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मेरी कहानी -- एटॉमिक हैबिट्स - Atomic Habits - By - James Clear- की ऑडियो बुक ---- Hindi translation of the international bestseller - Atomic Habits - की ऑडियो बुक- #Audio #Book ---- Easy and Proven Ways to Develop Good Habits and Break Bad Habits – bY James Clear ----- एटॉमिक हैबिट्स- Atomic Habits - - जेम्स क्लियर - " एटॉमिक हैबिट्स " का हिंदी अनुवाद - मनोज दुबे और विश्वदीप नाग

 

मेरी कहानी  --  एटॉमिक हैबिट्स - Atomic Habits - By - James Clear- की ऑडियो बुक   ----  Hindi translation of the international bestseller - Atomic Habits - की ऑडियो बुक-  #Audio #Book  ----  Easy and Proven Ways to Develop Good Habits and Break Bad Habits – bY James Clear  -----  एटॉमिक हैबिट्स- Atomic Habits -  - जेम्स क्लियर - " एटॉमिक हैबिट्स " का हिंदी अनुवाद - मनोज दुबे और विश्वदीप नाग


मेरी कहानी  --  एटॉमिक हैबिट्स - Atomic Habits - By - James Clear- की ऑडियो बुक 

Hindi translation of the international bestseller - Atomic Habits - की ऑडियो बुक-  #Audio #Book

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Easy and Proven Ways to Develop Good Habits and Break Bad Habits – bY James Clear

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एटॉमिक हैबिट्स- Atomic Habits -  - जेम्स क्लियर - " एटॉमिक हैबिट्स " का हिंदी अनुवाद - मनोज दुबे और विश्वदीप नाग

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Atomic Habits -  By : जेम्स क्लियर - Writer : JAMES CLEAR

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 मेरी कहानी

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एटॉमिक

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1 -  किसी भी चीज़ की अत्यंत छोटी मात्रा; किसी बड़े तंत्र की सबसे छोटी इकाई, जिसे और अधिक घटाया नहीं जा सकता।

2 -   असीमित ऊर्जा या शक्ति का स्रोत।

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हैबिट

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1. एक रूटीन या अभ्यास, जो नियमित रूप से किया जाता है; किसी विशेष स्थिति में अपने आप होने वाली प्रतिक्रिया।

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और अब शुरू करते है मेरी कहानी

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-- मैं हाई स्कूल में द्वितीय वर्ष के अंतिम दिन की बात है। मेरे चेहरे पर बेसबॉल का बैट लगा। मेरे क्लासमेट ने इसे तेज़ी से घुमाया और वह हाथ से छूट गया और हवा में उड़ते हुए मेरी ओर आया। मैं सँभलता, उससे पहले ही वह मेरी आँखों के बीचों-बीच लगा। टक्कर के क्षणों को लेकर मेरी कोई स्मृति नहीं है।

बैट इतनी तेज़ी से मेरे चेहरे पर लगा कि उसने मेरी नाक को खराब करके उसे यू के आकार में कर दिया। इस टक्कर से मेरे दिमाग़ के कुछ नरम ऊतक मेरी खोपड़ी के भीतर चले गए। एकदम ही मेरे सिर में सूजन उभर गई। एक क्षण से भी कम समय में मेरी नाक टूट चुकी थी, खोपड़ी में हड्डियाँ टूटी थी और आँखों के दोनों सॉकेट हिल चुके थे।

जब मैंने आँखें खोली, तो देखा कि लोग मेरी ओर मदद के लिए भाग रहे थे। मैंने नीचे देखा, तो कपड़ों पर लाल धब्बे देखे। मेरे एक क्लासमेट ने अपनी शर्ट निकालकर मुझे दी। मैंने नाक से बह रहे खून को रोकने का प्रयास किया। मैं अचंभित और दुविधा में था, मुझे पता ही नहीं था कि मैं कितने गंभीर रूप से जख्मी था।

मेरे टीचर ने अपनी भुजा मेरे कंधे के नीचे रखी ओर हमने दूर नर्स के रूम तक चलना शुरू किया। पूरे मैदान को पार करके और पहाड़ी के नीचे नर्स के ऑफिस के लिए वापस स्कूल लौटे। अनके हाथों ने सीधा रखने के लिए मुझे सहारा दिया। हम धीरे-धीरे वहाँ गए। किसी ने महसूस नहीं किया कि हर मिनट कीमती था।

जब हम नर्स के कमरे में आए, तो नर्स ने मुझसे कई सवाल पूछे।

"कौनसा वर्ष चल रहा है?"

मेरा ज़वाब था '1998', जबकि वह 2002 का वर्ष था।

'अमेरिका के राष्ट्रपति कौन हैं?'

मैंने कहा, 'बिल क्लिटन', जबकि सही उत्तर था, जॉर्ज बुश।

"आपकी माँ का नाम क्या है?"

'ओह', मैं अचकचा गया। इसमें दस सेकंड निकल चुके थे।

'पैटी', मैंने सामान्य तरह से कहा, जबकि मैं यह देख नहीं सका कि मुझे अपनी ही माँ का नाम याद करने में दस सेकंड लग गए।

यही अंतिम प्रश्न मुझे याद है। मेरा शरीर मस्तिष्क की सूजन झेल नहीं सका, एम्बुलेंस के पहले ही मैं होश खो चुका था। कुछ ही मिनट बाद मुझे स्कूल से स्थानीय हॉस्पिटल ले जाया गया।

वहाँ पहुँचने के बाद मेरे शरीर ने धीरे-धीरे काम करना बंद कर दिया। मुझे निगलने एवं साँस लेने में परेशानी होने लगी। कुछ ही देर में साँस बंद हो गई। डॉक्टरों ने तेज़ी से मुझे ऑक्सीज़न दी। उन लोगों ने यह भी फैसला लिया कि स्थानीय हॉस्पिटल मेरे मामले को देखने के लिए सुसज्जित नहीं है और उन्होंने हेलिकॉप्टर बुलाकर मुझे सिनसिनाटी के बड़े हॉस्पिटल में ले जाने का आदेश दिया।

मुझे आपातकालीन कक्ष के दरवाज़ों से निकाल कर हेलिपैड की ओर ले जाया गया। एक नर्स ने मुझे आगे की ओर धकेला, तो स्ट्रेचर ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर हिलता-डुलता हुआ चलता रहा, दूसरी नर्स ने हाथ से मेरी साँस को पंप किया। मेरी मम्मी कुछ देर पहले ही हॉस्पिटल में आई थीं और हेलिकॉप्टर में भरे पास आ गईं। मैं बेहोश था और खुद साँस नहीं ले पा रहा था। उन्होंने ही उड़ान में मेरा हाथ थामे रखा।

मेरी मम्मी ही मुझे हेलिकॉप्टर में ले गईं, मेरे पापा घर गए और उन्होंने मेरे भाई-बहन को यह जानकारी दी। वे जब मेरी बहन को बताने लगे, तब उनके आँसू निकल पड़े कि वे उस रात मेरी बहन की कक्षा आठ की ग्रेजुएशन सेरेमनी से वंचित रह जाएँगे। मेरे भाई-बहन को परिजन और मित्रों के यहाँ छोड़ने के बाद वे सिनसिनाटी में मेरी मम्मी के पास आ गए।

जब मैं और मेरी मम्मी हॉस्पिटल की छत पर हेलिकॉप्टर से उतरे, तो बीस डॉक्टर और नर्स दौड़ते हुए हेलिपैड पर आए और मुझे भीतर ले गए। तब तक मस्तिष्क में सूजन इतनी अधिक हो गई थी कि मैं बार-बार सदमे के बाद की स्थिति में जकड़ जाता था। मेरी अस्थियों को जोड़ना था, लेकिन सर्जरी की स्थिति नहीं थी। मुझे तीसरे दिन एक और बार जकड़न की शिकायत के चलते चिकित्सकीय परीक्षण के लिए कोमा में लाते हुए वेंटिलेटर पर रख दिया गया।

मेरे मम्मी-पापा इस हॉस्पिटल से अपरिचित नहीं थे। दस वर्ष पहले जब मेरी बहन को तीन वर्ष की आयु में ल्यूकेमिया बताया गया था, तब वे इसी इमारत के भूतल पर उसे लाए थे। तब मैं पाँच वर्ष का ही था। मेरा भाई छह माह का ही था। ढाई वर्ष के किमोथैरेपी के उपचार व मेरुदंड, बोन मैरो की बायोप्सी के बाद मेरी बहन कैंसर से मुक्त हो गई और हँसते-खेलते वहाँ से निकल आई। दस वर्ष के सामान्य जीवन के बाद मेरे मम्मी-पापा उसी जगह अपने एक और बच्चे को लेकर आ गए थे।

जब मैं कोमा में चला गया, तब हॉस्पिटल ने एक पादरी और एक सामाजिक कार्यकर्ता को मेरे मम्मी-पापा की मदद के लिए भेजा। यह वही पादरी था, जो दस वर्ष पूर्व मेरी बहन के भर्ती होने के समय आया था।

दिन ढल कर रात हो चुकी थी। मुझे कई मशीनें जीवित रख रही थीं। मेरे मम्मी-पापा हॉस्पिटल के गद्दों पर कुछ पल के लिए सो जाते थे और थकान के चलते लेट जाते थे, लेकिन चिंता के मारे फिर उठ जाते थे। मेरी मम्मी ने मुझे बाद में बताया, "यह मेरे जीवन की सबसे खराब रात थी।"

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मेरी सेहत में सुधार होना

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मुझ पर ईश्वर की कृपा हुई और अगले दिन सुबह मेरी साँस लौटी, तब डॉक्टरों ने राहत ली और मुझे कोमा से बाहर निकाल लिया। अंततः जब मुझे होश आया, तो मैंने देखा कि मेरे सूँघने की शक्ति नहीं रही है। तब एक नर्स ने परीक्षण के दौरान मुझसे कहा कि सेब के रस के बॉक्स में ज़ोर से सूँधिए। ऐसा करने से मेरी गंध लेने की शक्ति लौट आई, लेकिन तब सब चकित रह गए कि जैसे ही मैंने साँस लेकर खींची, तो मेरी आँखों के सॉकेट के फ्रेक्चर में तेज़ी से हवा पहुँचने से मेरी बाई आँख बाहर आ गई। आँखों का गोल भाग किसी सॉकेट से फूल कर बाहर आ गया था, जिसे खतरनाक ढंग से पलकों और मेरे मस्तिष्क से जुड़ी ऑप्टिक तंत्रिका ने पकड़ रखा था।

तब नेत्र विशेषज्ञ ने कहा कि जैसे ही मैं धीरे से साँस छोडूंगा, तो आँखें वापस अपनी अवस्था में आ जाएँगी, लेकिन यह कह नहीं सकते कि इसमें कितना समय लग जाएगा। हफ़्ते के बाद मेरी शल्य-क्रिया होनी थी, जिससे मुझे ठीक होने में कुछ और समय लग जाता। मैं ऐसा लग रहा था, मानो बॉक्सिंग के मैच में ग़लत स्थान पर खड़ा हूँ। हम घर लौट आए और मेरी नाक तब भी टूटी हुई थी, चेहरे पर करीब आधा दर्जन अस्थियाँ टूटी थीं और बाईं आँख फूली हुई।

बाद के महीने बहुत कठिन थे। मुझे लगने लगा था कि मेरे जीवन में सब कुछ थम गया है। हफ़्तों तक मुझे सब कुछ दो दिखाई देता था। मैं सीधे नहीं देख पाता था। एक माह से अधिक समय लगा, लेकिन मेरी आँख धीरे-धीरे ठीक हो गई। मेरे देखने की समस्या को ठीक होने में आठ माह लग गए, तब मैं कार चला सका।

शारीरिक उपचार में मुझसे बुनियादी एक्सरसाइज़ कराई गई, जैसे सीधी लकीर पर चलना। मैं वृढ़ था कि मेरी चोट मुझे अवसाद में न भर दे, लेकिन कुछ पल थे, जिसमें मैं निराश होता था, जबकि कुछ में उत्साह से भर जाता था।

एक वर्ष बाद जब मैं बेसबॉल के मैदान पर लौटा, तो यह जानकार मुझे पीड़ा हुई कि कितनी और मेहनत अभी मुझे करनी होगी। यह खेल मेरे जीवन का प्रमुख हिस्सा रहा था। मेरे पापा ने सेंट लुइस कार्डिनल के लिए माइनर लीग बेसबॉल खेला था। मेरा भी सपना इसे पेशेवर तरीके से खेलने का था। महीनों के पुनर्वास के पश्चात मेरी सबसे अधिक इच्छा मैदान पर लौटने की थी।

लेकिन बेसबॉल में मेरी वापसी आसान नहीं थी। जब सीज़न शुरू हुआ, तो मैं एकमात्र जूनियर था, जिसे यूनिवर्सिटी की बेसबॉल टीम से हटा दिया गया था। मुझे हाईस्कूल के द्वितीय वर्ष की टीम के साथ खेलने के लिए जूनियर यूनिवर्सिटी भेजा गया। मैं चार वर्ष की उम्र से खेल रहा था और एक ऐसा व्यक्ति, जिसने अपना पूरा समय और प्रयास किसी खेल में लगाया हो, उसे इस तरह से अलग करना अपमानजनक था। मुझे आज भी वह दिन अच्छी तरह याद है, जब यह हुआ था। मैं अपनी कार में बैठकर रोने लगा और रेडियो को किसी अच्छे गाने के लिए ट्यून करने लगा, जो मुझे बेहतर महसूस करा सके।

वर्ष भर के आत्म संदेह के बाद मैं यूनिवर्सिटी टीम में सीनियर के रूप में शामिल हो सका, लेकिन मैं मैदान में बहुत ही कम जा सका। कुल मिलाकर हाईस्कूल यूनिवर्सिटी बेसबॉल की मैंने 11 पारियाँ खेलीं, जो मुश्किल से किसी एक गेम से थोड़ी सी ज़्यादा थीं।

 

हाई स्कूल में मेरे खराब करियर के बाद भी मैं यह विश्वास कर रहा था कि मैं एक महान खिलाड़ी बन सकता हूँ। मैं जानता था कि यदि हालात सुधारने हैं, तो इसके लिए मुझे ही कोशिश करनी होगी। चोट लगने के दो वर्ष बाद निर्णायक मोड़ तब आया, जब मैं डेनिसन यूनिवर्सिटी से जुड़े कॉलेज में जाने लगा। यह नया आरंभथा। यही वह स्थान था, जहाँ मैंने पहली बार समझा कि छोटी आदतों में कितना विस्मयकारी सामर्थ्य रहता है।

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आदतों के बारे में मैंने कैसे सीखा

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डेनिसन यूनिवर्सिटी जाना मेरे जीवन का सर्वोत्तम फैसला था। मुझे बेसबॉल टीम में स्थान मिला, हालाँकि मैं सबसे नीचे रोस्टर में फ्रेशमैन के रूप में था, तो भी रोमांचित था। हाईस्कूल के मेरे वर्षों में उथल-पुथल के बावजूद मैं कॉलेज में एथलीट बन गया था।

बेसबॉल टीम में मेरी जल्द शुरुआत होने वाली नहीं थी, तो मैंने जीवन को व्यवस्थित करने पर ध्यान देना शुरू कर दिया। मेरे मित्र देर रात तक जगते थे और वीडियो गेम्स खेलते थे। मैंने रात को जल्द सोने की आदत बना ली। कॉलेज छात्रावास की अस्त-व्यस्त दुनिया में, मैं अपने कमरे को साफ-सुथरा और व्यवस्थित रखता था। ये छोटे सुधार थे, लेकिन इन्होंने मुझे अपने जीवन पर नियंत्रण रखना सिखा दिया। मैं दोबारा आत्मविश्वास का अनुभव करने लगा। यह बढ़ता आत्मविश्वास मेरी क्लॉस में भी दिखा। मेरे अध्ययन की आदतें सुधर गई और फर्स्ट ईयर में मुझे लगातार ए-ग्रेड्स मिलीं।

आदत एक दिनचर्या या व्यवहार है, जो नियमित रूप से प्रदर्शित होती है। ज्यादातर मामलों में यह स्वतः ही हो जाता है। जैसे-जैसे मैं हर सेमेस्टर पास करता गया, वैसे-वैसे मैं छोटी-छोटी आदतों को निरंतर जोड़ता गया। ये आदतें अंततः मुझे ऐसे परिणामों की ओर ले गईं, जो उस समय अकल्पनीय थे, जब मैंने शुरुआत की थी। उदाहारण के लिए, जीवन में पहली बार मैंने हर हफ़्ते कई दफा लाइट वेट लिफ्टिंग करने को अपनी आदत में शामिल कर लिया। बाद के वर्षों में यह सिलसिला जारी रहा। इस दौरान मेरी छह फीट चार इंच की काया 170 पाउंड (77 केजी) से बढ़कर 200 पाउंड (91 केजी) की हो गई।

जब द्वितीय वर्ष के सत्र की शुरुआत हुई, तो मुझे एक भूमिका पिचिंग स्टाफ (बेसबॉल में) में मिल गई। जूनियर रहते हुए मैं टीम कैप्टन चुना गया और सीज़न पूरा होने पर मैं ऑल कॉन्फ्रेंस टीम के लिए चुना गया, लेकिन मेरे सीनियर सीज़न ख़त्म होने तक मेरे सोने, अध्ययन और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग की आदतों ने वास्तव में सकारात्मक परिणाम देना शुरू कर दिया था।

जब मुझे हेलिकॉप्टर में हॉस्पिटल ले जाया गया था और कोमा में रखा गया था, उस घटना के छह वर्ष बाद मुझे डेनिसन यूनिवर्सिटी में शीर्ष पुरुष एथलीट चुना गया और मेरा नाम ईएसपीएन ऐकडेमिक ऑल अमेरिका टीम में था। पूरे देश में यह सम्मान मात्र तैंतीस खिलाड़ियों को दिया गया था।

 

जब तक मैं ग्रेजुएट हुआ, तब तक मेरा नाम स्कूल की रिकॉर्ड बुक्स में आठ श्रेणियों में दर्ज किया जा चुका था। इसी वर्ष मुझे यूनिवर्सिटी का सर्वोच्च ऐकडेमिक सम्मान, प्रेसिडेंट मेडल भी मिला।

सुनने में यदि यह आपको डींगें मारने जैसा लगता है, तो मुझे उम्मीद है कि आप मुझे माफ कर देंगे। सच कहूँ तो मेरे खेल करियर में ऐसा कुछ उल्लेखनीय या ऐतिहासिक नहीं था। पेशेवर खिलाड़ी के रूप में मैं खेल नहीं पाया, हालाँकि उन वर्षों को मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि मैंने कुछ ऐसा अर्जित कर लिया था, जो दुर्लभ था। मैंने अपनी क्षमता को पूर्ण रूप से विकसित कर लिया; और मैं मानता हूँ कि इस पुस्तक में जो विचार हैं, वे क्षमताओं को पूर्ण विकसित करने में आपकी मदद भी करेंगे।

 

हम सभी जीवन में चुनौतियों का सामना करते हैं। चोट लगना मेरे जीवन की चुनौतियों में से एक था, लेकिन उसके अनुभव ने मुझे एक अहम पाठ सिखा दिया। पहले जो बदलाव छोटे और कम महत्त्व के लगते हैं, उन्हें वर्षों करते रहने पर वे जुड़कर उल्लेखनीय परिणाम देते हैं। हम सभी नुकसान झेलते हैं, लेकिन लंबी अवधि में हमारे जीवन की गुणवत्ता अक्सर हमारी आदतों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। उन्हीं आदतों से आप वही परिणाम प्राप्त करते हैं, लेकिन बेहतर आदतों से कुछ भी संभव है।

 

हो सकता है कि कुछ लोग रातों-रात आश्चर्यजनक सफलता पा लेते हों। मैं उनमें से किसी को नहीं जानता, मैं भी उनमें से नहीं हूँ। कोमा से लेकर ऐकडेमिक ऑल अमेरिकन तक मेरी यात्रा में एक ही नहीं, अनेक अहम क्षण थे। विकास बहुत धीरे-धीरे हुआ, छोटी-छोटी जीतों और छोटी-छोटी महत्त्वपूर्ण बातों का सिलसिला चला। मैंने प्रगति का एक ही मार्ग अपनाया और वह था छोटे से शुरू करना। कुछ वर्ष बाद जब मैंने अपना स्वयं का कारोबार शुरू किया; तब व इसके बाद और इस पुस्तक के लेखन में भी मैंने यही रणनीति अपनाई।

 

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कैसे और क्यों मैंने यह पुस्तक लिखी

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मैंने अपने आलेख नवंबर 2012 में jamesclear.com पर लिखना आरंभ किए। कई वर्षों तक मैंने अपने व्यक्तिगत प्रयोग के नोट्स बनाकर रखने की आदत बनाए रखी थी और अब अंततः मैं उन्हें सार्वजनिक रूप से साझा करने को तैयार था। हर सोमवार और गुरुवार को मैं नया आलेख लिखता था। कुछ ही महीनों में लिखने की यह आसान आदत मुझे मेरे पहले एक हज़ार ईमेल सब्सक्राइबर्स दे गई और 2013 के अंत तक यह संख्या तीस हज़ार से ज़्यादा हो चुकी थी।

 

मेरी ईमेल लिस्ट 2014 में एक लाख सब्सक्राइबर्स से ज़्यादा की हो गई। इंटरनेट पर यह सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले न्यूज़लेटरों की सूची में शुमार हो गया। दो वर्ष पूर्व जब मैंने लिखना शुरू किया था, तब मुझे पाखंडी जैसा अनुभव हो रहा था, लेकिन अब मैं आदतों का विशेषज्ञ बनता जा रहा था। यह एक नया तमगा था, जो मुझे उत्साहित कर रहा था, लेकिन साथ ही मैं असहज भी अनुभव कर रहा था। मैंने कभी खुद को इस विषय का महारथी नहीं माना, बल्कि ऐसा व्यक्ति माना, जो अपने पाठकों के साथ-साथ ही प्रयोग कर रहा है।

मेरे सब्सक्राइबर जब 2015 में दो लाख तक पहुँच गए, तो मैंने पेंगुइन रेंडम हाउस से उस पुस्तक को लिखने का करार किया, जो आप पढ़ रहे हैं। जैसे ही मेरे पाठक बढ़ गए, वैसे ही मेरे कारोबार के अवसर भी बढ़ गए। मुझे शीर्ष कंपनियों में आदत बनने के विज्ञान, व्यवहार में बदलाव और सतत सुधार के बारे में बोलने के लिए खूब बुलाया जाने लगा। अमेरिका और यूरोप में कई सम्मेलनों में मैंने मुख्य वक्ता के तौर पर भाषण दिए।

 

2016 से मेरे आलेख बड़े प्रकाशनों जैसे टाइम, आन्द्रप्रनर और फोर्ब्स में नियमित रूप से आने लगे। आश्चर्यजनक रूप से उस वर्ष मेरे लेख 80 लाख लोगों ने पढ़े। मेरे कार्यों के बारे में एनएफएल, एनबीए और एमएलबी की टीमों के कोच पढ़ने लगे और अपनी-अपनी टीमों के साथ इसे बाँटने लगे।

 

2017 के प्रारंभ में मैंने हैबिट्स एकेडेमी को । यह उन शुरू किया संगठनों और लोगों के लिए प्रशिक्षण का प्रमुख मंच बन गई, जो बेहतर आदतें बनाने में रुचि रखते थे।' फॉर्च्यून 500 कंपनियाँ और तेज़ी से बढ़ रहे स्टार्ट-अप्स ने अपने अधिकारियों और स्टाफ को ट्रेनिंग के लिए यहाँ भेजना शुरू किया। कुल दस हज़ार लीडरों, मैनेजरों, कोचों और शिक्षकों ने हैबिट्स एकेडेमी से ग्रेजुएशन किया। उनके साथ मेरे कार्य अनुभवों ने भी मुझे अविश्वसनीय रूप से यह सिखा दिया कि वास्तविक दुनिया में आदतें काम करें, इसके लिए किन-किन बातों की ज़रूरत होती है।

 

जब यह पुस्तक 2018 में ख़त्म होने को आई, तो jamesclear.com पर हर माह लाखों की तादाद में विज़िटर्स आ रहे थे और लगभग पाँच सौ हज़ार मेरे साप्ताहिक ईमेल न्यूज़लैटर को सब्सक्राइब कर चुके थे। यह संख्या मेरी उम्मीद से कहीं ज़्यादा थी। जब मैंने यह शुरू किया था, तो मुझे पता भी नहीं था कि ऐसा संभव है।

 

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यह पुस्तक आपको कैसे फ़ायदा देगी

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उद्यमी और निवेशक नवल रविकांत ने कहा है, "कोई महान पुस्तक लिखने से पहले आपको खुद पुस्तक बनना पड़ता है।" मैंने उन विचारों को जाना, जिनका उल्लेख इसमें किया गया है, चोट से बाहर निकलने के लिए मुझे छोटी आदतों पर आश्रित होना पड़ा, ताकि जिम में मज़बूत हो सकूँ, मैं मैदान में अच्छे स्तर का प्रदर्शन कर सकूँ, लेखन कार्य कर सकूँ, एक सफल कारोबार चलाऊँ और सहजता से एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित हो सकूँ। छोटी आदतों ने मेरी क्षमताओं को उकेरा, और चूँकि आपने यह पुस्तक हाथ में ली है, इसलिए मेरा अनुमान है कि आप भी अपने भीतर निहित क्षमताओं को पूर्ण रूप से विकसित करना चाहेंगे। इच्छुक पाठक ज़्यादा जानकारी के लिए habitsacademy.com पर जा सकते हैं।

बाद के पेजों में मैं हर पायदान पर आपको बेहतर आदतें बनाने की योजना बताऊँगा। कुछ दिन या हफ़्तों के लिए नहीं, बल्कि जीवनभर के लिए। विज्ञान यद्यपि उन सब बातों को सही मानता है, जो मैंने लिखी है, लेकिन फिर भी यह मात्र अकादमिक शोध-पत्र नहीं है। यह काम में लागू होने वाला उपयोगी लेखन है। आदतों को कैसे बनाना है और कैसे बदलना है, उसके बारे में आपको व्यावहारिक सलाह दी गई है। मैंने इसके पीछे का विज्ञान भी इस तरीके से समझाया है, जिसे समझना और अपनाना आसान है।

 

मैंने जिन क्षेत्रों का वर्णन किया है, वे हैं बायोलॉजी, न्यूरोसाइंस, फिलासॉफी, सायकोलॉजी और कई अन्य। ये क्षेत्र कई वर्षों से हमसे करीब से जुड़े हैं। मैंने आपको उन उत्कृष्ट लोगों के विचारों का संकलन दिया है, जो लंबे समय से इन पर काम कर रहे हैं, साथ ही वैज्ञानिकों द्वारा हाल ही की गई नई ग्खोजों को भी बताया है। मैं आशा करता हूँ कि मेरा योगदान ऐसे विचारों का पता लगाना है, जो सबसे ज्यादा महत्त्व के हों और उनसे इस तरीके से जुड़ा जा सके, जो अत्यंत ही सरल हों। इन पन्नों में आपको जो भी अच्छा लगे, तो उसका श्रेय आप उन विशेषज्ञों को दे सकते हैं, जिन्होंने मुझसे पहले काम किया है। कोई भूर्खतापूर्ण बात लगे, तो यह मेरी ओर से की गई ग़लती मानिए।

 

इस पुस्तक की रीढ़ चार कदमों की आदतें हैं संकेत, ललक, प्रतिसाद और पुरस्कार। वही व्यवहार में परिवर्तन के चार नियम भी हैं, जो इन चार कदमों से निकलते हैं। सायकोलॉजी की पृष्ठभूमि वाले पाठक, इन शब्दावलियों को ऑपरेंट कंडीशनिंग (सीखने की प्रक्रिया) से जान सकते हैं, जिसे सबसे पहले 1930 के दशक में बी. एफ. स्किनर ने उद्दीपन, प्रतिसाद और पुरस्कार के तौर पर प्रतिपादित किया था। संकेत, रूटीन और पुरस्कार के रूप में ये चार्ल्स डुहिग की हाल ही में लिखी पुस्तक द पावर ऑफ हैबिट से चर्चित हुए।

 

व्यवहार के मनोविज्ञान को स्किनर जैसे वैज्ञानिकों ने समझ लिया था कि यदि आप सही तरह से पुरस्कार और दंड देते हैं, तो आप लोगों से किसी खास शैली में काम करा सकते हैं, लेकिन स्किनर के मॉडल ने यह बेहतर तरह से समझाया कि बाहरी उकसावे किस तरह से आदतों को प्रभावित करते हैं, हालाँकि इसमें यह अच्छा विवरण नहीं था कि किस तरह से हमारे विचार, आभास और मान्यताएँ हमारे व्यवहार को प्रभावित करती हैं। भीतर की अवस्थाएँ जैसे हमारा मूड और भावनाएँ अहम हैं। हाल के दशकों में वैज्ञानिकों ने हमारे विचार, आभास और व्यवहार के बीच संबंध को तय करना आरंभ किया है। यह शोध भी इन पेजों में शामिल कर लिया जाएगा।

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मैं जो ढाँचा कुल मिलाकर पेश कर रहा हूँ, वह संज्ञानात्मक और व्यवहारवादी मनोविज्ञान का एकीकृत मॉडल है। मैं मानता हूँ कि यह मानवीय व्यवहार के पहले मॉडलों में से एक है, जो सटीक तरीके से बाहरी उक‌सावे और आंतरिक भावनाओं की हमारी आदतों पर पड़ने वाले प्रभाव को बताता है। जहाँ कुछ भाषा आप समझते होंगे, वहीं मुझे विश्वास है कि आपको व्यवहार परिवर्तन के चार नियमों का वर्णन और उनके अनुप्रयोगों से आदतों के बारे में सोचने का नया मार्ग मिलेगा।

 

मानवीय व्यवहार हमेशा बदलता रहता है; हर परिस्थिति में, हर पल में, लेकिन यह पुस्तक उस बारे में है, जो बदलता नहीं है। यह मानव व्यवहार के मूल सिद्धांतों के बारे में है। ये ऐसे सिद्धांत हैं, जिन पर आप वर्षों चल सकते हैं। इन विचारों से आप कारोबार, परिवार और जीवन खड़ा कर सकते हैं।

 

बेहतर आदतें बनाने का कोई एक मार्ग नहीं है, लेकिन यह पुस्तक आपको वह सर्वश्रेष्ठ उपाय बता रही है, जो मैं जानता हूँ एक ऐसा दृष्टिकोण जो प्रभावी रहेगा, जिससे यह फर्क नहीं पड़ेगा कि आप कहाँ से शुरू करना है या आप क्या बदलना चाहते हैं। मैंने जो तरीके अपनाए, वे सभी के लिए प्रासंगिक हैं, जो हर पायदान पर सुधार चाहते हैं, फिर भले ही उनके लक्ष्य सेहत, पैसा, उत्पादकता, संबंधों या इन सभी पर केंद्रित हों। जब तक मानव व्यवहार का प्रश्न है, तब तक यह पुस्तक आपका मार्गदर्शन करेगी।

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और दोस्तो ये था आज का चैपटर -

और अब मिलते हैं अगले नए चैपटर के साथ, नई विडियों में,

आप हमेशा खुश रहें, आबाद रहें, स्वस्थ रहें, और आपका धन्यावाद, नमस्कार, जय हिन्द, जय भारत 

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