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जो यह कर सकता है उसके साथ पूरी दुनिया है। जो यह नहीं कर सकता, वह अकेला ही रहेगा।" ऑडियो बुक LOK VYAVHAR BOOK #Audio Book - #ऑडियो बुक लोक व्यवहार, प्रभावशाली व्यक्तित्व की कला "जो यह कर सकता है उसके साथ पूरी दुनिया है। जो यह नहीं कर सकता, वह अकेला ही रहेगा।"

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 जो यह कर सकता है उसके साथ पूरी दुनिया है।

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लोक व्यवहार, प्रभावशाली व्यक्तित्व की कला

"जो यह कर सकता है उसके साथ पूरी दुनिया है।

जो यह नहीं कर सकता, वह अकेला ही रहेगा।"

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हैल्लो दोस्तो, नमस्कार, आदाव,

स्वागत है आपका मेरे चैनल पर

आज आपको लोक व्यवहार पुस्तक के

नए  चैपटर के   साथ

जिसका नाम है

"जो यह कर सकता है उसके साथ पूरी दुनिया है।

जो यह नहीं कर सकता, वह अकेला ही रहेगा।"

आईये शुरू करते हैं।

इस पुस्तक की ऑडियो बुक    

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#ऑडियो #बुक

- LOK VYAVHAR BOOK -

#Audio #Book - #ऑडियो #बुक  

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"जो यह कर सकता है उसके साथ पूरी दुनिया है।

जो यह नहीं कर सकता, वह अकेला ही रहेगा।"

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  गर्मियों में मैं अक्सर मैन नदी में मछलियाँ पकड़ने जाता था। व्यक्तिगत रूप से मुझे स्ट्रॉबेरी और क्रीम बहुत पसंद हैं, परंतु मैंने यह पाया कि किसी अजीब कारण से मछलियों को कीड़े पसंद थे। इसलिए जब मैं मछली पकड़ने जाता था, तो मैं इस बात पर ध्यान नहीं देता था कि मुझे क्या पसंद है। मैं हुक में स्ट्रॉबेरी और क्रीम का चारा नहीं लगाता था। इसके बजाय मैं कीड़े को मछली के सामने लटकाकर उससे पूछता था, "क्या आप इसे खाना पसंद करेंगी ?"

क्यों हम लोगों को आकर्षित करने के लिए भी इसी कॉमन सेंस का प्रयोग करें ?

यही ग्रेट ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज ने प्रथम विश्वयुद्ध में किया। जब किसी ने उनसे पूछा कि वे किस तरह सत्ता में बने रह पाए जबकि युद्धकाल के दूसरे नेता विल्सन, ऑरलैन्डो और क्लीमेन्च्यू भुला दिए गए, तो उन्होंने बड़ा अच्छा जवाब दिया। उनका जवाब था कि अगर उनके ऊपर बने रहने का कोई कारण बताया जा सकता है तो वह यह है कि उन्होंने सीख लिया था कि किस तरह मछली की पसंद के हिसाब से चारा लगाया जाए।

हम क्या चाहते हैं इस बारे में बात करने से क्या फ़ायदा? यह तो बचपना है। मूर्खता है। ज़ाहिर है कि आप जो चाहते हैं, उसमें आपकी रुचि है। आपकी उसमें गहरी और प्रबल रुचि है, परंतु किसी और की उसमें कोई रुचि नहीं है। हम सभी आप ही की तरह हैं। हम सब अपने आप में रुचि लेते हैं।

इसलिए दुनिया में लोगों को प्रभावित करने का इकलौता तरीक़ा यह है कि आप सामने वाले की इच्छाओं के हिसाब से बात करें और यह बताएँ कि वह अपनी इच्छाओं को किस तरह पूरा कर सकता है।

जब आप कल किसी से कोई काम करवाना चाहें, तो इस बात को याद रखें। उदाहरण के तौर पर अगर आप चाहते हैं कि आपके बच्चे सिगरेट पीना छोड़ दें, तो आप उन्हें डाँटिए मत, उन्हें भाषण मत दीजिए, यह मत बताइए कि आप क्या चाहते हैं। इसके बजाय उन्हें यह समझाइए कि अगर वे सिगरेट पिएँगे तो वे कभी बास्केटबॉल टीम में शामिल नहीं हो पाएँगे या एथलेटिक्स का कप नहीं जीत पाएँगे।

चाहे आप बच्चों या के साथ व्यवहार कर रहे हों या मवेशियों या चिंपाजियों के साथ, आपको यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर, एक दिन राल्फ़ वॉल्डो इमर्सन और उनका पुत्र एक बछड़े को तबेले में ले जाने की कोशिश कर रहे थे। परंतु उन्होंने अपनी इच्छाओं के हिसाब से सोचने की आम गलती कर दी : इमर्सन धक्का दे रहे थे और उनका पुत्र खींच रहा था। परंतु बछड़ा वही कर रहा था जो वे लोग कर रहे थे वह भी केवल अपनी इच्छा के बारे में सोच रहा था, इसलिए उसने अपने पैर सख्ती से जमा लिए और मैदान छोड़कर तबेले की तरफ़ बढ़ने के लिए राज़ी नहीं हुआ। आइरिश नौकरानी ने यह दृश्य देखा। वह निबंध और पुस्तकें तो नहीं लिख सकती थी, परंतु कम से कम इस मौके पर उसमें इमर्सन से ज़्यादा कॉमन सेंस था। उसने इस बारे में सोचा कि बछड़ा क्या चाहता है इसलिए उसने अपनी उँगली बछड़े के मुँह में रख दी। बछड़ा मज़े से उसकी उँगली चूसते हुए उसके पीछे-पीछे तवेले की तरफ चल दिया।

जब से आप पैदा हुए हैं तब से आपने जो कुछ भी किया है वह इसलिए किया है क्योंकि आपने कुछ न कुछ हासिल करना चाहा है। आपने रेड क्रॉस में जो चंदा दिया था, वह भी इस नियम का अपवाद नहीं है। आपने रेड क्रॉस में चंदा इसलिए दिया क्योंकि आप लोगों की मदद करना चाहते थे; आप एक सुंदर, निःस्वार्थ, दैवी कार्य करना चाहते थे। "जितना भी तुम मेरे इन ग़रीब भाइयों की मदद के लिए करते हो, वह तुम मेरे लिए करते हो।"

अगर आपके मन में ऐसा करने की चाहत आपके पैसे की चाहत से ज़्यादा न होती तो आप ऐसा कभी नहीं करते। या हो सकता है कि आपने यह चंदा इसलिए दिया हो क्योंकि आपको इंकार करने में शर्म आ रही हो या किसी ग्राहक ने आपसे ऐसा करने के लिए कहा हो। परंतु एक बात तो तय है। आपने रेड क्रॉस में योगदान इसलिए दिया क्योंकि आप कुछ चाहते थे।

अपनी प्रसिद्ध पुस्तक इन्फ्लुएंसिंग ह्यूमन बिहेवियर में हैरी ए. ओवरस्ट्रीट ने लिखा है "कर्म पैदा होता है हमारी मूलभूत इच्छा से ... और बिज़नेस, घर, स्कूल और राजनीति में दूसरों को काम करने के लिए प्रेरित करने वाले लोगों को सबसे बढ़िया सलाह यही दी जा सकती है सबसे पहले सामने वाले व्यक्ति में काम करने की प्रवल इच्छा जगाएँ। जो यह कर सकता है उसके साथ पूरी दुनिया है। जो यह नहीं कर सकता, वह अकेला ही रहेगा।"

एन्ड्रयू कारनेगी गरीबी में पले स्कॉटलैंड के किशोर थे जिन्होंने अपनी नौकरी की शुरुआत दो सेंट प्रति घंटे के काम से की थी और बाद में उन्होंने 365 मिलियन डॉलर दान में दिए। उन्होंने जीवन की शुरुआत में ही सीख लिया था कि लोगों को प्रभावित करने का इकलौता तरीक़ा सामने वाले की इच्छाओं के बारे में बात करना है। वे केवल चार साल तक ही स्कूल गए थे, परंतु उन्होंने यह सीख लिया था कि लोगों के साथ किस तरह व्यवहार किया जाता है।

एक बार की बात है। उनकी एक रिश्तेदार अपने दोनों बच्चों को लेकर बहुत परेशान थी। वे येल में थे और इतने व्यस्त थे कि उन्हें घर पर चि‌ट्ठी लिखने की याद ही नहीं रहती थी। यही नहीं, वे अपनी चितित माँ की चिट्ठियों का जवाब भी नहीं देते थे।

यह सुनकर कारनेगी ने सौ डॉलर की शर्त लगाई कि वे लौटती डाक से अपनी चिट्ठी का जवाब मँगाकर दिखाएँगे और मजेदार बात यह कि वे जवाब देने का आग्रह भी नहीं करेंगे। जब शर्त लग गई तो कारनेगी ने अपने भतीजों को एक बातूनी चिट्ठी लिखी और बाद में लिख दिया कि वे हर एक को पाँच डॉलर का नोट चिट्ठी के साथ भेज रहे हैं।

परंतु कारनेगी ने साथ में नोट भेजने का कष्ट नहीं किया।

लौटती डाक से उसकी चिट्ठियों का सचमुच जवाब आया, जिसमें "प्यारे अंकल एन्ड्रयू" को धन्यवाद दिया गया था और आप खुद समझ सकते होंगे कि इसके बाद क्या लिखा होगा।

अपनी बात मनवाने का एक और उदाहरण क्लीवलैंड, ओहियो के स्टैन नोवाक का है जिन्होंने हमारे कोर्स में भाग लिया।

स्टैन जब एक दिन शाम को घर लौटे तो उन्होंने देखा कि उनका सबसे छोटा पुत्र टिम ड्रॉइंग रूम के फर्श पर बैठा-बैठा पैर चला रहा है और चीख़ रहा है। उसे अगले दिन किंडरगार्टन स्कूल जाना शुरू करना था और वह स्कूल जाने के लिए तैयार नहीं था। स्टैन की सामान्य प्रतिक्रिया यह होती कि वह बच्चे को उसके कमरे में भेज दे और उससे सख्ती से कहे कि उसे स्कूल जाना ही है, और उसे स्कूल जाने की तैयारी कर लेनी चाहिए। उसके पास कोई विकल्प नहीं था। परंतु उस शाम उसे यह एहसास हुआ कि अगर ऐसा किया गया तो टिम सही मानसिकता से स्कूल नहीं जाएगा। इसलिए स्टैन बैठ गया और सोचने लगा, "अगर मैं टिम होता, तो मैं स्कूल जाने के लिए क्यों उत्साहित होता ?"

उसने और उसकी पत्नी ने कुछ ऐसी मज़ेदार चीज़ों की सूची बनाई जिनमें टिम की रुचि थी जैसे फ़िंगर पेंटिंग, गाना गाना, नए दोस्त बनाना। फिर वे लोग काम में जुट गए। "हम सबने किचन की टेबल पर फ़िंगर पेंटिंग शुरू कर दी मेरी पत्नी लिल, मेरे बड़े पुत्र बॉब और मुझे इसमें मजा आ रहा था। जल्दी ही टिम ने दरवाज़े के बाहर से झाँका। कुछ समय बाद उत्सने हमसे आग्रह किया कि हम इस खेल में उसे भी शामिल कर लें। 'अरे, नहीं, तुम्हें फ़िंगरपेंट करना सीखने के लिए पहले किडरगार्टन जाना पड़ेगा।' अपनी आवाज़ में पूरा उत्साह भरकर मैं उसके पहलू से उसे समझ में आने वाली भाषा में उसे बताता रहा कि किंडरगार्टन में जाने से उसे कितनी मजेदार बातें सीखने को मिलेंगी। अगली सुबह मुझे लग रहा था कि मैं सबसे जल्दी उठ गया था। परंतु जब में नीचे गया तो मैंने देखा कि टिम लिविंग रूम की कुर्सी पर बैठा-बैठा सो रहा था। 'तुम यहाँ क्या कर रहे हो?' मैंने पूछा 'मैं किंडरगार्टन जाने का इंतज़ार कर रहा हूँ। मैं लेट नहीं होना चाहता।' हमारे पूरे परिवार के उत्साह ने टिम में वह प्रबल आकांक्षा जगा दी थी जो किसी चर्चा या धमकी से पैदा नहीं हो सकती थी।"

हो सकता है कि कल आप किसी को किसी बात के लिए राज़ी करना चाहते हों। कुछ बोलने से पहले थोड़ा रुककर खुद से पूछें, "मैं इस आदमी या औरत में ऐसा करने की इच्छा कैसे जगा सकता हूँ?"

इस सवाल से हमें यह लाभ होगा कि हम बिना सोचे-समझे किसी भी परिस्थिति में कूदने से और अपनी इच्छाओं के बारे फ़ालतू की बातें करने से बच जाएँगे।

वहुत पहले मैं न्यूयॉर्क के एक होटल के बॉलरूम को बीस रातों के लिए किराए पर लेता था ताकि मैं वहाँ पर अनी व्याख्यानमाला आयोजित कर सकूँ।

एक सीज़न की शुरुआत में मुझे अचानक यह सूचना दी गई कि मुझे पहले से लगभग तीन गुना किराया देना पड़ेगा। यह ख़बर मुझ तक पहुँचने से पहले ही टिकट छप चुके थे, बँट चुके थे और व्याख्यानमाला का सारा प्रचार हो चुका था।

ज्ञाहिर था कि मैं बढ़ा हुआ किराया नहीं देना चाहता था। परंतु होटल चालों से इस बारे में बात करने से क्या फ़ायदा कि मैं क्या

चाहता था ? होटल का मैनेजर मेरी इच्छा के हिसाब से नहीं, अपनी इच्छा के हिसाब से काम करता था। दो दिन बाद में मैनेजर से मिलने गया।

मैंने मैनेजर से कहा, "मुझे आपका पत्र पढ़कर पहले तो धक्का लगा, पर मैं आपको दोष नहीं दे रहा हूँ। अगर मैं आपकी जगह होता, तो मैंने भी शायद इसी तरह का पत्र लिखा होता। होटल का मैनेजर होने के नाते अधिकतम लाभ कमाना आपका कर्तव्य है। अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो आपको नौकरी से निकाल दिया जाएगा और निकाल देना चाहिए। अब, आइए एक कागज़ लेकर यह लिखें कि किराया बढ़ाने से आपको कौन-कौन से लाभ और हानियां होंगी।"

 

मैंने एक काग़ज़ उठाया, उस पर बीचोंबीच एक लाइन खींची और एक कॉलम में "फ़ायदे" और दूसरे कॉलम में "नुक़सान" शीर्षक डाल दिया।

मैंने लाभ वाले कॉलम में लिखा, "बॉलरूम क्ली"। फिर मैंने कहा : "आपको यह फ़ायदा होगा कि डांस और दीगर समारोहों के लिए आपका बॉलरूम ख़ाली रहेगा। यह एक बहुत बड़ा लाभ है क्योंकि आपको इन आयोजनों से ज़्यादा किराया मिल जाएगा, जबकि अगर आप व्याख्यानमाला के लिए यह बॉलरूम किराए पर देते हैं तो इससे आपको कम पैसे मिलेंगे। अगर मैं बीस रातों तक इस बॉलरूम में डेरा डाले रहूँगा तो इससे निश्चित रूप से आपके हाथ से फ़ायदेमंद बिज़नेस के कई मौक़े निकल जाएँगे।

"अब हम हानियों पर ध्यान देते हैं। पहली बात तो यह कि मुझसे अपनी आमदनी बढ़ाने के बजाय आप अपनी आमदनी घटा रहे हैं। दरअसल आपको बिलकुल भी आमदनी नहीं होगी, क्योंकि आपने जितना किराया माँगा है, मैं उतना किराया नहीं दे सकता। मजबूरन मुझे यह व्याख्यानमाला किसी दूसरी जगह आयोजित करनी पड़ेगी।

"इसके अलावा आपको एक और नुक़सान भी होगा। व्याख्यानमाला के बहाने बहुत से सुशिक्षित और सुसंस्कृत लोग आपके होटल में आते हैं। यह आपके लिए अच्छा खासा विज्ञापन हो जाता है। देखा जाए तो अगर आप अखबारों में विज्ञापन देने में पाँच हजार डॉलर खर्च करें, तो भी आपके होटल में इतने लोग नहीं आएँगे जितने कि इस व्याख्यानमाला के माध्यम से आ जाते हैं। यह होटल के लिए अच्छी पब्लिसिटी है. है ना ?"

बोलते समय मैंने इन दोनों "नुक़सानों" को उनके निर्धारित कॉलम में लिख दिया और उस काग़ज़ को मैनेजर को देते हुए कहा, "मैं चाहूँगा कि आप अपने होटल को होने वाले फ़ायदों और नकसानों पर सावधानीपूर्वक विचार करें और फिर मुझे अपना अंतिम निर्णय बता दें।"

अगले ही दिन मुझे उसका पत्र मिला जिसमें लिखा हुआ था कि मेरा किराया 300 प्रतिशत के बजाय केवल 50 प्रतिशत ही बढ़ाया गया है।

गौर फरमाएँ, मुझे यह छूट तब मिली, जब मैंने इस बारे में एक शब्द भी नहीं कहा था कि मैं क्या चाहता था। मैंने सिर्फ़ सामने बाले व्यक्ति की रुचि के हिसाब से सोचा और उसे यह बताया कि वह अपनी मनचाही चीज़ कैसे हासिल कर सकता था।

मान लीजिए इसके बजाय मैंने वही किया होता जो स्वाभाविक तार पर हम सभी करते हैं, यानी मैं उसके ऑफ़िस में घुस गया होता और उससे कहता, "मेरा किराया तीन गुना बढ़ाने का क्या मतलब है जबकि आप जानते हैं कि टिकट छप चुके हैं और प्रचार हो चुका है ? तीन गुना किराया ! यह तो ज्यादती है! बेवकूफ़ी है! मैं इतना किराया हर्गिज़ नहीं दूँगा।"

तब क्या हुआ होता ? एक बहस, जिसमें दोनों तरफ़ से गर्मागर्मी होती, तनातनी होती और आप तो जानते ही हैं कि इस तरह की बहस का अंत किस तरह होता है। चाहे मैं उससे उसकी ग़लती मनवा लेता, परंतु अपने गर्व के कारण वह झुकने के लिए कभी तैयार नहीं होता और मेरी बात कभी नहीं मानता।

मानवीय संबंधों की कला के बारे में हेनरी फ़ोर्ड ने बड़ी सुंदर सलाह दी है, "अगर सफलता का कोई रहस्य है, तो हममें यह क्षमता हो कि हम सामने वाले का नजरिया और हम किसी घटना को अपने नज़रिए के साथ-साथ सामने वाले के नजरिए से भी देख सकें।"

यह इतना बढ़िया कोटेशन है कि मैं इसे एक बार फिर दोहराना चाहूँगा "अगर सफलता का कोई रहस्य है, तो वह पह है कि हममें सामने वाले का नजरिया समझने की योग्यता हो और हम किसी घटना को अपने नज़रिए के साथ-साथ सामने वाले के नज़रिए से भी देख सकें।"

यह इतना आसान है, इतना स्पष्ट है कि इसकी सच्चाई हमें पहली नज़र में ही समझ में आ जानी चाहिए, परंतु फिर भी १० प्रतिशत लोग १० प्रतिशत से भी ज़्यादा समय इसे नजरअंदाज करते हैं।

एक उदाहरण ? आज सुबह डाक से आए पत्रों को देखिए और आप पाएँगे कि उनमें से ज़्यादातर लोग कॉमन सेंस के इस महत्वपूर्ण सिद्धांत की अवहेलना करते हैं। इस पत्र को ही ले लें जो एक एडवर्टाइज़िंग एजेंसी के रेडियो डिपार्टमेंट के प्रमुख ने लिखा है, जिसके ऑफ़िस पूरे महाद्वीप में फैले हुए हैं। यह पत्र देश भर के सभी स्थानीय रेडियो स्टेशनों के मैनेजरों को भिजवाया गया था। (मैंने ब्रैकेट में हर पैरेग्राफ़ के बारे में अपनी प्रतिक्रिया लिखी है।)

"मिस्टर जॉन ब्लैंक,

ब्लैंकविले, इंडियाना

डियर मिस्टर ब्लैंक :

कंपनी रेडियो के क्षेत्र में एडवर्टाइज़िंग एजेंसी के शिखर पर अपनी स्थिति को बनाए रखना चाहती है।"

(इस बात की किसे परवाह है कि तुम्हारी कंपनी क्या चाहती है। मैं अपनी खुद की समस्याओं को लेकर परेशान हूँ। बैंक मेरे घर के क़र्ज़ को फ़ोरक्लोज़ कर रही है, स्टॉक मार्केट कल नीचे गिर गया।

मेरी आज सुबह की सवा आठ बजे वाली ट्रेन छूट गई। मुझे पिछली रात को जोन्स परिवार के यहाँ होने वाले डांस में नहीं बुलाया गया। डॉक्टर कहता है कि मुझे हाई ब्लड प्रेशर है और न्यूराइटिस और डैन्डफ़ भी है। और इसके बाद क्या होता है? मैं हैरान-परेशान ऑफिस आता हूँ, अपनी डाक खोलता हूँ और वहाँ न्यूयॉर्क में बैठा कोई घमंडी आदमी इस बात की शेखी बघारता है कि उसकी कंपनी क्या चाहती है। बकवास ! अगर उसे इस बात का एहसास होता कि उसके पत्र का क्या प्रभाव पड़ेगा, तो उसने एडवर्टाइज़िंग बिज़नेस को छोड़कर शीप डिप बनाने का बिज़नेस शुरू कर दिया होता।)

"इस एजेंसी के राष्ट्रीय एडवर्टाइज़िंग अकाउंट्स नेटवर्क के आधारस्तंभ थे। हम हर साल इतना अधिक विज्ञापन करते हैं कि हम बाक़ी एजेंसियों से आगे हैं और इस बिज़नेस में नंबर वन पर हैं।"

(तुम बहुत बड़े हो, अमीर हो और नंबर वन हो, क्या सचमुच ? तो उससे क्या फ़र्क़ पड़ता है? मुझे रत्ती भर भी फ़र्क नहीं पड़ता चाहे तुम अमेरिका के जनरल मोटर्स और जनरल इलेक्ट्रिक और जनरल स्टाफ़ जितने बड़े हो जाओ। अगर तुममें चिड़िया जितनी भी बुद्धि होती तो तुम्हें यह एहसास होना चाहिए था कि मेरी रुचि इस बात में है कि मैं कितना बड़ा हूँ- न कि इस बात में कि तुम कितने बड़े हो। तुम्हारी इस अभूतपूर्व सफलता की चर्चा से मैं खुद को छोटा और महत्वहीन समझने लगा हूँ।)

"हम चाहते हैं कि रेडियो द्वारा अपने ग्राहकों की ऐसी सेवा करें जो सबसे बेहतर हो।"

(तुम चाहते हो! तुम चाहते हो। वज्र मूर्ख। मेरी इस बात में कोई रुचि नहीं है कि तुम क्या चाहते हो या अमेरिका का राष्ट्रपति क्या चाहता है। मैं तुम्हें आख़िरी बार बता दूँ कि मेरी रुचि इस बात में है कि मैं क्या चाहता हूँ और तुमने अपने बेवकूफ़ी भरे इस पत्र में अब तक इस बारे में एक शब्द भी नहीं लिखा है।)

"इसलिए क्या आप कंपनी का नाम साप्ताहिक स्टेशन जानकारी की अपनी विशेष सूची में जोड़ेंगे ? बुद्धिमत्तापूर्ण बुकिंग टाइम के लिए विस्तृत जानकारी एजेंसी के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।"

 

("विशेष" सूची। तुम्हारी यह मजाल ! पहले तो तुमने अपनी कंपनी का गुणगान करके मुझे महत्वहीन होने का एहसास कराया और अब तुम मुझसे यह अपेक्षा करते हो कि मैं तुम्हारी कंपनी का नाम "विशेष" सूची में लिख दूँगा। और तो और, तुमने इस आग्रह के साथ "कृपया" लिखने का कष्ट भी नहीं किया।)

"इस पत्र की तत्काल पावती भेजें, और बताएँ कि आप वर्तमान में क्या कर रहे हैं? आशा है कि पारस्परिक सहयोग से हम दोनों को ही लाभ होगा।"

(अरे मूर्ख! तुमने मुझे एक घटिया सा पत्र भेजा एक ऐसा पत्र जो पतझड़ की पत्तियों की तरह इधर-उधर बिखरा हुआ है और जब मैं अपने क़र्ज़, अपने ब्लड प्रेशर के बारे में चिंतित हूँ, उस समय तुम मुझसे यह उम्मीद कर रहे हो कि मैं बैठकर तुम्हारे पत्र की पावती भेजूँ और वह भी "तत्काल।" "तत्काल" से तुम्हारा क्या मतलब है? क्या तुम यह नहीं जानते कि मैं भी उतना ही व्यस्त हूँ जितने कि तुम या, कम से कम, मैं अपने आप को व्यस्त समझना पसंद करता हूँ। और जब हम इस विषय पर बात कर ही रहे हैं, तो मैं यह जानना चाहता हूँ कि तुम्हें यह अधिकार किसने दिया है कि तुम मुझ पर हुक्म चलाओ ?... तुम कहते हो कि इससे हम दोनों को ही लाभ होगा। आख़िरकार, आख़िरकार तुमने मेरे नज़रिए से देखा तो सही। परंतु इसमें मुझे क्या लाभ होगा, इस बारे में तो तुमने स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं लिखा।)

आपका,

जॉन डो

मैनेजर रेडियो डिपार्टमेंट

पुनःश्च : ब्लैंकविले जरनल से संलग्न रिप्रिंट आपको पसंद आएगा और आप इसे अपने स्टेशन पर ब्रॉडकास्ट करना चाहेंगे।

(आखिरकार, पुनःश्च वाले कॉलम में तुमने किसी ऐसी चीज का जिक किया है जो मेरे काम की है। तुमने इसी बात से अपना पत्र शुरू क्यों नहीं किया- परंतु अब क्या फ़ायदा ? कोई भी एडवर्टाइजिंग का आदमी जो इतनी सारी बकवास लिखने का अपराधी हो वह जरूर किसी मानसिक रोग से ग्रस्त होगा। तुम्हें यह जानने की क्या ज़रूरत है कि हम वर्तमान में क्या कर रहे हैं? तुम्हें तो अपनी धायरॉइड ग्लैंड में थोड़े से आयोडीन की ज़रूरत है।)

 

जिन लोगों ने अपना जीवन एडवर्टाइज़िंग में समर्पित किया है और जो लोग दूसरे लोगों को ख़रीदने के लिए प्रभावित करने की कला के विशेषज्ञ होने का दावा करते हैं- अगर वे लोग ही ऐसी चिटठी लिखते हैं, तो हम बुचर और बेकर या ऑटो मैकेनिक से क्या उम्मीद कर सकते हैं ?

यहाँ एक और पत्र दिया जा रहा है जो एक बड़े प्लेट टर्मिनल के सुपरिंटेंडेंट ने हमारे कोर्स के एक विद्यार्थी एडवर्ड वर्मिलन को लिखा था। इस पत्र का पाने वाले पर क्या प्रभाव पड़ा ? पहले इसे पढ़ लीजिए और फिर मैं आपको इस बारे में बताता हूँ।

ए. ज़ेरेगाज़ संस, इंक.

28 फ्रंट स्ट्रीट,

झुकलिन, न्यूयॉर्क 11201

प्रति : मिस्टर एडवर्ड वर्मिलन

महोदय,

चूँकि हमारे ग्राहक अपना अधिकांश माल शाम को भिजवाते हैं, इसलिए उस माल को बाहर भिजवाने में हमें काफ़ी मुश्किल आती है। इस वजह से हमारे यहाँ भीड़ हो जाती है, हमारे कर्मचारियों को ओवरटाइम करना पड़ता है, हमारे ट्रक देर से निकल पाते हैं और कई बार तो माल भी देर से पहुँच पाता है। 10 नवंबर को आपकी कंपनी ने 510 वस्तुओं का लॉट हमारे यहाँ भेजा, जो हमें शाम को 4:20 पर मिला।

देर से माल मिलने के कारण होने वाली परेशानियों से निबटने के लिए हम आपका सहयोग चाहते हैं। क्या हम आपसे यह अपेक्षा रख सकते हैं कि जब भी आपको माल भिजवाना हो, जैसा उक्त दिनांक को हुआ था, तो आप यह कोशिश करें कि या तो आपका ट्रक हमारे यहाँ जल्दी पहुँच जाए या फिर आप माल का कुछ हिस्सा सुबह भिजवा दें?

इस तरह की व्यवस्था से आपको यह लाभ होगा कि आपके ट्रक जल्दी ख़ाली हो जाएँगे और आपको यह निश्चिंतता भी होगी कि आपका माल सही समय पर उसी दिन रवाना हो जाएगा।

आपका, जे- बी- सुपरिंटेंडेंट

इस पत्र को पढ़कर ए. झेरेगाज़ सन्स, इंक. के सेल्स मैनेजर मिस्टर वर्मिलन की प्रतिक्रिया क्या हुई, यह उन्होंने मुझे लिखकर भिजवाई : "इस पत्र का मुझ पर उल्टा ही असर हुआ। इस पत्र की शुरुआत में उन्होंने अपनी समस्याओं का रोना रोया था, जिसमें मेरी ज़रा भी रुचि नहीं थी। फिर हमसे सहयोग माँगा गया था और इस बात का क़तई विचार नहीं किया गया था कि इससे हमें क्या असुविधा होगी। और आख़िरी पैरेग्राफ़ में इस तथ्य का उल्लेख किया गया था कि अगर हम सहयोग करेंगे तो इससे हमें यह फ़ायदा होगा कि हमारा माल उसी दिन तत्काल रवाना हो जाएगा।

"दूसरे शब्दों में, जिस बात में हमारी सबसे ज़्यादा रुचि थी, उसे सबसे बाद में लिखा गया था और इसीलिए पत्र का प्रभाव सकारात्मक होने के बजाय नकारात्मक पड़ा।"

चलिए देखते हैं कि क्या इस पत्र में हेरफेर करके हम इसे सुधार सकते हैं? हम अपनी समस्याओं के बारे में बात करने में एक मिनट भी बर्बाद नहीं करेंगे। हम हेनरी फ़ोर्ड की दी हुई हिदायत का ध्यान रखेंगे कि "हम सामने वाले का नज़रिया समझ सकें और हम किसी घटना को अपने नज़रिए के साथ-साथ सामने वाले के इस पत्र को रिवाइज़ करने का एक तरीका यह है। हो सकता है कि यह सर्वश्रेष्ठ तरीका न हो, परंतु क्या यह पिछले पत्र से बेहतर नहीं है?

मिस्टर एडवर्ड वर्मिलन, ए. झेरेगाज़ सन्स, इंक. 28 फ्रंट स्ट्रीट, ब्रुकलिन, न्यूयॉर्क 11201

प्रिय मिस्टर वर्मिलन,

आपकी कंपनी पिछले चौदह सालों से हमारी अच्छी ग्राहक है। स्वाभाविक रूप से हम इस बात के लिए कृतज्ञ हैं कि आप इतने लंबे समय से हमारे ग्राहक हैं। हम आपको बेहतर और त्वरित सेवाएँ देना चाहते हैं जिनके आप हक़दार हैं। परंतु हमें खेद है कि जब आपके ट्रक शाम को देर से माल लेकर हमारे यहाँ आते हैं (जैसा 10 नवंबर को हुआ था), तो हमारे लिए ऐसा करना हमेशा संभव नहीं हो पाता। ऐसा क्यों ? क्योंकि कई दूसरे ग्राहक भी शाम को देर से अपना माल भिजवाते हैं। ज़ाहिर है, इस वजह से हमारे यहाँ भीड़ हो जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि आपके ट्रकों को यहाँ पर ज़्यादा देर तक बेवजह रुकना पड़ता है और इस कारण कई बार तो आपका माल भी देर से पहुँचता है।

ऐसा नहीं होना चाहिए और इससे बचा जा सकता है। अगर आप अपना माल यथासंभव सुबह के समय पहुँचा दें, तो आपके ट्रक जल्दी ख़ाली हो सकेंगे, आपका माल बिना देरी के समय पर पहुँच सकेगा और हमारे कर्मचारी आपके बनाए हुए मैकरोनी और नूडल्स का बेहतरीन डिनर लेने के लिए जल्दी घर पहुँच सकेंगे।

वैसे आपका माल कभी भी आए, हमें आपको त्वरित सेवा देने में खुशी होगी।

आप व्यस्त होंगे। इसलिए कृपया इस पत्र का जवाब देने का कष्ट न करें।

आपका,

जे- बी- सुपरिंटेंडेंट

न्यूयॉर्क की एक बैंक में काम करने वाली बारबरा एंडरसन अपने बच्चे के स्वास्थ्य के कारण फीनिक्स, एरिज़ोना में रहना चाहती थी। हमारे कोर्स में सीखे गए सिद्धांतों का प्रयोग करते हुए उसने फीनिक्स के बारह बैंकों को यह पत्र लिखा :

डियर सर,

आपकी तेज़ी से बढ़ रही बैंक के लिए मेरा दस वर्ष का अनुभव काफ़ी काम का हो सकता है।

न्यूयॉर्क की बैंकर्स ट्रस्ट कंपनी में ब्रांच मैनेजर के वर्तमान पद तक आते-आते मैं कई पदों पर काम कर चुकी हूँ। मैं बैंकिंग के सभी पहलुओं के काम जैसे क्रेडिट, लोन, टेलर और प्रशासन इत्यादि अच्छी तरह सीख चुकी हूँ।

मैं मई में फीनिक्स में रहने के लिए आ रही हूँ और मुझे विश्वास है कि मैं आपकी बैंक के विकास और लाभ में अपना योगदान दे सकती हूँ। मैं 3 अप्रैल वाले सप्ताह में फीनिक्स में रहूँगी और मैं आपको यह दिखाना चाहूँगी कि मैं किस तरह आपके बैंक के लक्ष्यों को हासिल करने में आपकी मदद कर सकती हूँ।

धन्यवाद,

बारबरा एल. एंडरसन

आपको क्या लगता है मिसेज़ एंडरसन को इस पत्र का जवाब मिला होगा ? बारह में से ग्यारह बैंकों ने उन्हें इंटरव्यू का लेटर भेजा और उनके पास विकल्प था कि वे नौकरी के लिए अपनी पसंद का बैंक चुन सकें। क्यों? क्योंकि मिसेज एंडरसन ने यह नहीं बताया से किस तरह उनकी मदद कर सकती थीं और उन्होंने अपना पूरा ध्यान उनकी इच्छाओं पर दिया था, अपनी इच्छाओं पर नहीं। या कि वे क्या चाहती थीं, बल्कि अपने पत्र में उन्होंने लिखा था कि

हजारों सेल्समैन आज फुटपाथ पर निराश, हताश और थके उन्हें किस चीज की ज़रूरत है ? वे कभी यह सोचते ही नहीं हैं कि हुए घूम रहे हैं। क्यों ? क्योंकि वे हमेशा यही सोचते रहते हैं कि आप या मैं कोई चीज़ खरीदना नहीं चाहते हैं। परंतु हम दोनों ही अपनी समस्याओं को सुलझाने में हमेशा रुचि रखते हैं। अगर मेल्समेन हमें यह बता सकें कि उनकी सेवाओं या माल से हमारी समस्याएँ किस तरह सुलझ सकती हैं, तो उन्हें अपना सामान बेचने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, हम अपने आप उनका सामान खरीदेंगे। और ग्राहकों को यह नहीं लगना चाहिए कि उन्हें सामान बेचा जा रखा है, बल्कि उन्हें यह लगना चाहिए कि वे सामान ख़रीद रहे हैं।

फिर भी बहुत से सेल्समैन ज़िंदगी भर ग्राहक के नज़रिए से स्थिति को नहीं देख पाते। एक उदाहरण लें। मैं कई साल फ़ॉरेस्ट हिल्स में रहा, जो ग्रेटर न्यूयॉर्क के केंद्र में निजी मकानों की छोटी सी कॉलोनी थी। एक दिन जब मैं स्टेशन की तरफ़ तेज़ी से जा रहा या, तो मेरी मुलाक़ात एक रियल एस्टेट ऑपरेटर से हुई जो उस इलाके में बरसों से प्रॉपर्टी ख़रीदने और बेचने का काम कर रहा था। उसे फॉरेस्ट हिल्स की अच्छी जानकारी थी,

 

इसलिए मैंने उससे जल्दी में पूछा कि मेरा स्टको घर किस चीज़ से बना है, मेटल लैथ से या हॉलो टाइल से। उसने कहा कि उसे नहीं मालूम। और उसने मुझे एक ऐसी बात बताई जो मैं पहले से ही जानता था कि मैं यह जानकारी फ़ॉरेस्ट हिल्स गार्डन एसोसिएशन से ले सकता हूँ। अगली सुबह मुझे उसका पत्र मिला। क्या उसने पत्र में मेरे द्वारा चाही जानकारी दी ? उसे वह जानकारी टेलीफ़ोन के माध्यम से एक मिनट में मिल सकती थी। परंतु उसने इतना सा कष्ट भी नहीं किया। उसने मुझे एक बार फिर बताया कि मैं टेलीफ़ोन करके यह आनकारी ले सकता हूँ और इसके बाद उसने यह आग्रह किया कि मैं उससे अपना बीमा करवा लूँ।

मेरी मदद करने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह केवल खुद की मदद करने में दिलचस्पी ले रहा था।

बर्मिंघम, अलाबामा के जे. हॉवर्ड ल्यूकास ने हमें एक ही कंपनी के दो सेल्समैनों के बारे में बताया जिन्होंने एक ही तरह की स्थिति में अलग-अलग तरह से काम किया।

"कई साल पहले मैं एक छोटी कंपनी की मैनेजमेंट टीम में था। हमारे ऑफ़िस के पास ही एक बड़ी बीमा कंपनी का डिस्ट्रिक्ट हेडक्वार्टर था। उनके एजेंटों को इलाक़े बाँट दिए गए थे और हमारी कंपनी दो एजेंटों के हिस्से में आई थी, जिन्हें में कार्ल और जॉन का नाम देना चाहूँगा।

"एक सुबह कार्ल हमारे ऑफ़िस में आया और उसने बातों-बातों में यूँ ही यह ज़िक्र किया कि उसकी कंपनी ने एक्ज़ीक्यूटिव्ज़ के लिए हाल ही में एक नई बीमा पॉलिसी शुरू की है, जिसमें हमारी बाद में दिलचस्पी हो सकती है और जब पॉलिसी के पूरे डिटेल्स आ जाएँगे तब वह हमारे पास आएगा।

"उसी दिन, जॉन ने हमें कॉफ़ी ब्रेक के बाद फुटपाथ पर वापस लौटते हुए देखा और उसने चिल्लाकर कहा, 'ल्यूक, ज़रा ठहरो। मेरे पास आप लोगों के लिए एक बढ़िया ख़बर है।' उसने जल्दी में और बहुत रोमांचित होकर हमें बताया कि उसी दिन उसकी कंपनी ने एक बेहतरीन पॉलिसी शुरू की है। (इसी पॉलिसी का ज़िक्र कार्ल ने हल्के-फुल्के ढंग से किया था।) जॉन ने कहा कि क्यों न हम लोग इसके पहले ग्राहक बन जाएँ। उसने हमें कवरेज के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी दी और अपनी बात यह कहते हुए समाप्त की, 'यह पॉलिसी इतनी नई है कि मैं अपने ऑफ़िस से पूरी जानकारी कल ही ले लूँगा। इस बीच हम औपचारिकताएँ पूरी कर लें और अपने आवेदन पर हस्ताक्षर करके उन्हें भिजवा दें ताकि कंपनी व्यक्तिगत रूप से पूरी जानकारी दे सके।'

 

उसके उत्साह और रोमांच से हम भी उत्साहित और रोमांचित हो गए हालाँकि हमारे पास उस बालिसी के बारे में पूरी जानकारी नहीं थी। जब हमें पूरी जानकारी बिली, तो वह जॉन की बताई जानकारी के अनुरूप ही थी और इसका नतीजा यह हुआ कि जॉन ने न सिर्फ हममें से हर एक को लिसी बेच दी, बल्कि बाद में हमारे कवरेज को दुगुना भी कर दिया।

"कार्ल भी हमें यह पॉलिसी बेच सकता था, परंतु उसने हममें न पॉलिसियों के प्रति इच्छा जगाने की कोई कोशिश ही नहीं की

दुनिया में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो स्वार्थी हैं और खुद का भला करना चाहते हैं। इस वजह से उस दुर्लभ व्यक्ति को बहुत लाभहोता है जो निःस्वार्थ भाव से दूसरों की मदद करना चाहता है। इसके बहुत कम प्रतियोगी होते हैं। प्रसिद्ध वकील और अमेरिका के महान बिज़नेस लीडर ओवेन डी. यंग ने एक बार कहा था "जो लोग खुद को दूसरों की जगह रख सकते हैं, जो उनके दिमाग के काम करने की प्रक्रिया को समझ सकते हैं, उन्हें इस बात की चिंता करने की कभी ज़रूरत नहीं होनी चाहिए कि उनका भविष्य कैसा होगा।"

अगर आप इस पुस्तक से सिर्फ़ यही एक बात सीख लें कि किस तरह दूसरे व्यक्ति के नज़रिए से सोचा जाए और स्थिति को दूसरों के नज़रिए से देखा जाए तो यह आपके करियर की प्रगति में आधारस्तंभ साबित हो सकती है।

दूसरे व्यक्ति के नज़रिए से स्थिति को देखने और उसमें इच्छा जगाने का यह मतलब नहीं है कि आप सामने वाले का शोषण करना चाहते हैं और उससे ऐसा कोई काम करवाना चाहते हैं जिससे उसे नुक़सान हो और आपको फ़ायदा। इससे दोनों को फायदा होना चाहिए। मिस्टर वर्मिलन को लिखे पत्र में दिए गए सुझावों पर अमल करने से पत्र भेजने वाले और पत्र पाने वाले दोनों को ही लाभ हुआ। बैंक और मिसेज़ एंडरसन दोनों को ही उस पत्र से लाभ हुआ क्योंकि बैंक को एक बढ़िया कर्मचारी मिल गया और मिसेज़ एंडरसन को एक अच्छी नौकरी मिल गई। और बीमे के उदाहरण में भी जॉन को मिस्टर ल्यूकास के बीमे का कमीशन मिला और मिस्टर ल्यूकास को एक बढ़िया बीमा पॉलिसी मिल गई।

दूसरे व्यक्ति में काम करने की इच्छा जगाने का और दोनों ही पक्षों को लाभ पहुँचने का एक और उदाहरण हमें शेल ऑइल कंपनी के माइकल ई. व्हिडन के अनुभव से मिलता है। माइकल वारविक, रोड आइलैंड में इस कंपनी का टेरिटरी सेल्समैन है। माइक अपने जिले का नंबर वन सेल्समैन बनना चाहता था,

परंतु एक सर्विस स्टेशन के कारण वह नंबर वन सेल्समैन नहीं बन पा रहा था। इस स्टेशन का मालिक बुजुर्ग था और वह इसके आधुनिकीकरण के लिए राज़ी नहीं हो रहा था। उस स्टेशन की हालत बहुत ख़राब थी और इसलिए वहाँ पर बिक्री लगातार घटती जा रही थी।

स्टेशन के आधुनिकीकरण के बारे में माइक के आग्रहों को मैनेजर अनसुना कर देता था। कई प्रयासों और लंबी चर्चाओं के बाद - जिनका कोई फ़ायदा नहीं हुआ माइक ने यह फ़ैसला किया कि वह मैनेजर को अपने इलाक़े का सबसे नया शेल स्टेशन दिखाएगा।

मैनेजर नए स्टेशन की सुविधाओं से बहुत प्रभावित हुआ और जब माइक अगली बार उससे मिलने गया तो उसने देखा कि उसने अपने स्टेशन का आधुनिकीकरण करवा लिया था और उसकी बिक्री भी बढ़ गई थी। इस वजह से माइक अपने जिले में नंबर वन स्पॉट पर पहुँच गया। बातों से, चर्चाओं से कोई फ़ायदा नहीं हुआ था, परंतु मैनेजर के मन में तीव्र इच्छा जगाने से, उसे आधुनिक स्टेशन दिखाने से उसने अपने लक्ष्य को हासिल कर लिया था। और इससे मैनेजर और माइक दोनों को ही फ़ायदा हुआ।

ज़्यादातर लोग कॉलेज में जाते हैं और वे वर्जिल पढ़ना सीख लेते हैं या वे कैलकुलस के रहस्य जान लेते हैं परंतु वे यह नहीं जान पाते कि उनके मस्तिष्क किस तरह काम करते हैं। उदाहरण के तौर पर मैंने एक बार इफ़ैक्टिव स्पीकंग पर युवा कॉलेज ग्रैजुएट्स के लिए एक कोर्स आयोजित किया। यह सभी युवा एक बड़े एयरकंडीशनर निर्माता करियर कॉरपोरेशन के कर्मचारी बनने वाले थे। एक प्रतिभागी दूसरों से यह बात मनवाना चाहता था कि खाली समय में बास्केटबॉल खेलें और उसने अपनी बात को इस स्केटबॉल खेलना चाहता हूँ, परंतु जब भी मैं जिम जाता है मुझे ह से कहा: "मैं चाहता हूँ कि तुम लोग बास्केटबॉल खेलो। मैं पर गेम शुरू करने के लिए पर्याप्त लोग नहीं मिलते। हममें से तीन लोगों ने पिछली रात को बॉल इधर-उधर फेंकी थी। मैं आता है कि आप सब आज रात को जिम आएँ। मैं बास्केटबॉल हलना चाहता हूँ।"

क्या उसने इस बारे में बात की कि आप क्या चाहते हैं? आप ने जिम्नैशियम में नहीं जाना चाहते जहाँ कोई नहीं जाता। आपको म बात की कोई परवाह नहीं है कि वह क्या चाहता है।

क्या वह आपको बता सकता था कि आपको जिम क्यों जाना बीए, आपको जिम जाने से क्या लाभ मिलेंगे ? बिलकुल । ज़्यादा उनाह। अच्छी भूख। ज़्यादा तेज़ दिमाग। आनंद। गेम्स। बास्केटबॉल ।

मैं प्रोफ़ेसर ओवरस्ट्रीट की बुद्धिमत्तापूर्ण सलाह को एक बार और दोहराना चाहूँगा : सबसे पहले सामने वाले व्यक्ति में काम करने की प्रबल इच्छा जगाएँ। जो यह कर सकता है उसके साथ पूरी अनिया है। जो यह नहीं कर सकता, वह अकेला ही रहेगा।

हमारे ट्रेनिंग कोर्स का एक विद्यार्थी अपने छोटे बच्चे को लेकर पाशान था। बच्चे का वज़न कम था और वह ठीक से खाना नहीं बाता था। उसके माँ-बाप ने उसी तरीके का इस्तेमाल किया जिसका इतमाल आम तौर पर लोग करते हैं। वे उसे डाँटते-फटकारते रहे, उसके पीछे पड़े रहे। "मम्मी चाहती हैं कि तुम यह खाओ।" "पापा बाहते हैं कि तुम जल्दी से बड़े हो जाओ।"

क्या बच्चे ने इन बातों पर ध्यान दिया ? उतना ही, जितना बाम बालू से भरे समुद्रतट पर बालू के एक कण की तरफ़ देते हैं।

जिसमें थोड़ी सी भी बुद्धि होगी वह यह उम्मीद नहीं करेगा कि साल का छोटा बच्चा अपने तीस साल के पिता के नजरिए को झसकेगा। परंतु उसके पिता उससे ठीक यही उम्मीद कर रहे थे।

यह तो सरासर बेवकूफ़ी थी। पर आखिरकार पिता को अपनी गलती का एहसास हो गया। इसके बाद उन्होंने खुद से पूछा, "बच्चा क्या चाहता है? मैं अपनी इच्छा को उसकी इच्छा कैसे बना सकता हूँ ?

जब उसके पिता ने इस तरह सोचना शुरू किया तो उनके लिए समस्या का हल ढूँढ़ना आसान हो गया। बच्चे के पास एक तिपहिया साइकल थी और ब्रुकलिन के अपने घर के सामने की सड़क पर साइकल चलाना उसे बहुत पसंद था। इसी मोहल्ले में कुड घर छोड़कर एक बड़ा बच्चा रहता था जो इस छोटे बच्चे की तिपहिया साइकल छीन लेता था और खुद चलाने लगता था।

स्वाभाविक रूप से इसके बाद छोटा बच्चा दौड़कर अपनी माँ से शिकायत करता था और माँ आकर उस बड़े बच्चे को साइकल पर से उतरवाकर छोटे बच्चे को फिर से साइकल दिलवा देती थी। यह लगभग हर रोज़ होता था।

छोटा बच्चा क्या चाहता था, यह जानने के लिए किसी शरलॉक होम्स की ज़रूरत नहीं थी। उसका गर्व, उसका क्रोध, महत्वपूर्ण दिखने की उसकी इच्छा- जो उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण थे यह चाहते थे कि वह उस बड़े गुंडे से बदला ले, उसकी नाक पर मुक्का मारकर उसे धूल चटा दे। और जब उसके पिता ने उसे समझाया कि अगर वह अपनी माँ के कहे अनुसार अच्छी तरह से खाएगा तो एक दिन वह उस गुंडे को पीट सकेगा।

 

एक बार बच्चे को यह समझ में आ गया कि अच्छी तरह से खाने पर वह उस गुंडे की पिटाई कर सकेगा जब उसके पिता ने उससे यह वादा किया कि ऐसा सचमुच होगा तो फिर बच्चे ने अपनी माँ के बताए अनुसार खाना शुरू कर दिया। वह बच्चा पालक, हरी सब्ज़ियाँ, फल सब कुछ खाने लगा सिर्फ़ इसलिए ताकि वह इतना बड़ा हो जाए कि उस बड़े गुंडे की पिटाई कर सके जो उसका अक्सर अपमान किया करता था।

इस समस्या के बाद माँ-बाप ने दूसरी समस्या पर ध्यान दिया : बच्चे की आदत थी कि वह रात को अपना बिस्तर गीला कर  देता था।

वह अपनी दादी के साथ सोता था। सुबह दादी उठती थी. विस्तर छूती थी और कहती थी, "देखो, जॉनी, तुमने आज रात को बिस्तर में फिर सू सू कर दी।"

बच्चा जवाब देता था, "नहीं, दादी। मैंने नहीं की। आपने ही की होगी।"

डॉटने से चीखने-चिल्लाने से, उसे शर्मिंदा करने से, बार-बार को यह पसंद नहीं है- किसी भी उपाय से समस्या नहीं सुलझी। यह बताने से कि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि माता-पिता माँ-बाप ने अपने आप से पूछा, "हम बच्चे के मन में यह इच्छा कैसे पैदा करें कि वह बिस्तर गीला न करे?"

वह बच्चा क्या चाहता था। पहली बात तो यह कि वह दादी की तरह नाइटगाउन नहीं पहनना चाहता था, बल्कि अपने डैडी की तरह पाजामा पहनना चाहता था। दादी उसकी रात की हरकतों से परेशान हो चली थीं, इसलिए उन्होंने खुशी-खुशी यह प्रस्ताव रखा कि अगर वह बिस्तर गीला करने की आदत छोड़ देगा तो वे उसे पाजामा दिलवा देंगी। दूसरी बात यह कि बच्चा अपना अलग बिस्तर चाहता था। दादी ने उसकी यह बात भी मान ली।

उसकी माँ उसे ब्रुकलिन के एक डिपार्टमेंट स्टोर में लेकर गई। और सेल्सगर्ल को आँख का इशारा करते हुए कहा : "यह छोटे महाशय कुछ शॉपिंग करना चाहते हैं।"

सेल्सगर्ल ने उसे महत्व देते हुए कहा 'यंग मैन, मैं आपको क्या दिखाऊँ ?'

वह पूरी ऊँचाई तक तनकर खड़ा हो गया और उसने कहा, "मैं अपने लिए एक बिस्तर ख़रीदना चाहता हूँ।"

जब उसे वह बिस्तर दिखाया गया जो उसकी माँ उसके लिए खरीदना चाहती थी तो माँ ने सेल्सगर्ल को आँख का इशारा कर दिया और सेल्सगर्ल ने छोटे बच्चे को उस बिस्तर को ख़रीदने के लिए राज़ी कर लिया।

अगले दिन बिस्तर घर पहुँच गया। और उस रात जब उसके पिता घर लौटकर आए तो बच्चा दरवाज़े तक दौड़ता हुआ गया और चिल्लाते हुए उन्हें बताया, "डैडी! डैडी! ऊपर आओ, मेरा नया बिस्तर देखो, मैंने इसे खरीदा है।"

पिता ने बिस्तर देखा और चार्ल्स श्वाब की सलाह का पालन करते हुए उसकी दिल खोलकर तारीफ की और मुक्त कंठ से सराहना की।

इसके बाद पिता ने पूछा, "तुम इस बिस्तर को तो गीला नहीं करोगे ?"

बच्चे ने कहा, "अरे नहीं, बिलकुल नहीं! इस बिस्तर को गीला करने का तो सवाल ही नहीं उठता।" बच्चे ने अपना वादा निभाया। आख़िर इससे उसकी इच्छा, उसका गर्व जुड़ा हुआ था। उसने अपने लिए खुद की मर्जी से नया बिस्तर ख़रीदा था और उस पर वह अपना नया पाजामा पहनकर सोया था। वह एक बड़े आदमी की तरह व्यवहार करना चाहता था और उसने ऐसा ही किया।

एक और पिता के. टी. डचमैन एक टेलीफोन इंजीनियर थे। हमारे कोर्स के यह विद्यार्थी भी अपनी तीन साल की बेटी को नाश्ता करने के लिए तैयार नहीं कर पाते थे। बच्ची पर डाँटने-फटकारने, मनाने, बहलाने-फुसलाने का कोई असर नहीं हुआ। माता-पिता ने खुद से पूछा, "हम किस तरह इसमें खाने की इच्छा पैदा कर सकते हैं?"

छोटी बच्ची को अपनी माँ की नक़ल करने में बड़ा मज़ा आता था। वह चाहती थी कि वह जल्दी से बड़ी हो जाए। इसलिए एक सुबह उन्होंने बच्ची को कुर्सी पर बिठा दिया और उसे अपना नाश्ता बनाने दिया। जब छोटी बच्ची कड़ाही में अपना नाश्ता हिला रही थी तो योजना के हिसाब से इसी मनोवैज्ञानिक क्षण में पिता किचन में आए और बच्ची ने उत्साह से कहा: "देखो, डैडी आज मैं अपने लिए नाश्ता बना रही हूँ।"

उस दिन उसने बिना किसी के कहे दो बार नाश्ता किया क्योंकि उस नाश्ते में उसकी रुचि थी। उसे महत्वपूर्ण होने का एहसास था। उसने नाश्ता बनाने में आत्म-अभिव्यक्ति का नया मार्ग खोजा था।

विलियम विन्टर ने एक बार कहा था, "आत्म-अभिव्यक्ति इंसान के स्वभाव की सबसे बड़ी ज़रूरत होती है।" हम इसी मनोवैज्ञानिक सूत्र को अपने बिज़नेस में क्यों नहीं उतार पाते ? जब भी हमारे दिमाग में कोई बढ़िया विचार आए, तो उसे हम अपने विचार के रूप में दूसरों के सामने पेश क्यों करें। इसके बजाय हम ऐसी तरकीब क्यों न करें कि यह विचार उनके दिमाग में अपने आप आ जाए। तब उन्हें यह विचार अपना लगेगा और वे इसे पसंद करेंगे और शायद वे इसे बिना किसी के कहे अपनी इच्छा से ही मान लेंगे।

याद रखिए : "पहले तो सामने वाले व्यक्ति में काम करने की प्रबल इच्छा जगाएँ। जो यह कर सकता है उसके साथ पूरी दुनिया है। जो यह नहीं कर सकता, वह अकेला ही रहेगा।"

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सिद्धांत 3

सामने वाले व्यक्ति में प्रबल इच्छा जगाएँ।

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संक्षेप में लोगों को प्रभावित करने के मूलभूत तरीके

सिद्धांत 1 "बुराई मत करो, निंदा मत करो, शिकायत मत करो।"

सिद्धांत 2 सच्ची तारीफ़ करने की आदत डालें।

सिद्धांत 3 सामने वाले व्यक्ति में प्रबल इच्छा जगाएँ।

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और दोस्तो ये था आज का चैपटर

और अब मिलेगें नए चैपटर के साथ, नई विडियों में,

धन्यावाद, नमस्कार, जै हिन्द

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