इच्छा --- सोचिये और अमीर बनिये
- Think and Grow Rich - By -
Napoleon Hill- की ऑडियो बुक
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Hindi translation of the international bestseller Think and Grow
Rich - की ऑडियो बुक- #Audio #Book
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सोचिये और अमीर बनिये - नेपोलियन हिल - "थिंक एंड ग्रो रिच" का
हिंदी अनुवाद
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By : नेपोलियन हिल - Writer : NAPOLEON
HILL
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इच्छा
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सभी उपलब्धियों का शुरुआती
बिंदु अमीरी की दिशा में पहला क़दम
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मस्तिष्क
की कोई सीमाएँ नहीं हैं, सिवाय उनके जिन्हें हम मान लेते हैं।
ग़रीबी
और अमीरी दोनों ही विचार की संतानें हैं।
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जब एडविन सी. बार्स
ऑरेंज, न्यू जर्सी में पचास साल पहले माल गाड़ी से उतरे तो वे किसी फुटपाथिए की तरह
दिख रहे थे, परंतु उनके विचार शहंशाहों जैसे थे।
जब वे रेलवे स्टेशन
से थॉमस ए. एडिसन के ऑफ़िस की तरफ़ जा रहे थे, तो उनका दिमाग़ अपना काम कर रहा था।
उन्होंने खुद को एडिसन के सामने खड़े देखा। उन्होंने यह कल्पना की कि वे एडिसन के सामने
अपने जीवन की इकलौती प्रबल इच्छा को व्यक्त कर रहे हैं : उस महान आविष्कारक का बिज़नेस
पार्टनर बनने की प्रबल इच्छा।
बार्न्स की इच्छा सिर्फ़
आशा नहीं थी, यह सिर्फ़ कामना नहीं थी। यह एक तीव्र, प्रबल इच्छा थी, जो सबसे ऊपर थी
और हर चीज़ के पार जाती थी। उनकी इच्छा एकनिष्ठ थी, उनका एक निश्चित लक्ष्य था।
कुछ साल बाद, एडविन
सी. बार्न्स एक बार फिर एडिसन के सामने खड़े थे, उसी ऑफ़िस में जहाँ वे एडिसन से पहली
बार मिले थे। इस बार उनकी प्रबल इच्छा हक़ीक़त में बदल चुकी थी। वे एडिसन के साथ मिलकर
बिज़नेस कर रहे थे। उनके जीवन का सबसे बड़ा और प्रबल सपना सच हो चुका था।
बार्न्स इसलिए सफल हुए
क्योंकि उन्होंने एक निश्चित लक्ष्य चुना, और उन्होंने उस लक्ष्य को हासिल करने में
अपनी सारी ऊर्जा, इच्छाशक्ति, प्रयास हर चीज़ झोंक दी।
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वह आदमी जिसने
पुल जला दिए
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जिस अवसर का वे इंतज़ार
कर रहे थे, उसे आने में पाँच साल लग गए। बार्न्स के सिवाय हर आदमी को यह लगता था कि
वे एडिसन के बिज़नेस में एक छोटी सी कील की तरह थे। परंतु अपने मन में वे हर पल खुद
को एडिसन का पार्टनर ही समझते थे उसी दिन से जब उन्होंने वहाँ पहली बार काम करना शुरू
किया।
यह एकनिष्ठ इच्छा की
शक्ति का उल्लेखनीय उदाहरण है। बार्स को अपना लक्ष्य हासिल करने में इसलिए सफलता मिली,
क्योंकि वे किसी भी चीज़ से अधिक प्रबलता से एडिसन का बिज़नेस पार्टनर बनना चाहते थे।
उन्होंने उस लक्ष्य को प्राप्त करने की योजना बनाई। और उन्होंने अपने पीछे के सारे
पुल जला दिए। वे अपनी प्रबल इच्छा के साथ तब तक पूरे हौसले से डटे रहे जब तक कि उनकी
ज़िंदगी की सबसे बड़ी धुन आख़िरकार हक़ीक़त में नहीं बदल गई।
जब वे ऑरेंज गए, तो
उन्होंने अपने आप से यह नहीं कहा, "मैं कोशिश करके देखूँगा कि एडिसन मुझे अपने
यहाँ किसी तरह का काम दे दें।" इसके बजाय उन्होंने कहा, "मैं एडिसन से मिलूँगा
और उन्हें बता दूँगा कि मैं उनके साथ बिज़नेस करना चाहता हूँ।"
उन्होंने यह नहीं कहा,
"मान लो मैं एडिसन की कंपनी में अपना लक्ष्य प्राप्त करने में असफल हो जाता हूँ
तो मैं किसी दूसरे अवसर के लिए आँखें खुली रखूँगा।" इसके बजाय उन्होंने कहा,
"मैं इस दुनिया. में सिर्फ एक चीज़ हासिल करने का संकल्प करता हूँ और वह चीज़
है थॉमस ए. एडिसन के साथ बिज़नेस पार्टनरशिप। मैं अपने पीछे के सारे पुल जला दूँगा
और अपने पूरे भविष्य को इस विश्वास पर दाँव पर लगा दूँगा कि मुझमें अपना लक्ष्य प्राप्त
करने की योग्यता हैं।"
उन्होंने अपने लिए पीछे
हटने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा। उनकी स्थिति करो या मरो वाली स्थिति थी। - बार्न्स
की सफलता की कहानी बस इतनी सी है।
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अमीरी की तरफ धकेलने
वाली प्रेरणा
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काफ़ी समय पहले एक महान
योद्धा के सामने एक ऐसी परिस्थिति आई जिसमें उसके लिए यह आवश्यक हो गया कि वह युद्ध
में अपनी सफलता सुनिश्चित कर ले। वह अपनी सेना को शक्तिशाली सेना के ख़िलाफ़ भेजने
वाला था और दुश्मन के सैनिकों की संख्या ज़्यादा थी। उसने अपने सैनिकों को जहाज़ों
में भरा, दुश्मन देश तक समुद्र का सफ़र किया, सिपाहियों और गोला-बारूद को उतारा और
फिर उन जहाज़ों को जलाने का आदेश दिया जो उन्हें वहाँ तक लाए थे। युद्ध के पहले अपने
सैनिकों को संबोधित करते हुए उसने कहा, "आप देख रहे हैं कि जहाज़ जला दिए गए हैं।
इसका मतलब है कि हम यहाँ से तब तक ज़िंदा नहीं लौट सकते, जब तक कि हम जीत न जाएँ। हमारे
पास कोई विकल्प नहीं है। या तो हम जीतेंगे या फिर हम मर जाएँगे !" - वे जीत गए।
हर वह आदमी जो किसी
काम में जीत हासिल करना चाहता है उसे अपने जहाज़ जलाने के लिए तैयार रहना चाहिए और
अपने पीछे हटने के सारे रास्ते बंद करने का इच्छुक रहना चाहिए। यही करके आप यह सुनिश्चित
कर सकते हैं कि आपके मस्तिष्क में जीतने की वह धधकती हुई प्रबल इच्छा बनी रहेगी जो
कि सफलता के लिए अनिवार्य है।
शिकागो के भयंकर अग्निकांड
के बाद व्यापारियों का एक समूह स्टेट स्ट्रीट पर खड़ा हुआ था और अपने स्टोर्स की राख
को देख रहा था। उन्होंने एक मीटिंग की जिसमें यह फ़ैसला करना था कि क्या वे अपने स्टोर
फिर से बनाएँगे या फिर शिकागो छोड़कर देश के किसी दूसरे संभावनापूर्ण राज्य में अपना
स्टोर बनाएँगे। एक व्यापारी को छोड़कर वे सभी एक ही निष्कर्ष पर पहुँचे शिकागो छोड़ने
में ही समझदारी है।
जिस व्यापारी ने रुके
रहने और फिर से स्टोर बनाने का फैसला किया था, उसने अपने पुराने स्टोर के अवशेषों की
तरफ उँगली दिखाते हुए कहा, "सज्जनो इसी जगह पर मैं दुनिया का महानतम स्टोर बनाऊँगा,
चाहे यह स्टोर कितनी ही बार क्यों न जल जाए।"
यह वाक्य एक सदी पहले
कहा गया था। स्टोर उसी जगह बना। यह आज भी वहाँ खड़ा है, और उस मानसिक अवस्था की शक्ति
का प्रत्यक्ष प्रमाण है जिसे प्रबल इच्छा कहा जाता है। मार्शल फील्ड के लिए आसान रास्ता
यह होता कि वे भी अपने साथी व्यापारियों की तरह मैदान छोड़कर यानी शहर छोड़कर चले गए
होते। जब रास्ता कठिन था और भविष्य अंधकारमय नज़र आ रहा था, तो बाक़ी लोगों ने अपना
रास्ता बदल लिया और वे उस तरफ़ चले गए जहाँ रास्ता आसान दिख रहा था।
मार्शल फ़ील्ड और उनके
साथी व्यापारियों के बीच के इस अंतर को अच्छी तरह से समझ लें क्योंकि यही वह अंतर है
जो सभी सफल लोगों और असफल लोगों के बीच में होता है।
हर वयस्क आदमी जो धन
का मतलब समझता है वह धन वाहता है। परंतु केवल चाहने भर से दौलत नहीं मिल जाती। दौलत
निश्चित रूप से आती है अगर दौलत हासिल करने की प्रबल इच्छा हो, ऐसी इच्छा जो दिलोदिमाग़
पर हावी हो जाए और स्थाई मानसिक अवस्था बन जाए, अगर दौलत हासिल करने की योजना बनाई
जाए या निश्चित तरीके खोजे जाएँ और अगर उन योजनाओं पर दृढ़ता और लमन से जुटे रहा जाए
और असफलता को पहचानने से इंकार कर दिया जाए।
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प्रबल इच्छा
को सोने में बदलने के छह तरीके
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अमीरी की प्रबल इच्छा
को हक़ीक़त में बदलने का एक तरीक़ा है। इस तरीके में छह निश्चित, प्रैक्टिकल क़दम हैं:
पहला : अपने दिमाग में
पैसे की वह निश्चित मात्रा सोच लें जिसे हासिल करने की आपकी प्रबल इच्छा है। केवल यही
कहना पर्याप्त नहीं है, "मैं ढेर सारा पैसा चाहता हूँ।" कोई निश्चित रकम
सोचें (इस निश्चित रकम के पीछे एक मनोवैज्ञानिक कारण है जिसे मैं बाद वाले अध्याय में
विस्तार से स्पष्ट करूँगा।)
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दूसरा : यह तय कर लें
कि जिस पैसे की आपमें प्रबल इच्छा है, उसके बदले में आप क्या देना चाहेंगे। (सच तो
यह है कि इस दुनिया में मुफ्त में कोई चीज़ हासिल नहीं होती।)
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तीसरा : एक निश्चित
तारीख तय कर लें जब तक आप अपनी इच्छित धनराशि प्राप्त कर लेंगे।
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चौथा : एक निश्चित योजना बना लें कि आप किस तरह अपनी
प्रबल इच्छा को सच बनाएँगे और फिर चाहे आप तैयार हों या न हो, एकदम काम में जुट जाएँ
और उस योजना को कार्यरूप में ले आएँ।
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पाँचवाँ : आप कितनी
रक़म हासिल करना चाहते हैं, उसकी समय-सीमा, आप उस धनराशि के बदले में क्या देना चाहते
हैं और वह योजना जिसके द्वारा आप इस धनराशि को हासिल करना चाहते हैं इन सबका स्पष्ट,
संक्षिप्त ब्यौरा लिख लें।
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छठा : अपने
लिखे हुए ब्यौरे को ज़ोर से दिन में दो बार पढ़ें, एक बार रात को सोने से पहले और एक
बार सुबह उठते ही। जब आप पढ़ें- तो यह अनुभव करें और विश्वास करें जैसे आपके पास उतना
पैसा अभी हाल मौजूद है।
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यह महत्वपूर्ण है कि
आप इन छह क़दमों में बताए गए निर्देशों का पालन करें। यह विशेष महत्वपूर्ण है कि आप
छठे क़दम के निर्देशों का अनुसरण करें। आप शिकायत कर सकते हैं कि आपके लिए यह विश्वास
करना असंभव है कि आपके पास उतना पैसा अभी हाल मौजूद है। यहाँ पर प्रबल इच्छा आपकी सहायता
करेगी। अगर आपमें सचमुच अमीर बनने की प्रबल इच्छा होगी और यह इच्छा एक दीवानगी बन जाएगी
तो आपको खुद को यह विश्वास दिलाने में ज़रा भी कठिनाई नहीं आएगी कि आप इसे हासिल कर
लेंगे। लक्ष्य है अमीरी की प्रबल इच्छा, और इसे हासिल करने के लिए इतना दृढ़ संकल्पित
होना कि आप खुद को यह विश्वास दिला सकें कि वह धनराशि अभी हाल आपके पास मौजूद है।
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क्या आप करोड़पति
होने की कल्पना कर सकते हैं?
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यह निर्देश सिर्फ़ किसी
अज्ञानी आदमी को ही प्रैक्टिकल नहीं लगेंगे क्योंकि वह मानव मस्तिष्क के कार्य करने
के सिद्धांतों के बारे में कुछ नहीं जानता। कुछ लोग इन छह क़दमों की ताक़त को पहचानने
में असफल रहते हैं। उन लोगों को यह जानना चाहिए कि यह जानकारी एन्ड्रयू कारनेगी से
हासिल की गई है जिन्होंने स्टील मिल में साधारण मज़दूर के रूप में अपना करियर शुरू
किया, परंतु अपनी छोटी शुरुआत के बावजूद इन सिद्धांतों की बदौलत उन्होंने 10 करोड़
डॉलर से अधिक की दौलत कमाई।
आपके लिए यह जानना भी
महत्वपूर्ण है कि थॉमस ए. एडिसन ने यहाँ सुझाए गए छह क़दमों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण
किया था और उन पर अपनी सहमति की मोहर लगाई थी। उनका तो यहाँ तक कहना था कि यह सिद्धांत
न सिर्फ़ दौलत कमाने के लिए अनिवार्य हैं, बल्कि किसी भी लक्ष्य को हासिल करने के लिए
अनिवार्य हैं।
इन सिद्धांतों में किसी
"कठिन मेहनत" की ज़रूरत नहीं होती। यह आपसे कोई बलिदान नहीं माँगते। वे यह
नहीं चाहते कि आप मूर्ख या अतिविश्वासी बन जाएँ। इन पर अमल करने के लिए यह कतई ज़रूरी
नहीं है कि आप उच्च शिक्षित हों। परंतु इन छह क़दमों को सफलतापूर्वक जीवन में उतारने
के लिए आपमें पर्याप्त कल्पनाशक्ति होना अनिवार्य है ताकि आप यह देख सकें और समझ सकें
कि अमीर बनना क़िस्मत या संयोग या अक्सर के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। हर इंसान को
यह समझ लेना चाहिए कि जिन लोगों ने ढेर सारी दौलत इकट्ठी की है उन्होंने दौलत पाने
से पहले काफ़ी सपने देखे हैं, आशाएँ संजोई हैं, प्रबल इच्छाओं और योजनाओं का सहारा
लिया है।
यहीं पर आप यह भी जान
लें कि आप ढेर सारी दौलत कभी नहीं कमा सकते. अगर आपमें अमीर बनने की प्रबल इच्छा नहीं
है और अगर आप वास्तव में यह विश्वास नहीं करते कि यह दौलत आपके पास होगी।
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महान सपनों
की शक्ति
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अमीरी की दौड़ में हमें
यह जानकर प्रोत्साहन मिलता है कि आज की तेज़ी से बदलती दुनिया में नए विचारों, काम
करने के नए तरीक़ों, नए लीडर्स, नए आविष्कारों, शिक्षण के नए तरीक़ों, मार्केटिंग की
नई तकनीकों, नई पुस्तकों, नए साहित्य, टेलीविज़न के लिए नए फीचर्स, फ़िल्मों के लिए
नए विचारों की काफ़ी माँग है। नई और बेहतर चीज़ों की इस माँग के पीछे एक ऐसा गुण है
जो जीतने के लिए अनिवार्य है और वह है निश्चित लक्ष्य यह जानना कि आप क्या चाहते हैं
और अपने लक्ष्य को हासिल करने की प्रबल इच्छा।
दौलत इकट्ठी करने की
प्रबल इच्छा के साथ हमें यह याद रखना होगा कि दुनिया के सच्चे लीडर्स हमेशा वही लोग
रहे हैं जिन्होंने छुपे हुए अवसरों की अदृश्य शक्तियों का दोहन किया है और उसका प्रैक्टिकल
प्रयोग किया है; जिन्होंने विचारों की शक्तियों को गगनचुंबी इमारतों, शहरों, फैक्ट्रियों,
हवाईजहाज़ों, वाहनों और सुख-सुविधाओं में बदला है।
अमीर बनने की योजना
बनाते समय आप सपने देखने वाले को तुच्छ न समझें, न ही आप किसी दूसरे आदमी की बातों
में आएँ जो आपको यह समझाना चाहता हो कि सपने देखना मूर्खता है। बदली हुई दुनिया में
महान सफलता हासिल करने के लिए आपको अतीत के सफल लोगों के सूत्रों पर चलना होगा, जिनके
सपनों ने मानव जाति को बहुत सी बहुमूल्य चीजें दी हैं, वे सूत्र जो हमारे देश की धमनियों
में रक्त की तरह प्रवाहित हो रहे हैं। यह सूत्र हैं- अवसर को पहचानना और अपनी प्रतिभा
को विकसित करके उसकी मार्केटिंग करना।
आप जो काम करना चाहते
हैं, अगर वह सही है और आप उसमें विश्वास करते हैं, तो फिर आगे बढ़िए और उस काम को कर
दीजिए! अपने सपने को सामने रखिए और इस बात की परवाह मत कीजिए कि आपकी अस्थाई असफलता
पर "लोग" क्या कहेंगे। "लोग शायद यह नहीं जानते कि हर असफलता के भीतर
उतनी ही बड़ी सफलता का बीज छुपा होता है।
थॉमस एडिसन ने एक ऐसे
बल्ब का सपना देखा जो बिजली से जले और उन्होंने अपने सपने को भौतिक स्वरूप देने का
काम शुरू कर दिया। वे दस हज़ार बार असफल हुए, परंतु वे अपने सपने को साकार करने में
जुटे रहे, जब तक कि वह सपना सच नहीं हो गया। प्रैक्टिकल स्वप्नदर्शी मैदान छोड़कर नहीं
भागते !
व्हेलन ने सिगार स्टोर्स
की चेन का सपना देखा और वे उसे साकार करने में जुट गए। आज युनाइटेड सिगार स्टोर्स के
पास अमेरिका के सर्वश्रेष्ठ नुक्कड़ हैं।
राइट बंधुओं ने एक ऐसी
मशीन का सपना देखा जो हवा में उड़ सके। आज हम दुनिया भर में प्रत्यक्ष प्रमाण देख सकते
हैं कि उनका सपना वास्तव में दमदार था।
मार्कोनी ने एक ऐसे
सिस्टम का सपना देखा जो वायु की अनजानी शक्तियों का दोहन करे। दुनिया के हर रेडियो
और टेलीविज़न सेट में हमें इस बात का प्रमाण मिल जाता है कि उनका सपना व्यर्थ नहीं
था। आपको यह जानकारी रोचक लगेगी कि जब मार्कोनी ने लोगों को बताया कि उन्होंने एक ऐसा
सिद्धांत खोजा है जिसके द्वारा वे बिना किसी तार की मदद के हवा में संदेश भेज सकते
हैं तो मार्कोनी के दोस्तों ने उन्हें हिरासत में लेकर "मनोवैज्ञानिक" अस्पताल
में उनका चेकअप करवाया। आज के स्वप्नदर्शी बेहतर स्थिति में हैं।
दुनिया में आज ऐसे प्रचुर
अवसर भरे पड़े हैं जो अतीत के स्वप्नदर्शियों को नसीब नहीं हुए थे।
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अपने सपनों
को किस तरह लॉन्चिंग पैड से ऊपर भेजें
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बनने और करने की प्रबल
इच्छा वह शुरुआती बिंदु है जहाँ से स्वप्नदर्शी को अपनी ऊपर की यात्रा शुरू करनी है।
महत्वाकांक्षा के अभाव, उदासीनता, या आलस से सपने पैदा नहीं होते।
याद रखें, जो लोग जीवन
में सफल हुए हैं उन्हें बुरी शुरुआत का अनुभव हुआ है और सफलता की मंजिल पर पहुँचने
से पहले उनकी राह में बहुत सी बाधाएँ आई हैं। सफल लोगों की ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट
आम तौर पर किसी संकट के समय आता है, जिस समय उन्हें अपने "दूसरे व्यक्तित्व"
(अदर सेल्व्स) का पता चलता है।
जॉन बनयन ने अँग्रेज़ी
साहित्य की अमर पुस्तक द पिलग्रिम्स प्रोग्रेस तब लिखी जब वे अपने धार्मिक विचारों
की वजह से जेल में क़ैद थे।
ओ. हैनरी ने अपने मस्तिष्क
में सोई हुई अपनी प्रतिभा को तब जाना जब उन पर दुर्भाग्य का पहाड़ टूटा और उन्हें ओहियो
में कैदखाने में डाल दिया गया। दुर्भाग्य के कारण ही उन्हें अपने "दूसरे व्यक्तित्व"
से परिचित होने के लिए विवश होना पड़ा और अपनी कल्पनाशीलता के प्रयोग द्वारा उन्होंने
यह पाया कि वे दुखी अपराधी और असम्मानित व्यक्ति के बजाय महान लेखक बन सकते हैं।
चार्ल्स डिकेन्स शुरू
में बोतलों पर लेबल चिपकाने का काम करते थे। पहले प्रेम की असफलता ने उनकी आत्मा की
गहराइयों को भेद दिया और उन्हें विश्व के महानतम लेखकों की श्रेणी में ला खड़ा किया।
इस त्रासदी की वजह से पहले तो डेविड कॉपरफ़ील्ड लिखा गया और इसके बाद कई अन्य उपन्यास
लिखे गए जिन्होंने पाठकों के जीवन को बेहतर और समृद्ध बनाया।
हेलन केलर जन्म के कुछ
ही समय बाद बहरी, गूँगी और अंधी हो गईं। अपने महानतम दुर्भाग्य के वावजूद उन्होंने
इतिहास के महानतम लोगों में अपना नाम दर्ज करवाया। उनका पूरा जीवन इस बात का गवाह है
कि कोई भी व्यक्ति तब तक नहीं हारता जब तक कि वह अपनी हार को सच के रूप में स्वीकार
नहीं करता।
रॉबर्ट बर्न्स एक अशिक्षित
देहाती युवक थे। वे गरीबी का जीवन जीने के लिए अभिशप्त थे। इसी कारण वे शराबी बने।
परंतु उनके कारण आज दुनिया पहले से बेहतर है क्योंकि उन्होंने अपने विचारों को कविता
में बदल दिया और कौटे उखाड़कर उनकी जगह पर एक गुलाब रख दिया.
बीथोवन बहरे थे, मिल्टन
अंधे थे, परंतु उनके नाम अमर हैं क्योंकि उन्होंने सपने देखे और उन सपनों को क्रमबद्ध
विचारों में बदला।
किसी चीज़ की चाह रखने
और उसके लिए तैयार रहने में फर्क होता है। कोई भी व्यक्ति किसी चीज़ को प्राप्त करने
के लिए तब तक तैयार नहीं होता जब तक कि उसे वह हासिल करने का विश्वास न हो। यह मानसिक
अवस्था कामना या आशा की नहीं, बल्कि विश्वास की मानसिक अवस्था होती है। विश्वास के
लिए आपको अपने मस्तिष्क को खुला रखना होगा। बंद मस्तिष्क में न तो आस्था होती है, न
ही साहस और विश्वास।
याद रखें, जीवन में
अपने लक्ष्य को ऊँचा रखने के लिए, अमीरी और समृद्धि का लक्ष्य बनाने के लिए आपको गरीबी
और दुख के लक्ष्य बनाने की तुलना में ज़्यादा प्रयास नहीं करना है। एक महान कवि ने
इस शाश्वत सत्य को इन पंक्तियों में बखूबी समझाया है :
"मैंने ज़िंदगी
से चवन्नी का सौदा किया, और ज़िंदगी ने मुझे इससे ज़्यादा नहीं दिया, हालाँकि जब शाम
को मैंने अपनी मज़दूरी गिनी तो मैंने और ज़्यादा पैसे माँगे।
"ज़िंदगी एक न्यायप्रिय
मालिक है,
यह आपको उतना ही देती
है जितना आप माँगते हैं, परंतु एक बार आप अपनी मज़दूरी तय कर लेते हैं, तो फिर आपको
उतने पर ही काम करना पड़ता है।
"मैं एक मज़दूर
की तनख्वाह पर काम करता रहा, मैंने यही सीखा, और सोचकर निराश हुआ कि मैं ज़िंदगी से
जो भी तनख्वाह माँगता - जिंदगी मुझे खुशी-खुशी वही दे देती।"
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इच्छा प्रकृति
को हरा सकती है
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इस अध्याय के अंत में
मैं एक असाधारण व्यक्ति की कहानी सुनाना चाहूँगा। मैंने उसके पैदा होने के कुछ मिनटों
बाद उसे पहली बार देखा। जब वह इस संसार में आया तो उसके कान नहीं थे और जब डॉक्टरों
से ज़ोर देकर पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह बच्चा जीवन भर बारा और गूँगा रहेगा।
मैंने डॉक्टर की राय
को चुनौती दी। मुझे ऐसा करने का अधिकार था। मैं बच्चे का पिता था। मैं भी एक निर्णय
पर पहुँचा और मैंने भी अपनी राय दी, परंतु मैंने अपनी राय को अपने दिमाग़ में ही सोचा,
इसे अपने दिल तक ही रखा।
अपने दिल में मैं जानता
था कि मेरा पुत्र सुनेगा भी और बोलेगा भी। किस तरह ? मुझे विश्वास था कि कोई न कोई
तरीक़ा तो होगा और मैं जानता था कि मैं वह तरीक़ा ढूँढ़ लूँगा। मैंने अमर इमर्सन के
इन शब्दों को याद किया, "सारी की सारी दुनिया हमें आस्था सिखाती है। हमें सिर्फ़
आज्ञा भर माननी है। हममें से हर एक के लिए मार्गदर्शन उपलब्ध है और केवल सुनने भर से
हम सही शब्द सुन सकेंगे।"
सही शब्द ? प्रबल इच्छा
! यह इच्छा उस समय मेरे मन में किसी भी अन्य भावना से अधिक प्रबल थी कि मेरा पुत्र
बहरा और गूँगा नहीं होना चाहिए। उस इच्छा से मैं ज़रा भी पीछे नहीं हटा, एक सेकंड के
लिए भी नहीं।
मैं इस बारे में क्या
कर सकता था ? किसी तरह मैंने एक ऐसा रास्ता खोज लिया जिससे मैं अपने बच्चे के मस्तिष्क
में वही प्रबल इच्छा भर दूँ जो मेरे मस्तिष्क में थी इस बात की प्रबल इच्छा कि वह बिना
कानों के भी सुनने के तरीके खोजने में जुटा रहे।
जैसे ही बच्चा इतना
बड़ा हुआ कि वह मेरे साथ सहयोग कर सके में पूरी तरह सुनने की प्रबल इच्छा को उसके दिमाग़
में भरने लगा। मैंने उसे यकीन दिलाया कि प्रकृति उसकी इस प्रबल इच्छा को शारीरिक यथार्थ
में बदल देगी।
यह सारा चिंतन मेरे
अपने मस्तिष्क में चलता रहा, परंतु मैंने किसी को भी यह बात नहीं बताई। हर दिन मैं
खुद से किए गए वादे को दोहराता रहा कि मेरा पुत्र बहरा और गूँगा नहीं रहना चाहिए।
जब वह बड़ा हुआ और अपने
आस-पास की चीज़ों को देखने लगा तो हमने पाया कि उसमें सुनने की थोड़ी शक्ति तो थी।
जब वह उस उम्र में पहुँचा जब बच्चे आम तौर पर बोलना शुरू करते हैं, तो उसने बोलने की
कोई कोशिश नहीं की, परंतु उसकी हरकतों से हम समझ जाते थे कि वह कुछ आवाज़ों को थोड़ा-बहुत
सुन सकता था। मैं इतना ही तो जानना चाहता था। मुझे विश्वास था कि अगर वह ज़रा सा भी
सुन सकता था, तो उसकी सुनने की क्षमता बढ़ाई जा सकती है। फिर ऐसा कुछ हुआ जिससे मुझे
आशा बँधी। यह एक अनपेक्षित संयोग था।
----------
एक
"दुर्घटना" जिसने जीवन बदल दिया
----------
हम एक रिकॉर्ड प्लेयर
लाए। जब बच्चे ने इसका संगीत पहली बार सुना, तो वह तो खुशी के मारे पागल हो गया और
उसने उस मशीन पर क़ब्ज़ा कर लिया। एक बार वह रिकॉर्ड प्लेयर के सामने खड़े होकर उसी
रिकॉर्ड को दो घंटे तक सुनता रहा, और उसके दाँत उस मशीन के किनारे पर जकड़े हुए थे।
उसकी इस आदत का महत्व हमें कई वर्षों तक समझ में नहीं आया, जब तक कि हमें ध्वनि के
"बोन कंडक्शन" के सिद्धांत के बारे में पता नहीं चला।
रिकॉर्ड प्लेयर पर उसके
क़ब्ज़े के कुछ समय बाद मुझे पता चला कि अगर मैं उसके सिर के नीचे की तरफ़ वाली हड्डी
पर अपने होंठ लगाकर कुछ बोलूँ तो वह मेरी बातों को साफ़-साफ़ सुन सकता है।
यह पता चलने के बाद
कि वह मेरी आवाज़ को साफ़ सुन सकता है मैंने तत्काल उसके मस्तिष्क में सुनने और बोलने
की इच्छा को भरना शुरू कर दिया। मुझे जल्दी ही यह जानकारी मिली कि बच्चे को बेडटाइम
कहानियों में मज़ा आता है इसलिए मैंने ऐसी कहानियाँ लिखीं जो उसे स्वावलंबन, कल्पनाशक्ति
और सुनने तथा सामान्य बनने की तीव्र इच्छा विकसित करने का संदेश दे सकें।
खास तौर पर मैंने एक
कहानी पर जोर दिया जिसे मैं उसे बार-बार नए और नाटकीय अंदाज में बदल-बदलकर सुनाता रहा।
मैं इस कहानी के द्वारा उसके मस्तिष्क में यह विचार-बीज बोना चाहता था कि उसकी शारीरिक
स्थिति दर्भाग्य नहीं है, बल्कि एक छुपा हुआ बहुमूल्य सौभाग्य है। हालाँकि फिलॉसफी
ने मुझे सिखाया है कि हर दुर्भाग्य अपने साथ उतने ही बड़े सौभाग्य का बीज लेकर आता
है, परंतु सच कहूँ तो मुझे ज़रा भी एहसास नहीं था कि यह दुर्भाग्य किस तरह का सौभाग्य
बन सकता है।
---------
उसने छह सेंट
में एक नई दुनिया जीत ली !
---------
जब मैं पिछली बातें
याद करता हूँ तो मैं अब यह देख सकता हूँ कि चूँकि मेरे पुत्र को मुझ पर विश्वास था
इसलिए उसे इतने चमत्कारी परिणाम मिले। उसने बिना सवाल पूछे मेरी हर बात मानी। मैंने
उसके दिमाग में यह विचार बिठा दिया कि वह अपने बड़े भाई से ज़्यादा लाभप्रद स्थिति
में है और उसे कई तरीक़ों से लाभ मिलेगा। उदाहरण के तौर पर स्कूल में टीचर जब देखेंगे
कि उसके कान नहीं हैं, तो इस वजह से वे उसकी तरफ़ अधिक ध्यान देंगे और उसके साथ असाधारण
दयालुता से पेश आएँगे। और सचमुच टीचर्स ने ऐसा ही किया। मैंने उसके दिमाग में यह विचार
भी बिठा दिया कि जब वह पेपर बेचने लायक बड़ा हो जाएगा (उसका बड़ा भाई पहले से ही पेपर
बेचता था) तो उसे अपने भाई की तुलना में अधिक लाभ होगा, क्योंकि लोग उसके सामान के
अधिक पैसे देंगे। जब लोग देखेंगे कि कान न होने के बावजूद वह इतना मेहनती और समझदार
बच्चा है तो वे उसके साथ अतिरिक्त सहानुभूति रखेंगे।
जब वह सात साल का हुआ,
तो उसने पहली बार इस बात का प्रमाण दिया कि उसके दिमाग़ में मेरे बोए गए बीज अब फल
देने लगे हैं। कई महीनों तक उसने अख़बार बेचने की इच्छा ज़ाहिर की, परंतु उसकी माँ
इस बात के लिए तैयार नहीं हुई और उन्होंने उसे यह काम करने की अनुमति नहीं दी।
आखिरकार उसने इस मामले
को अपने हाथ में ले लिया। एक दोपहर जब वह घर में अकेला था, यानी नौकरों के सिवा वहाँ
कोई नहीं था, तो वह किचन की खिड़की से बाहर निकला, ज़मीन पर कूदा और बाहर की तरफ़ चल
पड़ा। उसने पड़ोस के जूते बनाने वाले से छह सेंट की पूँजी उधार ली, अख़बार ख़रीदने
में इस पूँजी का निवेश किया, अखबार बेचे, फिर से निवेश किया और देर शाम तक वह इसी तरह
बार-बार निवेश करता रहा और अखबार बेचता रहा। आख़िर अपने बहीखाते को सही करने के बाद
और अपने बैंकर से लिए छह सेंट के उधार को वापस करने के बाद उसने अपना मुनाफ़ा गिना-
बयालीस सेंट। जब हम रात को घर लौटे, तो हमने देखा कि वह अपने बिस्तर पर गहरी नींद में
सो रहा है और बयालीस सेंट उसकी मुट्ठी में जकड़े हुए हैं।
उसकी माँ ने उसकी मुट्ठी
खोली, सिक्के निकाले और रो पड़ी। यह भी होना था। अपने पुत्र की पहली सफलता पर रोना
तो उचित नहीं था। मेरी प्रतिक्रिया बिलकुल विपरीत थी। मैं खुलकर हँसा, क्योंकि मैं
जानता था कि अपने बच्चे के दिमाग़ में मैंने आत्मविश्वास का रवैया विकसित करने का जो
प्रयास किया था मैं उसमें सफल हुआ था।
उसकी माँ ने उसके पहले
व्यावसायिक अभियान में यह देखा कि एक बहरा सा बच्चा सड़कों पर जाकर पैसे कमाने के लिए
अपनी जान जोखिम में डाल रहा था। मैंने उसमें एक बहादुर, महत्वाकांक्षी, आत्मविश्वासी
छोटे बिज़नेसमैन को देखा जिसका खुद में विश्वास सौ फ़ीसदी बढ़ गया था क्योंकि वह अपनी
मर्जी से बिज़नेस में गया था और उसने सफलता हासिल की थी। इस सौदे से मुझे खुशी हुई
क्योंकि इससे मैं जान गया कि उसने अब अपने आत्मविश्वास और सफलता का वह प्रमाण दे दिया
था जो जीवन भर उसका साथ देगा।
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छोटा बहरा
बच्चा जो सुनने लगा
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छोटा बहरा बच्चा स्कूल
पास कर गया, और बिना अपने टीचर्स के लेक्चर सुने कॉलेज भी पास कर गया। वह अपने टीचर्स
की बात तभी सुन पाता था जब वे पास में खड़े होकर जोर से चिल्लाते थे। वह मूक-बधिर बच्चों
के स्कूल में पढ़ने नहीं गया। हमने उसे इस बात की इजाजत नहीं दी कि वह इशारों की भाषा
सीखे। हमने संकल्प कर लिया था कि वह एक सामान्य जीवन जिएगा और सामान्य बच्चों के साथ
रहेगा। और हम इस फ़ैसले पर डटे रहे, हालाँकि कई बार स्कूल के अधिकारियों से इस बारे
में हमारी काफ़ी बहस हुई।
जब वह हाई स्कूल में
था, तो हमने विजली से चलने वाले एक हियरिंग एड को आज़माकर देखा, परंतु उससे जरा भी
फायदा नहीं हुआ।
कॉलेज में उसके आखिरी
सप्ताह के दौरान एक ऐसी घटना हुई जो उसके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण टर्निंग पॉइंट साबित
हुई। यह संयोग ही था कि उसे बिजली का एक और हियरिंग एड मिल गया, जो उसे बतौर ट्रायल
भेजा गया था। वह अनमने ढंग से इसका परीक्षण करने के लिए तैयार हुआ, क्योंकि हियरिंग
एड के मामले में वह पहले भी एक बार निराश हो चुका था। आख़िरकार उसने उस यंत्र को उठाया
और लापरवाही से अपने सिर पर जमा लिया, बैटरी को चालू किया और लो, जादू के एक झटके से
वह सुनने लगा। ज़िंदगी भर से उसने आम लोगों की तरह सुनने का जो सपना देखा था वह सच
हो गया। जीवन में पहली बार वह उतनी ही स्पष्टता से सुन पा रहा था जिस तरह से आम लोग
सुनते हैं।
अपने हियरिंग एड की
सफलता से अभिभूत होकर और अपनी बदली हुई दुनिया की खुशी का इज़हार करने के लिए उसने
फ़ोन पर अपनी माँ से बात की और उसे उनकी आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी। अगले दिन उसने
क्लास में अपने प्रोफ़ेसरों की आवाज़ को भी साफ़ सुना और ऐसा ज़िंदगी में पहली बार
हुआ था। पहली बार वह दूसरे लोगों के साथ बिना किसी बाधा के बातचीत कर सकता था और उसे
कोई बात सुनाने के लिए दूसरों को ज़ोर से बोलने की अब कोई ज़रूरत नहीं रह गई थी। सचमुच,
उसकी दुनिया बदल चुकी थी।
प्रबल इच्छा ने फल देना
शुरू कर दिया था, परंतु जीत अभी पूरी नहीं हुई थी। बच्चे को अब भी एक निश्चित और प्रैक्टिकल
तरीका ढूँढ़ना था जिसके सहारे वह अपनी कमज़ोरी को ताक़त में बदल सके।
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विचार जो
चमत्कार करता है
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हालाँकि उसे इस बात
का एहसास नहीं था कि जो हासिल हुआ था वह कितना महत्वपूर्ण था, परंतु आवाज़ की दुनिया
में पहली बार क़दम रखते हुए उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था और उसने उस हियरिंग एड बनाने
वाली कंपनी के निर्माता को एक पत्र लिखा जिसमें उसने पूरे उत्साह से अपना अनुभव बताया।
उस पत्र में ऐसा कुछ था जिसकी बजह से कंपनी ने उसे न्यूयॉर्क आने का आमंत्रण दिया।
जब वह वहाँ पहुँचा तो उसे फ़ैक्ट्री में ले जाया गया और चीफ़ इंजीनियर को अपना अनुभव
बताते समय उसके दिमाग में एक कल्पना, एक विचार, एक प्रेरणा - आप इसे चाहे किसी भी नाम
से पुकार लें कौंध गई। इसी विचार के आवेग ने उसकी कमज़ोरी को ताक़त में, उसके कष्ट
को संपत्ति में बदल दिया और इसी की वजह से हज़ारों लोगों के जीवन में सुख की रोशनी
फैल गई।
इस विचार के आवेग का
साराश यह था उसने सोचा कि अगर वह बिना हियरिंग एड वाले लाखों बहरे लोगों तक अपनी बदली
हुई दुनिया की कहानी पहुँचा सके तो वह उनकी मदद कर सकता है।
एक महीने तक उसने गहन
शोध किया, जिस दौरान उसने हियरिंग एड के निर्माता के पूरे मार्केटिंग सिस्टम का विश्लेषण
किया। उसने ऐसे तरीके खोजे जिनके द्वारा वह बहरे लोगों तक अपना संदेश पहुँचा सके। जब
यह हो गया, तो उसने दो साल की योजना कागज़ पर बनाई, जो उसके विश्लेषण के परिणामों पर
आधारित थी। जब उसने कंपनी के सामने अपनी योजना प्रस्तुत की तो उसे तत्काल नौकरी दे
दी गई ताकि वह अपनी महत्वाकांक्षा को सच साबित कर सके।
जब उसने यह काम शुरू
किया तो उसने सपने में भी यह नहीं सोचा था कि वह हज़ारों बहरे लोगों के जीवन को आशा
और सहत से भर देगा जो उसकी मदद के बिना हमेशा बहरे बने रहने के लिए अभिशप्त रहते।
मन में कोई संदेह नहीं
है कि ब्लेयर पूरे जीवन बहरा और गूँगा ही बना रहता अगर उसकी माँ और मैंने उसके मस्तिष्क
को उस तरह के साँचे में नहीं ढाला होता।
जब मैंने उसके मन में
प्रबल इच्छा का यह बीज बोया कि वह आम आदमी की तरह सुन और बोल सके, तो उस बीज के साथ
एक ऐसा विचार भी गया। इसी विचार के कारण प्रकृति को एक पुल बनाना पड़ा और उसके मस्तिष्क
तथा बाहरी दुनिया के बीच की मौन की खाई को पाटना पड़ा।
सच है! प्रबल इच्छा
भौतिक रूप में आने के तरीके खोज ही लेती है। ब्लेयर ने यह इच्छा की कि सामान्य लोगों
की तरह सुनने की शक्ति उसके पास हो और अब यह शक्ति उसके पास है। वह एक कमी के साथ पैदा
हुआ था और उसे बड़ी आसानी से सड़क पर कुछ पेन्सिलों और एक टिन के डिब्बे के साथ भेजा
जा सकता था।
मैंने उसके बचपन में
उसके दिमाग में जो छोटा "सफ़ेद झूठ" डाल दिया था कि उसकी कमी दरअसल उसका
सबसे बड़ा लाभ है, कि वह उसके कारण सफल हो सकता है, अब सच साबित हो गया था। सचमुच ऐसा
कुछ भी नहीं है, चाहे वह सही हो या गलत, जिसे आस्था और प्रबल इच्छा मिलकर हक़ीक़त में
नहीं बदल सकते। यह गुण हर इंसान को मुफ्त में मिलते हैं।
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"मानसिक
केमिस्ट्री" जादू की तरह काम करती है
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मैडम शुमैन-हेंक नामक
सफल गायिका के बारे में छपी एक ख़बर से हमें यह पता चलता है कि वे इतनी सफल क्यों हुईं।
मैं उस पैरेग्राफ़ को पूरा कोट (कोट) कर देता हूँ, क्योंकि इसमें जो राज़ की बात है
वह है इच्छा, प्रबल इच्छा।
अपने करियर की शुरुआत
में मैडम शुमैन-हॅक वियेना कोर्ट ऑपेरा के डायरेक्टर से मिलने गईं और उन्होंने अपनी
आवाज़ का परीक्षण करवाना चाहा। परंतु उन्होंने ऐसा करने से इंकार कर दिया। उन्होंने
एक बार उस अजीब सी दिखने वाली और सस्ते कपड़े बहनने वाली लडकी की तरफ देखा और फिर रूखेपन
से कहा, "इस तरह के चेहरे और इस तरह के हलिए से तुम ऑपेरा में सफलता की बात सोच
भी कैसे सकती हो? देखो, बच्ची, सपने देखना छोड़ दो। एक सिलाई मशीन खरीदो और काम में
जुट जाओ। तुम कभी गायिका नहीं बन सकतीं।"
कभी नहीं एक बहुत लंबा
वक़्त होता है। वियेना कोर्ट ऑपेरा का डायरेक्टर गायन की तकनीक के बारे में बहुत कुछ
जानता था। परंतु वह इच्छा की शक्ति के बारे में बहुत कम जानता था, जो हद से बढ़ जाने
पर जुनून में बदल सकती है। अगर वह इस शक्ति के बारे में जानता होता, तो वह बिना अवसर
दिए प्रतिभा को ठुकराने की गलती कभी नहीं करता।
कुछ साल पहले, मेरा
एक बिज़नेस सहयोगी बीमार हो गया। उसकी हालत दिनोंदिन बिगड़ती गई और आख़िरकार उसे ऑपरेशन
के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा। डॉक्टर ने मुझे चेतावनी दी कि उसके ज़िंदा बचने के आसार
बहुत कम हैं। परंतु यह डॉक्टरों का विचार था। यह मरीज़ का विचार नहीं था। जब उसे ऑपरेशन
थिएटर में ले जाया जा रहा था, तो उसने धीमे से मुझसे कहा, "चिंता मत करो, चीफ़,
मैं कुछ ही दिनों में अस्पताल से बाहर आ जाऊँगा।" नर्स ने मेरी तरफ़ दयाभाव से
देखा। परंतु मरीज़ सही-सलामत वापस लौट आया। जब सब कुछ ठीक-ठाक हो गया, तो उसके डॉक्टर
ने कहा, "उसके जीवित बचने का एक ही कारण है- जीवित रहने की उसकी प्रबल इच्छा।
अगर उसने मौत की संभावना को पूरी तरह अस्वीकार न कर दिया होता तो आज वह ज़िंदा नहीं
होता।"
मैं आस्था के साथ-साथ
इच्छा की शक्ति में विश्वास करता हूँ क्योंकि मैंने देखा है कि यह शक्ति लोगों को गरीबी
की घाटी से. सत्ता और संपत्ति की चोटी तक ऊपर उठा देती है। मैंने देखा है कि यह शक्ति
क़ब्र से उसके मुर्दे चुरा लेती है, यानी कि यह लोगों को मरने नहीं देती। मैंने देखा
है कि इसी शक्ति के कारण लोग सैकड़ों तरीकों से असफल होने के बावजूद आखिरकार सफल हो
जाते हैं। मैंने देखा हैं कि इसी शक्ति के कारण मेरा पुत्र आज सामान्य, सुखद और सफल
ज़िंदगी जी रहा है, हालाँकि प्रकृति ने उसे इस दुनिया में विना कानों के भेजा था।
इंसान किस तरह इच्छा
की शक्ति का दोहन कर सकता है, किस तरह इसका प्रयोग कर सकता है? इसका जवाब इस पुस्तक
के आगे आने वाले अध्यायों में दिया गया है।
यह क्यों होता है यह
तो हम नहीं जानते, परंतु "मानसिक केमिस्ट्री" के किसी अजीब और सशक्त सिद्धांत
के द्वारा प्रकृति प्रबल इच्छा के आवेग में ऐसा कुछ भर देती है जिसके कारण इंसान असफलता
शब्द को पहचानने से इंकार कर देता है और इसी कारण वह कभी असफल नहीं होता।
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मस्तिष्क
की कोई सीमाएँ नहीं हैं, सिवाय उनके जिन्हें हम मान लेते हैं।
ग़रीबी
और अमीरी दोनों ही विचार की संतानें हैं।
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और दोस्तो ये था आज
का चैपटर -
और अब मिलते हैं अगले नए चैपटर के साथ, नई विडियों में,
आप हमेशा खुश रहें, आबाद रहें, स्वस्थ रहें,
और आपका धन्यावाद, नमस्कार, जय हिन्द, जय भारत
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Reviewed by Shiv Rana RCM
on
मई 23, 2026
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