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लोगों के साथ व्यवहार करने का अचूक रहस्य

इस दुनिया में सिर्फ़ एक ही तरीक़ा है जिससे आप किसी से कोई काम करवा सकते हैं। क्या आपने कभी यह सोचा है ? हाँ, सिर्फ़ एक तरीक़ा। और वह तरीक़ा है उस व्यक्ति में वह काम करने की इच्छा पैदा करना।

याद रखें, इसके अलावा कोई दूसरा तरीका है ही नहीं।

हाँ, आप किसी के सीने पर रिवॉल्वर रखकर उसमें घड़ी देने की इच्छा पैदा कर सकते हैं। आप अपने कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की धमकी देकर उन्हें सहयोग देने के लिए विवश कर सकते हैं (तभी तक जब तक आप उनके सामने हैं)। बच्चे को पीटकर या पिटाई का डर दिखाकर आप उससे अपनी बात मनवा सकते हैं। परंतु इन जंगली तरीक़ों के परिणाम अच्छे नहीं होंगे।

केवल एक ही तरीके से मैं आपसे कोई चीज़ हासिल कर सकता हूँ और वह तरीक़ा है आपको वह देना जो आप चाहते हैं। आप क्या चाहते हैं?

 

सिगमंड फ्रॉयड ने कहा था कि किसी भी काम को करने के पीछे मनुष्य की दो मूलभूत आकांक्षाएँ होती हैं सेक्स की आकांक्षा और महान बनने की आकांक्षा।

अमेरिका के महान दार्शनिक जॉन ड्यूई ने इसी बात को ज़रा इस अलग ढंग से कहा था।  डॉ. ड्यूई ने कहा था कि मानव प्रकृति में सबसे गहन आकांक्षा "महत्वपूर्ण बनने की आकांक्षा" होती है। यह महत्वपूर्ण है। हम इस पुस्तक में इस वाक्यांश के बारे में बार-बार सुनेंगे।

आप क्या चाहते हैं? वैसे तो हम ढेर सारी चीजें चाहते हैं, परंतु बहुत कम चीजों को हम इतनी प्रबलता से चाहते हैं कि उनके बिना हमारा काम नहीं चल सकता। ज़्यादातर लोगों में नीचे दी गई चीज़ों की आकांक्षा होती है :

 

1. स्वास्थ्य और जीवन का संरक्षण

2. भोजन

3. नींद

4. पैसा और पैसे से ख़रीदी जाने वाली वस्तुएँ

5. परलोक सुधारना

6. सेक्स की संतुष्टि

7. बच्चों का कल्याण

8. महत्व की भावना

 

और लगभग यह सभी आकांक्षाएँ आम तौर पर पूरी हो जाती हैं या संतुष्ट हो जाती हैं- सिवाय एक के। वह आकांक्षा जो उतनी ही गहन और प्रचंड होती है जितनी कि भोजन या नींद की आकांक्षा और वह आकांक्षा शायद ही कभी संतुष्ट होती है। इस आकांक्षा को लॉयड ने "महान बनने की आकांक्षा" कहा है और ड्यूई ने "महत्वपूर्ण बनने की आकांक्षा" कहा है।

 

लिंकन ने एक बार एक पत्र की शुरुआत में लिखा था, "हर एक को तारीफ़ अच्छी लगती है।" विलियम जेम्स ने कहा था, "हर मनुष्य के दिल की गहराई में यह लालसा छुपी होती है कि उसे सराहा जाए।" ग़ौर करें उसने इस आकांक्षा को इच्छा, या चाहत या कामना नहीं कहा। उसने कहा सराहे जाने की "लालसा।"

 

यह एक ऐसी मानवीय भूख है जो स्थायी है। और वह दुर्लभव्यक्ति जो लोगों की इस प्रशंसा की भूख को संतुष्ट करता है, लोगों को अपने वश में कर सकता है। लोग उससे इतना प्रेम करेंगे कि दफनाने वाले तक उसकी मौत पर दुखी होंगे।

 

इंसानों और जानवरों में यही फर्क है कि इंसानों में महत्वपूर्ण बनने की आकांक्षा होती है। जब मैं मिसूरी में फ़ार्म ब्वॉय था तो मेरे पिता अच्छी नस्ल के बेहतरीन ड्यूरॉक जर्सी सुअरों और मवेशियों को पालते थे। हम अपने सुअरों और मवेशियों को मेलों में होने बाली प्रदर्शनियों में ले जाते थे और पूरे मिडिल वेस्ट में जानवरों की प्रदर्शनियों में हिस्सा लेते थे। हमने दर्जनों बार प्रथम पुरस्कार जीते। मेरे पिताजी ने सफ़ेद मलमल के टुकड़े पर नीले रिबन लगा दिए और जब भी उनके दोस्त या आगंतुक घर में आते थे तो वे अपने सफ़ेद मलमल के लंबे टुकड़े को गर्व से दिखाते थे। एक सिरे को वे पकड़ते थे और दूसरे सिरे को मैं। और इस तरह वे अपने नीले रिबन प्रदर्शित किया करते थे।

 

सुअरों को अपने जीते हुए रिबनों की कतई परवाह नहीं थी। परंतु मेरे पिताजी को थी। पुरस्कार उन्हें महत्वपूर्ण होने का एहसास दिलाते थे।

 

अगर हमारे पूर्वजों में महत्वपूर्ण होने की यह आकांक्षा इतनी प्रबल नहीं होती, तो सभ्यता का विकास असंभव था। इसके बिना, हम आज भी जानवरों की तरह ही रह रहे होते।

 

महत्वपूर्ण बनने की इसी आकांक्षा के कारण एक अशिक्षित और गरीब ग्रॉसरी क्लर्क क़ानून की किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित हुआ, जो उसने रद्दी वाले से पचास सेंट में ख़रीदी थीं। आपने शायद उस ग्रॉसरी क्लर्क का नाम सुना होगा। उसका नाम लिंकन था।

 

महत्वपूर्ण बनने की इसी आकांक्षा ने डिकेन्स को अपने अमर उपन्यास लिखने के लिए प्रेरित किया। इसी आकांक्षा ने सर क्रिस्टोफर रेन को पत्थरों में सिम्फनी लिखने के लिए प्रेरित किया।

इसी आकांक्षा की वजह से रॉकफेलर ने करोड़ों डॉलर जमा किए और कभी खर्च नहीं किए। इसी आकांक्षा के कारण आपके शहर का सबसे अमीर परिवार एक ऐसा घर बनाता है जो उसकी ज़रूरत के हिसाब से बहुत बड़ा होता है।

 

यही आकांक्षा आपसे लेटेस्ट फ़ैशन के कपड़े पहनवाती है, लेटेस्ट कार खरिदवाती है और अपने होशियार बच्चों के बारे में बातें करवाती है।

 

यही आकांक्षा कई लड़के-लड़कियों को गैंग में शामिल करवाकर उनसे अपराध करवाती है। न्यूयॉर्क के भूतपूर्व पुलिस कमिश्नर ई. पी. मरूनी के अनुसार औसत युवा अपराधी में इतना ईगो होता है कि गिरफ्तार होने के बाद उसकी सबसे पहली माँग उन अख़बारों को पढ़ने की होती है जिन्होंने उसे हीरो बना दिया। वे बाद में मिलने वाली सज़ा को लेकर उतने चिंतित नहीं होते, जितने कि अखबार में नामी खिलाड़ियों, फ़िल्म और टीवी स्टार्स और राजनेताओं के साथ अपनी तस्वीर छपी देखकर खुश होते हैं।

 

आप मुझे बता दें कि किस बात से आपको महत्वपूर्ण होने का अनुभव होता है, और मैं आपको बता दूँगा कि आप क्या हैं। इस बात से आपका चरित्र निर्धारित होता है। यह आपके बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात है। उदाहरण के तौर पर, जॉन डी. रॉकफेलर को चीन के पीकिंग शहर में एक अस्पताल बनवाने के लिए करोड़ों डॉलर का दान देने में महत्व का एहसास होता था। ऐसे लाखों गरीब लोगों के भले के लिए, जिन्हें न कभी उन्होंने देखा है और न कभी देख पाएँगे। दूसरी तरफ़ डिलिंजर एक लुटेरा, बैंक डकैत और हत्यारा बनने में महानता का अनुभव करता था। जब एफ़.बी.आई. के एजेंट उसे खोज रहे थे तो वह मिनेसोटा के एक फार्महाउस में घुसा और उसने कहा, "मैं डिलिंजर हूँ!" उसे इस बात पर गर्व था कि वह देश का सबसे चर्चित अपराधी है। उसने कहा, "मैं तुम्हें नुक़सान नहीं पहुँचाऊँगा, परंतु मैं डिलिंजर हूँ!"

 

हाँ, डिलिंजर और रॉकफेलर में यह महत्वपूर्ण अंतर था कि

 

उन्हें महत्वपूर्ण होने का अनुभव अलग-अलग चीजों से होता था। इतिहास ऐसे रोचक उदाहरणों से भरा पढ़ा है कि प्रसिद्ध लोगों ने महत्वपूर्ण होने की अपनी आकांक्षा को किस तरह अभिव्यक्त किया। जॉर्ज वॉशिंगटन "हिज़ माइटिनेस, द प्रेसिडेंट ऑफ़ युनाइटेड स्टेटस" कहलाना पसंद करते थे। कोलंबस ने "एडमिरल ऑफ द ओशन एंड वायसराय ऑफ इंडिया" के टाइटल के लिए आवेदन किया था। कैथरीन महान ऐसे पत्रों को नहीं पढ़ती थी जिन पर "हर इम्पीरियल मेजेस्टी" नहीं लिखा होता था। और मिसेज लिंकन व्हाइट हाउस में मिसेज ग्रांट पर शेरनी की तरह झपटते हुए चिल्लाई थीं. "तुमने बिना मेरी इजाज़त के मेरे सामने बैठने की ज़रत कैसे की ?"

 

हमारे देश के करोड़पतियों ने एडमिरल बर्ड के अंटार्कटिका अभियान के लिए 1928 में इस शर्त पर धन दिया कि बर्फीले पर्वतों की श्रेणियों का नाम उनके नाम पर रखा जाए। प्रसिद्ध लेखक विक्टर ह्यूगो चाहते थे कि पेरिस शहर का नाम उनके नाम पर रखा जाए। महान शेक्सपियर भी अपने परिवार के लिए कोट ऑफ़ आर्म्स हासिल करके अपने नाम को अधिक महत्वपूर्ण बनाना चाहते थे।

 

सहानुभूति और ध्यान आकर्षित करने के लिए तथा महत्वपूर्ण होने का अनुभव करने के लिए लोग बीमार होने का बहाना करते हैं। उदाहरण के तौर पर मिसेज़ मैकिन्ले को ही लें। उन्हें महत्वपूर्ण होने का एहसास तब होता था जब वे अपने पति को यानी कि अमेरिका के राष्ट्रपति को देश के महत्वपूर्ण मामलों की उपेक्षा करने के लिए विवश कर देती थीं। अमेरिका के राष्ट्रपति की यह पत्नी चाहती थीं कि उनके पति अपने सारे काम-धाम छोड़कर उनके पास घंटों बैठे रहें, अपनी बाँहों में लेकर उन्हें शांत करने की कोशिश करें। वे अपने पति का ध्यान खींचने के लिए इतनी व्याकुल थीं कि उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि दाँतों के डॉक्टर के पास जाते समय भी उनका पति उनके साथ रहे। एक बार जब उन्हें दाँतों के डॉक्टर के पास अकेले जाना पड़ा, (क्योंकि उस समय उनके पति का गृहमंत्री जॉन हे के साथ अपॉइंटमेंट था), तो इस छोटी सी बात पर इन श्रीमतीजी ने तूफ़ान खड़ा कर दिया।

 

लेखिका मैरी रॉबर्ट्स राइनहार्ट ने मुझे एक स्वस्थ और प्रतिभाशाली महिला के बारे में बताया, जो महत्वपूर्ण होने का एहसास हासिल करने के लिए बिस्तर पर पड़ गई। "एक दिन," मिसेज़ राइनहार्ट ने कहा, "इस महिला को किसी मुश्किल परिस्थिति का सामना करना पड़ा, शायद उसकी उम्र का। उसे अपनी आगे की जिंदगी में अकेलापन दिख रहा था और उसकी ज़िंदगी में कोई सपना, कोई आशा नहीं थी।

 

"वह बीमार होकर विस्तर पर पड़ गई और दस साल तक उसकी बूढ़ी माँ उसकी चाकरी करती रही, उसके लिए भोजन की घाली ले जाती रही, उसकी सेवा करती रही। एक दिन बूढ़ी माँ सेवा की थकान के कारण मर गई। कुछ हफ्तों तक बीमार युवती दुख मनाते हुए विस्तर पर पड़ी रही, फिर वह उठी, उसने अपने कपड़े बदले और एक बार फिर ज़िंदगी जीना शुरू कर दिया।"

 

 

कई विशेषज्ञों का मानना है कि महत्वपूर्ण होने का एहसास ही कई लोगों को पागल हो जाने के लिए प्रेरित करता है। जो लोग पागल हो जाते हैं, वे पागलपन के स्वप्नलोक में अपने आपको महत्वपूर्ण बना लेते हैं। वे खुद को वह महत्व दे देते हैं जो उन्हें असली दुनिया में नहीं मिल पाता। अमेरिका में मानसिक रोगों से जितने मरीज़ पीड़ित हैं उनकी संख्या बाक़ी सारी बीमारियों से पीड़ित रोगियों से अधिक है।

 

पागलपन का क्या कारण है ?

 

इस सवाल का ठीक-ठीक जवाब तो कोई नहीं दे सकता, पर हम यह ज़रूर जानते हैं कि कुछ बीमारियाँ जैसे सिफ़िलिस मस्तिष्क कोशिकाओं को नष्ट कर देती हैं और इसका परिणाम पागलपन होता है। दरअसल लगभग आधे मानसिक रोगों के पीछे शारीरिक कारणों को ज़िम्मेदार समझा जा सकता है जैसे मानसिक आघात, अल्कोहल, मादक या विषैले पदार्थ और दुर्घटनाएँ। परंतु बाक़ी आधे - और यह इस कहानी का सबसे भयावह हिस्सा है बाक़ी आधे पागल होने वाले लोगों की मस्तिष्क कोशिकाओं में कोई शारीरिक गड़बड़ी नहीं होती। पोस्टमॉर्टम परीक्षणों में जब मरने वालों के मस्तिष्क ऊतकों को माइक्रोस्कोप के नीचे देखा गया तो वे उतने ही स्वस्थ दिख रहे हे जितने कि आपके या मेरे। फिर ये लोग पागल क्यों होते हैं?

 

मैंने यह सवाल चार सबसे प्रमुख मनोचिकित्सालयों में से एक के मुख्य चिकित्सक से पूछा। इस प्रसिद्ध चिकित्सक को अपने विषय ज्ञान के लिए ढेर सारे पुरस्कार और सम्मान मिले थे, परंतु उसने मुझसे स्पष्ट रूप से कहा कि वह नहीं जानता कि लोग पागल क्यों होते हैं। कोई भी इसका पूरी तरह सही कारण नहीं जानता। परंतु उसने यह भी कहा कि जो लोग पागल हो जाते हैं उनमें से कई पागलपन की अवस्था में उस महत्व का अनुभव करते हैं जो उन्हें असली दुनिया में नसीब नहीं होता। इस प्रसिद्ध मनोचिकित्सक ने मुझे एक कहानी सुनाई

 

"मेरी एक मरीज़ है जिसकी शादी का दुखद अंत हुआ था। उसे प्रेम, शारीरिक संतुष्टि, बच्चे और सामाजिक प्रतिष्ठा चाहिए थे, परंतु ज़िंदगी ने उसकी आशाओं पर पानी फेर दिया। उसका पति उससे प्रेम नहीं करता था। वह उसके साथ बैठकर भोजन भी नहीं करता था और उससे कहता था कि वह उसका भोजन ऊपरी मंज़िल पर उसके कमरे में परोसे। उनके कोई बच्चा भी नहीं था और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी नहीं थी। वह पागल हो गई और अपनी कल्पना में उसने अपने पति को तलाक़ दे दिया और एक वार फिर अपने कुँआरेपन का नाम रख लिया। उसे विश्वास है कि अब वह एक अमीर आदमी की पत्नी बन गई है और वह इस बात पर ज़ोर देती है कि उसे लेडी स्मिथ के नाम से बुलाया जाए।

 

"और जहाँ तक बच्चों का सवाल है वह कल्पना करती है कि हर रात को वह एक नए बच्चे को जन्म देती है। जब भी मैं उसे देखने जाता हूँ वह कहती है, 'डॉक्टर, कल रात को मेरे यहाँ एक बच्चे ने जन्म लिया है।'"

 

 

 

उसके सपनों के जहाज़ हक़ीक़त की चट्टानों से टकराकर चूर-चूर हो गए है. परंतु पागलपन के काल्पनिक टापुओं पर वह अपने सपनों को सच कर रही है।

 

क्या यह दुखद है? में नहीं जानता। वैसे उस डॉक्टर ने यह भी कहा, "अगर मैं उसका पागलपन दूर करके एक बार फिर से उसकी सोचने-समझने की शक्ति लौटा सकता, तो भी शायद मैं ऐसा नहीं करता। वह आज जितनी खुश है, उतनी खुश पहले कभी नहीं रही।"

 

अगर कई लोग महत्व की भावना के इतने भूखे हैं कि वे उसके लिए सचमुच पागल भी हो सकते हैं, तो ज़रा सोचिए कि मैं और आप अपने आस-पास के लोगों को सच्ची प्रशंसा देकर कितना बड़ा चमत्कार कर सकते हैं और कितना कुछ हासिल कर सकते हैं।

 

चार्ल्स श्वाब अमेरिकी उद्योग के उन पहले व्यक्तियों में से एक थे, जिन्हें एक साल में दस लाख डॉलर से ज़्यादा तनख्वाह (तब इन्कम टैक्स नहीं हुआ करता था और पचास डॉलर प्रति सप्ताह कमाने वाला आदमी संपन्न समझा जाता था) मिला करती थी। उन्हें एन्ड्रयू कारनेगी ने 1921 में युनाइटेड स्टेट्स स्टील कंपनी के पहले प्रेसिडेंट के रूप में नियुक्त किया और उस वक्त श्वाब की उम्र केवल अड़तीस वर्ष थी। (बाद में श्वाब यू.एस. स्टील छोड़कर मुश्किल में फँसी बेथलहम स्टील कंपनी के प्रेसिडेंट बने और उन्होंने इसे अमेरिका की सर्वाधिक लाभदायक कंपनियों में से एक बना दिया।)

 

एन्ड्रयू कारनेगी ने चार्ल्स श्वाब को एक साल में दस लाख डॉलर या प्रतिदिन तीन हज़ार डॉलर से अधिक तनख्वाह क्यों दी ? क्यों ? क्या इसलिए कि श्वाब जीनियस थे ? नहीं। तो फिर क्या इसलिए कि वे स्टील उद्योग के सबसे बड़े जानकार थे ? नहीं। खुद चार्ल्स श्वाब का मानना था कि उनके नीचे काम कर रहे कई लोग स्टील बनाने के बारे में उनसे ज़्यादा जानते थे।

 

श्वाब कहते हैं कि उन्हें इतनी ज़्यादा तनख्वाह मिलने का सबसे बड़ा कारण यह था कि वे लोगों के साथ व्यवहार करने की कला में निपुण थे। मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने ऐसा किस तरह किया। मैं उनका रहस्य उन्हीं के शब्दों में बता रहा है ऐसे शब्द जिनसे काँसे में ढलवा लेना चाहिए और हर घर और स्कूल, हर दुकान और ऑफिस में रखना चाहिए ऐसे शब्द जिन्हें बच्चों को कंठस्थ कर लेना चाहिए, बजाय उस लेटिन ग्रामर या ब्राजील की सालाना वर्षा की मात्रा को कंठस्थ करने के जो जीवन में कभी उनके काम नहीं आएगी ऐसे शब्द जिनके हिसाब से चलने पर आपका और मेरा जीवन बदल जाएगा।

 

श्वाब ने कहा, "मैं मानता हूँ कि मेरी सबसे बडी पूँजी अपने कर्मचारियों का उत्साह बढाने की कला है और मैं सराहना और प्रोत्साहन के द्वारा लोगों से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करवा लेता हैं।

 

"कोई भी बात किसी व्यक्ति की महत्वाकांक्षाओं को इतनी बुरी तरह से नहीं कुचलती जितनी कि सुपीरियर्स की आलोचना। मैं कभी किसी की आलोचना नहीं करता। मैं प्रोत्साहन देने में विश्वास करता हूँ ताकि व्यक्ति काम करने के लिए प्रेरित हो। इसलिए मैं तारीफ़ करने के लिए तत्पर रहता हूँ और ग़लती निकालने में कंजूसी बरतता हूँ। अगर मुझे कोई बात पसंद आती है, तो मैं दिल बोलकर तारीफ़ करता हूँ और मुक्त कंठ से सराहना करता हूँ।"

 

 

 

 

 

तो श्वाब यह करते थे। परंतु सामान्य लोग क्या करते हैं ? इसका ठीक उल्टा। अगर उन्हें कोई बात पसंद नहीं आती, तो वे अपने कर्मचारियों पर अपनी भड़ास निकाल देते हैं। अगर उन्हें कोई बात पसंद आती है, तो वे कुछ भी नहीं कहते। एक पुरानी कहावत है: "मैंने एक बार गलत काम किया जिसके बारे में मुझे हमेशा सुनना पड़ा। मैंने दो बार अच्छा काम किया, परंतु उसके बारे में मैंने कभी नहीं सुना।"

 

श्वाब का मानना था, "जीवन के मेरे लंबे अनुभव के दौरान मैं दुनिया के कई देशों के महान लोगों से मिला हूँ और मुझे आज तक ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, चाहे वह कितने भी ऊँचे पद पर हो, जो आलोचना के बजाय तारीफ़ के माहौल में ज़्यादा बेहतर काम न कर सकता हो।"

 

श्वाव के अनुसार यही एन्ड्रयू कारनेगी की अ‌द्भुत सफलता के प्रमुख कारणों में से एक था। कारनेगी अपने सहयोगियों की सार्वजनिक रूप से और अकेले में भी प्रशंसा किया करते थे।

 

कारनेगी तो अपनी कब्र के पत्थर पर भी अपने कर्मचारियों की तारीफ़ करना नहीं भूले। उन्होंने खुद के लिए यह स्मृति-लेख लिखा था : "यहाँ पर वह आदमी सोया है जो जानता था कि अपने से समझदार लोगों को अपने आस-पास इकट्ठा कैसे किया जाए।"

 

सच्ची प्रशंसा ही वह रहस्य था जिसकी वजह से जॉन रॉकफेलर इतने सफल हुए। उदाहरण के तौर पर जब उनके पार्टनर एडवर्ड टी. बेडफोर्ड की वजह से दक्षिण अमेरिका के एक कॉन्ट्रैक्ट में फर्म को 40 प्रतिशत नुक़सान हुआ, तो रॉकफेलर उनकी आलोचना कर सकते थे, परंतु वे जानते थे कि बेडफोर्ड ने अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश की थी और वैसे भी अब तो नुक़सान हो चुका था। इसलिए रॉकफेलर ने उन्हें बधाई देने का कारण खोज ही लिया। उन्होंने बेडफोर्ड को बधाई दी कि उन्होंने निवेश की 60 प्रतिशत रक़म डूबने से बचा ली। "यह बहुत बढ़िया रहा," रॉकफेलर ने कहा। "हम हमेशा दिमाग का इतना बढ़िया इस्तेमाल नहीं कर पाते।"

 

 

 

अब मैं एक कहानी सुनाना चाहता हूँ जो हालाँकि सच नहीं है, परंतु उसमें सच्चाई ज़रूर छुपी है और यही वजह है कि मैं उसे सुना रहा हूँ :

 

एक देहाती महिला ने दिन भर की कठोर मेहनत के बाद अपने परिवार के सामने भोजन की जगह भूसे का ढेर रख दिया। जब पति और बेटों ने झुंझलाकर इस अजीब हरकत का कारण पृष्ठछा तो उस महिला ने जवाब दिया, "मुझे लगता था कि तुम्हारा ध्यान इस तरफ़ जाता ही नहीं है कि तुम्हारे सामने खाना रखा जाता है। या भूसा। बीस साल से मैं तुम लोगों के लिए खाना बना रही हूँ परंतु तुम लोगों ने मुझे कभी यह नहीं बताया कि तुम लोग भूसा नहीं खा रहे हो।"

 

कुछ समय पहले घर से भागने वाली पत्नियों पर एक शोध हुआ कि उनके घर से भागने के पीछे सबसे बड़ा कारण क्या होता है? क्या आप बता सकते हैं वह कारण क्या था ? "प्रशंसा का अभाव।" और मैं शर्त लगाता हूँ कि यही घर से भागने वाले पतियों के बारे में भी सच होगा। हम अक्सर अपने पति-पत्नी को यह बताने की ज़रूरत ही नहीं समझते कि हम उनसे प्रभावित हैं

 

मेरी क्लास में के एक सदस्य ने अपने जीवन की एक घटना सुनाई जिसमें उसकी पत्नी ने उससे एक आग्रह किया था। उसकी पत्नी और अन्य महिलाएँ चर्च में एक आत्म-सुधार कार्यक्रम में शामिल हुए। एक दिन उसकी पत्नी ने उससे पूछा कि वह उसकी छह कमियाँ बताए जिन्हें सुधारने से वह बेहतर पत्नी बन जाए।

 

 

उसका पति यह सुनकर हैरान रह गया। उसने कक्षा के सामने कहा, "मुझे इस आग्रह से बड़ी हैरानी हुई। सच कहा जाए तो में बड़ी आसानी से उसे छह ऐसी बातों की सूची थमा सकता था जिनमें सुधार की ज़रूरत थी और ईश्वर जानता है, कि वह ऐसी हज़ार बातों की सूची थमा सकती थी जिनमें मुझे सुधार की ज़रूरत थी - परंतु मैंने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय मैंने उससे कहा, 'मुझे इस बारे में सोचने का समय दो और मैं तुम्हें सुबह इसका जवाब दे दूँगा।'

 

"अगली सुबह मैं बहुत जल्दी उठ गया और फूल वाले को फोन करके उससे अपनी पत्नी के लिए छह गुलाबों का तोहफ़ा भिजवाने के लिए कहा जिसके साथ यह चिट्ठी लगी हो, 'मुझे तुम्हारी छह कमियाँ नहीं मालूम, जिनमें सुधार की ज़रूरत हो। तुम जैसी भी हो, मुझे बहुत अच्छी लगती हो।'

 

"उस शाम को जब मैं घर लौटा तो क्या आप बता सकते हैं दरवाज़े पर किसने मेरा स्वागत किया : बिलकुल ठीक। मेरी पत्नी ने। उसकी आँखों में आँसू भरे हुए थे। यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि मैं इस बात पर बहुत खुश था कि मैंने उसके आग्रह के बावजूद उसकी आलोचना नहीं की थी।

 

"अगले रविवार को चर्च में उसने बाक़ी महिलाओं को यह घटना सुनाई और बहुत सी महिलाओं ने आकर मुझसे कहा, 'इतनी बुद्धिमानी की बात हमने पहले कभी नहीं सुनी।' तब जाकर मुझे सराहना की शक्ति का एहसास हुआ।"

 

लॉरेंज ज़िगफ़ेल्ड ब्रॉडवे में धूम मचाने वाले प्रसिद्ध प्रोड्यूसर रहे हैं। उनकी छवि एक ऐसे प्रोड्यूसर की थी जिनमें "अमेरिकी युवतियों को ग्लैमरस" बनाने की अद्भुत प्रतिभा थी। हर बार वे ऐसी साधारण युवतियों को लेते थे, जिनकी तरफ़ कोई दुबारा पलटकर नहीं देखता और उन्हें स्टेज पर वे ग्लैमरस और रहस्यमयी युवतियों में बदल देते थे। प्रशंसा और आत्मविश्वास के महत्व को जानने के कारण वे जानते थे कि सिर्फ़ प्रशंसा और महत्व दिए जाने पर साधारण सी महिला भी अपने आपको सुंदर मानने लगती है। वे प्रैक्टिकल थे  उन्होंने कोरस में काम करने वाली लड़कियों की तनख्वाह तीस डॉलर प्रति सप्ताह से बढ़ाकर एक सौ पचहत्तर डॉलर प्रति सप्ताह कर दी। और वे विशाल हृदय भी थे। फ़ॉलीज़ के मंचन की पहली रात को उन्होंने सभी स्टार्स को टेलीग्राम भेजे और शो में काम करने वाली हर कोरस गर्ल को अमेरिकन ब्यूटी रोज़ेस भेंट किए।

 

एक बार मुझ पर डाइटिंग का भूत सवार हो गया और मैं छह दिनों तक भूखा रहा। यह मुश्किल नहीं था। छठवें दिन मुझे उतनी भूख नहीं लग रही थी, जितनी कि मुझे दूसरे दिन लग रही थी। हम सभी जानते हैं कि अगर किसी के परिवार या कर्मचारियों को छह दिनों तक खाना न मिले, तो वह व्यक्ति अपने आपको अपराधी मानेगा। परंतु अगर वह व्यक्ति परिवार या कर्मचारियों की सच्ची तारीफ़ छह दिन, छह हफ्तों या साठ साल तक न करे तो उसे ज़रा भी अपराधबोध का अनुभव नहीं होता। हम यह भूल जाते हैं कि तारीफ़ भी भोजन की ही तरह हमारी अनिवार्य आवश्यकता है।

 

जब महान अभिनेता अल्फ्रेड लुंट ने रियूनियन इन विएना में मुख्य भूमिका निभाई तो उन्होंने कहा, "मुझे जिस चीज़ की सबसे अधिक ज़रूरत है वह है अपने आत्मसम्मान के लिए पोषण।"

 

 

 

 

 

हम अपने बच्चों, दोस्तों और कर्मचारियों के शरीर को पोषण देते हैं, परंतु हम उनके आत्मसम्मान को कितना कम पोषण देते हैं? हम उन्हें ऊर्जा के लिए बीफ और आलू उपलब्ध करवाते हैं, परंतु हम उन्हें प्रशंसा के दयालुतापूर्ण शब्द देना भूल जाते हैं जो सालों तक उनकी यादों में सुबह के सितारों के संगीत की तरह गूँजेंगे।

 

पॉल हार्वे ने अपने एक रेडियो ब्रॉडकास्ट "द रेस्ट ऑफ़ द स्टोरी" में बताया कि किस तरह सच्ची प्रशंसा किसी इंसान की जिंदगी बदल सकती है। उन्होंने एक घटना सुनाई। कई साल पहले डेटॉइट की एक टीचर ने स्टेवी मॉरिस से कहा कि वह क्लासरूम में गुम हो गए चुहे को खोजने में उसकी मदद करे। आप इस बात पर गौर करें, उसने इस बात की प्रशंसा की कि प्रकृति ने भले ही स्टेवी को आँखें नहीं दी थीं, परंतु इसके बदले में स्टेवी को सुनने की अद्भुत शक्ति प्रदान की थी। स्टेवी में ऐसा कुछ था जो उस क्लास में किसी और के पास नहीं था। परंतु दरअसल यह पहली बार था जब किसी ने उसकी सुनने की शक्ति के लिए स्टेवी की तारीफ़ की थी। अब सालों बाद स्टेवी मानते हैं कि यह प्रशंसा एक नए जीवन की शुरुआत थी। उस घटना के बाद उन्होंने अपनी सुनने की कला को विकसित किया और स्टेवी वंडर के स्टेज नाम को अपनाकर वे सत्तर के दशक के महान पॉप सिंगर और गीतकार बन गए।

 

कई पाठक इन शब्दों को पढ़ते समय यह सोच रहे होंगे, "अच्छा, चापलूसी ! मक्खन पॉलिश ! मैंने इनका इस्तेमाल करके देखा है। समझदार लोगों के सामने यह तरीके काम नहीं आते।"

 

सही बात है। चापलूसी समझदार लोगों के सामने सफल नहीं होती। यह उथली, स्वार्थी और झूठी होती है। इसे असफल होना ही चाहिए और यह असफल होती भी है। वैसे कई लोग तो तारीफ़ के इतने भूखे होते हैं कि वे चापलूसी को भी तारीफ़ समझकर उसे निगल लेते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह भूख से मरता आदमी घास और कीड़े-मकोड़े तक खा लेता है।

 

महारानी विक्टोरिया को भी चापलूसी पसंद थी। प्रधानमंत्री बेंजामिन डिज़राइली ने यह स्वीकार किया कि वे महारानी की चापलूसी किया करते थे। उनके शब्दों में वे "बड़ी चम्मच से मक्खन लगाया करते थे।" परंतु डिज़राइली ब्रिटेन के सबसे सुसंस्कृत, योग्य और चतुर व्यक्तियों में से एक थे। वे इस कला में जीनियस थे। जो चीज़ उनके लिए काम कर गई, ज़रूरी नहीं कि वह आपके और मेरे लिए भी काम कर जाए। लंबे समय में चापलूसी से आपको फ़ायदा कम और नुक़सान ज़्यादा होगा। चापलूसी नक़ली सिक्का है। अगर आप इसे असली सिक्के की तरह बाज़ार में चलाने की कोशिश करेंगे तो आप परेशानी में पड़ सकते हैं।

 

प्रशंसा और चापलूसी में क्या फ़र्क है? इसका जवाब बहुत आसान है। एक सच्ची होती है और दूसरी झूठी। एक दिल से निकलती है, दूसरी दाँतों से। एक निःस्वार्थ होती है, दूसरी स्वार्थपूर्ण। एक की हर जगह सराहना होती है, दूसरी की हर जगह निंदा।

 

मैंने मेक्सिको सिटी के चापुल्टेपेक पैलेस में हाल ही में मैक्सिकन हीरो जनरल अल्वारो ऑब्रेगॉन की मूर्ति देखी। उस मूर्ति के नीचे जनरल ऑब्रेगॉन की फिलॉसफ़ी के बुद्धिमत्तापूर्ण शब्द लिखे थे : "अपने पर हमला करने वाले दुश्मनों से मत डरो। बल्कि उन दोस्तों से डरो, जो तुम्हारी चापलूसी करते हों।"

 

नहीं! नहीं! नहीं! मैं आपको चापलूसी करने के लिए नहीं कह रहा हूँ। मैं तो बिलकुल अलग ही बात कह रहा हूँ। मैं आपसे एक नई ज़िंदगी शुरू करने के लिए कह रहा हूँ। मुझे दोहराने दें। मैं आपसे एक नई जिंदगी शुरू करने के लिए कह रहा हूँ।

 

सम्राट जॉर्ज पंचम ने बकिंघम पैलेस में अपनी स्टडी की दीवार पर छह सूत्रवाक्य लगा रखे थे। इनमें से एक सूत्रवाक्य था, "मुझे यह सिखाएँ कि न तो मैं किसी की झूठी तारीफ़ करूँ और न ही किसी की झूठी तारीफ़ सुनने के लिए उत्सुक रहूँ।" यही चापलूसी का अर्थ है- झूठी तारीफ़। मैंने एक बार चापलूसी की परिभाषा कहीं पढ़ी थी जो दोहराने लायक़ है: "चापलूसी सामने वाले को वही बताना है, जो वह अपने बारे में सोचता है।"

 

"आप चाहे जो भाषा इस्तेमाल कर लें," राल्फ़ वॉल्डो इमर्सन ने कहा था, "आप हमेशा बही कह पाएँगे जो आप हैं"

 

अगर हमें सिर्फ चापलुसी ही करनी हो तो सबकी चापलूसी करके हम बडी आसानी से मानवीय संबंधों के विशेषज्ञ बन सकते

 

जब हम किसी निश्चित समस्या के बारे में नहीं सोच रहे होते हैं. तो अपने खाली समय में 95 प्रतिशत वक्त हम खुद के बारे में ही सोचते हैं। अगर हम खुद के बारे में सोचना थोडा कम कर दें और दूसरे व्यक्ति की अच्छाइयों के बारे में सोचने लगें, तो हमें चापलूसी की ज़रूरत ही नहीं पडेगी जिसे पहली ही नज़र में, अक्सर मुँह से निकलने से पहले ही पहचाना जा सकता है और जो बडी उथली और झूठी लगती है।

 

आज की दुनिया में सच्ची तारीफ़ दुर्लभ हो गई है। न जाने ऐसा क्यों होता है कि हम अच्छे नंबर लाने पर अपने पुत्र या पुत्री की प्रशंसा करना अक्सर भूल जाते हैं। या हम अपने बच्चों को उस समय प्रोत्साहित करने में असफल रहते हैं जब वे पहली बार अच्छा केक बनाने में सफल होते हैं या चिड़ियों के लिए घर बनाते हैं। बच्चों को अपने माता-पिता की रुचि और प्रशंसा से जो आनंद मिलता है, उससे अधिक आनंद और किसी बात से नहीं मिलता।

 

अगली बार जब आप अपने क्लब में अच्छे भोजन का आनंद लें तो रसोइए तक यह संदेश ज़रूर भिजवाएँ कि खाना अच्छा बना था और जब कोई थका हुआ सेल्समैन आपके प्रति बहुत अधिक शिष्टाचार दिखाए तो इसका भी उल्लेख करना न भूलें।

 

हर पादरी, हर भाषण देने वाला और हर सार्वजनिक वक्ता जानता है कि अगर श्रोताओं की भीड़ में से एक भी व्यक्ति ताली न बजाए या तारीफ़ न करे तो कितना बुरा लगता है और उत्साह कितना कम हो जाता है। प्रोफेशनल्स पर जो लागू होता है वह ऑफ़िस, दुकानों, फ़ैक्टरियों के कर्मचारियों, हमारे परिवारों और दोस्तों पर दुगुना लागू होता है। अपने संबंधों में हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हमारे संगी-साथी इंसान हैं और तारीफ़ के भूखे हैं। यह वह असली सिक्का है जिसे हर व्यक्ति पसंद करता है।

 

अपनी हर दिन की यात्रा में कृतज्ञता की चिंगारियों की दोस्ताना पगडंडी छोड़ने की कोशिश करें। आपको आश्चर्य होगा कि किस तरह इन चिंगारियों से दोस्ती की छोटी-छोटी लौ प्रज्ज्वलित हो जाएँगी जो आपकी अगली यात्रा में आपको गर्माहट देंगी।

 

 

 

न्यू फ़ेयरफ़ील्ड, कनेक्टिकट की पामेला डन्डैम की ज़िम्मेदारियों में से एक थी एक नए जेनिटर के सुपरविज़न की, जिसका काम काफ़ी खराब था। दूसरे कर्मचारी उसका मखौल उड़ाया करते थे और उसे बताया करते थे कि वह कितना घटिया काम कर रहा था। यह बहुत ही गलत बात थी, दुकान का बहुत सा क़ीमती वक़्त बर्बाद हो रहा था।

 

पैम ने इस कर्मचारी को प्रेरित करने के कई तरीके आज़माए, परंतु कोई लाभ नहीं हुआ। फिर उसने देखा कि कभी-कभार वह किसी काम को बहुत अच्छे ढंग से कर लेता था। पैम ने फ़ैसला किया कि जब भी ऐसा मौक़ा आएगा तो वह दूसरे लोगों के सामने उसकी तारीफ़ करेगी। ऐसा करने के बाद सबने देखा कि हर दिन उसके काम में सुधार होता गया और जल्दी ही वह अपना सारा काम अच्छे ढंग से करने लगा। अब सभी लोग उसका सम्मान करते हैं

 

और उसकी प्रशंसा करते हैं। सच्ची प्रशंसा से सकारात्मक परिणाम मिले, जबकि आलोचना और मखौल से कुछ हाथ नहीं आया।

 

लोगों को ठेस पहुँचाने से वे कभी नहीं बदलते, न ही इससे कोई सकारात्मक प्रभाव पड़ता है इसलिए ऐसा व्यवहार करना निरर्थक होता है। एक पुरानी कहावत है जिसे मैंने काटकर अपने शीशे पर चिपका लिया है जहाँ मैं इसे हर रोज़ पढ़ लेता हूँ :

 

मैं इस राह पर सिर्फ़ एक बार ही चलूँगा। इसलिए अगर मैं कुछ अच्छा कर सकता हूँ या किसी इंसान का कुछ भला कर सकता हूँ तो मैं ऐसा अभी कर दूँ। मैं इसे टालूँगा नहीं, नज़रअंदाज़ नहीं करूँगा, क्योंकि मैं दुबारा इस राह पर नहीं लौटूंगा।

इमर्सन ने कहा था, "हर व्यक्ति मुझसे किसी न किसी बात में बेहतर होता है। मैं उसकी वह बात सीख लेता हूँ।"

 

अगर यह इमर्सन के बारे में सही है, तो हमारे और आपके अपनी इच्छाओं के बारे में सोचना छोड दें। हम चापलूसी को भूल बारे में तो यह हज़ार गुना ज्यादा सही है। हम अपनी उपलब्धियों, जाएँ। ईमानदारी से सच्ची प्रशंसा करें। दिल खोलकर तारीफ़ करें और मुक्त कंठ से सराहना करें। अगर आप ऐसा करेंगे तो आप पाएँगे कि लोग आपके शब्दों को अपनी यादों की तिजोरी में रखेंगे और जिंदगी भर उन्हें दोहराते रहेंगे- आपने जो कहा है, वह आप भूल जाएँगे, पर वे नहीं भूल पाएँगे।

 

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सिद्धांत 2

सच्ची तारीफ़ करने की आदत डालें ।

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