विचार ही वस्तु हैं --- सोचिये और अमीर बनिये - Think and Grow Rich - By - Napoleon Hill- की ऑडियो बुक
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विचार ही
वस्तु हैं --- सोचिये
और अमीर बनिये - Think and Grow Rich - By -
Napoleon Hill- की ऑडियो बुक
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Hindi translation of the international bestseller Think and Grow
Rich - की ऑडियो बुक- #Audio #Book
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सोचिये और अमीर बनिये - नेपोलियन हिल - "थिंक एंड ग्रो रिच" का
हिंदी अनुवाद
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By : नेपोलियन हिल
- Writer : NAPOLEON HILL
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विचार ही
वस्तु हैं
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वह आदमी जिसने
थॉमस ए. एडिसन का पार्टनर बनने का तरीक़ा "सोचा"
सच है है
कि "विचार ही वस्तु हैं" और वे बेहद शक्तिशाली वस्तु यहै, जब उनके साथ निश्चित
स्वस्य और बेहद अक्तिशाली दौलत या किसी दूसरी भौतिक वस्तु को हासिल करने की प्रबल इच्छा
जुड़ी हुई हो।
कुछ साल पहले,
एडविन सी. बार्स ने इस सच्चाई को जाना कि लोग दरअसल सोचकर अमीर बन सकते हैं। परंतु
उन्होंने इस सत्य को एक ही बैठक में नहीं जान लिया। यह उनकी समझ में धीरे-धीरे आया
और इसकी शुरुआत हुई महान एडिसन के साथ पार्टनरशिप करने की उनकी प्रबल इच्छा से।
बार्स की
इच्छा की ख़ासियत यह थी कि यह निश्चित थी। वे एडिसन के साथ काम करना चाहते थे, उनके
लिए काम नहीं करना चाहते थे। वे किस तरह अपनी इच्छा को हक़ीक़त में बदलते हैं इस विवरण
को ध्यान से पढ़ें। तभी आप उन सिद्धांतों को बेहतर तरीके से समझ पाएँगे जिनसे दौलत
हासिल होती है।
जब यह इच्छा
या विचार उनके दिमाग़ में पहली बार कौंधर तो वे इस स्थिति में नहीं थे कि इस पर अमल
कर सकें। उनकी राह में दो बाधाएँ थीं। पहली यह कि वे एडिसन को नहीं जानते थे। और दूसरी
यह कि उसके पास ऑरेंज, न्यू जर्सी जाने के लिए रेल के किराए तक के पैसे नहीं थे।
यह बाधाएँ
ज़्यादातर लोगों का हौसला पस्त कर देतीं और वे अपनी इच्छा को हक़ीक़त में बदलने की
कोई कोशिश ही नहीं करते। परंतु इस आदमी की इच्छा कोई साधारण इच्छा नहीं थी।
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आविष्कारक और "फुटपाथिया"
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वह एक दिन
मिस्टर एडिसन की प्रयोगशाला में पहुँच गया और उसने यह घोषणा की कि वह उस महान आविष्कारक
का बिज़नेस पार्टनर बनने के लिए आया है। बार्स और एडिसन के बीच हुई इस पहली मुलाक़ात
के बारे में बोलते हुए वर्षों बाद एडिसन ने कहा, "वह एक साधारण फुटपाथिए की तरह
मेरे सामने खड़ा था, परंतु उसके चेहरे पर ऐसा कोई भाव था, जिससे यह दिखता था कि वह
जो पाना चाहता है, उसने उसे हासिल करने का दृढ़ निश्चय कर रखा है। लोगों के साथ वर्षों
के अनुभव से मैंने सीखा है कि जब कोई व्यक्ति किसी चीज़ को इतनी बुरी तरह पाना चाहता
है कि वह उसे पाने के लिए अपना पूरा भविष्य ज़िंदगी के एक ही पाँसे पर दाँव पर लगा
दे तो उस व्यक्ति की जीत तय है। मैंने उसे उसका मनचाहा अवसर इसलिए दिया क्योंकि मैं
देख सकता था कि उसने यह तय कर लिया है कि वह तब तक जुटा रहेगा जब तक कि वह सफल न हो
जाए। बाद की घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि मैंने कोई गलती नहीं की।"
उस युवक के
हुलिए से एडिसन प्रभावित नहीं हुए थे, क्योंकि उसका हुलिया बहुत ही ख़राब था। फ़र्क़
उसकी सोच से पड़ा।
बार्न्स को
पहली ही मुलाक़ात में एडिसन ने अपना पार्टनर नहीं बना लिया। परंतु उन्हें एडिसन के
ऑफ़िस में बहुत कम तनख्वाह पर काम करने का अवसर मिला।
महीने गुज़रते
गए। बार्स ने अपने दिमाग में जो निश्चित महान लक्ष्य बनाया था, उस बहुमूल्य लक्ष्य
तक पहुँचाने वाली कोई घटना नहीं हुई। परंतु बार्न्स के मस्तिष्क में महत्वपूर्ण बदलाव
हुए। वे अपनी इस इच्छा को लगातार और अधिक प्रबल करते जा रहे थे कि एक दिन वे एडिसन
के बिज़नेस पार्टनर बनकर दिखाएँगे।
मनोवैज्ञानिक
सही कहते हैं, "जब कोई व्यक्ति किसी चीज़ के लिए सचमुच तैयार होता है, तो वह चीज़
आ जाती है।" बार्न्स एडिसन का बिज़नेस पार्टनर बनने के लिए तैयार थे, इससे भी
बड़ी बात यह कि उन्होंने तब तक तैयार बने रहने का संकल्प कर लिया था जब तक कि उन्हें
अपनी मनचाही चीज़ हासिल न हो जाए।
उन्होंने
खुद से यह नहीं कहा, "अरे, इससे क्या फ़ायदा होगा ? बेहतर यह होगा कि मैं अपना
लक्ष्य बदल लूँ और सेल्समैन का काम आज़माकर देखूँ।" इसके बजाय उन्होंने कहा,
"मैं यहाँ एडिसन के साथ बिज़नेस शुरू करने के लिए आया हूँ और मैं इस लक्ष्य को
हासिल करके ही रहूँगा चाहे मुझे इसमें अपनी सारी ज़िंदगी ही क्यों न लगानी पड़े।"
वे पूरी तरह गंभीर थे। अगर लोग अपने लक्ष्य को निश्चित कर लें और एकाग्रता व संपूर्ण
समर्पण से उसे प्राप्त करने में जुट जाएँ, तो लोगों की क़िस्मत बदल सकती है।
शायद युवा
बार्न्स को उस समय यह पता न हो, परंतु इकलौती इच्छा को प्राप्त करने की उनकी लगन और
उनका दृढ़ संकल्प उन्हें सारी बाधाओं के पार ले गए और उन्हें वह अवसर मिल ही गया जिसकी
उन्हें तलाश थी।
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अवसर के छद्म रूप
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जब अवसर आया,
तो वह ऐसे रूप में आया और ऐसी दिशा से आया, जिसकी बार्न्स ने उम्मीद भी नहीं की थी।
अवसर इंसानों के साथ अक्सर इस तरह की चालबाज़ी करता है। अवसर पिछले दरवाज़े से चुपचाप
घुस आता है और अक्सर यह दुर्भाग्य या अस्थाई पराजय के - वेष में आता है। शायद इसीलिए
बहुत सारे लोग अवसर को पहचान नहीं पाते।
एडिसन ने
एक नया ऑफ़िस यंत्र बनाया था, जिसे उस वक़्त एडिसन डिक्टेटिंग मशीन के नाम से जाना
जाता था। उनके सेल्समैन उस मशीन को लेकर उत्साहित नहीं थे। उन्हें यह विश्वास नहीं
था कि इसे आसानी से बेचा जा सकता था। बार्स ने अपना अवसर देखा। यह अवसर चुपके से उनके
जीवन में आया था एक अजीब सी दिखने वाली मशीन में छुपकर, जिसमें बार्न्स और उनके आविष्कारक
को छोड़कर किसी तीसरे की कोई रुचि नहीं थी।
बार्न्स जानते
थे कि वे एडिसन डिक्टेटिंग मशीन बेच सकते हैं। उन्होंने एडिसन को यह सुझाव दिया और
उन्हें तत्काल अपना मौक़ा मिल गया। उन्होंने मशीन बेची। और इतनी सफलतापूर्वक बेची कि
एडिसन ने उन्हें इस मशीन को पूरे देश में डिस्ट्रीब्यूट करने और मार्केटिंग का कॉन्ट्रैक्ट
दे दिया। इस बिज़नेस सहयोग से बार्स ने ढेर सारा पैसा कमाया, परंतु उन्होंने इससे भी
बड़ा काम कर दिखाया। उन्होंने यह साबित कर दिया कि इंसान "सोचकर अमीर बन सकता
है।"
बार्स की
मौलिक इच्छा का आर्थिक मूल्य उनके लिए क्या था, यह तो मैं नहीं जानता। शायद इसकी वजह
से उन्हें बीस या तीस लाख डॉलर मिले होंगे। परंतु रक़म महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण
तो यह जानना है कि सिद्धांतों के सहारे इंसान अपने विचारों को भौतिक (मैटेरियल) पुरस्कारों
में बदल सकता है।
बार्न्स ने
महान एडिसन के साथ पार्टनरशिप की बात दिल से सोची। यह सोच-सोचकर वे दौलतमंद बन गए।
उनके पास शुरुआत में कुछ भी नहीं था। उस वक़्त तो वे इतना ही जानते थे कि वे क्या चाहते
थे, और उनमें अपनी मनचाही चीज़ हासिल होने तक डटे रहने का संकल्प था।
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सोने से तीन फुट दूर
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असफलता का
एक आम कारण यह है कि लोग अस्थाई पराजय के बाद मैदान छोड़ देते हैं। हर व्यक्ति कभी
न कभी यह गलती ज़रूर करता है।
आर. यू. डार्बी
के एक अंकल गोल्डरश के दौर में "स्वर्ण की खोज के अभियान" में जुट गए। वे
खुदाई करने और अमीर बनने के लिए पश्चिम दिशा में गए। वे नहीं जानते थे कि धरती के नीचे
जितना सोना छुपा है उससे कहीं ज़्यादा सोना इंसानों के विचारों में छुपा है। वे तो
कुदाली-फावड़ा लेकर ज़मीन के एक टुकड़े पर खुदाई करने में जुट गए।
कई सप्ताह
की मेहनत के बाद उन्हें चमकते हुए स्वर्ण की झलक दिखाई दी। परंतु उस सोने को सतह तक
लाने के लिए मशीनों की ज़रूरत थी। चुपचाप उन्होंने खदान का मुँह ढंक दिया और मैरीलैंड
के विलियम्सबर्ग के अपने घर लौट आए। उन्होंने अपने रिश्तेदारों और कुछ दोस्तों को
"सोने की खुदाई में सफलता" के बारे में बताया। उन्होंने मिलकर मशीनों को
ख़रीदने के लिए आवश्यक धन जुटाया। अंकल और डार्बी खदान पर काम शुरू करने के लिए वापस
लौटे।
कच्ची धातु
की पहली खेप को स्मेल्टर तक पहुँचाया गया। वहाँ यह पता चला कि उनकी खदान कॉलोरेडो की
सबसे बढ़िया खदान थी। कच्ची धातु की कुछ खेपों में ही उनके सारे क़र्ज़े उतर जाते।
फिर भारी मुनाफ़े की बारी आती।
खुदाई करने
वाली मशीनें नीचे जा रही थीं। डार्बी और अंकल की आशाएँ आसमान छू रही थीं। तभी अचानक
कुछ हुआ। सोने की झलक गायब हो गई। वे इन्द्रधनुष के आख़िरी सिरे पर आ गए थे और स्वर्ण
पात्र अब वहाँ नहीं था। वे खोदते रहे, इस आशा में कि एक बार फिर सोने की झलक दिख जाए
परंतु उनकी मेहनत बेकार गई।
आख़िरकार,
उन्होंने मैदान छोड़ने का फ़ैसला किया।
उन्होंने
एक कबाड़ी को मशीनें कौड़ियों के मोल बेच दीं और ट्रेन पकड़कर वापस घर लौट आए। कबाड़ी
ने एक माइनिंग इंजीनियर को बुलवाकर खदान का इंस्पेक्शन करवाया। इंजीनियर ने सलाह दी
कि यह प्रोजेक्ट इसलिए असफल हुआ क्योंकि इसके मालिक यह नहीं जानते थे कि बीच में
"फ़ॉल्ट लाइन" आती है। उसके विश्लेषण के अनुसार सोने की झलक उस स्थान से
मात्र तीन फुट नीचे थी जहाँ डार्बी ने खुदाई बंद की थी। और इंजीनियर का अनुमान सच साबित
हुआ।
कबाड़ी को
खदान से लाखों-करोड़ों डॉलर का सोना मिला, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि वह जानता था कि हार
मानने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित होता है।
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"लोगों के ना कहने के कारण मैं कभी नहीं रुकूँगा"
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बाद में मिस्टर
डाबर्बी ने अपने इस नुक़सान की कई गुना भरपाई कर ली, जब उन्होंने यह खोज लिया कि इच्छा
को सोने में बदला जा सकता है। यह खोज उन्होंने तब की जब वे जीवन बीमा बेचने के बिज़नेस
में आए।
उन्हें याद
था कि उन्होंने सोने से तीन फुट दूर ही हार मान ली थी। डार्बी ने इस अनुभव से सबक़
सीखा और वे अपने नए बिज़नेस में खुद से यह कहा करते थे, "मैं सोने से तीन फुट
दूर रुक गया था, परंतु जब मैं लोगों से बीमा खरीदने के लिए कहता हूँ तो मैं सिर्फ़
इसलिए कभी नहीं रुकता क्योंकि उन्होंने ना कह दिया है।"
डार्बी ऐसे
चुनिंदा लोगों में से एक बन गए जिन्होंने हर साल एक मिलियन डॉलर से अधिक का बीमा बेचा।
उन्होंने सोने की खदान के बिज़नेस के "हार मानने" के अनुभव से "जुटे
रहने" का सबक़ सीख लिया था।
किसी भी इंसान
के जीवन में सफलता आने से पहले उसके जीवन में अस्थाई पराजय या असफलता ज़रूर आती है।
जब आदमी पराजित हो जाता है तो सबसे आसान और तार्किक रास्ता यही होता है कि मैदान छोड़
दिया जाए। और ज़्यादातर लोग यही करते हैं।
इस देश के
सबसे सफल पाँच सौ से ज़्यादा लोगों ने इस लेखक को बताया है कि उन्हें महानतम सफलता
उस मोड़ पर मिली जब वे हार चुके थे और हारने के बिंदु से एक क़दम आगे ही सफलता उनका
इंतज़ार कर रही थी। असफलता बहुत चालाक और मज़ाकिया क़िस्म की होती है। इसे लोगों को
तब गिराने में मज़ा आता है जब सफलता उनके बहुत क़रीब होती है।
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लगन का पचास - सेंट का सबक़
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मिस्टर डार्बी
को सोने की खुदाई के अनुभव से "असफलता की युनिवर्सिटी" से डिग्री मिली। उसके
कुछ समय बाद ही उन्हें एक और अनुभव हुआ जिससे उन्हें यह सीख मिली कि "ना"
का मतलब हमेशा "ना" नहीं होता।
एक दोपहर
को वे पुरानी मिल में गेहूँ साफ़ करने में अपने अंकल की मदद कर रहे थे। अंकल के बड़े
फ़ार्म पर बहुत से अश्वेत किसान. रहा करते थे, जो फ़सल बटाई पर ले लेते थे। धीमे से
दरवाज़ा खुला और किराएदार की छोटी सी अश्वेत लड़की अंदर आई और दरवाज़े से टिककर खड़ी
हो गई।
अंकल ने उसकी
तरफ़ देखा और चिल्लाकर पूछा, "तुम्हें क्या चाहिए ?"
विनम्रता
से बच्ची ने जवाब दिया, "मेरी मम्मी ने कहा है कि आप उन्हें पचास सेंट भिजवा दें।"
"मैं
नहीं भेजूँगा," अंकल ने जवाब दिया, "अब तुम घर की तरफ़ दौड़ लगा दो।"
"यस
सर," बच्ची ने जवाब दिया। परंतु वह ज़रा भी नहीं हिली।
अंकल अपने
काम में जुट गए और वे इतने व्यस्त थे कि उन्होंने इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया कि बच्ची
अभी गई नहीं है। काफ़ी देर बाद जब उन्होंने देखा कि वह अब भी वहीं खड़ी है, तो वे फिर
चिल्लाए, "मैंने तुमसे कहा था कि तुम घर चली जाओ। अब जाओ, या फिर मैं तुम्हारी
पिटाई कर दूँ।"
छोटी बच्ची
ने कहा, "यस सर," परंतु वह ज़रा भी नहीं हिली।
अंकल ने उस
गेहूँ के बोरे को वहीं पटक दिया, जिसे वे उठाकर थ्रेशर में डालने वाले थे और एक डंडा
उठाकर वे बच्ची की तरफ़ आगे बढ़े। उनके हावभाव से लग रहा था कि आज वे बच्ची को सबक़
सिखाकर ही रहेंगे।
डार्बी की
साँसें थम गईं। उसे विश्वास था कि अंकल अब हमला करने ही वाले हैं। वह जानता था कि अंकल
का गुस्सा बहुत तेज़ था।
जब अंकल बच्ची
के पास पहुँचे, तो बच्ची एक क़दम आगे बढ़ी और वह उनकी आँखों में आँखें डालकर तेज़ आवाज़
में चीख़ी, "मेरी मम्मी को पचास सेंट चाहिए ही चाहिए।"
अंकल रुक
गए, उन्होंने उसकी तरफ़ एक मिनट देखा, फिर धीरे से डंडे को फ़र्श पर रख दिया, अपनी
जेब में हाथ डाला, आधा डॉलर निकाला और बच्ची को दे दिया।
बच्ची ने
पैसे ले लिए और दरवाज़े की तरफ़ पीछे की ओर बढ़ने लगी, परंतु उसने अपनी आँखें उस आदमी
पर से नहीं हटाईं जिसे उसने अभी हराया था। जब वह चली गई तो अंकल एक बक्से पर बैठ गए
और दस मिनट तक खिड़की के बाहर झाँकते हुए कुछ सोचते रहे। वे सोच रहे थे कि एक छोटी
सी बच्ची की लगन ने उन्हें किस तरह हरा दिया था।
मिस्टर डार्बी
के मन में भी चिंतन चल रहा था। उनके अनुभव में यह पहली बार था जब उन्होंने किसी अश्वेत
बच्ची को किसी वयस्क श्वेत आदमी पर भारी पड़ते देखा था। उसने ऐसा किस तरह किया ? उनके
अंकल को क्या हो गया था जो उनका गुस्सा काफूर हो गया और वे एक भेड़ की तरह आज्ञाकारी
बन गए ? इस बच्ची में वह कौन सी शक्ति थी जिसके कारण उसे सफलता मिली ? डार्बी के मन
में इसी तरह के बहुत से सवाल कौंध रहे थे, परंतु उन्हें इन सवालों के जवाब बरसों तक
नहीं मिले। और एक दिन उन्होंने मुझे यह कहानी सुनाई।
अजीब संयोग
था कि यह असामान्य अनुभव इस लेखक को उसी पुरानी मिल में सुनाया गया, ठीक उसी जगह पर
जहाँ अंकल को हार का सामना करना पड़ा था।
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बच्ची की अद्भुत शक्ति
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जब हम उस
पुरानी मिल में खड़े थे, तो मिस्टर डार्बी ने इस असामान्य सफलता की कहानी को दोहराया
और अंत में यह सवाल पूछा,
"आपको
क्या लगता है? इस बच्ची में वह कौन सी अद्भुत शक्ति थी, जिसके कारण उसने अंकल को हरा
दिया?"
इस सवाल का
जवाब, इस पुस्तक में दिए गए सिद्धांतों में मिल जाएगा। जवाब पूरी तरह से दिया गया है
और इससे आप संतुष्ट होंगे। इसमें वह सारी जानकारी और निर्देश हैं जिनकी मदद से कोई
भी आदमी उसी अद्भुत शक्ति का प्रयोग कर सकता है, जिसका प्रयोग उस बच्ची ने संयोगवश
कर लिया था।
अपने दिमाग
को चौकन्ना रखें और आप देख पाएँगे कि किस अद्भुत शक्ति ने उस बच्ची की मदद की। आप अगले
अध्याय में इस शक्ति की एक झलक देख सकेंगे। इस पुस्तक में कहीं पर आपको एक ऐसा विचार
मिल जाएगा जिससे आपकी ग्रहणशील शक्तियाँ पैनी हो जाएँगी, और आप भी अपने लाभ के लिए
उस अचूक शक्ति का उपयोग कर सकेंगे। इस शक्ति का एहसास आपको पहले अध्याय में भी हो सकता
है या फिर यह आगे के किसी अध्याय में आपके दिमाग़ में कौंध सकता है। यह एक विचार के
रूप में आ सकता है। या, यह किसी योजना या लक्ष्य के रूप में भी आ सकता है। यह आपको
अतीत की ओर ले जा सकता है, असफलता या हार के पुराने अनुभवों की ओर, और उनसे कोई ऐसा
सबक़ निकाल सकता है जिसके द्वारा आपने जितना खोया है, आप उससे ज़्यादा हासिल कर सकें।
जब मैंने
मिस्टर डार्बी को बताया कि वह छोटी सी अश्वेत बच्ची किस अद्भुत शक्ति का प्रयोग कर
रही थी, तो उन्होंने तीस साल के अपने जीवन बीमा सेल्समैन के कार्य का विश्लेषण करते
हुए यह तत्काल स्वीकार किया कि इस क्षेत्र में उनकी सफलता का एक बहुत बड़ा कारण उस
बच्ची से सीखा गया सबक़ था।
मिस्टर डार्बी
ने बताया, "हर बार जब भी संभावित ग्राहक मुझे टरकाना चाहता था, और मुझसे सामान
ख़रीदने से मना कर देता था, तो मुझे उसी पुरानी मिल में खड़ी वह बच्ची याद आ जाती थी
जिसकी बड़ी-बड़ी आँखों में अवज्ञा साफ़ दिख रही थी। यह याद करते ही मैं खुद से कहता
था, 'मुझे यह सेल अवश्य करनी चाहिए।' मेरी ज़्यादातर सेल तभी हुई है जब शुरुआत में
ही लोगों ने 'ना' कहा है।"
उन्हें अपनी
वह गलती भी याद थी जब वे सोने से सिर्फ तीन क़दम के फासले पर रुक गए थे और उन्होंने
मैदान छोड दिया था और हार मान ली थी। "परंतु," उन्होंने कहा, "यह अनुभव
अभिशाप के बजाय मेरे लिए वरदान साबित हुआ। इसने मुझे सिखाया कि किस तरह जुटे रहा जाए,
चाहे परिस्थितियाँ कितनी ही कठिन क्यों न हो। किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल करने
से पहले मुझे यह सबक़ सीखने की ज़रूरत थी।"
मिस्टर डार्बी
और उनके अंकल की सोने की खुदाई, बच्ची और अंकल की मुठभेड़ की कहानियाँ बेशक सैकड़ों
जीवन बीमा एजेंटों द्वारा पढ़ी जाएँगी। और इन सभी को लेखक यह बता देना चाहता है कि
इन दोनों अनुभवों से सबक़ सीखकर ही डार्बी हर साल दस लाख डॉलर से ज़्यादा का जीवन बीमा
बेच पाए।
मिस्टर डार्बी
के अनुभव साधारण थे और रोज़मर्रा के जीवन में ऐसी बातें अक्सर होती रहती हैं, परंतु
इन्हीं के कारण उनकी तक़दीर बदल गई इसलिए यह अनुभव उनके लिए जीवन के अनमोल उपहार सावित
हुए। उन्होंने इन दोनों नाटकीय अनुभवों का लाभ लिया, क्योंकि उन्होंने इनका विश्लेषण
किया और उनसे सबक़ सीखा। परंतु उस आदमी का क्या होगा जिसके पास असफलता के विश्लेषण
का न तो समय है, न ही इच्छा है? ऐसे आदमी को वह ज्ञान कहाँ से मिलेगा जो उसे सफलता
के रास्ते पर ले जा सकता है? वह आदमी कहाँ और कैसे हार को अवसर की सीढी में बदलने की
कला सीखेगा ?
इन्हीं सवालों
के जवाब देने के लिए यह पुस्तक लिखी गई है।
---------
आपको सिर्फ़ एक दमदार विचार की ज़रूरत है
---------
जवाब में
तेरह सिद्धांतों का वर्णन है, परंतु इसे पढ़ते समय यह याद रखें, जिन सवालों के जवाब
आप खोज रहे हैं, वे आपको अपने ही मस्तिष्क में मिल सकते हैं। यह पुस्तक पढ़ते समय आपके
दिमाग में कोई 'विचार, योजना या लक्ष्य अचानक कौंध सकता है।
दमदार विचार
की ही जरूरत होती है। इस पुस्तक में दिए गए सिद्धांत ऐसे तरीके और नुस्खे बताते हैं
जिनके प्रयोग से उपयोगी विचार उत्पन्न हो सकते हैं।
इन सिद्धांतों
के वर्णन से पहले आपको यह महत्वपूर्ण सुझाव दे दिया जाना चाहिए...
जब दौलत आती
है तो इतनी तेज़ी से आती है, और इतनी ज्यादा आती है कि आदमी हैरान हो जाता है कि गरीबी
के इतने सालों में वह कहाँ छुपी हुई थी।
यह वाक्य
हैरान करने वाला है। यही नहीं, यह उस लोकप्रिय विश्वास के विरुद्ध भी है जिसका मानना
है कि दौलत सिर्फ़ उन्हीं लोगों को मिलती है जो कड़ी मेहनत करते हैं और लंबे समय तक
करते हैं।
जब आप सोचकर
अमीर बनने की शुरुआत करेंगे, तो आप देखेंगे कि दौलत मानसिक अवस्था से लक्ष्य की निश्चितता
से शुरू होती है, चाहे उसमें कड़ी मेहनत हो या न हो। आप, और आप ही की तरह के हर व्यक्ति,
को यह जानने में रुचि लेनी चाहिए कि उस मानसिक अवस्था को कैसे हासिल किया जाए जिससे
दौलत को आकर्षित किया जा सके। मैंने पच्चीस साल रिसर्च करने में लगाए. क्योंकि मैं
भी यह जानना चाहता था कि "अमीर लोग किस तरह अमीर बनते हैं।"
बहुत गौर
से देखें। जैसे ही आप इस फिलॉसफ़ी के सिद्धांतों को अपना लेंगे और इन सिद्धांतों पर
अमल करने के निर्देशों का पालन करने लगेंगे, आपकी आर्थिक स्थिति सुधरने लगेगी और आप
जिस भी चीज़ को छुएँगे, वह आपके लिए फ़ायदेमंद साबित होने लगेगी। असंभव ? बिलकुल नहीं!
मानव जाति
की एक ख़ास कमज़ोरी यह है कि औसत आदमी "असंभव" शब्द का प्रयोग बहुत करता
है। वह ऐसे सारे काम जानता है जो असंभव हैं। वह ऐसी सारी चीजें जानता है जिन्हें नहीं
किया जा सकता। यह पुस्तक ऐसे लोगों के लिए लिखी गई है जो ऐसे नियम जानना चाहते हैं
जिन्होंने दूसरे लोगों को सफल बनाया है और जो इन नियमों पर चलने के लिए अपना सब कुछ
दाँव पर लगाने के इच्छुक हैं।
सफलता उन्हीं
को मिलती है जो सफलता के बारे में जागरूक (सक्सेस कॉन्शियस) होते हैं।
असफलता उन्हीं
को मिलती है जो असफलता के बारे में जागरूक (फेल्योर कॉन्शियस) होते हैं।
इस पुस्तक
का लक्ष्य है उन सभी लोगों की मदद करना जो अपने मस्तिष्क को असफलता की जागरूकता से
निकालकर सफलता की जागरूकता की ओर ले जाना चाहते हैं।
ज़्यादातर
लोगों में एक और कमज़ोरी होती है। उनकी आदत होती है कि वे अपने विश्वासों और अनुभवों
के पैमाने से हर वस्तु और व्यक्ति को नापते हैं। इसे पढ़ने वाले कई लोग तो यह विश्वास
कर रहे होंगे कि वे सिर्फ़ सोचकर अमीर नहीं बन सकते, क्योंकि उनके चिंतन की आदतें गरीबी,
कमियों, दुख, असफलता और हार के दलदल में फंसी हुई हैं।
यह दुर्भाग्यशाली
लोग मुझे उस प्रसिद्ध चीनी व्यक्ति की याद दिलाते हैं, जो अमेरिकी तौर-तरीके सीखने
के लिए अमेरिका आया था। वह युनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो में पढ़ने लगा। एक दिन प्रेसिडेंट
हार्पर वहाँ पर इस युवक से मिले और उससे कुछ देर बातें कीं। उन्होंने उससे पूछा कि
उसने अमेरिकी लोगों में सबसे प्रमुख बात क्या देखी।
उस युवक ने
जवाब दिया, "आप सबकी आँखें तिरछी हैं। अमेरिकी लोगों की यही बात मुझे सबसे ख़ास
लगी कि आप सबकी आँखें तिरछी हैं।"
और हम लोग
चीन के लोगों के बारे में क्या कहते हैं?
जिस चीज़
को हम नहीं समझ पाते, हम उस पर विश्वास करने से इंकार कर देते हैं। हुम मूर्खतापूर्वक
यह विश्वास करते हैं कि हमारी सीमाएँ ही सीमाओं का सही पैमाना हैं। निश्चित रूप से,
सामने वाले की आँखें आपको "तिरछी" लगेंगी क्योंकि वे आपके जैसी नहीं हैं।
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"असंभव" फ़ोर्ड वी-8 मोटर
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जब हैनरी
फोर्ड ने अपनी प्रसिद्ध वी-8 मोटर बनाने का फैसला किया तो उन्होंने एक ऐसा इंजन बनाने
का विकल्प चुना जिसके आठो सिलिंडर एक ही ब्लॉक में हों। उन्होंने अपने इंजीनियरों को
ऐसा इंजन बनाने का निर्देश दिया। डिज़ाइन कागज़ पर आ गया, परंतु सभी इंजीनियरों का
कहना था कि आठ सिलिंडर के इंजन ब्लॉक को एक ही टुकड़े में ढालना असंभव है।
फ़ोर्ड ने
कहा, "फिर भी आप इसे बनाओ।"
"परंतु,"
उन्होंने जवाब दिया, "यह असंभव है।"
"काम
चालू कर दो," फ़ोर्ड ने आदेश दिया, "और यह काम तब तक करते रहो जब तक तुम्हें
इसमें सफलता न मिल जाए, चाहे इसमें कितना भी वक़्त लगे।"
इंजीनियरों
ने काम शुरू कर दिया। अगर वे फ़ोर्ड की नौकरी में बने रहना चाहते थे तो उनके पास कोई
दूसरा विकल्प था भी नहीं। छह महीने गुज़र गए, परंतु कुछ भी नहीं हुआ। इसके बाद छह महीने
और गुज़र 'गए, और फिर भी कुछ नहीं हुआ। इंजीनियरों ने आदेश के पालन की हरसंभव कोशिश
की, परंतु वह काम उन्हें "असंभव" लग रहा था, जिसे किया जाना संभव नहीं था।
. एक साल
बाद फ़ोर्ड ने इंजीनियरों को फिर बुलवाया और दुबारा उन्होंने उन्हें वही बताया कि उनके
आदेश को पूरा करने का कोई तरीक़ा उन्हें नहीं सूझ रहा है।
"काम
चालू रखो," फ़ोर्ड ने कहा। "मैं इसे चाहता हूँ, और मैं इसे पाकर ही रहूँगा।"
उन्होंने
काम चालू रखा और फिर जैसे जादू की छड़ी से रहस्य प्रकट हो गया।
फ़ोर्ड की
लगन एक बार फिर जीत्ती !
हो सकता है
कि यह कहानी अक्षरशः सत्य न हो, परंतु इसका मूल भाव और घटनाएँ बिलकुल सही हैं। अगर
आप इससे निष्कर्ष निकालना चाहते हों तो इससे यह निष्कर्ष निकालें कि आप भी सोवकर अमीर
बन सकते हैं और आप भी फ़ोर्ड की करोड़ों डॉलर की अम्मीरी का रहस्य जान सकते हैं। आपको
यह रहस्य जानने के लिए बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।
हैनरी फोर्ड
इसलिए सफल हुए, क्योंकि उन्हें सफलता के सिद्धांत मालूम थे और उन्होंने उन सिद्धांतों
पर अमल किया था। इनमें से एक है इच्छा : यह जानना कि आपको क्या चाहिए। पढ़ते समय फ़ोर्ड
की कहानी याद रखें और उन पंक्तियों को दोहराएँ जिनमें उनकी अभूतपूर्व उपलब्धि का रहस्य
बताया गया है। अगर आप ऐसा कर सकते हैं, अगर आप उन सिद्धांतों पर उँगली रख सकते हैं
जिनकी वजह से हैनरी फ़ोर्ड अमीर बने, तो आप उनकी उपलब्धियों की बराबरी कर सकते हैं,
चाहे आप किसी भी व्यवसाय या रोज़गार में हों।
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आप क्यों "अपने भाग्य के निर्माता" हैं?
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जब हेनले
ने अमर पंक्तियाँ लिखीं, "मैं अपने भाग्य का निर्माता हूँ, मैं अपनी आत्मा का
कप्तान हूँ," तो उन्हें हमें यह जानकारी देनी चाहिए थी कि हम अपने भाग्य के निर्माता
स्वयं हैं, अपनी आत्माओं के कप्तान हम स्वयं हैं, क्योंकि हममें अपने विचारों को नियंत्रित
करने की शक्ति है।
उन्हें हमें
यह बताना चाहिए था कि हमारे दिमाग में जो विचार प्रबल होते हैं, हमारा मस्तिष्क उनकी
तरफ़ चुंबकीय शक्ति से आकर्षित होता है, और इंसान आज तक इसका कारण नहीं जान पाया है
कि यह "चुंबक" ऐसी शक्तियों, लोगों और जीवन की परिस्थितियों को आकर्षित क्यों
करता है जो हमारे प्रबल विचारों से संबद्ध होते हैं।
उसे हमें
यह बताना चाहिए था कि ढेर सारी दौलत हासिल करने से पहले हमें अपने मन में दौलत हासिल
करने की प्रबल इच्छा का चुंबकीय विचार रखना चाहिए। हमें "धन के बारे में जागरूक"
बनना चाहिए जब तक कि दौलत की प्रबल इच्छा इसे हासिल करने की कोई निश्चित योजना न बनवा
दे। लेकिन चूंकि हेनले एक कवि थे, वार्शनिक नहीं थे, इसलिए उन्होंने इस महान सच्चाई
को कविता के रूप में ही रखा और इन पंक्तियों के वाशीनेक अर्थ को पढ़ने वालों के विश्लेषण
पर छोड़ दिया।
धीरे-धीरे
यह महान सत्य हमें समझ में आता है जो बाद में पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि इस पुस्तक
में बताए गए सिद्धांतों में वह रहस्य छुपा हुआ है जिसके द्वारा आप अपने आर्थिक भविष्य
को नियंत्रित कर सकते हैं।
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सिद्धांत जो आपकी तक़दीर बदल सकते हैं
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अब हम इन
सिद्धांतों में से पहले सिद्धांत को परखने के लिए तैयार हैं। अपने दिमाग़ को खुला रखें
और यह जान लें कि आप जो पढ़ रहे हैं वह किसी एक इंसान की खोज नहीं है। ये सिद्धांत
कई लोगों के लिए काम कर चुके हैं। आप भी अपने लाभ के लिए उनका इस्तेमाल कर सकते हैं।
आपको यह करना
आसान लगेगा, कठिन नहीं।
कई साल पहले
मैंने वेस्ट वर्जीनिया के सालेम कॉलेज में एक भाषण दिया था। अगले अध्याय में दिए गए
सिद्धांत के बारे में मैं इतनी प्रबलता से बोला कि श्रोताओं में से एक ने इसे अपनी
फ़िलॉसफ़ी का हिस्सा बना लिया। वह युवक संसद सदस्य बन गया और फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट
सरकार में एक महत्वपूर्ण पद पर पहुँचा। उसने मुझे एक पत्र लिखा जिसमें उसने स्पष्ट
रूप से उल्लेख किया कि अगले अध्याय में बताए जाने वाले सिद्धांत के बारे में उसके विचार
क्या हैं। इसी वजह से मैं उसके पत्र को प्रकाशित कर रहा हूँ ताकि यह अगले अध्याय की
भूमिका का कार्य करे।
यह आपको आने
वाले पुरस्कारों की एक झलक देता है।
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प्रिय नेपोलियन,
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संसद सदस्य
के रूप में सेवा करते हुए मैं लोगों की समस्याओं को गहराई से समझ पाया हूँ। मैं एक
सुझाव देना चाहता हूँ जो हज़ारों लोगों की मदद कर सकता है।
1922 में
आपने सालेम कॉलेज में एक भाषण दिया था। तब मैं उसी कॉलेज में पढ़ता था। उस भाषण में
आपने मेरे मन में एक ऐसे विचार का बीज बोया था जिसकी वजह से में आज इतना सफल हो सका
हूँ, जिसकी वजह से मैं आज इतने सारे लोगों की सेवा कर पा रहा हूँ, और जिसकी वजह से
ही मैं भविष्य में भी सफलता प्राप्त कर पाऊँगा।
मुझे याद
है, जैसे यह कल ही की बात हो, कि आपने हैनरी फ़ोर्ड का उदाहरण दिया था, जिनके पास ज़्यादा
शिक्षा नहीं थी, जिनके पास एक डॉलर भी नहीं था, जिनके कोई प्रभावशाली मित्र भी नहीं
थे, परंतु इन सबके बावजूद वे सफलता की चोटी पर पहुँच गए। मैंने उसी समय अपना मन बना
लिया था, आपके भाषण के पूरा होने से पहले ही मैंने ठान लिया था कि चाहे मेरे जीवन में
कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, मैं उन सबको पार करके सफलता प्राप्त करूँगा।
हज़ारों युवा
इस साल और आगे आने वाले कुछ सालों में कॉलेज की पढ़ाई पूरी करके निकलेंगे। उनमें से
हर एक को प्रैक्टिकल प्रोत्साहन के वैसे ही संदेश की ज़रूरत होगी जैसा संदेश मुझे आपसे
मिला था। वे जानना चाहते होंगे कि किस तरफ़ जाएँ, क्या करें ताकि जीवन में सफलता उनके
क़दम चूमे। आप उन्हें रास्ता बता सकते हैं क्योंकि आफ्ने इतने सारे लोगों की समस्याएँ
सुलझाने में उनकी मदद की है।
आज अमेरिका
में ऐसे हज़ारों लोग हैं जो यह जानना चाहेंगे कि विचारों को दौलत में किस तरह बदला
जा सकता है, गरीबी के दलदल से बाहर निकलकर अमीरी के गलीचे तक कैसे पहुँचा जा सकता है।
अगर उनकी कोई मदद कर सकता है, तो वह आप हैं।
अगर आप यह
पुस्तक प्रकाशित करें, तो मैं इसकी पहली प्रति ख़रीदना चाहूँगा, जिस पर आपका ऑटोग्राफ़
हो। ---- शुभकामनाओं सहित -- आपका जेनिंग्स
रैंडॉल्फ़
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वह भाषण देने
के पैंतीस साल बाद मैं एक बार फिर 1957 में सालेम कॉलेज गया और वहाँ मैंने अपना भाषण
एक बार फिर दिया। उस समय मुझे सालेम कॉलेज से डी. लिट. की मानद उपाधि भी मिली।
1922 से आज
तक मैंने जेनिंग्स रैंडॉल्फ़ को लगातार आगे बढ़ते देखा है: देश के प्रमुख एयरलाइन्स
एक्ज़ीक्यूटिव्ज़ में से एक, वेस्ट वर्जीनिया से अमेरिकी सीनेटर, और महान प्रेरणादायक
वक्ता।
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इंसान का
मस्तिष्क जो सोच सकता है और जिसमें यक़ीन कर सकता है उसे वह हासिल कर सकता है
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और दोस्तो
ये था आज का चैपटर -
और अब मिलते हैं अगले नए चैपटर के
साथ, नई विडियों में,
आप हमेशा खुश रहें, आबाद रहें,
स्वस्थ रहें, और आपका धन्यावाद, नमस्कार, जय हिन्द, जय भारत
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Reviewed by Shiv Rana RCM
on
मई 21, 2026
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