recent posts

आदतें किस तरह आपकी पहचान बनाती हैं (और इसके विपरीत) -- एटॉमिक हैबिट्स - Atomic Habits - By - James Clear- की ऑडियो बुक ---- Hindi translation of the international bestseller - Atomic Habits - की ऑडियो बुक- #Audio #Book ---- Easy and Proven Ways to Develop Good Habits and Break Bad Habits – bY James Clear ----- एटॉमिक हैबिट्स- Atomic Habits - - जेम्स क्लियर - " एटॉमिक हैबिट्स " का हिंदी अनुवाद - मनोज दुबे और विश्वदीप नाग

 

https://www.youtube.com/@shivavoicelibrary


आदतें किस तरह आपकी पहचान बनाती हैं (और इसके विपरीत) --  एटॉमिक हैबिट्स - Atomic Habits - By - James Clear- की ऑडियो बुक 

----

Hindi translation of the international bestseller - Atomic Habits - की ऑडियो बुक-  #Audio #Book

----

Easy and Proven Ways to Develop Good Habits and Break Bad Habits – bY James Clear

-----

एटॉमिक हैबिट्स- Atomic Habits -  - जेम्स क्लियर - " एटॉमिक हैबिट्स " का हिंदी अनुवाद - मनोज दुबे और विश्वदीप नाग

-----

Atomic Habits -  By : जेम्स क्लियर - Writer : JAMES CLEAR

---------

 

आदतें किस तरह आपकी पहचान बनाती हैं (और इसके विपरी

---------

https://www.youtube.com/@shivavoicelibrary

------------------------------------------------

https://www.facebook.com/profile.php?id=61582814052126

------------------------------------------------

https://www.facebook.com/profile.php?id=61585805794623

------------------------------------------------

https://www.instagram.com/shivavoicelibrary/

------------------------------------------------

https://shivabooklibrary.blogspot.com/

-----------

 

आदतें किस तरह आपकी पहचान बनाती हैं (और इसके विपरीत)

-------

ऐसा क्यों होता है कि बुरी आदतों को बार-बार करना आसान होता है और अच्छी आदतों को डालना मुश्किल होता है? दैनिक आदतों को सुधारने की तुलना में कुछ चीजें आपके जीवन पर अधिक प्रभाव डालती हैं। इसलिए संभव है कि अगले वर्ष इस समय तक आप कुछ बेहतर करने की बजाय वही कर रहे होंगे, जो अभी कर रहे हैं।

 

गंभीर प्रयास और यदा-कदा प्रेरणा के अचानक फूट पड़ने के बावजूद अच्छी आदतों को कुछ दिन से अधिक बनाए रखना कठिन लगने लगता है। शारीरिक अभ्यास, ध्यान, लिखना या खाना बनाना जैसी आदतें एक या दो दिन के लिए तो ठीक लगती हैं, लेकिन बाद में ये तकलीफदेह लगने लगती हैं।

 

हालाँकि एक बार आदतें पड़ जाएँ, तो वे आपके साथ हमेशा के लिए टिकी ही रहती हैं; ख़ासतौर पर अवांछित आदतें। भले ही आपकी मंशा अच्छी हो, लेकिन अस्वास्थ्यकर आदतें जैसे जंक फूड खाना, बहुत अधिक टीवी देखना, टालना या धूम्रपान छोड़ना असंभव सा लगता है।

 

आदतों को बदलना दो कारणों से चुनौती भरा होता है: (1) हम ग़लत चीज़ बदलने की कोशिश करते हैं और (2) हम ग़लत तरह से अपनी आदतों को बदलने की कोशिश करते हैं। इस अध्याय में मैं पहले बिंदु पर बात करूंगा। बाद के अध्याय में दूसरे बिंदु का उत्तर दूँगा।

 

पहली ग़लती तो यह कि हम ग़लत चीज़ को बदलना चाहते हैं। व्यवहार में मैं जो कह रहा हूँ, उसे समझने के लिए तीन स्तरों को समझना होगा, जिनमें बदलाव होता है। आप इसकी कल्पना प्याज की परतों के रूप में कर सकते हैं।

---------

पहली परत, आपके परिणामों में बदलाव। इसका संबंध आपके परिणामों को बदलने से होता है: वज़न घटाना, पुस्तक प्रकाशित करना, स्पर्धा जीतना। आपके अधिकांश लक्ष्य परिवर्तन के इस स्तर से ही जुड़े होते हैं।

 

दूसरी परत, प्रक्रिया में बदलाव। इस स्तर का संबंध अपनी आदतों और प्रणालियों को बदलने से होता है जिम में एक नया रूटीन बनाना, अपनी डेस्क को साफ करना, ताकि बेहतर काम कर सकें, ध्यान की प्रक्रिया विकसित करना। जो ज़्यादातर आदतें आप बनाते हैं, वे इस स्तर से ही जुड़ी होती हैं।

 

तीसरी और सबसे गहरी परत, आपकी पहचान में बदलाव। यह स्तर आपकी धारणाएँ बदलने से संबंधित होता है दुनिया के बारे में आपकी राय, खुद की इमेज, खुद को और दूसरों को देखने का तरीक़ा। अधिकांश धारणाएँ, अनुमान और पूर्वाग्रह इसी स्तर से संबंधित होते हैं।

 

आपको जो प्राप्त होता है, वे परिणाम होते हैं। प्रक्रियाएँ वे हैं, जो आप करते

पहचान आपके विश्वास से जुड़ी होती है। जब स्थायी आदतें विकसित करने की बात आती है, जब एक फीसदी सुधारों की प्रणाली विकसित करने की बात आती है, तो समस्या यह नहीं होती कि एक स्तर दूसरे की अपेक्षा बेहतर है या बदतर। सुधार के हर स्तर अपने तरीके से उपयोगी होते हैं। समस्या बदलाव की दिशा में होती है।

---

कई लोग अपनी आदतों में बदलाव की प्रक्रिया इस बात पर केंद्रित करके करते हैं कि वे क्या अर्जित करना चाहते हैं। यह परिणाम आधारित आदतों का मार्ग प्रशस्त करता है। इसका विकल्प पहचान आधारित आदतें विकसित करना है। इस दृष्टिकोण से हम क्या बनना चाहते हैं, इस पर केंद्रित करके शुरुआत करते हैं।

----

सोचिए कि दो लोग सिगरेट पीने का विरोध कर रहे हैं। जब सिगरेट उन्हें पेश की जाती है, तो पहला व्यक्ति कहता है, "नहीं, धन्यवाद। मैं इससे छुटकारा पाने की कोशिश कर रहा हूँ।" यह सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन वह व्यक्ति अब भी यह मानता है कि वह सिगरेट पीने वाले लोगों में से है, और कुछ अन्य करने का प्रयास कर रहा है। वे उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी आदत इसी धारणा को लेकर चलने से बदल जाएगी।

 

दूसरा व्यक्ति जिसे सिगरेट दी जाती है, यह कहता है, "नहीं, धन्यवाद। मैं सिगरेट नहीं पीता।" बहुत मामूली सा अंतर है, लेकिन यह कहना कि मैं सिगरेट नहीं पीता, उस व्यक्ति की पहचान में बदलाव की ओर संकेत दे रहा है। सिगरेट पीना उसकी पिछली ज़िंदगी का हिस्सा था, अब वह नहीं पीता है। इसलिए उस व्यक्ति की पहचान सिगरेट पीने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं की जा सकती।

 

ज़्यादातर लोग जब सुधार करने की शुरुआत करते हैं, तो पहचान बदलने के बारे में सोचते भी नहीं हैं। वे सिर्फ यह सोचते हैं, "मैं स्किनी (परिणाम) होना चाहता हूँ और यदि मैं इसी डाइट का अनुसरण करता रहा, तो मैं स्किनी (प्रक्रिया) हो सकूँगा।" वे लक्ष्य तय करते हैं और यह निर्धारित करते हैं कि क्या करना है, ताकि लक्ष्य हासिल कर सकें। इसमें वे उस धारणा की चिंता नहीं करते हैं, जो उनकी प्रक्रिया को चला रही है। वे खुद को किस तरह से देख रहे हैं, उस नज़रिए को वे नहीं बदलते हैं और न ही इस बात को मानते हैं कि उनकी पुरानी पहचान उनके बदलाव की नई योजना को खंडित कर सकती है।

 

हर प्रणाली में होने वाले कार्यों के पीछे धारणाओं का एक तंत्र रहता है। लोकतंत्र की प्रणाली आज़ादी, बहुमत का शासन और सामाजिक समानता की धारणा पर टिकी है। तानाशाही की प्रणाली अलग धारणाओं पर टिकी है, जिसमें सारे अधिकार किसी एक के हाथ में होते हैं और कठोर आज्ञापालन होता है। लोकतंत्र में आप कई तरीके सोच सकते हैं, ताकि अधिक से अधिक लोग वोट दें, लेकिन इस तरह के बदलाव की उम्मीद तानाशाही में नहीं होती है। यह तानाशाही प्रणाली की पहचान नहीं है। वोट देना ऐसा व्यवहार है, जो कुछ तरह की धारणाओं में असंभव है।

 

चाहे हम किन्हीं व्यक्तियों, संगठनों या समुदायों की बात करें, लेकिन इस तरह का पैटर्न वहाँ भी होता है। धारणाओं और अनुमानों के कुछ ढाँचे होते हैं, जो प्रणाली को आकार देते हैं। इसमें निहित आदतों से पहचान बनती है।

 

जो व्यवहार स्वयं के प्रतिकूल होगा, वह लंबे समय तक नहीं चलेगा। यदि आप अधिक पैसा चाहते हैं और आपकी पहचान उन लोगों में से है, जो कमाने से अधिक खर्च करते हैं, तो आप हमेशा अर्जित करने की बजाय खर्च करने में ही प्रवृत्त होते रहेंगे। आप अच्छी सेहत चाहते हैं, लेकिन यदि आप हमेशा आराम को ही आदतें किस तरह आपकी पहचान बनाती हैं (और इसके विपरीत) प्राथमिकता देते रहेंगे, तो शरीर की ट्रेनिंग की बजाय आप आराम करते रहेंगे। यदि आप अपने जीवन की पुरानी धारणाओं को नहीं बदलते हैं, तो अपनी आदतों को बदलना बहुत मुश्किल है। आपके पास एक नया लक्ष्य और नई योजना हो सकती है, लेकिन आप क्या हैं, आपने उसे नहीं बदला।

 

बोल्डर, कोलोराडो के उद्यमी ब्रायन क्लार्क की कहानी इसका उत्तम उदाहरण मानी जा सकती है। ब्रायन ने मुझे बताया कि "जहाँ तक मुझे याद है कि मुझे अपने नाखून चबाने की आदत रही है।" "जब मैं छोटा था, तब घबराहट में नाखून चबाने से इस आदत की शुरुआत हुई थी। बड़े होने पर यह अवांछित आदत में तब्दील हो गई। एक दिन मैंने सोचा कि तब तक नाखून नहीं चबाना है, जब तक वे बढ़ न जाएँ। अपनी इच्छाशक्ति से मैंने वह कर दिखाया।"

 

फिर ब्रायन ने कुछ चमत्कारिक किया।

 

"मैंने अपनी पत्नी से कहा कि पहली बार मेरा मैनिक्यर करा दें। मेरा सोचना था कि यदि मैंने नाखूनों के लिए पैसा देना शुरू कर दिया, तो मैं उन्हें चबाऊँगा नहीं। और इसने काम कर दिखाया, लेकिन केवल पैसे के कारण नहीं। मेरे नाखून मैनिक्यर के कारण सुंदर हो गए थे, यह पहली बार मैंने देखा। मैनिक्यर करने वाले ने भी कहा कि मेरे नाखून यदि चबाए न जाएँ, तो ये वास्तव में स्वस्थ और आकर्षक हैं। अचानक मुझे मेरे नाखूनों पर गर्व होने लगा। यह ऐसा था कि जिसके बारे में मैंने कभी इच्छा तक नहीं की थी और इसने मुझे अचानक से बदलकर रख दिया। मैंने उसके बाद एक बार भी नाखून नहीं कुतरे। इसी कारण से मैं अब गर्व से उनकी इतनी कद्र करता हूँ।"

 

जब आदत आपकी पहचान का हिस्सा बन जाए, तो वह प्रेरणा का भीतरी स्वरूप होता है। यह कहने के लिए एक ऐसी बात है कि मैं इसी तरह का व्यक्ति हूँ, जो यह चाहता था। यह उससे बहुत अलग है कि मैं ऐसा व्यक्ति हूँ, जो ऐसा ही है।

 

किसी पहचान विशेष पर यदि आप गर्व अनुभव करते हैं, तो आप उतने ही अधिक प्रेरणा से भरे होंगे और उससे संबंधित आदतों से जुड़े होंगे। यदि आप अपने बालों के लुक पर गर्व करते हैं, तो आप कई तरह की आदतें इसकी देख-रेख से संबंधित बना चुके होंगे। यदि आपको अपने बाइसेप्स पर गर्व है, तो आप कभी भी शरीर के ऊपर के हिस्से का वर्कआउट बंद नहीं करेंगे। यदि आपको अपने द्वारा बनाए गए स्कार्फ पर गर्व है, तो हफ़्ते में आप कई घंटे स्कार्फ बुनने में लगाएँगे। एक चार आपकी गर्वानुभूति परिदृश्य में शामिल हो गई, तो आप कैसे भी करके उस आदत को बनाए रखेंगे।

 

वास्तविक रूप से व्यवहार का बदलना ही पहचान बदलना है। आप किसी प्रेरणा से ही आदत की शुरुआत करते हैं, लेकिन केवल एक ही कारण से आप उस आदत में बने रहते हैं, क्योंकि वह आपकी पहचान बन चुकी होती है। हरेक व्यक्ति खुद को जिम जाने, एक या दो बार सेहतमंद खाना खाने के लिए तैयार कर सकता है, लेकिन यदि आप व्यवहार के पीछे की धारणा को नहीं बदलते हैं, तो लंबे समय तक इस पर चलते रहना कठिन होता है। सुधार तब तक अस्थायी रहते हैं, जब तक कि वे उसका हिस्सा नहीं बन जाते, जो आप हैं।

लक्ष्य पुस्तक पढ़ने का नहीं, लक्ष्य पाठक बनने का है।

लक्ष्य मैराथन में दौड़ने का नहीं, लक्ष्य धावक बनने का है।

लक्ष्य वाद्य सीखने का नहीं, लक्ष्य संगीतकार बनने का है।

आपका व्यवहार आपकी पहचान को प्रतिबिंबित करता है। आप जो करते हैं, वह इस बात का संकेत है कि आप किस प्रकार के व्यक्ति हैं। आपकी धारणा इस पर निर्भर करती है कि आप इसे सजगता के साथ करते हैं या बिना सजगता के। शोध बताते हैं कि एक बार व्यक्ति किसी पहचान के एक पहलू पर धारणा बना लेता है, तो वह उस धारणा के साथ और जुड़ता चला जाता है। उदाहरण के लिए जो व्यक्ति 'मतदाता' के रूप में पहचाने जाते हैं, वे उन लोगों की तुलना में वोट देने के अधिक इच्छुक होंगे, जो कहते हैं कि हम वोट देना चाहते हैं। इसी प्रकार से जो व्यक्ति अपनी पहचान में एक्सरसाइज़ को शामित कर चुका होता है, उसे कभी प्रशिक्षण लेने के लिए समझाने की ज़रूरत नहीं होगी। सही करना आसान है। कुल मिलाकर जब आपका व्यवहार और आपकी पहचान दोनों एक हो जाते हैं, तो आपको व्यवहार बदलने की आवश्यकता नहीं होती है। आप उसी तरह से व्यवहार करते हैं, जैसे आप हैं।

आदत बनने के सभी पहलुओं की तरह यह भी दुधारी तलवार है। जब यह आपके लिए काम करती है, तो पहचान बदल जाती है और आत्म सुधार का शक्तिशाली बल मिलता है। जब यह विपरीत काम करती है, तो आपकी पहचान श्राप बनकर रह जाती है। एक बार आपने पहचान को अपने भीतर बैठा लिया, तो अपनी निष्ठा उसके प्रति समर्पित करना आसान हो जाता है, ताकि यह आपमें बदलाव की क्षमता पर असर डाल सके। कई लोग संज्ञानात्मक नींद में ही जीवन निकाल देते हैं और उनकी पहचान से जुड़े मानकों का आँख बंद कर पालन करते रहते हैं।

----

अचेतन, अर्द्धचेतन, अवचेतन आदि सभी शब्दों का उपयोग वैचारिक सजगता के अभाव के लिए किया जा सकता है। अकादमिक क्षेत्रों में भी इन शब्दों का अक्सर इस्तेमाल किया जाता रहा है, बिना किसी सावधानी के। 'अचेतन' शब्द का उपयोग मैं इसलिए करना चाहूँगा कि यह बहुत व्यापक है, जिसमें दिमाग़ की दोनों प्रक्रियाएँ आ जाती है, जहाँ हम सजग रह कर कभी नहीं पहुँच सकते और इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं कि हमारे आस-पास क्या है। 'अचेतन' से उन सब बातों का वर्णन होता है, जिनके बारे में आप सजग रह कर नहीं सोच रहे होते हैं।

----

'मुझे दिशाएँ याद करने में परेशानी होती है।'

'मैं सुबह उठ नहीं सकता।'

'मैं लोगों के नाम याद नहीं रख सकता।'

'हमेशा मैं देर से पहुँचता हूँ।'

'टेक्नोलॉजी के मामले में मैं अच्छा नहीं हूँ।'

'मुझे गणित बहुत कठिन लगता है।'

...और भी अन्य हज़ारों बातें।

जब आप कोई कहानी स्वयं के लिए लगातार वर्षों तक चलाते रहते हैं, तो आप एक मानसिक ढाँचे में उतर जाते हैं, और उसी को सच मानने लगते हैं। कुछ समय बाद आप कुछ कार्यों से इंकार करने लगते हैं "मैं यह कर ही नहीं सकता।" अपनी खुद की छवि को बनाए रखने का भीतरी दबाव बहुत अधिक होता है और उसी तरह से व्यवहार करना आपकी धारणा का हिस्सा हो जाता है। आप खुद के विरोध को दरकिनार करने के तरीके ढूँढ लेते हैं।

कोई विचार या कार्य आपकी पहचान से जितनी गहराई से संबंधित होता है, उसे बदल पाना उतना ही कठिन हो जाता है। यह भले ही ग़लत हो, लेकिन यह मानना आपके लिए सुविधाजनक हो जाता है कि आपकी संस्कृति की मान्यताएँ (समूह की पहचान) क्या हैं, अथवा आप वे करते हैं, जिनसे आपकी छवि (व्यक्तिगत पहचान) बनी रहती है। किसी भी स्तर पर, भले ही वह निजी हो, टीम की हो, समुदाय की हो, सकारात्मक बदलाव में सबसे बड़ा अवरोध पहचान के संघर्ष से जुड़ा होता है। अच्छी आदतें युक्तिसंगत हो सकती हैं, लेकिन यदि वे आपकी पहचान से सामंजस्य नहीं रखती हैं, तो आप उन्हें आचरण में लेने से विफल रहेंगे।

 

किसी भी दिन आप अपनी आदतों से संघर्ष कर सकते हैं, क्योंकि आप बहुत व्यस्त हैं या थके हुए हैं या फिर अभिभूत हैं या सैकड़ों अन्य कारण होते हैं। लंबे समय में आप अपनी आदतों से जुड़े नहीं रह पाते हैं, क्योंकि आपकी स्वयं की छवि उसमें अवरोध बन जाती है। इस कारण से आप अपनी पहचान के एक पक्ष से जुड़ नहीं पाते हैं। प्रगति के लिए कुछ भुला देना ज़रूरी होता है। स्वयं का श्रेष्ठ रूप बनाने के लिए ज़रूरी होता है कि आप अपनी धारणाओं का संपादन करें और अपनी पहचान को उन्नत और विस्तारित करें।

इससे एक महत्त्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है: यदि आपकी धारणाएँ और दुनिया के प्रति आपका नज़रिया आपके व्यवहार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, तो आख़िर वे विकसित कैसे होते हैं? आपकी पहचान बनती किस तरह से है? और आप आपकी पहचान के नए पहलुओं पर कैसे ध्यान दे सकते हैं, जो आपके सहायक होते हैं और धीरे-धीरे उन चीज़ों को भी कैसे हटा सकते हैं, जो आपकी राह में बाधा डालते हैं?

-----

पहचान बदलने की दो चरणों की प्रक्रिया

-----

आपकी आदतों से ही आपकी पहचान बन पाती है। आप पहले से तय धारणाओं के साथ पैदा नहीं होते हैं। हर मान्यता जो आप में है, वह हालात और अनुभव के आधार पर सीखी गई है।

सटीकता से कहें, तो आप किस तरह से अपनी पहचान को मूर्त रूप देना चाहते हैं, वही आपकी आदतें हैं। आप जब अपना बिस्तर हर दिन लगाते हैं, तो आप व्यवस्थित व्यक्ति के रूप में पहचान प्रदर्शित करते हैं। जब आप हर दिन लिखते हैं, तो आप रचनात्मक व्यक्ति के रूप में पहचान प्रदर्शित करते हैं। जब आप प्रशिक्षण लेते हैं, तो आप एक खिलाड़ी के रूप में पहचान प्रदर्शित करते हैं।

जितना ज़्यादा आप अपना व्यवहार दोहराते जाएँगे, उतना ही अधिक उस व्यवहार से संबंधित अपनी पहचान को सुदृढ़ करते जाएँगे। वास्तव में आइडेंटिटी (पहचान) शब्द की उत्पत्ति लेटिन शब्द एसेन्शियास से हुई है, जिसका अर्थ है होना। दूसरा शब्द है आइडेंटिडेम, जिसका अर्थ है बार-बार। आइडेंटिटी (पहचान) मूल रूप से 'आपके होने का दोहराव' है।

अभी आपकी जो भी पहचान है, आप उसे ही मानते हैं, क्योंकि आपके पास उसके साक्ष्य हैं। यदि आप बीस वर्षों से नियमित रूप से चर्च जा रहे हैं, तो आपके पास धार्मिक होने के साक्ष्य हैं। यदि आप हर रात एक घंटा जीवविज्ञान पढ़ते हैं, तो आपके पास साक्ष्य हैं कि आप पढ़ने वाले हैं। यदि आप बर्फ गिरने पर भी जिम जाते ही हैं, तो आपके पास साक्ष्य है कि आप फिटनेस के प्रति वचनबद्ध हैं। जितने अधिक साक्ष्य आपके पास आपकी धारणाओं के होंगे, उतनी मज़बूती से आप उसमें विश्वास करेंगे।

मेरे जीवन के प्रारंभिक दौर में, मैं खुद को लेखक नहीं मानता था। यदि आप मेरे हाईस्कूल के टीचर या कॉलेज प्रोफेसर से पूछेंगे, तो वे आपको कहेंगे कि मैं औसत लेखक रहा हूँ: कोई उत्कृष्ट नहीं। जब मैंने लेखन का करियर शुरू किया तो पहले के कुछ वर्ष तक मैं हर सोमवार और गुरुवार को एक आलेख प्रकाशित कराता था। जैसे-जैसे इसके साक्ष्य बढ़ते गए, वैसे-वैसे मेरी पहचान लेखक के रूप में बन गई। मैंने लेखक के रूप में कभी शुरुआत नहीं की थी। मैं अपनी आदतों से लेखक बन सका।

 

इसमें संदेह नहीं कि आपकी आदतें न केवल आपकी पहचान को प्रभावित करती हैं, बल्कि उनकी आवृत्ति से वे कई बार बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाती है। जीवन का हर अनुभव आपकी छवि को संशोधित करता है। ऐसा भी नहीं है कि एक बार आपने फुटबॉल पर किक मारी तो आप खुद को फुटबॉल खिलाड़ी के रूप में समझने लगें, या आपने एक चित्र बनाया है, तो आप स्वयं को कलाकार समझने लगे, लेकिन जैसे ही आप इस चीज़ को बार-बार दोहराते हैं, तो साक्ष्य एकत्र होते जाते हैं और आपकी खुद की छवि बदलना शुरू होती है। किसी एक अनुभव का प्रभाव बुँचला जाता है, लेकिन आदतों का प्रभाव समय के साथ पुनः आ जाता है, जिसका मतलब है आपकी पहचान बनाने में आपकी आदतें सर्वाधिक साक्ष्य जुटाती हैं। इस तरह से कह सकते हैं कि आपके खुद के निर्माण की प्रक्रिया आदतों के निर्माण की प्रक्रिया में निहित है।

 

यह एक तरह का क्रमिक विकास होता है। हम अपनी अंगुलियाँ चटकाते हुए बदल नहीं सकते और यह तय नहीं कर सकते कि हम एकदम बदलकर नए हो गए। हम थोड़ा-थोड़ा हर दिन आदत-दर-आदत के हिसाब से बदलते हैं। हमारे अंदर सतत रूप से सूक्ष्म व क्रमिक विकास होता रहता है।

 

हर आदत एक सुझाव की तरह होती हैः "अरे! शायद यही वह बात है, जो मैं हूँ।" यदि आप एक पुस्तक पूरी करते हैं, तो आप ऐसे व्यक्ति होते हैं, जो पुस्तकें पढ़ना पसंद करता है। यदि आप जिम जाते हैं, तो आप ऐसे व्यक्ति हैं, जो एक्सरसाइज़ करना पसंद करता है। यदि आप गिटार बजाने का अभ्यास करते हैं, तो आप ऐसे व्यक्ति हैं, जो संगीत पसंद करता है।

 

हर कार्य आपके लिए एक वोट की तरह होता है कि आप किस तरह का व्यक्ति बनना चाहते हैं। सिर्फ कोई एक घटना आपकी पूर्व धारणाओं को बदल नहीं सकेगी, लेकिन जैसे ही वोट बढ़ते हैं, वैसे ही आपकी नई पहचान के साक्ष्य भी बढ़ते हैं। यही कारण है कि अर्थपूर्ण बदलाव के लिए क्रांतिकारी बदलाव की ज़रूरत नहीं होती। छोटी-छोटी आदतें नई पहचान के साक्ष्य देकर अर्थपूर्ण बदलाव लाती हैं। और यदि कोई बदलाव अर्थपूर्ण होता है, तो यह वाकई में बड़ा होता है। यह छोटे-छोटे सुधारों का विरोधाभास है।

इन सबको एक साथ देखा जाए, तो आप पाएँगे कि आदतें ही आपकी पहचान बदलने का मार्ग हैं। आप कौन हैं? इसे बदलने का सबसे ज़्यादा व्यावहारिक उपाय यही है कि आप जो करते हैं, उसे बदल डालें।

---

हर बार जब आप एक पेज लिखते हैं, तो आप लेखक होते हैं।

हर बार जब आप वायलिन का अभ्यास करते हैं, तो आप संगीतज्ञ होते हैं।

हर बार जब आप एक्सरसाइज़ शुरू कर देते हैं, तो आप एथलीट होते हैं।

हर बार जब आप कर्मचारियों को प्रोत्साहन देते हैं, तो आप लीडर होते हैं।

हर आदत न केवल परिणाम लाती है, बल्कि आपको बहुत कुछ सिखाती भी है। जैसे- खुद पर विश्वास करना। आप यह विश्वास करना शुरू कर देते हैं कि आप इन चीज़ों को अर्जित कर सकते हैं। जब वोट बढ़ने लगते हैं, तो साक्ष्य भी बदलने लगते हैं। आप जो कहानी खुद से कहते हैं, वह भी बदलने लगती है।

यह सही है कि यह बात विपरीत रूप से भी काम करती है। हर बार जब आप बुरी आदत को चुनते हैं, तो यह आपकी उस पहचान के लिए वोट होता है। अच्छी बात यह है कि आपको परफेक्ट होने की ज़रूरत नहीं है। किसी भी चुनाव में दोनों पक्षों को वोट मिलते हैं। किसी चुनाव को जीतने के लिए आपको सर्वसम्मत वोट की नहीं, बल्कि बहुमत की ज़रूरत होती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप किसी ख़राब व्यवहार या फिर अनुत्पादक आदत के लिए कुछ वोट दे देते हैं। आपका लक्ष्य तो समय के बहुमत को हासिल करना है।

नई पहचान के लिए नए साक्ष्यों की ज़रूरत होती है। यदि आप उसी तरह से वोट करते रहे, जैसे पहले से करते रहे हैं, तो वैसे ही नतीजे आपको प्राप्त होंगे। यदि कुछ बदलते नहीं हैं, तो कुछ बदलेगा नहीं।

--------

यह एकदम सरल दो चरणों की प्रक्रिया है:

--------

1. यह तय करें कि आप किस तरह के व्यक्ति बनना चाहते हैं।

2. छोटी-छोटी जीतों से खुद को साबित करें।

पहले यह तय करें कि आप क्या बनना चाहते हैं। यह प्रत्येक स्तर पर हो सकता है, चाहे वह व्यक्ति हो, टीम हो, समुदाय हो या राष्ट्र हो। आप किसके समर्थन में रहना चाहेंगे? आपके सिद्धांत और मूल्य क्या हैं? आप किसके जैसा बनना चाहते हैं?

ये बड़े सवाल हैं और कई लोग तय नहीं कर पाते कि शुरुआत कहाँ से करनी है, लेकिन वे जानते हैं कि किस तरह के नतीजे उनको चाहिए वे सिक्स पेक एब्स चाहते हैं, कम बेचैन होना चाहते हैं या फिर अपना वेतन दोगुना करना चाहते हैं। यह अच्छी बात है। अब आप जिस तरह के व्यक्ति बनना चाहते हैं,

---------

उसके परिणाम से उलटा चलना शुरू कीजिए और पीछे तक आते हुए पूरा तरीका समझ लीजिए। आप अपने आप से पूछें "वह किस तरह का व्यक्ति होता है, जो मेरी इच्छा वाला परिणाम हासिल कर सकता है?" वह किस तरह का व्यक्ति होता है, जो चालीस पाउंड वज़न कम कर सकता है? वह किस तरह का व्यक्ति होता है, जो नई भाषा सीख सकता है? वह किस तरह का व्यक्ति होता है, जो सफलता से स्टार्ट-अप चला लेता है?

उदाहरण के लिए, "वह किस तरह का व्यक्ति होता है, जो पुस्तक लिख सकता है?" संभवतः कोई ऐसा व्यक्ति, जो नियमित और भरोसेमंद हो। अब आपका पूरा ज़ोर पुस्तक लिखने (परिणाम आधारित) की बजाय ऐसा व्यक्ति बनने की ओर चला जाता है, जो नियमित और भरोसेमंद (पहचान आधारित) हो।

यह प्रक्रिया इस तरह की मान्यताओं को बढ़ावा देती है, जैसे :

'मैं इस तरह का टीचर हूँ, जो विद्यार्थियों के लिए लड़ता है।'

मैं इस तरह का डॉक्टर हूँ, जो हर रोगी को ज़रूरत के हिसाब से समय और सहानुभूति देता है।'

'मैं इस तरह का मैनेजर हूँ, जो कर्मचारियों की वकालत प्रबंधन के आगे करता है।'

एक बार आपने समझ लिया कि आपको किस तरह का व्यक्ति बनना है, तो आप छोटे-छोटे कदम उठाने लगते हैं, ताकि आपकी इच्छित पहचान सुदृढ़ हो सके। मेरी एक दोस्त है, जिसने 100 पाउंड तक वज़न कम किया है, उसने खुद से पूछा, "एक स्वस्थ व्यक्ति क्या करता है?" पूरे दिन वह इस सवाल को एक गाइड के रूप में प्रयोग में लाने लगी। क्या एक स्वस्थ व्यक्ति कैब लेगा या पैदल चल कर जाएगा? क्या एक स्वस्थ व्यक्ति बरिटो या सलाद ऑर्डर करेगा? उसने पाया कि यदि वह एक स्वस्थ व्यक्ति की तरह व्यवहार करती रही, तो कुछ समय बाद वह उसी की तरह बन जाएगी। वह सही थी।

पहचान आधारित आदतों की अवधारणा इस पुस्तक में शामिल अन्य प्रमुख विषय: फीडबैक लूप्स से हमारा पहला परिचय कराती है। आपकी आदतें, आपकी पहचान को आकार देती हैं; और आपकी पहचान, आपकी आदतों को आकार देती हैं। यह दोतरफा मार्ग है। सभी आदतों का बन जाना फीडबैक लूप होता है (इस अवधारणा के बारे में अगले अध्याय में हम विस्तार से बात करेंगे), लेकिन महत्त्वपूर्ण यह है कि परिणामों की बजाय आपके मूल्य, सिद्धांत और पहचान इस लूप को संचालित करें। ध्यान हमेशा उस जैसा व्यक्ति बनने पर होना चाहिए, कोई ख़ास नतीजा प्राप्त करने पर नहीं पहचान में बदलाव, आदत में बदलाव का नॉर्थ स्टार (सबसे चमकदार पक्ष) होता है। इस पुस्तक के शेष भाग में आपको अपने भीतर, अपने परिवार, अपनी टीम, अपनी कंपनी और जहाँ भी आप चाहते हैं, उसमें बेहतर आदतों को डालने के कदम दर कदम निर्देश दिए गए हैं, लेकिन वास्तविक सवाल है: "क्या आप उस प्रकार के व्यक्ति बन पा रहे हैं, जैसे बनना चाहते हैं?" पहला कदम क्या और कैसे नहीं, वरन कौन है। आपको पता होना चाहिए कि आप क्या बनना चाहते हैं, अन्यथा बदलाव के लिए आपकी खोज बिना पतवार की नौका के समान होगी। और इसलिए हम यहाँ इसे शुरू कर रहे हैं।

 

आपके पास खुद के बारे में जो मान्यताएँ हैं, उन्हें बदलने की सामर्थ्य होती है। आपकी पहचान कोई जड़वत पत्थर जैसी नहीं है। हर क्षण आपके पास अपनी पसंद होती है। आप आज चुनी गई आदतों के आधार पर उस पहचान को चुन सकते हैं, जिसे आप आज अपनाना चाहते हैं। यही इस पुस्तक का गहरा उद्देश्य है और आदतें क्यों मायने रखती हैं, उसका वास्तविक कारण है।

 

अच्छी आदतों को बनाने से तात्पर्य ऐसा नहीं है कि पूरे दिन इसमें खुद को झोंक दिया जाए। यह हर रात एक दाँत चमकाना, हर सुबह ठंडे पानी का शावर लेना या हर दिन एक ही कपड़े पहनना जैसा नहीं है। यह सफलता के लिए बाहरी परिणामों को हासिल करने के बारे में भी नहीं है, जैसे ज़्यादा पैसे कमाना, वज़न घटाना या तनाव घटाना। आदतें आपको यह सब उपलब्ध करा देंगी, लेकिन बुनियादी रूप से आदतों से तात्पर्य कुछ प्राप्त कर लेना नहीं है। उनका तात्पर्य कुछ बनना होता है।

 

अंततः आपकी आदतें मायने रखती हैं, क्योंकि वे आपको ऐसा व्यक्ति बनने में मदद करती हैं, जो आप बनना चाहते हैं। आदतें ऐसा मार्ग होती हैं, जिनके माध्यम से आप अपने बारे में सबसे गहरी मान्यताओं को विकसित करते हैं। अक्षरशः आप वही बनते हैं, जो आपकी आदतें होती हैं।

-----

अध्याय का सार

-----

तीन स्तरों पर बदलाव होता है परिणाम आधारित बदलाव, प्रक्रिया में बदलाव और पहचान में बदलाव ।

अपनी आदतों को बदलने का सबसे प्रभावी तरीक़ा इस बात पर फोकस करना नहीं है कि आप क्या हासिल करना चाहते हैं, बल्कि इस बात पर फोकस करना है कि आप क्या बनना चाहते हैं।

-----

 

 

आपकी आदतों से ही आपकी पहचान बनती है। हर गतिविधि एक प्रकार से उस व्यक्ति जैसा बनने के लिए एक वोट के समान होती है, जैसा बनने की आपकी इच्छा होती है।

स्वयं का सर्वश्रेष्ठ संस्करण बनने के लिए आपको अपनी धारणाओं का सतत रूप से संपादन करना होगा और अपनी पहचान को उन्नत तथा विस्तारित करना होगा।

वास्तविक कारण यह है कि आदतें इसलिए मायने नहीं रखतीं कि वे आपको बेहतर परिणाम दे सकती हैं (यद्यपि वे ऐसा कर सकती हैं), बल्कि इसलिए मायने रखती है, क्योंकि वे खुद के बारे में आपकी मान्यताओं को बदल सकती हैं।

--------

और दोस्तो ये था आज का चैपटर -

और अब मिलते हैं अगले नए चैपटर के साथ, नई विडियों में,

आप हमेशा खुश रहें, आबाद रहें, स्वस्थ रहें, और आपका धन्यावाद, नमस्कार, जय हिन्द, जय भारत 

------

 

 

आदतें किस तरह आपकी पहचान बनाती हैं (और इसके विपरीत) -- एटॉमिक हैबिट्स - Atomic Habits - By - James Clear- की ऑडियो बुक ---- Hindi translation of the international bestseller - Atomic Habits - की ऑडियो बुक- #Audio #Book ---- Easy and Proven Ways to Develop Good Habits and Break Bad Habits – bY James Clear ----- एटॉमिक हैबिट्स- Atomic Habits - - जेम्स क्लियर - " एटॉमिक हैबिट्स " का हिंदी अनुवाद - मनोज दुबे और विश्वदीप नाग आदतें किस तरह आपकी पहचान बनाती हैं (और इसके विपरीत) --  एटॉमिक हैबिट्स - Atomic Habits - By - James Clear- की ऑडियो बुक   ----  Hindi translation of the international bestseller - Atomic Habits - की ऑडियो बुक-  #Audio #Book  ----  Easy and Proven Ways to Develop Good Habits and Break Bad Habits – bY James Clear  -----  एटॉमिक हैबिट्स- Atomic Habits -  - जेम्स क्लियर - " एटॉमिक हैबिट्स " का हिंदी अनुवाद - मनोज दुबे और विश्वदीप नाग Reviewed by Shiv Rana RCM on मई 27, 2026 Rating: 5

कोई टिप्पणी नहीं:

Blogger द्वारा संचालित.