चार सरल तरीक़ों से बेहतर आदतें कैसे बनाएँ -- एटॉमिक हैबिट्स - Atomic Habits - By - James Clear- की ऑडियो बुक ---- Hindi translation of the international bestseller - Atomic Habits - की ऑडियो बुक- #Audio #Book ---- Easy and Proven Ways to Develop Good Habits and Break Bad Habits – bY James Clear ----- एटॉमिक हैबिट्स- Atomic Habits - - जेम्स क्लियर - " एटॉमिक हैबिट्स " का हिंदी अनुवाद - मनोज दुबे और विश्वदीप नाग
चार सरल तरीक़ों से
बेहतर आदतें कैसे बनाएँ -- एटॉमिक हैबिट्स - Atomic Habits - By - James Clear- की ऑडियो बुक
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Hindi translation of the international bestseller - Atomic Habits - की ऑडियो बुक-
#Audio #Book
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Easy and Proven Ways to Develop Good Habits and Break Bad Habits – bY
James Clear
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एटॉमिक हैबिट्स- Atomic Habits - - जेम्स क्लियर - " एटॉमिक हैबिट्स " का हिंदी अनुवाद - मनोज दुबे और
विश्वदीप नाग
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Atomic
Habits - By : जेम्स क्लियर - Writer : JAMES CLEAR
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चार सरल तरीक़ों से
बेहतर आदतें कैसे बनाएँ -
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- एडवर्ड थॉर्नडाइक
नाम के एक मनोवैज्ञानिक ने 1898 में एक प्रयोग किया था, जिसने आदतें बनने की प्रक्रिया
और हमारे व्यवहार को निर्देशित करने वाले नियमों के बारे में हमारी समझ की आधारशिला
रखी। एडवर्ड की रुचि पशुओं के व्यवहार के अध्ययन में थी और उन्होंने बिल्लियों पर कार्य
शुरू किया था।
पज़ल बॉक्स नाम के एक
उपकरण में वे हर बिल्ली को डाल देते थे। बॉक्स इस तरह से तैयार किया गया था कि बिल्ली
आसानी से एक दरवाज़े से निकल जाए, इसके लिए बिल्ली को मामूली सा उपक्रम करना था; जैसे
'एक रस्सी का लूप खींचना था, एक लीवर दबाना था या एक प्लेटफॉर्म पर चढ़ना था।' उदाहरण
के लिए बॉक्स में एक लीवर था, जिसे दबाने पर वह बॉक्स का द्वार खोल देता था। एक बार
दरवाज़ा खुल जाने पर बिल्ली बाहर निकल कर खाने के बर्तन की ओर भाग सकती थी।
अधिकांश बिल्लियाँ बॉक्स
में डालते ही भागने के बारे में सोचती थीं। वे किनारों पर अपनी नाक डालतीं, पंजे से
खुरचतीं या नोंचकर खोलने का प्रयास करतीं। कुछ ही मिनटों के प्रयास के बाद सभी बिल्लियाँ
उस जादुई लीवर को दबाने में कामयाब रहतीं और दरवाज़ा खोलकर भाग निकलतीं।
एडवर्ड ने कई प्रयोगों
में हर बिल्ली का व्यवहार जाँचा। शुरुआत में सभी पशु बॉक्स में यहाँ-वहाँ ऐसे ही निरुद्देश्य
घूमते रहे, लेकिन जैसे ही लीवर दबा और दरवाज़ा खुला, वैसे ही सीखने की प्रक्रिया शुरू
हो गई। धीरे-धीरे हर बिल्ली लीवर दबाने के एक्शन से जुड़ती चली गई, क्योंकि उन्हें
बॉक्स से बचकर भागने और खाना खाने का पुरस्कार मिल रहा था।
यह व्यवहार बीस से तीस
बार के ट्रायल में इतना आसान और उनकी आदत में आ गया कि वे कुछ ही सेकंड में भाग निकलती
थीं। उदाहरण के लिए एडवर्ड ने यह लिखा, "बारहवीं बिल्ली ने इसे करने के लिए इस
तरह का समय लिया। 160 सेकंड, 30 सेकंड, 90 सेकंड, 60 सेकंड, 15 सेकंड, 28 सेकंड,
20 सेकंड, 30 सेकंड, 22 सेकंड, 11 सेकंड, 15 सेकंड, 20 सेकंड, 12, 10, 14, 10, 8,
8, 5, 10, 8, 6, 6, 71"
पहले तीन ट्रायल्स में
बिल्ली औसतन 1.5 मिनट में भाग पाई। अंतिम तीन ट्रायल्स में 6.3 सेकंड लगे। अभ्यास से
हर बिल्ली ने कुछ कम गलतियाँ कीं और उनकी गतिविधियाँ तेज़ तथा ज़्यादा स्वचालित हो
गईं। ग़लतियों को दोहराने की बजाय बिल्ली सीधे ही हल की तरफ जाने लगी।
अपने अध्ययन
से एडवर्ड ने सीखने की प्रक्रिया को इस तरह
समझाया; "जिन व्यवहारों के संतोषजनक परिणाम होते हैं, वे दोहराव की ओर प्रवृत्त
होते हैं। जिन व्यवहारों के निराशाजनक परिणाम होते हैं, उनका दोहराव होने की संभावना
कम होती है।" उनका यह कार्य इस बात की चर्चा करने का सटीक शुरुआती बिंदु है कि
किस तरह से हमारे जीवन में आदतें बनती हैं। आदतें क्या हैं? क्यों दिमाग इन्हें बनाने
की चिंता करता है? एडवर्ड का प्रयोग इन बुनियादी सवालों के जवाब भी देता है।
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आपका दिमाग क्यों आदतें
बनाता है
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आदत का अर्थ एक ऐसा
व्यवहार होता है, जिसे इतनी बार दोहराया जाता है कि वह स्वचालित हो जाता है। आदत बनने
की प्रक्रिया प्रयोग और त्रुटि से शुरू होती है। जब भी जीवन में आपका सामना किसी नई
परिस्थिति से होता है, तो आपके दिमाग़ को एक फैसला लेना होता है। मैं इस पर क्या प्रतिक्रिया
दूँ? पहली बार जब आप किसी समस्या का सामना करते हैं, तो आप तय नहीं कर पाते कि उसे
कैसे हल करना है। एडवर्ड की बिल्ली की तरह आप वह सब करके देखते हैं, जो उसने किया था,
ताकि काम बन सके।
इस वक़्त आपके मस्तिष्क
में तंत्रिकाओं की गतिविधियाँ बहुत ही उच्चस्तरीय रहती हैं। आप बहुत ही सावधानी से
स्थिति का विश्लेषण कर रहे होते हैं और किस तरह से काम करना है, सजग होकर इसका निर्णय
ले रहे होते हैं। आप अथाह नई जानकारी ग्रहण करते हैं और इन सबका कोई अर्थ निकालने की
कोशिश में लगे होते हैं। मस्तिष्क व्यस्त रहकर सबसे प्रभावी कार्रवाई के बारे में सीखना
रहा होता है।
जैसे बिल्ली लीवर दबा
रही थी, वैसे आप भी कई बार अचानक किसी हल पर पहुँच जाते हैं। आप बेचैन अनुभव कर रहे
हैं और आपको पता चलता है कि दौड़ने से शांति मिल सकती है। दिनभर का काम करके आप थक
जाते हैं और आपको पता चलता है कि वीडियो गेम्स खेलकर आपको शांति मिलती है। आप खोजते
जाते हैं, खोजते जाते हैं, खोजते जाते हैं और फिर आपको अचानक कोई बड़ा पुरस्कार मिलता
है।
अप्रत्याशित पुरस्कार
मिलने के बाद आप अगली बार के लिए अपनी रणनीति बदल लेते हैं। आपका दिमाग तत्काल उन घटनाओं
की सूची बनाने लगता है, जो पुरस्कार से पहले घटी थीं। एक मिनट रुकिए, यहाँ अच्छा अनुभव
हुआ था? मैंने ठीक उसके पहले क्या किया था?
सभी मानवीय
व्यवहारों के पीछे यही फीडबैक लूप होता है:
प्रयास करना, विफल होना, सीखना, अलग-अलग तरह से कोशिश करना। अभ्यास से व्यर्थ की गतिविधियाँ
निकल जाती हैं और सार्थक प्रयास ज़ोरदार तरह से काम करने लगते हैं। आदत बनने की यही
प्रक्रिया है।
जब भी आप किसी समस्या
से बार-बार दो चार होते हैं, तो आपका मस्तिष्क इसे हल करने की प्रक्रिया को स्वचालित
करने लगता है। आपकी आदतें आपके द्वारा नियमित रूप से झेली जा रही समस्याओं और तनावों
के स्वचालित हल की एक श्रंखला होती हैं। व्यवहार वैज्ञानिक जेसन रेहा लिखते हैं,
"हमारे माहौल में बार-बार सामने आ रही समस्याओं के विश्वसनीय ही हल आदतें हैं।"
जैसे ही आदतें बन जाती
हैं, मस्तिष्क में गतिविधियाँ घट जाती हैं। आप उन संकेतों से आत्मसात कर लेते हैं,
जो सफलता की भविष्यवाणी करते हैं और शेष अन्य बातों की अनदेखी कर देते हैं। जब भविष्य
में उस तरह की समस्या उत्पन्न होती है, तो आपको सटीक रूप से पता होता है कि क्या करना
है। किसी स्थिति के हर पक्ष का विश्लेषण करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। आपका मस्तिष्क
प्रयोग और त्रुटि की प्रक्रिया को छोड़ देता है और मानसिक नियम को रचता है- 'यदि यह
है, तो फिर हल वह है।' जब भी समस्या उपयुक्त हो, तब इस संज्ञानात्मक कथानक का पालन
स्वचालित रूप से किया जा सकता है। अब आप जब भी तनाव अनुभव करेंगे, वैसे ही आप में दौड़ने
की इच्छा होगी। जैसे ही आप काम से लौटेंगे, आप हाथ में वीडियो गेम कंट्रोलर उठा लेंगे।
एक विकल्प, जिसके लिए कभी कोशिश करनी पड़ती थी, अब वह स्वचालित हो गया है। आदत ढल चुकी
है।
आदतें मानसिक शॉर्टकट
होती हैं, जो अनुभव से सीखीं जाती हैं। एक अर्थ में एक आदत उन कदमों की स्मृति है,
जो पहले किसी समस्या को हल करने के लिए आपने अपनाए थे। जब भी स्थितियाँ सही रहती हैं,
तो आप इस स्मृति को स्वचालित रूप से समस्या पर लागू करके उसे हल कर लेते हैं। मस्तिष्क
भूतकाल को इसलिए याद कर लेता है, ताकि उसे बेहतर ढंग से पता रहे कि भविष्य में क्या
काम आएगा। यही इसका प्राथमिक कारण है।
आदतों का
बनना आश्चर्यजनक रूप से बैहुत उपयोगी होता
है, क्योंकि चेतन मन को मस्तिष्क का अवरोध माना जाता है। चेतन मन एक बार में एक समस्या
पर ही ध्यान दे सकता है। इसी के फलस्वरूप आपका मस्तिष्क हमेशा आपके सजग ध्यान का भंडारण
करके रखता है, ताकि सबसे ज़रूरी कार्य में उसे लगा सके। जब भी संभव होता है, चेतन मन
को अचेतन मन को कार्य सौंप देना पसंद होता है, जिससे वह इसे स्वचालित रूप से कर सके।
आदत बन जाने के बाद सटीक रूप से यही होता है। आदतों के कारण संज्ञानात्मक भार कम होता
है और मानसिक क्षमता मुक्त हो जाती है, ताकि अन्य कार्यों पर आप अपना ध्यान केंद्रित
कर सकें।
क्षमता होने के बावजूद
कुछ लोग आदतों के लाभों के बारे में अचरज करते हैं। तर्क यह होता है: क्या आदतें मेरे
जीवन को सुस्त कर देंगी? मैं अपने आपको ऐसी जीवनशैली में नहीं ढाल सकता, जिसमें मैं
रस न ले सकूँ। क्या इस तरह का रूटीन जीवन की जीवंतता और सहजता ख़त्म नहीं कर देता?'
मुश्किल से ऐसा होता हो। इस तरह के सवाल एक झूठा विभाजन खड़ा कर देते हैं। वे आपको
सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि आदतों को बनाने और स्वच्छंद रहने में से किसी एक को
चुनें। वास्तव में दोनों ही एक-दूसरे के सहयोगी और पूरक हैं।
आदतें कभी स्वतंत्रता
में रुकावट नहीं डालती हैं। वे तो स्वतंत्रता का सृजन करती हैं। वास्तव में जिन लोगों
की किसी तरह की आदतें नहीं होती हैं, उन लोगों के पास कम से कम स्वतंत्रता होती है।
अच्छी वित्तीय आदतों के बिना आप हमेशा हर डॉलर के लिए कठिनाई झेलेंगे। सेहतमंद आदतें
न होने पर आप हमेशा ऊर्जा की कमी महसूस करेंगे। सीखने की अच्छी आदत के अभाव में आप
हमेशा पिछड़ा हुआ अनुभव करेंगे। हमेशा ही यदि आपको मामूली कामों जैसे मैं एक्सरसाइज़
कब करूँ?, मैं लिखने कहाँ जाऊँ?, मैं बिलों का पैसा कब जमा करूँ? आदि के लिए भी फैसले
लेने की नौबत आ जाए तो समझ लीजिए कि आपको स्वतंत्र रहने का समय नहीं मिल सकेगा। जीवन
के मूल तत्वों को अपेक्षाकृत आसान बना कर ही आप दिमाग़ में वह जगह पैदा कर सकते हैं,
जब आप मुक्त होकर सोचें और रचनात्मक कार्य करें।
इसके विपरीत,
जब आपकी आदतें बनी हुई होती हैं और जीवन के
मूल तत्व सँभले और संपादित होते हैं, तब आपका दिमाग़ नई चुनौतियों और अगली समस्याओं
के हल में महारत हासिल करने पर ध्यान देने के लिए स्वतंत्र होता है। वर्तमान में आदतों
को बना लेने से भविष्य में आप वह अधिक से अधिक कर सकते हैं, जो आप चाहते हैं।
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चार आसान कदमों में
आदत बनने की प्रक्रिया को बाँट सकते हैं: संकेत (क्यू), ललक (क्रेविंग), प्रतिसाद
(रिस्पांस) और पुरस्कार (रिवॉर्ड)। इसे इन बुनियादी भागों में बाँट देने से समझ में
आ जाता है कि आदत क्या है?, कैसे वह कार्य करती है? और उसे सुधारें कैसे?
क्रम में आगे बढ़ती
हैं संकेत, ललक, प्रतिसाद और पुरस्कार।
ये चार चरण ही हर आदत
के मेरुदंड होते हैं और आपका दिमाग़ इन्हीं चरणों में, इसी क्रम में, हर समय काम करता
है।
पहले, संकेत होता है।
यह आपके मस्तिष्क को चालू करता है, ताकि वह एक व्यवहार करे। कुछ सूचनाओं के अंश होते
हैं, जो प्रतिफल का अनुमान दे देते हैं। हमारे पूर्वज प्रागैतिहासिक अवधि में संकेतों
पर ध्यान देते थे, जो उन्हें खाने, पानी और मैथुन की स्थिति का भान कराते थे। आज हम
अपना अधिक से अधिक समय उन संकेतों को समझने में लगाते हैं, जो दूसरे स्तर के पुरस्कारों
जैसे धन और प्रसिद्धि, शक्ति और हैसियत, प्रशंसा और स्वीकृति, प्रेम और मित्रता तथा
निजी संतुष्टि का भान कराते हैं। (यह सही है कि ये काम अप्रत्यक्ष रूप से हमारे अस्तित्व
के अवसरों और प्रजनन को सुधारते हैं। जो भी हम करते हैं, यह उसके पीछे का गहन उद्देश्य
होता है।)
आपका दिमाग़ सतत रूप
से आपके भीतरी और बाहरी वातावरण का विश्लेषण करके यह संकेत देता है कि आपके लिए कुछ
फायदा या पुरस्कार कहाँ है?, क्योंकि संकेत इस बात का पहली बार भान कराता है कि आप
पुरस्कार के नज़दीक हैं, जो स्वाभाविक रूप से ललक बढ़ाता है।
6 चार्ल्स डुहिग की
पुस्तक 'पावर ऑफ हैबिट' के पाठक इन शब्दों को समझ लेंगे। डुहिग ने एक उत्कृष्ट किताब
लिखी। मेरी मंशा इन चरणों को चार आसान नियमों में समन्वित करके वहाँ से शुरुआत करने
की है, जहाँ उन्होंने छोड़ा था। जीवन और कामकाज में इन नियमों को अपनाकर आप बेहतर आदतों
का निर्माण कर सकते हैं।
ललक दूसरा
चरण है और यह हर आदत के पीछे की प्रेरक शक्ति
है। प्रेरणा या इच्छा के बिना या बदलाव की किसी ललक के बिना काम करने का कोई कारण नहीं
होता। जो भी ललक है, वह आपकी आदत नहीं, बल्कि स्थिति में बदलाव है, जो इसके फलस्वरूप
होता है। आप में सिगरेट पीने की ललक नहीं होती, बल्कि उससे जो राहत मिलती है, उसकी
इच्छा आपको होती है। दाँत साफ करने से आप प्रेरित नहीं होते, बल्कि मुँह साफ होने के
अहसास से होते हैं। आप टीवी चालू करना नहीं चाहते, बल्कि आप मनोरंजन चाहते हैं। हर
ललक इच्छा से संबंधित होती है, जो आपके भीतर की स्थिति को बदलना चाहती है। यह एक अहम
बिंदु है, जिस पर हम बाद में विस्तार से चर्चा करेंगे।
--
ललक हर व्यक्ति में
अलग-अलग होती है। सिद्धांततः कोई भी सूचना आपकी ललक बढ़ा देती है, लेकिन व्यवहार में
लोग एक तरह के संकेतों से प्रेरित नहीं होते हैं। जुआरी के लिए स्लॉट मशीन की ध्वनि
में वह बात होती है, जो उसकी इच्छा को तीव्र करती है। कुछ लोगों के लिए, जो कभी-कभार
जुआ खेलते हैं, केसिनो की ध्वनियाँ मात्र पीछे से होने वाला शोर रहती हैं। जब तक व्याख्या
न हो, तब तक संकेत व्यर्थ रहते हैं। देखने वाले के विचारों, अहसासों और भावनाओं से
ही कोई संकेत ललक में बदल जाता है।
तीसरा कदम प्रतिसाद
होता है। प्रतिसाद ही वास्तविक आदत होती है, जो आप करते हैं, जो एक विचार या कार्य
का स्वरूप ले सकती है। कोई प्रतिसाद मिलता भी है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता
है कि आप कितने प्रेरित हैं और व्यवहार से कितना अवरोध जुड़ा है। यदि किसी खास काम
में आपकी इच्छा से अधिक शारीरिक या मानसिक प्रयास करने होते हैं, तो आप उसे नहीं करेंगे।
आपकी क्षमता के आधार पर भी आपके प्रतिसाद तय होते हैं। यह सुनने में आसान लगता है,
लेकिन आदत तभी बन सकती है, जब आप उसे करने में समर्थ होते हैं। यदि आप बास्केटबॉल में
बॉल फेंकने की इच्छा रखते हैं, लेकिन आप पर्याप्त ऊँचा कूद नहीं सकते, तो आपकी किस्मत
खराब है।
अंततः प्रतिसाद
आपको पुरस्कार देता है। हर आदत का अंतिम लक्ष्य
पुरस्कार होता है। संकेत, पुरस्कार को देखते हैं। ललक, पुरस्कार पाने की इच्छा को व्यक्त
करती है। प्रतिसाद से तात्पर्य पुरस्कार हासिल करने से है। हम पुरस्कारों का पीछा इसलिए
करते हैं, क्योंकि इससे दो बातें होती हैं (1) वे हमें संतुष्ट करती हैं। (2) वे हमे
शिक्षित करती हैं।
पुरस्कारों का पहला
उद्देश्य आपकी ललक को संतुष्ट करना होता है। पुरस्कारों के स्वयं अपने लाभ होते हैं।
खाना और पानी आपको ऊर्जा देते हैं, जो जीवित रहने के लिए ज़रूरी हैं। पदोन्नत होने
से ज़्यादा थन और सम्मान मिलना है। अपने शरीर को सही आकार में रखने से आप सेहतमंद होते
हैं और डेटिंग की आपकी संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। सबसे तात्कालिक लाभ यह होता है कि पुरस्कार
खाने के प्रति, कोई दर्जा हासिल करने के प्रति या स्वीकृति हासिल करने के प्रति आपकी
ललक को संतुष्ट करते हैं। कम से कम एक पल के लिए तो पुरस्कार आपको ललक से तृप्ति और
राहत प्रदान करते हैं।
दूसरा, पुरस्कार हमें
सिखाते हैं कि कौनसा काम भविष्य में भी याद रखा जाना है। आपका मस्तिष्क पुरस्कार को
पहचान लेता है। जब आप जीवन को देखते हैं, तो आपका तंत्रिका तंत्र सतत रूप से यह देखता
है कि किस काम से आपकी इच्छा संतुष्ट हो रही है और प्रसन्नता मिल रही है। सुख और दुख
के अनुभव फीडबैक तंत्र का हिस्सा हैं, जो अनुपयोगी के स्थान पर विभिन्न उपयोगी काम
करने में आपके दिमाग़ की मदद करते हैं। पुरस्कार फीडबैक लूप को बंद कर देते हैं और
आदत चक्र को पूरा कर देते हैं।
यदि किसी भी चार चरणों
में व्यवहार अपर्याप्त है, तो आदत नहीं बनेगी। संकेत को ही ख़त्म कर दिया जाए, तो आदत
कभी शुरू नहीं हो सकेगी। ललक को कम कर दें, तो काम करने के लिए आपको प्रेरणा नहीं मिलेगी।
व्यवहार को मुश्किल कर दीजिए, तो आप इसे नहीं कर सकेंगे। यदि पुरस्कार आपकी इच्छा को
संतुष्ट करने में सफल नहीं होता है, तो आप इसे भविष्य में फिर नहीं करेंगे। प्रथम तीन
चरणों के बिना व्यवहार उभरेगा नहीं। सभी चारों के बिना व्यवहार दोहराएगा भी नहीं।
आदत का चक्र
संकेत
ललक
पुरस्कार
प्रतिक्रिया - प्रतिसाद
---------
ये अंतहीन
चक्र बनाते हैं, जो आपके जीवन में हर पल चलता
जा रहा है। यह 'आदत चक्र' सतत रूप से आस-पास के वातावरण को स्कैन कर लेता है, और आगे
क्या होगा? इसके बारे में खुलासा कर देता है। परिणामों से विभिन्न प्रतिसादों की कोशिश
करता है और उनसे सीखता रहता है।'
संक्षेप में कहें तो
संकेत ललक को बढ़ाता है, जो प्रतिसाद के प्रति प्रेरित करता है, यही पुरस्कार देता
है, और हमारी ललक को शांत करता है। अंततः इसका संबंध संकेत से ही होता है। ये चारों
चरण एक साथ एक न्यूरोलॉजिकल फीडबैक लूप बनाते हैं- संकेत, ललक, प्रतिसाद और पुरस्कार।
संकेत, ललक, प्रतिसाद, पुरस्कार-स्वचालित आदत की रचना करते हैं। इसी चक्र को हैबिट
लूप कहते हैं।
ऐसा नहीं है कि चार
कदमों की यह प्रक्रिया कभी-कभार होती हो, बल्कि यह अंतहीन फीडबैक लूप है, जो आपके जीवित
रहने तक हर पल एवं लगातार चलती रहती है और हर गतिविधि पर सक्रिय रहती है। मस्तिष्क
लगातार आस-पास के वातावरण को स्कैन करता रहता है और अनुमान लगाता है कि आगे क्या होगा?
विभिन्न प्रतिसादों को ढूँढता है और परिणामों से सीख लेता है। समस्त प्रक्रिया कुछ
क्षण में हो जाती है। और हम उसे बार-बार बिना सोचे-समझे दोहराते हैं, जबकि हर चीज़
पूर्व के क्षणों में ही समाहित रहती है।
इन चारों को हम दो चरणों
में विभक्त कर सकते हैं समस्या का चरण और हल का चरण। समस्या के चरण में एक संकेत तथा
ललक होती है, और आप समझ जाते हैं कि कुछ बंदलने की ज़रूरत है। हल के चरण में प्रतिसाद
और पुरस्कार आता है और यह तब होता है, जब आप काम करते हैं और इच्छित बदलाव को हासिल
कर लेते हैं।
हल का चरण
समस्या का चरण
3 प्रतिक्रियाएँ
पूरा व्यवहार किसी समस्या
को हल करने की इच्छा से चल रहा होता है। कभी-कभी समस्या यह होती है कि आपको लगता है
कि कोई चीज़ अच्छी है, और आप उसे पाना चाहते हैं। कभी-कभी समस्या आपके दर्द के आभास
की होती है, जिससे आप राहत पाना चाहते हैं। दोनों तरह से हर आदत का मक़सद आपके सामने
आई समस्या को हल करने का होता है।
-----------
चार्ल्स डुहिग
और निर एयाल को इस चित्र पर अपना प्रभाव छोड़ने
के लिए विशेष रूप से मान्यता मिलनी चाहिए। हैबिट लूप का यह चित्र उस भाषा और डिज़ाइन
का संयोजन है, जो क्रमशः चार्ल्स डुहिग की पुस्तक 'द पावर ऑफ हैबिट' और एयाल की पुस्तक
'हुक्ड' से लोकप्रिय हए।
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समस्या का चरण
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आपके फोन पर कोई नया
मैसेज आया।
आप उस मैसेज को जानने
के इच्छा रखते हैं।
आप ई-मेल का उत्तर दे
रहे हैं।
आप तनाव अनुभव करने
लगते हैं और काम के बोझ से थकने लगते हैं। आप खुद को नियंत्रण में रखना चाहते हैं।
आप सुबह उठते हैं।
आप सचेत होना चाहते
हैं।
ऑफिस से निकलकर आप सड़क
पर चलते हैं और आपको पास ही डोनट की दुकान से खुशबू आती है।
आप डोनट खाने की ललक
रखते हैं।
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हल का चरण - पुरस्कार
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आप फोन उठाकर मैसेज
देखते हैं।
संदेश पढ़ने की आपकी
ललक पूरी होती है। फोन को उठाना फोन के बजने से संबंधित होता है।
आप नाखून कुतरने लगते
हैं।
तनाव कम करने की आपकी
ललक संतुष्ट होती है। नाखून कुतरना ई-मेल के जवाब से संबंध रखता है।
आप एक कप कॉफी पीते
हैं।
सचेत होने की आपकी ललक
पूरी होती है। कॉफी पीने का संबंध जागने से है।
आप डोनट खरीदकर उसे
खाते हैं।
आप अपनी ललक डोनट. खाकर
पूरी करते हैं। डोनट खरीदना आपके ऑफिस के क़रीब सड़क पर चलने से संबंधित है।
----
समस्या का चरण
----
संकेत
आप काम में एक प्रोजेक्ट
पर कहीं अटक जाते हैं।
आप एक डार्क रूम में
जाते हैं।
----
ललक
आप अटका हुआ करते हैं
महसूस और अपनी कुंठा से मुक्त होना चाहते हैं।
आप वहाँ देखना चाहते
हैं।
----
हल का चरण
----
प्रतिक्रिया - प्रतिसाद
आप फोन उठाते हैं और
सोशल मीडिया देख लेते हैं।
----
पुरस्कार
---
आपकी ललक पूरी होती
है और आप राहत महसूस करते हैं। सोशल मीडिया को देखना काम के दौरान अवरोध आने से संबद्ध
है।
--
आप लाइट का बटन चालू
करते हैं।
---
वहाँ देखने की ललक पूरी
होती है। लाइट चालू करने का संबंध डार्क रूम में होने से संबंधित है।
-----
सोचिए कि
आप डार्क रूम में जाते हैं और लाइट का स्विच चालू करते हैं। आपने इसे आदत के रूप में इतनी बार किया है कि यह आप बिना सोचे कर देते
हैं। आप चारों चरणों को क्षणभर में पूरा कर लेते हैं। कार्रवाई करने की तीव्र इच्छा
बिना सोचे ही आपको प्रभावित कर देती है।
जब हम वयस्क हो जाते
हैं, तब हम मुश्किल से ध्यान देते हैं कि आदतें हमारी ज़िंदगी को चला रही हैं। हममें
से अधिकांश लोग इस बात पर चिंतन नहीं करते हैं कि हर सुबह हम किसी एक ही पैर के जूते
के फीते पहले क्यों बाँधना आरंभ करते हैं, या उपयोग करने के बाद ही टोस्टर का प्लग
क्यों निकालते हैं, या काम से लौटने पर आरामदायक परिधान क्यों पहनते हैं। मानसिक प्रोग्रामिंग
के दशकों बाद हम खुद अपने आप इस तरह की सोच और काम के पैटर्न में चले जाते हैं।
------------
अगले अध्यायों में हम
देखेंगे कि संकेत, ललक, प्रतिसाद और पुरस्कार कैसे बार-बार लगभग हर उस बात को प्रभावित
करते हैं, जो हम हर दिन करते हैं, परंतु यह करने से पहले हमारे लिए यह ज़रूरी है कि
हम इन चार कदमों को व्यावहारिक संरचना में बदल दें, ताकि हम अच्छी आदतों को बना सकें
और बुरी आदतों को ख़त्म कर सकें। मैं इस संरचना का उल्लेख व्यवहार बदलने के चार नियम
के रूप में करता हूँ और यह अच्छी आदतों को बनाने और बुरी आदतों को ख़त्म करने के सरल
नियम प्रदान करती है। आप हर नियम को एक लीवर जैसा मान सकते हैं, जो मानव व्यवहार को
प्रभावित करता है। जब ये लीवर सही स्थिति में होते हैं, तो अच्छी आदतों को बनाने में
प्रयास नहीं लगते। जब वे गलत स्थिति में रहते हैं, तो यह लगभग असंभव होता है।
अच्छी आदतें कैसे बनाएँ
पहला नियम (संकेत) -- इसे
स्वाभाविक और स्पष्ट बनाएँ।
दूसरा नियम (ललक) -- इसे आकर्षक बनाएँ।
तीसरा नियम (प्रतिक्रिया)
-- इसे आसान बनाएँ।
चौथा नियम (पुरस्कार)
--- इसे संतोषप्रद बनाएँ।
----------
हम इन नियमों
को उलटकर यह जान सकते हैं कि खराब आदत को
कैसे ख़त्म करें?
खराब आदत को कैसे खत्म करें,
पहले
नियम का उलट (संकेत) -- इसे अस्पष्ट
बनाएँ।
दूसरे नियम का उलट
(ललक) --- इसे अनाकर्षक बनाएँ।
तीसरे नियम का उलटा
(प्रतिक्रिया) -- इसे कठिन बनाएँ।
चौथे नियम का उलट (पुरस्कार)
--- इसे असंतोषजनक बनाएँ।
----
मेरे लिए यह दावा करना
गैर-ज़िम्मेदाराना हो सकता है कि ये चार नियम किसी भी मानव व्यवहार को बदलने की संपूर्ण
संरचना हैं, लेकिन मैं सोचता हूँ कि ये इसके बहुत आस-पास हैं। आप जल्द ही देखेंगे कि
व्यवहार परिवर्तनं के ये चारों नियम खेल से लेकर राजनीति, कला से लेकर दवाओं, कॉमेडी
से लेकर प्रबंधन तक लगभग हर क्षेत्र पर लागू होते हैं। चाहे आप कैसी भी चुनौती का सामना
कर रहे हों, इन
---
नियमों को प्रयोग में
लाया जा सकता है। हर आदत के लिए पूरी तरह अलग तरीका अपनाने की ज़रूरत नहीं है।
जब भी आप अपने व्यवहार
में परिवर्तन चाहें, तो आप स्वयं से आसान सवाल पूछ सकते हैं :
1. मैं इसे कैसे स्पष्ट
बना सकता हूँ?
2. मैं इसे कैसे आकर्षक
बना सकता हूँ?
3. मैं इसे कैसे आसान
बना सकता हूँ?
4. मैं इसे कैसे संतोषप्रद
बना सकता हूँ?
यदि आपने कभी सोचा हो
कि "मैं वह क्यों नहीं करता, जो मैं कहता हूँ किं मैं करने जा रहा हूँ? मैं क्यों
वज़न कम नहीं कर पा रहा हूँ? या सिगरेट पीना बंद नहीं कर रहा हूँ? या सेवानिवृत्ति
के लिए पैसा नहीं बचा रहा हूँ? या अलग से कोई कारोबार क्यों नहीं कर रहा हूँ? किसी
चीज़ को मैं क्यों अहम कहता हूँ? लेकिन मैं उसके लिए कभी समय नहीं निकाल पाता?"
तो इन सवालों के जवाब इन चार नियमों में ही कहीं मिल सकते हैं। अच्छी आदतों को बनाने
और खराब को ख़त्म करने की कुंजी, इन मूलभूत नियमों को समझने और अपने अनुसार उनमें बदलाव
करने में छिपी है। हर लक्ष्य विफल होगा, यदि वह मानव के मिज़ाज के विपरीत होगा।
जीवन में
जो तंत्र हैं, उनके अनुसार आपकी आदतें बनती
हैं। बाद के अध्यायों में हम इन नियमों पर एक के बाद एक चर्चा करेंगे और बताएँगे कि
आप किस तरह से एक ऐसी प्रणाली बनाने में उनका उपयोग कर सकते हैं, जिसमें अच्छी आदतें
स्वाभाविक तौर पर उभरें और ख़राब आदतें लुप्त हो जाएँ।
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अध्याय का सार
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आदत वह व्यवहार है,
जिसे कई बार दोहराया गया है, जिसके चलते वह अपने आप होती है।
आदतों का मूल उद्देश्य
जीवन की समस्याओं को हल करना होता है, जिसमें कम से कम ऊर्जा और प्रयास करने पड़े।
किसी भी आदत को फीडबैक
लूप में बाँटा जा सकता है, जिसमें चार कदम होते हैं : संकेत, ललक, प्रतिसाद और पुरस्कार।
व्यवहार बदलने के चार
नियम सरल नियम हैं, जिन्हें हम अच्छी आदतों को बनाने के लिए उपयोग कर सकते हैं। उनमें
ये हैं (1) इसे स्पष्ट बनाएँ, (2) इसे आकर्षक बनाएँ, (3) इसे आसान बनाएँ, और (4) इसे
संतोषप्रद बनाएँ।
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और दोस्तो ये था आज
का चैपटर -
और अब मिलते हैं अगले नए चैपटर के साथ, नई विडियों में,
आप हमेशा खुश रहें, आबाद रहें, स्वस्थ रहें,
और आपका धन्यावाद, नमस्कार, जय हिन्द, जय भारत
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Reviewed by Shiv Rana RCM
on
मई 27, 2026
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