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"अगर शहद इकट्ठा करना हो, तो मधुमक्खी के छत्ते पर लात न मारें" Part-I - LOK VYAVHAR BOOK IN HINDI - (How to Win Friends and Influence People - Hindi) - If you must collect honey, don’t kick the beehive - Part-I

                                      

"अगर शहद इकट्ठा करना हो, तो मधुमक्खी के छत्ते पर लात न मारें"

Part-I

- LOK VYAVHAR BOOK IN HINDI -

(How to Win Friends and Influence People - Hindi) -

If you must collect honey, don’t kick the beehive - Part-I

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लोक व्यवहार, प्रभावशाली व्यक्तित्व की कला

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@shivavoicelibrary

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 हैल्लो दोस्तो, नमस्कार, आदाव,

स्वागत है आपका मेरे चैनल पर

आज आपको लोक व्यवहार पुस्तक के

पहले चैपटर

"अगर शहद इकट्ठा करना हो, तो मधुमक्खी के छत्ते पर लात न मारें"

के बारे  में बताने जा रहा हूं।    आईये शुरू करते हैं।   

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If you must collect honey, don’t kick the beehive

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7 मई, 1931 को न्यूयॉर्क शहर में एक जबर्दस्त मुठभेड़ चल रही थी। मुठभेड़ अपने अंतिम रोमांचक चरण में थी। हफ्तों तक तक पीछा करने के बाद पुलिस ने आख़िरकार "दुनाली बंदूक" के नाम से मशहूर हत्यारे क्रॉले को घेर लिया था। वह हत्यारा जो न सिगरेट पीता था, न ही शराब अब चारों तरफ़ से घिरा हुआ था और वेस्ट एंड एवेन्यू में अपनी प्रेमिका के घर में छुपा हुआ था।

 

डेढ़ सौ पुलिस वाले और जासूस ज़मीन से लेकर छत तक चारों तरफ़ से उसे घेरे हुए थे। वह ऊपरी मंज़िल पर छुपा था। पुलिस वालों ने छत में छेद करके टियरगैस का इस्तेमाल करके इस "पुलिस वालों के नामी हत्यारे" को निकालना चाहा। उन्होंने आस-पास की इमारतों पर मशीनगनें तैनात कर दीं। एक घंटे से भी ज़्यादा समय तक न्यूयॉर्क के इस रहवासी इलाके में पिस्तौल और मशीनगन से गोलियाँ चलती रहीं। क्रॉले एक कुर्सी के पीछे छुपकर पुलिस पर लगातार गोलियाँ चला रहा था। दस हज़ार से अधिक रोमांचित लोग इस रोमांचक मुठभेड़ को देख रहे थे। इस तरह का नज़ारा न्यूयॉर्क में पहले कभी नहीं देखा गया था।

 

जब क्रॉले को पकड़ा गया तो पुलिस कमिश्नर ई. पी. मल्रूनी ने कहा कि वह न्यूयॉर्क के इतिहास में अब तक के सबसे ख़तरनाक अपराधियों में से एक था। कमिश्नर का कहना था, "वह पंख फड़फड़ाने की आवाज पर ही किसी को मौत के घाट उतार देता था।"

 

परंतु "दनाली बंदुक" कॉले खुद को क्या समझता था ? हम यह जानते हैं, क्योंकि जिस समय पुलिस उस पर गोलियाँ चला रही थी. उसने एक पत्र लिखा था। जब वह यह पत्र लिख रहा था. तो उसके घावों से बहते खून के निशान इस पत्र पर छूट गए। इस पत्र में क्रॉले ने कहा था, "मेरे कोट के नीचे एक दूखी परंतु दयालु दिल है- एक ऐसा दिल जो किसी को नुक़सान नहीं पहुँचाना चाहता।"

 

यह लिखने के कुछ समय पहले की बात है। कॉले लॉग आइलैंड पर देहात की सुनी सड़क पर अपनी गर्लफ्रेंड के साथ रंगरेलियाँ मना रहा था। अचानक एक पुलिस वाला कार के पास आया और उसने क्रॉले से लाइसेंस दिखाने के लिए कहा।

 

बिना कुछ कहे क्रॉले ने अपनी रिवॉल्वर निकाली और उसने पुलिस वाले के सीने में एक के बाद एक गोलियाँ उतार दीं। जब पुलिस अफ़सर ज़मीन पर गिर गया, तो क्रॉले कार से नीचे कूदा, उसने अफ़सर का रिवॉल्वर निकाला और मर चुके पुलिस वाले के शरीर में एक और गोली मारी। और यही निर्मम हत्यारा अब कह रहा था: "मेरे इस कोट के नीचे एक दुखी परंतु दयालु दिल है-एक ऐसा दिल जो किसी को नुक़सान नहीं पहुँचाना चाहता।"

 

क्रॉले को मौत की सज़ा सुनाई गई। जब उसे सिंग सिंग जेल में मृत्युदंड के लिए ले जाया जा रहा था तो क्या उसने यह कहा, "यह लोगों को मारने की सज़ा है?" नहीं, उसने कहा, "यह खुद को बचाने की सज़ा है।"

इस कहानी का संदेश यह है "दुनाली बंदूक" क्रॉले खुद को किसी बात के लिए दोष नहीं देता था।

क्या यह अपराधियों में असामान्य बात है? अगर आपको ऐसा लगता है, तो यह सुनें:

"मैंने लोगों का भला करने में अपने जीवन के बेहतरीन साल लगा दिए ताकि वे सुख से रह सकें और इसके बदले में मुझे गालियाँ, सुनने को मिलती हैं और पुलिस से छुपे छुपे फिरना पड़ता है।"

 

यह वाक्य अल कैपोन के हैं जो अमेरिका का सबसे कुख्यात बदमाश था। शिकागो में उस जैसा ख़तरनाक गैंग लीडर नहीं था। परंतु अल केपोन खुद को दोषी या अपराधी नहीं मानता था। वह खुद को परोपकारी समझता था- एक ऐसा परोपकारी, जिसे जनता ठीक से समझ नहीं पाई थी।

 

और यही नेवार्क में गैंग्स्टर की गोलियों से मरने से पहले डच शुल्ट्ज़ ने कहा। न्यूयॉर्क के सबसे कुख्यात अपराधियों में से एक डच शुल्ट्ज़ ने एक अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा कि वह जनता की भलाई करता है। और उसे इस बात का पूरा यक़ीन था।

 

मैंने इस विषय पर न्यूयॉर्क की बदनाम सिंग सिंग जेल के वॉर्डन लुइस लॉस से लंबा पत्र-व्यवहार किया है। वे कहते हैं, "सिंग सिंग जेल के बहुत कम अपराधी अपने आपको बुरा समझते हैं। वे उसी तरह इंसान हैं जैसे कि आप और मैं। इसलिए वे तर्क देते हैं, खुद को सही साबित करते हैं। वे आपको यह बता सकते हैं कि उन्हें तिजोरी क्यों तोड़नी पड़ी या उन्हें गोली क्यों चलानी पड़ी। सही या गलत तर्कों के द्वारा अधिकांश अपराधी अपने अपराधों को सही ठहराने की कोशिश करते हैं और यह मानते हैं कि उन्हें सज़ा नहीं मिलनी चाहिए थी।"

 

अगर अल केपोन, "दुनाली बंदूक" क्रॉले, डच शुल्ट्ज़ और जेल की दीवारों में क़ैद कुख्यात अपराधी अपने आपको दोषी नहीं मानते तो वे लोग क्या करते हैं जिनसे आप और हम मिलते हैं ?

 

अमेरिकी स्टोर्स की चेन के संस्थापक जॉन वानामेकर ने यह स्वीकार किया था, "तीस साल पहले मैंने समझ लिया था कि किसी को दोष देना मूर्खता है। मेरे पास अपनी खुद की सीमाओं को ही पार करने की मुसीबत काफ़ी है और मैं इस बात पर सिर नहीं धुनता कि ईश्वर ने बुद्धि का उपहार सबको एक जैसा नहीं दिया है।"

 

वानामेकर ने यह सबक़ जल्दी सीख लिया, परंतु मुझे यह सबक़ सीखने में तैंतीस साल लगे जिस दौरान मुझसे ढेरों गलतियाँ हुई। और तब जाकर में यह समझ पाया कि सौ में से निन्यानवे लोग किसी भी बात के लिए अपने आपको दोष नहीं देते। चाहे वे कितने ही गलत हों, परंतु वे अपनी आलोचना नहीं करते, अपनी गलती नहीं मानते।

किसी की आलोचना करने का कोई फायदा नहीं होता, क्योंकि इससे सामने वाला व्यक्ति अपना बचाव करने लगता है, बहाने बनाने लगता है या तर्क देने लगता है। आलोचना खतरनाक भी है क्योंकि इससे उस व्यक्ति का बहुमूल्य आत्मसम्मान आहत होता है उसके दिल को ठेस पहुँचती है और वह आपके प्रति दुर्भावना रखने लगता है।

विश्वप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक बी. एफ़. स्किनर ने अपने प्रयोगों से यह सिद्ध कर दिया है कि जिस जानवर को अच्छे व्यवहार के लिए पुरस्कार दिया जाता है वह उस जानवर से ज़्यादा तेज़ी से सीखता है जिसे ख़राब व्यवहार के लिए दंड दिया जाता है। बाद में हुए अध्ययनों से यह पता चला कि यही इंसानों के बारे में भी सही है। आलोचना से कोई सुधरता नहीं है, अलबत्ता संबंध ज़रूर बिगड़ जाते हैं।

एक और महान मनोवैज्ञानिक हैंस सेल्ये ने कहा है, "जितने हम सराहना के भूखे होते हैं, उतने ही हम निंदा से डरते हैं।"

आलोचना या निंदा से कर्मचारियों, परिवार के सदस्यों और दोस्तों का मनोबल कम हो जाता है और उस स्थिति में कोई सुधार नहीं होता, जिसके लिए आलोचना की जाती है।

 

एनिड, ओक्लाहामा के जॉर्ज बी. जॉन्स्टन एक इंजीनियरिंग कंपनी में सुरक्षा प्रभारी थे। उनकी एक ज़िम्मेदारी यह थी कि जब भी कर्मचारी फ़ील्ड में अपना काम कर रहे हों, तो कर्मचारी अपने हेलमेट लगाए रखें। पहले तो वे जब भी किसी कर्मचारी को बिना हेलमेट लगाए देखते थे, तो उन्हें बर्दाश्त नहीं होता था। वे नियमों का हवाला देते हुए उसे सख़्त आदेश देते थे कि वह नियमों का पालन करे। परिणाम यह होता था कि कर्मचारी मन मारकर उसके आदेश का पालन तो करते थे, परंतु अक्सर उसके जाने के बाद अपने हेलमेट फिर से हटा देते थे।

उसने दूसरी तरकीब आज़माने का फैसला किया। अगली बार जब उसने कुछ कर्मचारियों को बिना हेलमेट के देखा तो उसने उनसे पूछा कि क्या हेलमेट आरामदेह नहीं हैं या उनकी फ़िटिंग सही नहीं है। फिर मुस्कराते हुए उसने उन लोगों को यह बताया कि हेलमेट उन्हें चोट से बचाने के लिए हैं और इसलिए काम करते समय उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए हेलमेट पहनना चाहिए। इसका परिणाम यह हुआ कि कर्मचारियों ने अपनी इच्छा से हेलमेट पहनना शुरू कर दिया और कोई दुर्भावना भी पैदा नहीं हुई।

इतिहास में आपको हज़ारों उदाहरण मिल जाएँगे जो बताते हैं कि आलोचना से कोई लाभ नहीं होता। उदाहरण के तौर पर आप थियोडोर रूजवेल्ट और राष्ट्रपति टैफ़्ट के विवाद को लें, एक ऐसा विवाद जिसने रिपब्लिकन पार्टी में विभाजन करवा दिया, वुडरो विल्सन को व्हाइट हाउस में बिठा दिया और प्रथम विश्वयुद्ध में बड़े चमकदार अक्षरों में कुछ लाइनें दर्ज करवा दीं और इतिहास का रुख बदल दिया। जब रूजवेल्ट 1908 में व्हाइट हाउस से बाहर गए तो उन्होंने टैफ़्ट का समर्थन किया, जो राष्ट्रपति चुन लिए गए। फिर रूजवेल्ट शेरों का शिकार करने अफ्रीका चले गए। लौटने पर उन्होंने जब हालात देखे तो वे बरस पड़े। उन्होंने अनुदारवाद के लिए टैफ्ट की आलोचना करनी शुरू कर दी और तीसरी बार खुद राष्ट्रपति बनने की कोशिश की। उन्होंने बुल मूस पार्टी का गठन किया और जी.ओ.पी. को लगभग ध्वस्त कर दिया। अगले चुनाव में विलियम हॉवर्ड टैफ़्ट और उनकी रिपब्लिकन पार्टी की बुरी तरह हार हुई और उसे केवल दो राज्यों वरमॉन्ट और ऊटा में ही सफलता मिली। इस पार्टी की अब तक की यह सबसे शर्मनाक पराजय थी।

इस हार के लिए रूज़वेल्ट ने टैफ़्ट को दोषी ठहराया, परंतु क्या राष्ट्रपति टैफ़्ट ने खुद को दोषी माना। बिलकुल नहीं। आँखों में आँसू भरकर, राँधे गले से टैफ़्ट ने कहा: "मैंने जो किया, उसके सिवाय मैं कर ही क्या सकता था ?"

दोष किसका था ? रूजवेल्ट का या टैफ्ट का ? सच कहूँ तो मैं नहीं जानता और न ही मुझे इसकी परवाह है। मैं सिर्फ यह बताना चाहता हूँ कि रूजवेल्ट की आलोचना टैफ़्ट से यह नहीं मनवा सकी कि दोष उनका था। इससे सिर्फ़ यही हासिल हुआ कि टैफ़्ट खुद के बचाव में तर्क देने लगे और आँखों में आँसू भरकर उन्होंने कहा: "मैंने जो किया, उसके सिवाय में कर ही क्या सकता था?"

 

टीपॉट डोम ऑइल स्कैंडल को ही लें। 1920 के दशक की शुरुआत में यह अखबारों की सुर्खियों में था। इसने देश को हिलाकर रख दिया। लोगों की याददाश्त में अमेरिकी सार्वजनिक जीवन में इतना बड़ा स्कैंडल पहले कभी नहीं हुआ था। यहाँ पर इस स्कैंडल के तथ्य बताये जा रहे हैं। हार्डिंग के कैबिनेट में मंत्री अल्बर्ट वी. फ़ॉल को एल्क हिल और टीपॉट डोम में तेल के सरकारी भंडारों को लीज़ पर देना था- ऐसे तेल के भंडार, जिन्हें नौसेना के भविष्य के उपयोग के लिए अलग रख दिया गया था। क्या फ़ॉल ने इनकी नीलामी की या इनके लिए टेंडर बुलवाए ? नहीं। इसके बजाय उन्होंने अपने दोस्त एडवर्ड एल. डोहेनी को यह फ़ायदेमंद ठेका तश्तरी में रखकर दे दिया। और डोहेनी ने क्या किया ? उसने तत्काल फ़ॉल को दस लाख डॉलर दे दिए और इसे "लोन" का नाम दिया। फिर फ़ॉल ने जिले की युनाइटेड स्टेट्स मरीन्स को यह आदेश दिया कि वे एल्क हिल भंडारों से रिसने वाले तेल का फ़ायदा उठा रहे प्रतियोगियों को उस जगह से हटा दे। जब प्रतियोगी कंपनियों को बंदूकों और संगीनों की नोंक पर वहाँ से हटाया गया तो उन्होंने दुखी होकर अदालत की शरण ली तब जाकर टीपॉट डोम स्कैंडल का भंडाफोड़ हुआ। इससे इतना हंगामा हुआ कि हार्डिंग सरकार ख़तरे में पड़ गई, पूरा देश काँप गया, रिपब्लिकन पार्टी का भविष्य अंधकारमय नज़र आने लगा और अल्बर्ट बी. फ़ॉल को जेल जाना पड़ा।

फ़ॉल की हर जगह निंदा हुई। इतनी निंदा सार्वजनिक जीवन में बहुत कम लोगों को सहनी पड़ी थी। परंतु क्या उन्हें कोई पश्चाताप हुआ ? कभी नहीं! सालों बाद हरबर्ट हूवर ने एक सामाजिक भाषण में यह कहा कि प्रेसिडेंट हार्डिंग की मौत किसी दोस्त के विश्वासघात के कारण मानसिक आघात पहुँचने से हुई। जब मिसेज़ फ़ॉल ने यह सुना तो वे अपनी कुर्सी से कूद पड़ीं। रोते हुए अपनी मुट्ठी आसमान की ओर तानते हुए वे चीख़ीं, "क्या! हार्डिंग के साथ फ़ॉल विश्वासघात करेंगे? असंभव ! मेरे पति ने कभी किसी के साथ विश्वासघात नहीं किया। सोने से भरा यह घर भी मेरे पति से कोई गलत काम नहीं करवा सकता। उल्टे उन्हीं के साथ विश्वासघात किया गया है और उन्हें बलि का बकरा बनाकर सूली पर चढ़ाया गया है।"

तो यही होता है। यही मानव स्वभाव है। हर गलत काम करने वाला अपनी गलती के लिए दूसरों को दोष देता है, परिस्थितियों को दोष देता है, परंतु खुद को दोष नहीं देता। हम सब यही करते हैं। इसलिए अगली बार जब हमारी इच्छा किसी की आलोचना करने की हो, तो हम अल केपोन, "दुनाली बंदूक" क्रॉले और अल्बर्ट हॉल को याद रखें। हमें यह एहसास होना चाहिए कि आलोचना बूमरैंग की तरह होती है। यह लौटकर हमारे ही पास आ जाती है, यानी बदले में वह व्यक्ति हमारी आलोचना करना शुरू कर देता है। हमें यह एहसास भी होना चाहिए कि जिस व्यक्ति की हम आलोचना कर रहे हैं या हम जिसे सुधारने की कोशिश कर रहे हैं वह जवाब में खुद की सफाई में कुछ तर्क देगा या फिर विनम्र टैफ़्ट की तरह यही कहेगा: "मैंने जो किया, उसके सिवाय मैं कर ही क्या सकता था ?"

15 अप्रैल, 1865 की सुबह अब्राहम लिंकन का पार्थिव शरीर एक सस्ते लॉजिंग हाउस के हॉल में रखा हुआ था। यह हॉल फ़ोर्ड थिएटर के सामने था जहाँ जॉन विल्कीस बूथ ने उन्हें गोली मारी थी। लिंकन का लंबा शरीर एक बिस्तर पर रखा था जो उनके शरीर के हिसाब से काफ़ी छोटा था। रोज़ा बॉन्हर की प्रसिद्ध पेंटिंग द हॉर्स फ़ेयर की सस्ती नक़ल बिस्तर के ऊपर टँगी हुई थी और एक गैस बत्ती पीली रोशनी फेंक रही थी।

 

 

लिंकन के पार्थिव शरीर के सामने खड़े रक्षा मंत्री स्टैंटन ने कहा, "लोगों के दिल जीतने वाला सर्वश्रेष्ठ शासक अब दुनिया में नहीं रहा।"

लिंकन लोगों का दिल किस तरह जीत लेते थे, उनकी सी जीवनियाँ पढी हैं और एक पुस्तक लिंकन द अननोन लिखने में सफलता का राज़ क्या था ? मैंने दस साल तक लिंकन की बहुत पूरे तीन साल लगाए हैं। मेरा विश्वास है कि मैंने लिंकन के व्यक्तित्व और उनके घरेल जीवन का जितना विस्तृत अध्ययन किया है, उतना शायद ही किसी ने किया होगा। मैंने लोगों के साथ व्यवहार करने की लिंकन की कला का भी विशेष अध्ययन किया। क्या लिंकन आलोचना करते थे ? हाँ। इंडियाना की पिजन क्रीक वैली में अपनी जवानी के दिनों में वे न सिर्फ लोगों की आलोचना करते थे, बल्कि पत्रों और कविताओं में लोगों का मखौल उड़ाते हुए उन्हें छपवाते भी थे। एक बार ऐसे ही एक पत्र ने नफ़रत की ऐसी आग भड़का दी जो जीवन भर जलती रही।

जब लिंकन इलिनॉय में वकील के रूप में प्रैक्टिस करते थे, तब भी वे खुलेआम अपने विरोधियों पर आक्रमण करते हुए पत्र लिखते थे और उन्हें अख़बारों में छपवाते थे। परंतु एक बार बात कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई।

1842 में लिंकन ने जेम्स शील्ड्स नाम के दंभी और नकचढ़े राजनेता पर व्यंग्य लिखा। लिंकन ने एक गुमनाम पत्र के माध्यम से यह व्यंग्य भेजा, जो स्प्रिंगफ़ील्ड जर्नल में छपा। पूरा शहर शील्ड्स पर हँस रहा था। संवेदनशील और दंभी शील्ड्स आग-बबूला हो गया। उसने पता लगा लिया कि पत्र किसने लिखा था। वह अपने घोड़े पर चढ़ा और उसने लिंकन को ढूँढ़कर उनके सामने द्वंद्वयुद्ध का प्रस्ताव रख दिया। लिंकन द्वंद्वयुद्ध नहीं करना चाहते थे, परंतु उनके पास बिना सम्मान खोए इससे बचने का रास्ता भी नहीं था। उन्हें हथियारों का विकल्प दिया गया। चूँकि उनकी बाँहें लंबी थीं, इसलिए उन्होंने तलवारबाज़ी को चुना। उन्होंने एक वेस्ट पॉइंट ग्रैजुएट से तलवारबाज़ी का प्रशिक्षण भी लिया। जिस दिन द्वंद्वयुद्ध होना था, उस दिन वे और शील्ड मिसिसिपी नदी के किनारे मिले और उनमें से एक की मृत्यु तय थी। परंतु आखिरी मिनट में साथियों के बीच-बचाव के कारण द्वंद्वयुद्ध टल गया।

 

लिंकन के जीवन की यह सबसे विकट घटना थी। इसने उन्हें लोगों के साथ व्यवहार करने की कला का एक अनमोल सबक सिखा दिया। इसके बाद उन्होंने फिर कभी किसी को अपमानजनक पत्र नहीं लिखा। इसके बाद उन्होंने फिर कभी किसी का मखौल नहीं उड़ाया। इसके बाद उन्होंने फिर कभी किसी बात के लिए किसी की आलोचना नहीं की।

गृहयुद्ध के दौरान लिंकन पोटोमैक की सेना के लिए एक के बाद एक नए जनरल को नियुक्त करते रहे और हर जनरल -मैक्लेलन, पोप, बर्नसाइड, हुकर, मीड ने इतनी बड़ी गलतियाँ कीं कि लिंकन हताशा में फ़र्श पर इधर से उधर चक्कर काटते रहे। आधा देश इन अयोग्य सेनापतियों को लानतें भेज रहा था, परंतु लिंकन "जिनके हृदय में किसी के लिए दुर्भावना नहीं थी, बल्कि सबके लिए सद्भावना थी", शांत रहे। उनका प्रिय कोटेशन था, "किसी की आलोचना मत करो, ताकि आपकी भी आलोचना न हो।"

जब मिसेज़ लिंकन और दूसरे लोग दक्षिणी प्रांतों के लोगों की आलोचना करते थे तो लिंकन जवाब देते थे, "उनकी आलोचना मत करो; अगर हम उन परिस्थितियों में होते तो हम भी वैसे ही होते।"

परंतु अगर किसी व्यक्ति के पास आलोचना के अवसर थे, तो निश्चित रूप से वह व्यक्ति लिंकन थे। हम सिर्फ़ एक उदाहरण से यह समझ सकते हैं :

गेटिसबर्ग का युद्ध जुलाई, 1863 के पहले तीन दिनों में लड़ा गया था। 4 जुलाई की रात को जनरल ली दक्षिण दिशा में पीछे हटने लगा। तूफ़ानी बादलों के कारण हुई तेज़ बारिश से बाढ़ आ गई। जब ली अपनी पराजित सेना के साथ पोटोमैक पहुँचा तो उसने देखा कि उसके सामने बाढ़ से उफनती नदी है जिसे पार करना संभव नहीं है और उसके पीछे विजेता यूनियन आर्मी है। ली बुरी तरह फँस चुका था। उसके पास बचने का कोई रास्ता नहीं था। लिंकन यह बात समझ गए। यह ईश्वर की कृपा से मिला एक सुनहरा मौका धा-ली की सेना को हराने का अवसर जिससे युद्ध तत्काल समाप्त हो जाता। इसलिए दिल में आशा का सैलाब लिए हुए लिंकन ने जनरल मीड को आदेश दिया कि वे युद्ध के बारे में कोई मीटिंग न करें बल्कि तत्काल ली पर हमला कर दें। लिंकन ने अपने आदेशों को टेलीग्राफ़ कर दिया और फिर एक विशेष संदेशवाहक को मीड के पास भेजकर तत्काल कार्यवाही करने को कहा।

और जनरल मीड ने क्या किया ? उसे जो आदेश मिले थे, उसने उनके ठीक विपरीत काम किया। लिंकन के मना करने के बावजूद उसने सैन्य सभा की मीटिंग बुलाई। वह हमला करने में झिझका। उसने टालमटोल की। उसने सब तरह के बहाने बनाकर उन्हें टेलीग्राफ़ किया। उसने ली पर हमला करने से साफ़ इंकार कर दिया। आख़िरकार बाढ़ का पानी उतर गया और ली अपनी सेना के साथ नदी पार करके सुरक्षित निकल गया।

 

लिंकन गुस्से से पागल हो गए। "इसका क्या मतलब है?" लिंकन अपने पुत्र के सामने चीख़ रहे थे। "हे भगवान! इसका क्या मतलब है? कितना सुनहरा मौक़ा था ? दुश्मन हमारी गिरफ्त में था। हमें सिर्फ़ अपने हाथ फैलाकर उसे पकड़ना था और फिर भी हमने उसे अपने हाथों से निकल जाने दिया। मेरे आदेशों के बावजूद मेरी सेना टस से मस नहीं हुई। परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि कोई भी जनरल ली को हरा सकता था। अगर मैं वहाँ होता, तो मैंने खुद उसे अपने हाथों से कोड़े लगाए होते।"

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घोर निराशा में लिंकन बैठे और उन्होंने मीड को यह पत्र लिखा। और याद रहे, अपने जीवन के इस दौर में लिंकन बेहद संयत थे और उनकी शब्दावली बेहद शालीन और संयमित हुआ करती थी। 1863 में लिंकन का लिखा यह पत्र गंभीरतम आलोचना से कम नहीं था।

"प्रिय जनरल,

"मुझे नहीं लगता कि ली के बच निकलने की गंभीरता से आप परिचित हैं। वह हमारी मुट्ठी में था और उसे पकड़ लेने से युद्ध समाप्त हो जाता। परंतु अब युद्ध लंबे समय तक चलता रहेगा। जब आप पिछले सोमवार को नदी के इस तरफ़ ली पर हमला नहीं कर सके, तो अब आप ऐसा कैसे कर सकते हैं जब वह नदी के उस पार सुरक्षित निकल गया है और आप अपनी दो तिहाई से ज़्यादा सेना उस पार नहीं ले जा सकते ? ऐसी आशा करना निश्चित रूप से अतार्किक है और मुझे नहीं लगता कि आप ज्यादा कुछ कर पाएँगे। सुनहरा मौक़ा आपके हाथ से निकल चुका है और मुझे इस बात का बेहद अफ़सोस है।"

जनरल मीड को यह पत्र पढ़कर कैसा लगा ?

मीड को यह पत्र कभी नहीं मिला। लिंकन ने इसे भेजा ही नहीं। यह पत्र लिंकन की मौत के बाद उनकी फ़ाइलों में मिला।

मेरा अंदाज़ा है और यह सिर्फ़ अंदाज़ा है कि यह पत्र लिखने के बाद लिंकन ने खिड़की से बाहर देखा होगा और खुद से कहा होगा, "एक मिनट। शायद मैं जल्दबाज़ी कर रहा हूँ। व्हाइट हाउस के शांत माहौल में बैठकर मीड पर हमला करने की सलाह देना मेरे लिए आसान है, परंतु अगर मैं गेटिसबर्ग में होता, और अगर मैंने इतना खून-खराबा देखा होता जितना मीड ने पिछले हफ्ते के दौरान देखा है, अगर मेरे कानों में भी घायलों और मरने वालों की चीख-पुकार गई होती, तो शायद मैं भी हमला करने के लिए तत्पर नहीं होता। अगर मैं मीड की तरह सुरक्षात्मक प्रवृत्ति का होता, तो शायद मैंने भी वही किया होता जो उसने किया था। वैसे भी, अब मौक़ा हाथ से निकल चुका है। अगर मैं यह पत्र भेज दूँगा तो इससे मेरी भड़ास तो निकल जाएगी, पर इससे मीड को बहुत ठेस पहुँचेगी। वह मेरी आलोचना करेगा और खुद को सही साबित करने की कोशिश करेगा। इससे दुर्भावना पैदा होगी, सेनापति के रूप में मीड की उपयोगिता बुरी तरह प्रभावित होगी और इसके बाद वह शायद सेना से इस्तीफ़ा भी दे दे।"

तो जैसा में पहले ही कह चुका है. लिंकन ने पत्र को एक तरफ़ रख दिया। कटु अनुभव से वे यह जानते थे कि तीखी आलोचना और डॉट-फटकार हमेशा बेमानी होती है और उनसे कोई लाभ नहीं होता।

प्रसिद्ध लेखक मार्क टवेन कभी-कभार अपना आपा खो बैठते थे और गुस्से में इतने गर्म पत्र लिखते थे कि काग़ज़ तक जलने लगता था। उदाहरण के तौर पर, एक बार उन्होंने गुस्से में एक व्यक्ति को लिखा, "आपको तो जिंदा दफ़ना दिया जाना चाहिए। अगर आप ऐसा चाहते हैं, तो मुझे बता दें ताकि मैं बाक़ी इंतज़ाम कर दूँ।" एक और मौके पर उन्होंने एक संपादक को पत्र लिखकर यह बताया कि उनका प्रूफ़रीडर "मेरी स्पेलिंग और विरामचिन्हों" को सुधारने की कोशिश करता है। ट्वेन ने आदेश दिया: "अगली बार आप मेरे लिखे अनुसार ही छापें और प्रूफ़रीडर से कहें कि वह अपने सुझावों को अपने सड़े हुए दिमाग़ में ही रखे।"

इस तरह के ज़हर बुझे पत्र लिखने से मार्क ट्वेन को राहत मिलती थी। इससे उनके दिल की भड़ास निकल जाती थी और इनसे कोई नुक़सान भी नहीं होता था, क्योंकि मार्क की पत्नी ऐसे पत्रों को चुपके से फाड़ दिया करती थी। उन्हें कभी डाक के डिब्बे में डाला ही नहीं जाता था।

क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जिसे आप बदलना, सुधारना और बेहतर बनाना चाहते हों ? बहुत बढ़िया ! यह बहुत अच्छा विचार है। मैं भी इसके पक्ष में हूँ। परंतु क्यों न खुद से ही शुरुआत की जाए ? विशुद्ध स्वार्थी ढंग से सोचें तो भी दूसरों को सुधारने के बजाय खुद को सुधारना हमारे लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद होगा- हाँ, और कम ख़तरनाक भी। कन्फ्यूशियस ने कहा था, "जब आपके खुद के घर की सीढ़ियाँ ही साफ़ न हों तो अपने पड़ोसी की छत पर पड़ी बर्फ़ के बारे में शिकायत मत करो।"

जब मैं युवा था और लोगों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा था तो मैंने रिचर्ड हार्डिंग डेविस नाम के लेखक को एक मुर्खतापूर्ण पत्र लिखा। मैं लेखकों के बारे में एक पत्रिका के लिए लेख तैयार कर रहा था और मैंने डेविस से उनके काम करने के तरीके के बारे में पूछा। कुछ सप्ताह पहले ही मुझे किसी का ऐसा पत्र मिला था, जिसके नीचे लिखा था, "डिक्टेट किया गया, परंतु पढ़ा नहीं गया।" मैं इस वाक्य से बहुत प्रभावित हुआ। मुझे लगा कि लेखक बहुत बड़ा और व्यस्त और महत्वपूर्ण व्यक्ति होगा तभी उसने ऐसा लिखा। मैं क़तई व्यस्त नहीं था, परंतु मैं रिचर्ड हार्डिंग डेविस पर इम्प्रेशन जमाना चाहता था, इसलिए मैंने अपनी छोटी चिट्ठी के आख़िर में यह शब्द लिख दिए, "डिक्टेट किया गया, परंतु पढ़ा नहीं गया।"

उसने मेरे पत्र का जवाब देने का कष्ट नहीं किया। उसने इस पत्र के आख़िर में एक लाइन लिखकर लौटती डाक से मेरे पास भिजवा दिया : "आपके बैड मैनर्स का कोई जवाब नहीं।" बात सच थी। मैंने गलती की थी और शायद मेरी भर्त्सना भी होनी चाहिए थी। परंतु चूँकि मैं इंसान था इसलिए मुझे इस बात का बुरा लगा। मुझे इतनी चोट पहुँची थी कि जब दस साल बाद मैंने रिचर्ड हार्डिंग डेविस की मौत की ख़बर पढ़ी तो मेरे दिमाग़ में एक ही विचार घूम रहा था और मुझे यह स्वीकार करने में शर्म आती है वह चोट जो उन्होंने मुझे पहुँचाई थी।

अगर आप और मैं कल किसी के मन में अपने लिए विद्वेष पैदा करना चाहते हों, जो दशकों तक पलता रहे और मौत के बाद भी बना रहे, तो हमें और कुछ नहीं करना है सिर्फ़ चुनिंदा शब्दों में चुभती हुई आलोचना करनी है इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारी आलोचना कितनी सही या जायज़ है।

लोगों के साथ व्यवहार करते समय हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हम तार्किक लोगों से व्यवहार नहीं कर रहे हैं। हम भाबनात्मक लोगों से व्यवहार कर रहे हैं जिनमें पूर्वाग्रह भी हैं, ख़ामियाँ भी हैं; गर्व और अहंकार भी है।

कटु आलोचना के कारण ही थॉमस हार्डी जैसे अँग्रेज़ी साहित्य के महान उपन्यासकार ने उपन्यास लिखना हमेशा के लिए छोड दिया। आलोचना के कारण ही अँग्रेज कवि थॉमस चैटरटन ने आत्महत्या कर ली।

चलकर इतने कटनीतिक बन गए लोगों के साथ व्यवहार करने में इतने कुशल हो गए कि उन्हें फ्रांस में राजदूत के रूप में भेजा गया। बेंजामिन फ्रैंकलिन जो अपनी युवावस्था में अभद्र थे, आगे उनकी सफलता का राज़ क्या था ? "मैं किसी के बारे में बरा नहीं बोलेंगा." उनका कहना था, "और हर एक के बारे में अच्छा ही बोलूँगा।"

कोई भी मुर्ख बराई कर सकता है. निंदा कर सकता है. शिकायत कर सकता है और ज्यादातर मुर्ख यही करते हैं।

परंतु समझने और माफ़ करने के लिए आपको समझदार और संयमी होना पड़ता है।

कार्लायल ने कहा था, "महान व्यक्ति छोटे लोगों के साथ व्यवहार करने में अपनी महानता दिखाते हैं।"

बॉब हूवर एक प्रसिद्ध टेस्ट पायलट थे जो एयर शो में अक्सर प्रदर्शन किया करते थे। एक बार वे सैन डिएगो से एयर शो में हिस्सा लेने के बाद लॉस एंजेलिस में अपने घर की तरफ लौट रहे थे। जैसा फ्लाइट ऑपरेशन्स पत्रिका में वर्णन किया गया है, हवा में तीन सौ फुट की ऊँचाई पर दोनों इंजन अचानक बंद हो गए। कुशल तकनीक से उन्होंने हवाई जहाज़ उतार लिया और हालाँकि इस प्रक्रिया में हवाई जहाज़ को तो काफ़ी नुक़सान पहुँचा परंतु किसी को चोट नहीं आई।

इस घटना के बाद हूवर ने सबसे पहले हवाई जहाज़ के ईंधन की जाँच की। जैसी उन्हें शंका थी, उनके द्वितीय विश्वयुद्ध वाले प्रोपेलर जहाज़ में गैसोलीन की जगह जेट का ईंधन डाल दिया गया था।

हवाई अड्डे लौटने के बाद उन्होंने उस मैकेनिक के बारे में पूछा जिसने उनके हवाई जहाज़ की सर्विसिंग की थी। युवा मैकेनिक अपनी गंभीर गलती पर बुरी तरह शर्मिंदा था। जब हूवर उसके पास पहुँचे तो उसके चेहरे पर आँसू बह रहे थे। उसकी गलती की वजह से एक बहुत महँगा हवाई जहाज़ नष्ट हो गया था, और तीन जिंदगियाँ भी जा सकती थीं।

आप हूवर के गुस्से का अनुमान लगा सकते हैं? इस लापरवाही के लिए यह कुशल और स्वाभिमानी पायलट कितनी कडी फटकार लगा सकता था। परंतु हूवर ने मैकेनिक को फटकार नहीं लगाई, उन्होंने उसकी आलोचना भी नहीं की। इसके बजाय, उन्होंने अपनी बाँह को उसके कंधे पर रखकर कहा, "तुम्हें यह बताने के लिए कि मुझे तुम पर पूरा भरोसा है और अब तुम दुबारा ऐसा नहीं करोगे, मैं चाहता हूँ कि तुम कल मेरे एफ़ 51 हवाई जहाज़ की सर्विसिंग करो।"

ज़्यादातर माँ-बाप अपने बच्चों की आलोचना करते हैं। आप सोच रहे होंगे कि मैं आपको ऐसा करने से रोकूँगा। नहीं, मैं ऐसा नहीं करूँगा। मैं सिर्फ़ यह कहना चाहता हूँ, "इसके पहले कि आप उनकी आलोचना करें, अमेरिकी पत्रकारिता के एक क्लासिक लेख 'फ़ादर फ़ॉरगेट्स' को पढ़ लें।" यह लेख पहली बार पीपुल्स होम जर्नल के संपादकीय के रूप में छपा था। हम इस लेख को लेखक की अनुमति से छाप रहे हैं। रीडर्स डाइजेस्ट में इसका संक्षिप्त रूपांतरण इस तरह प्रकाशित हुआ था :

"फ़ादर फ़ॉरगेट्स" उन छोटे लेखों में से एक है जो गहन अनुभूति के किसी क्षण में लिखे जाते हैं जो पाठकों के दिल को छू जाते हैं। अब यह लेख लगातार पुनर्प्रकाशित हो रहा है। इसके लेखक डब्ल्यू. लिविंगस्टन लारनेड के अनुसार यह लेख "हज़ारों पत्रिकाओं और अखबारों में छप चुका है। इसे कई विदेशी भाषाओं में भी उतनी ही लोकप्रियता मिली है और उनमें भी यह लेख बहुत ज्यादा बार छपा है। मैंने हज़ारों लोगों को व्यक्तिगत अनुमति दी है कि वे इसका प्रयोग स्कूल, चर्च और लेक्चर प्लेटफ़ॉर्म से कर सकें। यह अनगिनत बार असंख्य कार्यक्रमों में रेडियो पर भी आ चुका है। हैरानी की बात है कि कॉलेज की पत्रिकाओं और हाई स्कूल की

पत्रिकाओं में भी यह लेख छपा। कई बार एक छोटा सा लेख रहस्यमयी कारणों से "क्लिक" हो जाता है। इस लेख के साथ यही हुआ है।"

 

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फ़ादर फ़ॉरगेट्स (हर पिता यह याद रखे)

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डब्ल्यू. लिविंग स्टन लारनेड

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सुनो बेटे ! मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ। तुम गहरी नींद में सो रहे हो। तुम्हारा नन्हा सा हाथ तुम्हारे नाजुक गाल के नीचे दबा है। और तुम्हारे पसीना-पसीना ललाट पर घुँघराले बाल बिखरे हुए हैं। मैं तुम्हारे कमरे में चुपके से दाखिल हुआ हूँ, अकेला। अभी कुछ मिनट पहले जब मैं लायब्रेरी में अखबार पढ़ रहा था, तो मुझे बहुत पश्चाताप हुआ। इसीलिए तो आधी रात को मैं तुम्हारे पास खड़ा हूँ, किसी अपराधी की तरह।

जिन बातों के बारे में मैं सोच रहा था, वे ये हैं, बेटे। मैं आज तुम पर बहुत नाराज़ हुआ। जब तुम स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहे थे, तब मैंने तुम्हें खूब डाँटा... तुमने टॉवेल के बजाय पर्दे से हाथ पोंछ लिए थे। तुम्हारे जूते गंदे थे, इस बात पर भी मैंने तुम्हें कोसा। तुमने फ़र्श पर इधर-उधर चीजें फेंक रखी थीं... इस पर मैंने तुम्हें भला-बुरा कहा।

नाश्ता करते वक़्त भी मैं तुम्हारी एक के बाद एक ग़लतियाँ निकालता रहा। तुमने डाइनिंग टेबल पर खाना बिखरा दिया था। खाते समय तुम्हारे मुँह से चपड़-चपड़ की आवाज़ आ रही थी। मेज़ पर तुमने कोहनियाँ भी टिका रखी थीं। तुमने ब्रेड पर बहुत सारा मक्खन भी चुपड़ लिया था। यही नहीं जब मैं ऑफ़िस जा रहा था और तुम खेलने जा रहे थे और तुमने मुड़कर हाथ हिलाकर "बाय-बाय, डैडी" कहा था, तब भी मैंने भूकुटी तानकर टोका था, "अपनी कॉलर ठीक करो।"

 

 

 

 

 

 

शाम को भी मैंने यही सब किया। ऑफ़िस से लौटकर मैंने देखा कि तुम दोस्तों के साथ मिट्टी में खेल रहे थे। तुम्हारे कपड़े गंदे थे, तुम्हारे मोज़ों में छेद हो गए थे। मैं तुम्हें पकड़कर ले गया और तुम्हारे दोस्तों के सामने तुम्हें अपमानित किया। मोज़े महँगे हैं- जब तुम्हें ख़रीदने पड़ेंगे तब तुम्हें इनकी क़ीमत समझ में आएगी। ज़रा सोचो तो सही, एक पिता अपने बेटे का इससे ज़्यादा दिल किस तरह दुखा सकता है?

क्या तुम्हें याद है जब मैं लाइब्रेरी में पढ़ रहा था तब तुम रात को मेरे कमरे में आए थे, किसी सहमे हुए मृगछौने की तरह। तुम्हारी आँखें बता रही थीं कि तुम्हें कितनी चोट पहुँची है। और मैंने अख़बार के ऊपर से देखते हुए पढ़ने में बाधा डालने के लिए तुम्हें झिड़क दिया था, "कभी तो चैन से रहने दिया करो। अब क्या बात है?" और तुम दरवाज़े पर ही ठिठक गए थे।

तुमने कुछ नहीं कहा था, बस भागकर मेरे गले में अपनी बाँहें डालकर मुझे चूमा था और "गुडनाइट" कहकर चले गए थे। तुम्हारी नन्ही बाँहों की जकड़न बता रही थी कि तुम्हारे दिल में ईश्वर ने प्रेम का ऐसा फूल खिलाया है जो इतनी उपेक्षा के बाद भी नहीं मुरझाया। और फिर तुम सीढ़ियों पर खट-खट करके चढ़ गए।

तो बेटे, इस घटना के कुछ ही देर बाद मेरे हाथों से अख़बार छूट गया और मुझे बहुत ग्लानि हुई। यह क्या होता जा रहा है मुझे ? ग़लतियाँ ढूँढ़ने की, डाँटने-डपटने की आदत सी पड़ती जा रही है मुझे। अपने बच्चे के बचपने का मैं यह पुरस्कार दे रहा हूँ। ऐसा नहीं है, बेटे, कि मैं तुम्हें प्यार नहीं करता, पर मैं एक बच्चे से ज़रूरत से ज्यादा उम्भी लगा बैठा था। मैं तुम्हारे व्यवहार को अपनी उम्र के तराजू पर तौल रहा था।

तुम इतने प्यारे हो, इतने अच्छे और सध्ये तुम्हारा नन्हा सा दिल इतना बड़ा है जैसे चौड़ी पहाडियों के पीडे से उगती सुबह । तुम्हारा बड़प्पन इसी बात से नजर आता है कि दिन भर डाँटते रहने वाले पापा को भी तुम रात को "गुडनाइट किस" देने आए। आज की रात और कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है, बेटे। मैं अँधेरे में तुम्हारे सिरहाने आया हूँ और मैं यहाँ पर घुटने टिकाए बैठा है. शर्मिदा ।

यह एक कमजोर पश्चाताप है। मैं जानता हूँ कि अगर मैं तुम्हें जगाकर यह सब कहँगा तो शायद तुम नहीं समझ पाओगे। पर कल से मैं सचमुच तुम्हारा प्यारा पापा बनकर दिखाऊँगा। मैं तुम्हारे साथ खेलूँगा, तुम्हारी मज़ेदार बातें मन लगाकर सुनूँगा, तुम्हारे साथ खुलकर हँसँगा और तुम्हारी तकलीफ़ों को बाँदूँगा। आगे से जब भी मैं तुम्हें डॉटने के लिए मुँह खोलूँगा, तो इसके पहले अपनी जीभको अपने दाँतों में दबा लूँगा। मैं बार-बार किसी मंत्र की तरह यह कहना सीखूँगा, "वह तो अभी बच्चा है... छोटा सा बच्चा!"

 

 

 

मुझे अफ़सोस है कि मैंने तुम्हें बच्चा नहीं, बड़ा मान लिया था। परंतु आज जब मैं तुम्हें गुड़ी-मुड़ी और थका-थका पलंग पर सोया देख रहा हूँ, बेटे, तो मुझे एहसास होता है कि तुम अभी बच्चे ही तो हो। कल तक तुम अपनी माँ की बाँहों में थे, उसके कांधे पर सिर रखे। मैंने तुमसे कितनी ज़्यादा उम्मीदें की थीं, कितनी ज़्यादा !

लोगों की आलोचना करने के बजाय हमें उन्हें समझने की कोशिश करनी चाहिए। हमें यह पता लगाना चाहिए कि जो काम वे करते हैं, उन्हें वे क्यों करते हैं। यह आलोचना करने से बहुत ज्यादा रोचक और लाभदायक होगा। यही नहीं, इससे सहानुभूति, सहनशक्ति और दयालुता का माहौल भी बनेगा। "सबको समझ लेने का मतलब है सबको माफ कर देना।"

 डॉ. जॉनसन ने कहा था, "भगवान खुद इंसान की मौत से पहले उसका फैसला नहीं करता।"

फिर आप और मैं ऐसा करने वाले कौन होते हैं?

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सिद्धांत 1

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"बुराई मत करो, निंदा मत करो, शिकायत मत करो।"

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और दोस्तो ये था आज का चैपटर

और अब मिलेगों नए चैपटर के साथ नई विडियों में,

धन्यावाद, नमस्कार, जै हिन्द

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