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छोटी-छोटी आदतों की चमत्कारिक ताक़त -- एटॉमिक हैबिट्स - Atomic Habits - By - James Clear- की ऑडियो बुक ---- Hindi translation of the international bestseller - Atomic Habits - की ऑडियो बुक- #Audio #Book ---- Easy and Proven Ways to Develop Good Habits and Break Bad Habits – bY James Clear

छोटी-छोटी आदतों की चमत्कारिक ताक़त --  एटॉमिक हैबिट्स - Atomic Habits - By - James Clear- की ऑडियो बुक   ----  Hindi translation of the international bestseller - Atomic Habits - की ऑडियो बुक-  #Audio #Book  ----  Easy and Proven Ways to Develop Good Habits and Break Bad Habits – bY James Clear



छोटी-छोटी आदतों की चमत्कारिक ताक़त --  एटॉमिक हैबिट्स - Atomic Habits - By - James Clear- की ऑडियो बुक 

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Hindi translation of the international bestseller - Atomic Habits - की ऑडियो बुक-  #Audio #Book

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Easy and Proven Ways to Develop Good Habits and Break Bad Habits – bY James Clear

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एटॉमिक हैबिट्स- Atomic Habits -  - जेम्स क्लियर - " एटॉमिक हैबिट्स " का हिंदी अनुवाद - मनोज दुबे और विश्वदीप नाग

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Atomic Habits -  By : जेम्स क्लियर - Writer : JAMES CLEAR

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छोटी-छोटी आदतों की चमत्कारिक ताक़त

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मूल सिद्धांत - क्यों छोटे बदलाव बड़ा असर दिखाते है

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ब्रिटिश साइकलिंग की क़िस्मत 2003 में एक दिन बदल गई। ग्रेट ब्रिटेन में प्रोफेशनल साइकलिंग को संचालित करने वाली इस संस्था ने हाल ही में नया परफॉर्मेंस डायरेक्टर डेव ब्रेल्सफोर्ड को रख लिया था। यह वह समय था, जब ग्रेट ब्रिटेन में प्रोफेशनल साइकलिस्ट करीब सौ वर्षों से साधारण दर्जे को झेल रहे थे। ब्रिटिश साइकलिस्ट्स ने 1908 से लेकर अब तक सिर्फ एक बार ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीता था, जबकि साइकलिंग की सबसे बड़ी स्पर्धा टूर डी फ्रांस में बहुत ही ख़राब प्रदर्शन किए थे। 110 वर्ष में किसी भी ब्रिटिश साइकलिस्ट ने टूर डी फ्रांस में जीत हासिल नहीं की थी।

वास्तव में ब्रिटिश साइकलिस्ट्स का प्रदर्शन इतना निराशाजनक रहा था कि यूरोप के शीर्ष साइकल निर्माताओं में से एक ने तो टीम को साइकल बेचने तक से मना कर दिया था, क्योंकि उन्हें डर था कि यदि अन्य प्रोफेशनल्स देखेंगे कि ब्रिटिश साइकल खिलाड़ी उनके गियर को प्रयोग में लेते हैं, तो उनकी बिक्री घट सकती है।

 

ब्रेल्सफोर्ड को ब्रिटिश साइकलिंग को नए मार्ग पर लाने के लिए रखा गया था। एक रणनीति के प्रति उनकी कड़ी प्रतिबद्धता उन्हें पूर्व के कोचों से अलग करती थी। वे इस रणनीति को 'छोटी-छोटी जीत या फायदे का संग्रह' कहते थे। यह दर्शन इस बात पर आधारित है कि आप जो कुछ भी करें, उस हर बात में मामूली सुधार की तलाश करते रहें। ब्रेल्सफोर्ड कहते थे, "पूरा सिद्धांत इस बात पर आधारित है कि यदि साइकल चलाने के लिए जो भी प्रयास किया जा रहा है, उसे टुकड़ों में बाँटकर आप देखेंगे और फिर उनमें एक फीसदी सुधार भी करेंगे, तो आप जब समग्र रूप से इसे अमल में लाएँगे, तो बहुत ज़्यादा बदलाव कर चुके होंगे।"

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बेल्सपोर्ड और उनके कोचों ने मामूली बदलावों से शुरुआत की, जिसकी एक प्रोफेशनल साइकलिंग टीम से आशा की जाती है। उन्होंने साइकल की सीट को फिर से। डेज़ाइन कराया, ताकि यह अधिक सुविधाजनक हो सके एवं टायरों पर अल्कोहल रगड़ दिया, ताकि वे अच्छी पकड़ से चल सकें। उन्होंने साइकल चालकों से इलेक्ट्रिकली हीटेड पेंट्स पहनने को कहा, ताकि मांसपेशियों का तापमान आदर्श रहे, साथ ही बायोफीडबैक सेंसर के प्रयोग से यह जाँचा कि प्रत्येक एथलीट एक ख़ास वर्कआउट के दौरान किस स्थिति में रहता है। टीम ने विंड टनल (एक विशेष सुरंग, जिसमें लगातार हवा चलती है। इसमें कई वाहनों का भी परीक्षण होता है) में विभिन्न कपड़े पहनकर परीक्षण किया और आउटडोर में साइकल चलाने के लिए प्रयुक्त सूट्स की बजाय इंडोर रेसिंग सूट्स का प्रयोग किया, जो हल्के और ज़्यादा एयरोडायनामिक साबित हुए।

 

लेकिन वे इतने पर ही नहीं रुके। ब्रेल्सफोर्ड और उनकी टीम ने अनदेखे और अनपेक्षित क्षेत्रों में भी एक फीसदी का सुधार करने का प्रयास जारी रखा। उन्होंने कई तरह के मसाज़ लोशन का प्रयोग करके देखा कि कौनसा तेज़ी से मसल्स को ठीक करता है। इसके लिए उन्होंने एक सर्जन रखा, जिसने साइकल चालकों को हाथ धोने का सबसे बढ़िया तरीका सिखाया, ताकि वे ठंड की चपेट में आने से बच जाएँ। उन्होंने यह भी बताया कि हर साइकल खिलाड़ी को रात में सोने के लिए किस तरह का तकिया और गद्दा लेना चाहिए। यहाँ तक कि उन्होंने टीम का ट्रक भी भीतर से सफेद रंग से पेंट करा लिया, ताकि धूल के मामूली कणों को भी देखा जा सके, जो पहले नज़र नहीं आते थे, जबकि उसके कारण अच्छे से तैयार की हुई साइकल की गति भी ख़राब हो सकती थी।

 

इस तरह के सैकड़ों अन्य छोटे-छोटे सुधार किए गए, तो परिणाम इतनी तेज़ी से आए कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।

 

ब्रेल्सफोर्ड के पद सँभालने के पाँच साल बाद ही ब्रिटिश साइकलिंग टीम का 2008 के बीजिंग ओलिंपिक में दबदबा रहा, जिसमें उसने सड़क और ट्रैक साइकलिंग स्पर्धाओं में 60 फीसदी स्वर्ण पदक जीते। चार वर्ष बाद जब ओलिंपिक का आयोजन लंदन में किया गया, तो ब्रिटिश साइकल खिलाड़ियों ने नौ ओलिंपिक रिकॉर्ड्स और सात विश्व रिकॉर्ड्स कायम किए।

 

उसी वर्ष ब्रेडली विगिंस पहले ब्रिटिश साइकलिस्ट वने, जिन्होंने टूर डी फ्रांस में जीत दर्ज की। अगले वर्ष उनकी ही टीम के अन्य साथी क्रिस फ्रूम ने यह रेत जीती और 2015, 2016 और 2017 में भी वे ही जीते। छह वर्ष में ब्रिटिश साइकलिस्ट्स ने पाँच मर्तबा टूर डी फ्रांस में जीत दर्ज की।

ब्रिटेन के साइकलिस्ट्स दस वर्ष की अवधि 2007 से 2017 के बीच 178 विश्व चैम्पियनशिप और 66 ओलिंपिक अथवा पैरालिंपिक स्वर्ण पदक जीत चुके थे, साथ ही उन्होंने पाँच वार दूर डी फ्रांस में जीत हासिल की थी, जो साइकलिंग के इतिहास मैं सबसे ज़्यादा सफल दौर माना जाता है।

 

यह होता कैसे है? कैसे सामान्य एथलीट्स की एक टीम ऐसे मामूली बदलावों से विश्व चैम्पियन बनकर खड़ी हो जाती है, जो पहली बार देखने पर इतने मामूली लगते हैं कि उनसे बहुत से बहुत थोड़ा सा अंतर पड़ सकता है? क्यों छोटे-छोटे सुधार एकत्र होकर इतने उल्लेखनीय नतीजे दे सकते हैं और किस प्रकार से आप यह नज़रिया अपने जीवन में लागू कर सकते हैं?

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क्यों छोटी आदतें बड़ा बदलाव करती हैं

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दैनिक जीवन में किसी निर्णायक क्षण के महत्त्व का आकलन बढ़ा-चढ़ाकर करना और छोटे-छोटे सुधारों को कम समझना बहुत ही आसान है। हम यही मानते हैं कि बड़ी सफलता में ज़्यादा प्रयास ज़रूरी हैं। भले ही वह वज़न घटाने का मामला हो, कारोबार बढ़ाना हो, पुस्तक लिखना हो, चैम्पियनशिप जीतना हो या किसी मक़सद को प्राप्त करना हो। हम अपने आप पर इतना दबाव डालते हैं, ताकि किसी तरह से कुछ ऐसा बदलाव हो सके कि हर कोई इस बारे में बात करे।

 

इन सबके बीच एक फीसदी सुधार विशेष रूप से कोई मायने नहीं रखता, कभी-कभी तो इस पर कोई ध्यान तक नहीं देता, लेकिन यह लंबे समय के लिए बहुत अर्थपूर्ण हो सकता है। छोटा सुधार लंबे समय में असाधारण अंतर दिखा सकता है। इसका गणित इस प्रकार से काम करता है यदि आप प्रतिदिन एक फीसदी भी पहले से बेहतर होते हैं, तो पूरे एक वर्ष में 37 गुना बेहतर बन सकते हैं। इसके विपरीत यदि आप एक वर्ष तक हर दिन एक फीसदी बदतर होते जाते हैं, तो आप शून्य के करीब हो जाएँगे। भले ही छोटी जीत से शुरुआत हो या छोटी हार से, यह एकत्र होकर कई गुना हो जाती है।

 

आदतें आत्मसुधार का चक्रवृद्धि व्याज होती हैं। जिस प्रकार से धन चक्रवृद्धि ब्याज में कई गुना बढ़ता है, उसी प्रकार से आपकी आदतों का प्रभाव बार-बार करने पर बढ़ता जाता है। भले ही वे किसी दिन मामूली बदलाव के रूप में दिखती हों, लेकिन कई महीनों और वर्षों में इनका प्रभाव ज़बरदस्त हो सकता है। जब आप दो, पाँच या कदाचित दस वर्ष बाद, पीछे की ओर देखते हैं तो आपको स्पष्ट दिखता है कि अच्छी आदतों के मूल्य क्या हैं और बुरी आदतों के लिए क्या कीमत चुकानी होती है।

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2- जब यह पुस्तक प्रकाशित होने जा रही थी, तब ब्रिटिश साइकिलंग टीम के बारे में नई सूचनाएँ प्राप्त हुई थीं। आप मेरे विचार atomichabits.com/cycling/साइकलिंग देख सकते हैं।

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जीवन में प्रतिदिन इस अवधारणा को महसूस करना कठिन होता है। हम अक्सर छोटे बदलावों को इसलिए नकार देते हैं, क्योंकि वे उस पल इतने उल्लेखनीय नहीं दिखाई देते। यदि आप आज थोड़ा भी पैसा बचाते हैं, तो आप करोड़पति नहीं हो जाते हैं। यदि तीन दिन जिम जाएँगे, तो भी आप बैडोल ही रहेंगे। यदि आप हर रात एक घंटा मेंडारिन पढ़ते हैं, तो आप भाषा नहीं सीख पाते हैं। हम कुछ बदलाव करते हैं, लेकिन नतीजे तेज़ी से नहीं दिखते और फिर हम पुराने ढर्रे पर ही लौट आते हैं।

 

दुर्भाग्य से बदलाव की धीमी गति भी हमें बुरी आदतों की ओर प्रवृत्त करती है। यदि आज आपने सेहत को लाभ न पहुँचाने वाला भोजन खाया है, तो इससे ज़्यादा फर्क नहीं होगा। यदि आप देर रात तक काम करते हैं और अपने परिवार की उपेक्षा करते हैं, तो वे आपको माफ कर देंगे। यदि आप एक दिन अपना प्रोजेक्ट टालते हैं, तो उसे पूरा करने के लिए बाद में एक दिन अधिक लगेगा। एक फैसले को आसानी से खारिज किया जा सकता है।

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लेकिन जब आप ख़राब फैसलों से एक फीसदी ग़लती हर दिन करते हैं, और छोटी गलतियाँ दोहराते चले जाते हैं साथ ही छोटे-छोटे बहानों को सही ठहराते हैं, तो हमारा यही चयन अंत में बढ़कर ख़राब नतीजा दे सकता है। यह कई गलतियों का संचय होता है - एक फीसदी गिरावट के कारण ही बाद में समस्या होती है।

 

अपनी आदतों में बदलाव से जो प्रभाव होता है, वह किसी विमान को अपने मार्ग से कुछ ही डिग्री बदलने के समान होता है। सोचिए कि आप लॉस एंजेलिस से न्यू-यॉर्क जा रहे हैं। यदि पायलट एलएएक्स (लॉस एंजेलिस अंतरराष्ट्रीय विमानतल) से चलते हुए ही 3.5 डिग्री दक्षिण की ओर मुड़ जाता है, तो न्यू यॉर्क की बजाय आप वॉशिंगटन डीसी में उतरेंगे। उड़ान भरते समय इतने मामूली बदलाव की ओर शायद ध्यान न जाता होता हो। भले ही विमान का अगला भाग कुछ फीट ही मुड़ा हो, लेकिन यह अंततः अमेरिका में ही आपको सैकड़ों मील दूर उतारेगा।

 

इसी प्रकार से दैनिक जीवन की आदतों में मामूली बदलाव आपके जीवन को किसी और दिशा में ले जाता है। एक फीसदी बेहतर या एक फीसदी बदतर उस पल भले ही उल्लेखनीय न लगे, लेकिन कालांतर में यह भारी बदलाव दिखा सकता है कि आप क्या हैं और आप क्या हो सकते थे। सफलता प्रतिदिन की आदतों का उत्पाद है; जीवन में केवल एक बार बदलाव का नहीं।

 

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप अभी कितने सफल या असफल हैं, लेकिन फर्क इससे पड़ता है कि आपकी आदतें आपको सफलता के मार्ग पर डाल रही हैं या नहीं। आपको अपने वर्तमान नतीजों की बजाय अपने वर्तमान मार्ग पर अधिक ध्यान देना चाहिए। यदि आप करोड़पति हैं और आप हर महीने जो कमा रहे हैं, उससे अधिक ख़र्च कर रहे हैं, तो आपका रास्ता ठीक नहीं है। यदि आपके खर्च करने की आदतें बदलती नहीं हैं, तो अंत अच्छा नहीं रहेगा। इसके विपरीत आप हर महीने कुछ न कुछ बचा रहे हैं, तो आप वित्तीय रूप से स्वतंत्र या स्वायत्त होने के मार्ग पर आगे बढ़ रहे होते हैं- भले ही आप जितना चाहते हैं, उससे धीमी गति से चल रहे हों।

 

आपके परिणाम आपकी आदतों का ही संकलन होते हैं। आपकी वित्तीय आदतों का परिणाम आपकी नेटवर्थ है। खाने की आदतें ही आपके वज़न का निर्धारण करती हैं। आपके सीखने की आदतों का परिणाम ही आपका ज्ञान है। आपकी सफाई की

 

3-- मैंने स्वयं इसमें रुचि ली और वास्तव में इसकी गणना की। वाशिंगटन डीसी से न्यूयॉर्क शहर 225 मील दूर है। मान लीजिए आप 747 विमान या एयरबस आ 380 में उड़ान भर रहे हैं। जब आप लॉस एंजेलिस छोड़ते हैं, तो विमान की दिशा 3.5 डिग्री बदल जाती है। ऐसे में संभावना होती है कि विमान की नोज़ 7.2 से 7.6 फीट या 86 से 92 इंच शिफ्ट हो जाएगी। दिशा में मामूली सा शिफ्ट गंतव्य में बहुत ज़्यादा अंतर ला देता है।

आदतों का नतीजा अलग दिखता है। आप जो दोहराते हैं, वह आपको प्राप्त होता है।

यदि आप अपनी भविष्यवाणी करना चाहते हैं कि आप जीवन में कहाँ पहुँचेंगे, तो आपको छोटे फायदों और छोटे नुकसानों दोनों का एक वक्र बनाना होगा, तो आप देखेंगे कि किस तरह से आपके दैनिक जीवन की पसंद-नापसंद दस या वीस वर्ष में आपको क्या परिणाम देगी। क्या आप हर माह की कमाई से कम खर्च कर रहे हैं? क्या आप हर हफ्ते जिम जा रहे हैं? क्या आप पुस्तकें पढ़कर हर दिन कुछ नया सीख रहे हैं? इस तरह के छोटे-छोटे संघर्ष आपका भविष्य अपने आप बता देंगे।

सफलता और असफलता के अंतर को समय बहुत बढ़ा देता है। आप जीवन को जो भी दे रहे हैं, वह गुणित होकर सामने आएगा। अच्छी आदतें समय को आपका दोस्त बना देंगी। ख़राब आदतें समय को शत्रु बना देंगी।

आदतें दुधारी तलवार हैं। बुरी आदतें आसानी से आपको ख़त्म कर सकती हैं, जिस तरह से अच्छी आदतें आपको बेहतर बना सकती हैं। इसलिए इसे समझना बहुत महत्त्वपूर्ण है। आपका जानना आवश्यक है कि किस प्रकार से आदतें काम करती हैं और अपनी पसंद के अनुसार कैसे इन्हें बनाया जाए, ताकि आप इस दोधारी तलवार की एक धार से बच सकें।

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प्रगति वास्तव में होती कैसी है?

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सोचिए कि आपके सामने टेबल पर बर्फ का क्यूब रखा है। कमरे में इतनी ठंडक है कि आप अपनी साँस को देख सकते हैं। यह तापमान पच्चीस डिग्री है। कमरा धीरे-धीरे गरम होने लगता है....

छब्बीस डिग्री।

सत्ताइस डिग्री।

अट्ठाइस डिग्री।

आपके सामने रखी टेबल. पर बर्फ का क्यूब अभी भी है।

उनतीस डिग्री।

तीस।

इक्कत्तीस ।

अब तक, कुछ नहीं हुआ।

फिर बत्तीस डिग्री। बर्फ पिघलने लगती है। इससे पहले एक-एक डिग्री बढ़ने से इतना अंतर नहीं पड़ा था, लेकिन इस एक डिग्री ने बड़ा परिवर्तन कर दिया।

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आपकी आदतें आपके लिए संयोजित हो सकती हैं या फिर विरोध में खड़ी हो सकती हैं

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सकारात्मक संयोजन

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उत्पादकता वाले अवयव

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किसी एक दिन में एक अतिरिक्त कार्य पूरा करना एक छोटा सा करतब हो सकता है, लेकिन पूरे करियर के लिए यह बहुत मायने रखेगा। पुराने काम को स्वतः कर पाने के प्रभाव या किसी नए कौशल में निपुण होना भी उल्लेखनीय होता है। बिना सोचे आप जितने भी काम सँभालते हैं, आपका मस्तिष्क दूसरे क्षेत्रों में ध्यान केंद्रित करने को तैयार हो जाता है।

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ज्ञान के अवयव

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कोई एक बात सीख लेने से आप विद्वान नहीं बन जाते हैं, लेकिन जीवन भर सीखने की प्रवृत्ति से आपमें बदलाव आ जाता है। हर पुस्तक जो पढ़ रहे हैं, वह आपको कुछ नया ही नहीं सिखाती है, बल्कि पुराने ढर्रे पर सोचने के तरीकों में भी बदलाव लाती है। जैसा कि वॉरेन बफे कहते हैं, "ज्ञान इसी तरह से कार्य करता है। यह चक्रवृद्धि ब्याज के समान बढ़ता जाता है।"

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संबंधों के अवयव

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लोग आपके ही व्यवहार का पलटकर जवाब देते हैं। जितना आप दूसरों की मदद करेंगे, अन्य लोग उतनी अधिक आपकी मदद करना चाहेंगे। थोड़ा अच्छा बनकर बात करने से उसके नतीजे आपको दिखने लगते हैं और मज़बूत संबंध बन जाते हैं।

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नकारात्मक संयोजन

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तनाव के अवयव

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ट्रैफिक जाम की कुंठा। पालन-पोषण के दायित्व का भार। दो वक़्त की ज़रूरतों को पूरा करने की चिंता। थोड़ा अधिक ब्लड प्रेशर का तनाव। तनाव के ये कारण हैं, जो खुद ही सँभल सकते हैं, लेकिन जब ये कई वर्षों तक बने रहते हैं, तो सेहत के लिए गंभीर हो सकते हैं।

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नकारात्मक विचारों के अवयव

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जितना अधिक आप यह सोचते हैं कि आप किसी काम के नहीं हैं, मूर्ख हैं या सुंदर नहीं हैं, उतना अधिक आप जीवन को उसी रूप में देखने लगते हैं। इस तरह से आप विचारों में अवरुद्ध हो जाते हैं। इसी प्रकार से जब आप दूसरों के बारे में सोचते हैं, तब भी यही होता है। एक बार जब आप लोगों को क्रोधी, अन्यायी स्वार्थी के रूप में देखने लगते हैं तो इसी तरह के लोग हर स्थान पर दिखने लगेंगे।

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क्रोध के अवयव

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बहुत कम ऐसा होता है कि दंगे, विरोध, आंदोलन किसी एक घटना का नतीजा हों। जब तक छोटे-छोटे आक्रोश, हर दिन का बिगाड़ धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, फिर एक घटना घट जाती है और आक्रोश जंगल की आग के जैसा फैल जाता है।

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सफलता के पल अक्सर पूर्व के कामों के परिणाम ही होते हैं, जो बड़े बदलाव के लिए संभावनाएँ तैयार करते हैं। यह स्थिति हर जगह देखने को मिल जाएगी। कैंसर आपने जीवन का 80 फीसदी भाग तो पता चले बिना ही बिताता है, लेकिन फिर कुछ ही माह में शरीर को ख़त्म कर देता है। बाँस पहले पाँच वर्षों में बढ़ा हुआ नहीं दिखता है, क्योंकि यह ज़मीन के भीतर जड़ें जमाता रहता है और अगले छह हफ़्ते में नब्बे फीट तक बढ़ जाता है।

 

इसी प्रकार से आदतें भी तब तक कोई फर्क नहीं डालती हैं, जब तक कि आप एक अहम सीमा को पार नहीं कर जाते और नए स्तर नहीं पा लेते। किसी अनुसंधान या तलाश के आरंभ और मध्य में अक्सर निराशा की खाई होती है। आप सीधी रेखा में प्रगति की आशा करते हैं और पहले दिन, एक हफ़्ते और यहाँ तक कि कई माह तक जब बदलाव अप्रभावी दिखते हैं, तो आप कुंठित हो सकते हैं। ऐसा नहीं लगता है कि आप कहीं जा रहे हैं। यह किसी भी संयोजन प्रक्रिया का प्रमाण होता है; सर्वाधिक शक्तिशाली परिणामों में विलंब होता है।

 

यह मूल कारणों में से एक है कि क्यों स्थायी आदतें बनाना इतना मुश्किल होता है। लोग कुछ छोटे बदलाव करते हैं और उन्हें ठोस नतीजा नहीं मिलता है, तो वे इसे रोक देने का फैसला करते हैं। आप सोचते हैं "मैं कई महीने तक हर दिन दौड़ा, तो मैंने अपने शरीर में बदलाव क्यों नहीं देखा?" जब इस तरह के विचार हावी होते हैं, तो अच्छी आदतों को दरकिनार करने का बहाना मिल जाता है, लेकिन अर्थपूर्ण बदलाव के लिए आदतों को लंबे समय तक बनाए रखना होता है, ताकि आप इस पठार को पार कर सकें। इसे में अंतर्निहित संभावनाओं का पठार कहता हूँ।

 

यदि आप देखते हैं कि आप अच्छी आदतों को बनाने और बुरी आदतों को ख़त्म करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप सुधरने की क्षमता खो चुके हैं। अक्सर यह इस कारण से होता है कि आप अब तक अंतर्निहित संभावनाओं का पठार पार नहीं कर पाए हैं। कड़े परिश्रम के बाद भी सफलता हासिल न करने की शिकायत करना कमरे को पच्चीस से इक़्तीस डिग्री तक गरम करने के बाद भी बर्फ का क्यूब न पिघलने की शिकायत करने जैसा ही है। आपका किया हुआ कर्म नष्ट या व्यर्थ नहीं गया है, बल्कि वह जमा होते जा रहा है। जो भी घटता है, वह बत्तीस डिग्री पर होता है।

 

जब आप अंततः अंतर्निहित संभावनाओं के पठार को पार कर लेते हैं, तो लोग इसे रातों-रात अर्जित की गई सफलता कहते हैं। बाहर की दुनिया केवल वह नाटकीय घटना देखती है, जब आप सफलता प्राप्त करते हैं, वह प्रक्रियाएँ नहीं देखती, जिनसे आप निकले हैं, लेकिन आप जानते हैं कि आपका वह काम ही है, जो आप लंबे समय से कर रहे थे, जिसके कारण आज आप उछाल ले सके हैं, जबकि कभी ऐसा लगता था कि आप किसी तरह की प्रगति नहीं कर रहे हैं।

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मानव भूगर्भीय दबाव के समान ही होता है। दो टेक्टोनिक प्लेट्स एक-दूसरे के विपरीत रहकर लाखों वर्षों तक एक-दूसरे को रगड़ती रहती हैं, तनाव धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, फिर एक दिन वे उसी तरह से एक-दूसरे को रगड़ती हैं, जैसे क्यों से चल रहा था, लेकिन इस बार तनाव बहुत अधिक हो जाता है। भूकंप आ जाता है। एकदम कुछ होने के पहले बदलाव लगातार होता रहता है।

 

महारत हासिल करने में धैर्य लगता है। एनबीए के इतिहास की सबसे सफल टीम सेंट एंटोनियो स्पर्स ने समाज सुधारक जैकब रीज़ का एक कथन अपने लॉकर रूम में लटका रखा है: "जब मुझे कोई भी मदद करता हुआ नहीं दिखता है, तो मैं पत्थर तोड़ने वालों की ओर देखता हूँ, जो चट्टान पर हथौड़ा चलाते हैं, करीब सैकड़ों बार वे चलाते होंगे, तो भी उसमें दरार नहीं आती है। सी के बाद पहले ही हथौड़े में यह दो टुकड़ों में बँट जाती है और मैं जानता हूँ कि यह अंतिम हथौड़ा नहीं होता है, जिसने इसे तोड़ा, बल्कि पहले भी जो चले हैं, उनका भी असर होता है।"

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प्रयासों के नतीजे अक्सर देर से ही मिलते हैं। कई माह या वर्षों के बाद हमारे द्वारा पहले किए गए काम का हम वास्तविक मूल्य समझ पाते हैं। यह 'निराशा की घाटी' बना देता है, जहाँ लोग हफ़्तों और महीनों मेहनत करने के बाद भी बिना किसी परिणाम के हतोत्साहित महसूस करते हैं, हालाँकि यह काम व्यर्थ नहीं जाता है। यह जमा होने लगता है। हमारे पिछले प्रयासों का पूर्ण मूल्य काफी समय बाद प्राप्त होता है।

 

सभी बड़ी चीजें छोटी शुरुआतों से प्राप्त हो पाती हैं। हर आदत का बीज अकेला, छोटा सा निर्णय रहता है, लेकिन जैसे ही वह फैसला बार-बार आदत के रूप में उभरने लगता है, तो वह मज़बूत होने लगता है। वह जड़ें जमाता है और शाखाएँ निकलने लगती हैं। बुरी आदतों को ख़त्म करना ठीक अपने भीतर बलूत का एक तगड़ा वृक्ष उखाड़ने के समान है। अच्छी आदतों को बनाना ठीक हर दिन एक कोमल सुंदर फूल को उपजाने के समान है।

 

लेकिन यह इस बात से तय होता है कि क्या हम उस आदत के प्रति इतनी निष्ठा रखते हैं कि हम अंतर्निहित संभावनाओं के पठार पर आकर सफलता हासिल कर सकें? ऐसे कौन-कौन से कारण हैं, जो लोगों को अवांछित आदतों की ओर ले जाते हैं और दूसरों को अच्छी आदतों के समग्र प्रभाव का आनंद लेने देते हैं?

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लक्ष्यों को भूलकर व्यवस्था पर पूरा ध्यान दें

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सामान्य बुद्धि मानती है कि हम जीवन में जो अर्जित करना चाहते हैं, जैसे अच्छा शरीर, सफल कारोबार, आराम का जीवन और कम चिंताएँ, ज़्यादा समय दोस्तों और परिवार के साथ विताना, उसे प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि हम विशिष्ट और कार्रवाई योग्य लक्ष्य निर्धारित करें।

 

कई वर्षों तक मैं भी अपनी आदतों को इसी के अनुसार बनाता रहा। प्रत्येक लक्ष्य था, जिसे प्राप्त करना था। मैंने स्कूल में ग्रेड्स के लिए, जिम में वज़न के लिए, कारोबार में लाभ हासिल करने के लिए लक्ष्य निर्धारित कर लिए। कुछ में तो मैं सफल हो गया, लेकिन अधिकांश में विफल हो गया। धीरे-धीरे मुझे समझ आया कि मेरे नतीजों का मेरे लक्ष्यों से बहुत कम लेना-देना था। लगभग हर चीज़ का लेना-देना उन व्यवस्थाओं से था, जिनका मैंने पालन किया था।

 

व्यवस्थाओं और लक्ष्यों के बीच क्या फर्क है? यह एक विशिष्टता है। सबसे पहले मैंने इसे डिलबर्ट कॉमिक के कार्टूनिस्ट स्कॉट एडम्स से सीखा। लक्ष्य हमेशा वे परिणाम होते हैं, जिन्हें आप प्राप्त करना चाहते हैं। व्यवस्थाएँ वे प्रक्रियाएँ हैं, जो आपको नतीजों की ओर ले जाती हैं।

 

-- यदि आप कोच हैं, तो आपका लक्ष्य केवल चैम्पियनशिप जीतने का होता है। व्यवस्था वह तरीका है, जिसके तहत खिलाड़ियों का चयन होता है, अपने सहायक कोचों को तैयार किया जाता है और अभ्यास किया जाता है।

 

-- यदि आप उद्यमी हैं, तो आपका लक्ष्य लाखों डॉलर का कारोबार बनाने का होगा। आपकी व्यवस्था प्रोडक्ट आइडिया का परीक्षण करना, कर्मचारी रखना और मार्केटिंग के लिए अभियान चलाना होगी।

 

 --  यदि आप एक संगीतकार हैं, तो आपका लक्ष्य एक नई रचना को तैयार करना होगा। कितनी बार आप अभ्यास करते हैं, कितनी बार आप हिम्मत हार जाते हैं, मुश्किल उपायों से कैसे निपटते हैं, गुरु से फीडबैक लेने की प्रक्रिया आदि आपकी व्यवस्था है।

 

अब एक रोचक प्रश्न : यदि आप अपने लक्ष्यों की उपेक्षा करके पूरी तरह से

 

व्यवस्था पर ध्यान देते हैं, तो क्या आप सफल हो पाएँगे? उदाहरण के लिए, यदि आप बास्केटबॉल कोच हैं और स्पर्धा जीतने के लक्ष्य की उपेक्षा करके केवल इस बात पर ध्यान देते हैं कि टीम हर दिन किस तरह से अभ्यास कर रही है, तो भी क्या परिणाम मिलेंगे?

मैं समझता हूँ, मिलेंगे।

किसी भी खेल में अच्छे स्कोर के साथ 'फिनिश' करना एक लक्ष्य होता है, लेकिन स्कोरबोर्ड की ओर देखते हुए खेल पूरा करना हास्यास्पद हो सकता है। हर दिन कुछ बेहतर होना ही वास्तव में जीत का सही तरीक़ा माना जाता है। तीन बार के सुपर बाउल विजेता बिल वॉल्श के शब्दों में, "स्कोर स्वयं अपनी चिंता कर लेगा।" यही बात जीवन के अन्य हिस्सों में भी लागू होती है। यदि आप बेहतर परिणाम चाहते हैं, तो लक्ष्य तय करना भूल जाएँ। व्यवस्था पर ज़्यादा ध्यान दें।

 

इसके मायने क्या हैं? क्या लक्ष्य बेकार की चीज़ है? बिलकुल नहीं। लक्ष्य दिशा तय करते हैं, लेकिन व्यवस्था प्रगति करने के लिए सबसे उपयुक्त रहती है। समस्याएँ तब बहुत सारी हो जाती हैं, जब आप लक्ष्य के बारे में सोचने में ही बहुत समय बिता देते हैं और अपनी व्यवस्था को सुधारने में पर्याप्त समय नहीं देते हैं।

 

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समस्या #1: जीतने और हारने वालों के लक्ष्य समान होते हैं

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लक्ष्य निर्धारित करना अस्तित्व बचे रहने के पूर्वाग्रह से गंभीर रूप से ग्रस्त होता है। हम उन पर ध्यान देते हैं, जो जीत जाते हैं यानी जो दौड़ में बच जाते हैं। हम यह आकलन ग़लत करते हैं कि महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य ने उन्हें सफल बनाया है। हम उन लोगों को नज़र अंदाज़ कर देते हैं, जिनका लक्ष्य भी जीत का ही होता है, लेकिन वे सफल नहीं हो पाते हैं।

 

हर ओलिंपिक खिलाड़ी स्वर्ण पदक जीतना चाहता है। हर उम्मीदवार नौकरी चाहता है। यदि सफल और असफल दोनों व्यक्तियों के लक्ष्य समान रहते हैं, तो फिर लक्ष्य विजेताओं को हारने वालों से अलग नहीं करता। दूर डी फ्रांस को जीतने के लक्ष्य ने ब्रिटिश साइकलिस्ट्स को शिखर पर नहीं पहुँचाया था। वे तो हर वर्ष स्पर्या जीतना चाहते थे, लोक वैसे ही जैसे कोई अन्य प्रोफेशनल टीम चाहती है। यह लक्ष्य तो हमेशा ही रहा था। अलग परिणाम तभी आ पाया, जब उन्होंने लगातार छोटे-छोटे सुधारों की व्यवस्था लागू की।

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समस्या #2: लक्ष्य प्राप्त करना क्षणिक परिवर्तन मात्र होता है

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सोचिए आपका कमरा अस्त-व्यस्त है और आपने उसे साफ करने का लक्ष्य रखा है। यदि आप ऊर्जा से भरकर वह करेंगे, तो अभी ही वह साफ हो जाएगा, लेकिन यदि आप आलस की वही आदतें जारी रखेंगे, जिनकी वजह से कमरा अस्त-व्यस्त हुआ था, तो कमरे में नई गंदगी पसर जाएगी और फिर आप किसी और प्रेरणा की उम्मीद करने लगेंगे। आपको बार-बार वही परिणाम मिलेंगे, क्योंकि आप उसमें निहित व्यवस्था को बदल ही नहीं सके। आपने किसी लक्षण का उपचार बिना कारण जाने ही किया है।

 

लक्ष्य को प्राप्त करने से जीवन में क्षणभर के लिए ही बदलाव होता है। सुधार के बारे में यह सहज ज्ञान के विपरीत है। हम सोचते हैं कि हमें अपने नतीजे बदलने की जरूरत है, लेकिन नतीजे समस्या नहीं हैं। वास्तव में हमें वह व्यवस्था या प्रणाली बदलनी चाहिए, जो समस्या का कारण है। जब आप परिणाम के स्तर पर समस्या हल करते हैं, तो वह अस्थायी रूप से हो पाती है। बेहतरी के लिए सुधार करना है, तो आपको व्यवस्था के स्तर पर समस्या हल करनी होगी। जो इनपुट्स है, उनमें सुधार कर लें, परिणाम खुद सुधर जाएँगे।

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समस्या # 3 : लक्ष्य आपकी खुशियों को सीमित करते हैं।

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किसी लक्ष्य के बारे में अंतर्निहित अनुमान यह रहता है : "एक बार लक्ष्य प्राप्त हो जाए, तो मैं खुश रहूँगा।" लक्ष्य के साथ तब समस्या हो जाती है, जब आपकी मानसिकता बन चुकी होती है कि आप अगले पड़ाव की प्राप्ति तक खुशियाँ नहीं मनाएँगे। मैं इस झंझट में इतनी बार उलझा हूँ कि संख्या मुझे पता नहीं। वर्षों तक खुशियाँ भेरे लिए भविष्य की बात बनकर रह गई थी। मैं खुद को ही वचन देता था कि एक बार मैं बीस पाउंड मांसपेशियों और बना लूँ या मेरे कारोबार का उल्लेख न्यू-यॉर्क टाइम्स में हो जाए, तो अंततः मुझे आराम मिलेगा।

 

यही नहीं, लक्ष्य 'या तो यह या वह' का टकराव पैदा करते हैं: या तो आप अपना लक्ष्य प्राप्त करके सफल होते हैं या फिर विफल हो जाते हैं और निराश हो जाते हैं। आप खुद को मानसिक रूप से खुशी की संकुचित सोच में बाँध लेते हैं। यह गलत दिशा है। यह संभव नहीं है कि वास्तविक जीवन में आपका रास्ता वैसा ही हो, जैसा खाका आपने अपने दिमाग में शुरुआत के वक़्त बनाया था। सिर्फ एक परिदृश्य तक अपनी संतुष्टि को सीमित रखने का कोई मतलब नहीं है, जबकि आपके पास सफलता के कई मार्ग हैं।

 

व्यवस्था पहले बनाने की मानसिकता तनाव से मुक्ति प्रदान कराती है। जब आप उत्पाद से ज़्यादा प्रक्रिया से प्रेम करने लगते हैं, तो आपको खुश होने के लिए खुद को अनुमति नहीं देनी होती। आप कभी भी खुश हो सकते हैं, क्योंकि प्रणाली या व्यवस्था काम करती जा रही है। और एक प्रणाली या व्यवस्था कई स्वरूपों में सफल हो सकती है। यह ज़रूरी नहीं है कि आपने जो सोचा हो, उसी में सफलता मिले।

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समस्या # 4 लक्ष्यों का दीर्घकालिक प्रगति से टकराव

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अंततः लक्ष्योन्मुखी मानसिकता आप पर 'उतार-चढ़ाव' का प्रभाव छोड़ेगी। कई धावक महीनों तक कड़ा परिश्रम करते हैं, लेकिन जैसे ही वे 'फिनिश लाइन' को पार करते हैं, वे प्रशिक्षण रोक ही देते हैं। रेस उन्हें और अधिक प्रेरित नहीं करती है। जब आपका सारा परिश्रम किसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए होता है, तो उसे प्राप्त करने के बाद क्या रह जाता है? इसी कारण से कई लोग लक्ष्य प्राप्ति के बाद खुद को पुरानी आदतों की ओर मोड़ लेते हैं।

 

लक्ष्य निर्धारित करने का मकसद किसी स्पर्धा को जीतना होता है, परंतु व्यवस्था या प्रणाली बनाने का मकसद खेल को खेलते रहना होता है। वास्तविक लंबी सोच लक्ष्यविहीन सोच होती है। यह केवल एक लक्ष्य हासिल करने मात्र तक सीमित नहीं होती है। यह सतत सुधार या परिशोधन का अंतहीन वक्र है। निश्चित रूप से यह किसी प्रक्रिया को लेकर आपकी प्रतिबद्धता है, जो आपकी प्रगति का निर्धारण करेगी।

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छोटी-छोटी आदतों की व्यवस्था

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यदि आपको अपनी आदतों को बदलने में परेशानी होती है, तो समस्या आप नहीं हैं। समस्या आपकी प्रणाली में है। बुरी आदतें खुद को बार-बार दोहराती है, इसलिए नहीं कि आप उन्हें बदलना नहीं चाहते हैं, बल्कि इसलिए कि बदलने की आपकी प्रणाली गलत है।

आप अपने लक्ष्यों के स्तर तक ऊँचा नहीं उठते हैं। आप प्रणालियों के स्तर तक नीचे जाते हैं।

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किसी एक लक्ष्य की बजाय पूरी प्रणाली या व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करना ही इस पुस्तक के मूल विषयों में से एक है। अटॉमिक (छोटी-छोटी) शब्द के पीछे भी गहरे अर्थ निहित हैं, लेकिन आप अब समझ गए होंगे कि छोटी आदतों के मायने मामूली बदलाव हैं, मामूली लाभ, एक फीसदी सुधार, लेकिन छोटी आदतें केवल पुरानी आदतें नहीं होतीं, बल्कि कोई भी छोटा सुधार होती हैं। छोटी आदतें ही व्यवस्था या प्रणाली का अंग होती हैं। जैसे छोटे-छोटे अणुओं से कण बनते हैं, वैसे ही छोटी आदतों से उल्लेखनीय नतीजों का निर्माण होता है।

 

आदतें हमारे जीवन में अणु जैसी होती हैं। हर एक मूल इकाई के रूप में होती है, जो समग्र सुधार में सहयोग देती है। पहले ये छोटी आदतें ज़्यादा महत्त्व की नहीं लगती हैं, लेकिन जैसे ही ये एक के बाद एक बढ़ती जाती हैं, तो ये बड़ी जीत का ईंधन बन जाती हैं, जिसकी कीमत आरंभिक निवेश से ज़्यादा होती है। वे छोटी और प्रबल दोनों होती है। यही अटॉमिक हैबिट्स (छोटी आदत) के मुहावरे का अर्थ है- नियमित अभ्यास या रूटीन को अपनाना। ऐसा न केवल छोटा और करने में आसान होता है, बल्कि यह अतुल शक्ति का स्रोत भी होता है: यह संयुक्त वृद्धि की व्यवस्था का एक अहम अंग होता है।

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अध्याय का सार

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आदतें आत्म सुधार का चक्रवृद्धि ब्याज होती हैं। प्रतिदिन एक फीसदी बेहतर होना लंबे समय में बहुत मायने रखता है।

आदतें दोधारी तलवार होती हैं। वे आपके लिए भी काम कर सकती हैं और आपके विरोध में भी काम कर सकती हैं, इसलिए इसे विस्तार से समझ लेना ज़रूरी होता है।

छोटे बदलाव अक्सर तब तक कोई अंतर नहीं बताते हैं, जब तक कि आप किसी अहम मंज़िल तक नहीं पहुँच जाते। किसी भी संयुक्त प्रक्रिया में सर्वाधिक शक्तिशाली परिणाम देर से ही मिलता है। इसके लिए आपका धैर्य आवश्यक है।

कोई भी छोटी आदत बड़ी प्रणाली या प्रक्रिया का हिस्सा होती है। जिस प्रकार अणुओं से कण बनते हैं, उसी प्रकार छोटी-छोटी आदतों से उल्लेखनीय परिणाम निकलते हैं।

यदि आप अच्छे परिणाम चाहते हैं, तो लक्ष्य निर्धारित करना भूल जाइए। इसकी बजाय अपनी प्रणाली या व्यवस्था पर ध्यान दें।

आप अपने लक्ष्यों के स्तर तक ऊँचा नहीं उठते हैं। आप प्रणालियों के स्तर तक नीचे जाते हैं।

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और दोस्तो ये था आज का चैपटर -

और अब मिलते हैं अगले नए चैपटर के साथ, नई विडियों में,

आप हमेशा खुश रहें, आबाद रहें, स्वस्थ रहें, और आपका धन्यावाद, नमस्कार, जय हिन्द, जय भारत 

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