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नियम-4-हमेशा ज़रूरत से कम बोलें- शक्ति के 48 नियम- ऑडियो बुक- #Audio #Book-Robert Greene ------- शक्ति के 48 नियम- - की ऑडियो बुक- 48 LAWS OF POWER - #Audio #Book - Robert Greene - ----- Hindi translation of 48 LAWS OF POWER - by Robert Greene -----

 

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नियम-4-हमेशा ज़रूरत से कम बोलें- शक्ति के 48 नियम- ऑडियो बुक- #Audio #Book-Robert Greene

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शक्ति के 48 नियम-   - की ऑडियो बुक-  48 LAWS OF POWER - #Audio #Book - Robert Greene -

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Hindi translation of 48 LAWS OF POWER - by Robert Greene

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By : रॉबर्ट ग्रीन - - Writer : Robert Greene

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 नियम - 4 - हमेशा ज़रूरत से कम बोलें

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विचार

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लोगों को शब्दों से प्रभावित करने की कोशिश न करें। आप जितना ज़्यादा बोलेंगे, उतने ही ज़्यादा साधारण नज़र आएँगे और आपका नियंत्रण उतना ही कम होगा। अगर आप अपनी बात को अस्पष्ट, गोलमोल और अजीब रखेंगे, तो आपकी नीरस बात भी मौलिक लगेगी। सशक्त लोग कम बोलकर प्रभावित करते हैं और रौबदार दिखते हैं। इस बात की ज़्यादा संभावना होती है कि ज़्यादा बोलते समय आपके मुँह से कोई न कोई मूर्खतापूर्ण बात निकल ही जाएगी।

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शक्ति कई मायनों में दिखावे का खेल है। जब आप ज़रूरत से कम बोलते हैं, तो आप हमेशा वास्तविकता से ज़्यादा महान और शक्तिशाली नज़र आते हैं। आपकी चुप्पी से दूसरे लोग परेशान हो जाएँगे। इंसान विश्लेषण और स्पष्टीकरण करने वाली मशीनें हैं। वे यह जानने की फिराक में रहते हैं कि आप क्या सोच रहे हैं। जब आप अपने शब्दों को सावधानी से नियंत्रित करते हैं, तो वे आपके इरादों या आपकी मंशा को नहीं समझ पाते हैं।

 

आपके संक्षिप्त जवाब या ख़ामोशी से वे रक्षात्मक हो जाएँगे और बीच में कूद पड़ेंगे। आपकी ख़ामोशी के ख़ाली स्थान को भरने की हड़बड़ी में वे घबराकर कुछ भी बोलने लगेंगे, जिससे आपको उनके और उनकी कमज़ोरियों के बारे में बहुमूल्य जानकारी मिलेगी। आपसे मिलकर जाने के बाद उन्हें ऐसा लगेगा, जैसे वे लुट गए हों। घर जाकर वे आपके हर शब्द पर गहराई से विचार करेंगे। आपकी संक्षिप्त टिप्पणियों पर जब लोग अतिरिक्त ध्यान देंगे, तो इससे आपकी शक्ति तो बढ़नी ही है।

 

युवावस्था में चित्रकार एंडी वारहोल को यह समझ में आ गया कि लोगों से बातें करके उनसे अपना मनचाहा काम करवाना असंभव है। बातों से लोग आपके ख़िलाफ़ हो जाएँगे, आपकी इच्छाओं के विपरीत काम करेंगे और अपने दुष्ट स्वभाव की वजह से आपकी अवज्ञा करेंगे। उन्होंने एक मित्र से एक बार कहा था, "मैंने यह सीखा है कि जब आप चुप रहते हैं, तो दरअसल आपके पास ज़्यादा शक्ति होती है।"

 

बाद के जीवन में वारहोल ने इस तकनीक का इस्तेमाल बहुत अच्छी तरह किया। इंटरव्यू में वे भविष्यवाणी (ओरेकल) की तरह बहुत संक्षिप्त वाक्य बोलते थे। वे कोई जटिल और रहस्यमयी बात कह देते थे और इंटरव्यू लेने वाला इस उधेड़बुन में रहता था कि इसका न जाने क्या मतलब होगा। वह सोचने लगता था कि वारहोल के अर्थहीन दिख रहे वाक्यों के पीछे कोई गहरी बात छिपी होगी। वारहोल अपनी पेंटिंग्स के बारे में कभी बातें नहीं करते थे। वे इसके विश्लेषण का काम दूसरों पर छोड़ देते थे। वे अपने काम के बारे में जितना कम बोलते थे, दूसरे लोग उसके बारे में उतनी ही ज़्यादा बातें करते थे। और लोग उसके संपादक बारे में जितनी ज़्यादा बातें करते थे, वारहोल की पेंटिंग्स उतनी ही ज़्यादा महँगी बिकती थीं।

 

ज़रूरत से कम बोलकर आप अपनी शक्ति का नाटकीय को बहुत ज़्यादा बढ़ा लेते हैं। इसके अलावा, आप जितना कम बोलेंगे, आपके मुँह से कोई मूर्खतापूर्ण या ख़तरनाक बात निकलने का जोखिम भी उतना ही कम होगा। 1825 में निकोलस प्रथम रूस के सिंहासन पर बैठे। उनके सिंहासन पर बैठते ही उनके ख़िलाफ़ विद्रोह होने लगा। यह विद्रोह उदारवादी कर रहे थे, जो आधुनिकीकरण की माँग कर रहे थे। वे चाहते थे कि रूस में यूरोप के बाक़ी देशों की तरह उद्योग-धंधे और इमारतें बनें। दिसंबर के विद्रोह के नाम से मशहूर इस विद्रोह का निर्ममता से दमन करते हुए निकोलस प्रथम ने विद्रोही नेता कोंदरेटी रयेलेयेव को मृत्युदंड देने का आदेश दिया। रयेलेयेव को फाँसी दी जाने के तख़्ते पर खड़ा किया गया और उसके गले में रस्सी बाँध दी गई। फिर नीचे से तख़्ता हटा लिया गया। लेकिन रयेलेयेव जैसे ही रस्सी से झूला, रस्सी टूट गई और वह जमीन पर गिर गया। उस वक़्त इस तरह की घटनाएँ ईश्वर का इंसाफ़ मानी जाती थीं और जो व्यक्ति मृत्युदंड से इस तरह बचता था, उसे आम तौर पर माफ़ कर दिया जाता था। जब रयेलेयेव अपने पैरों पर खड़ा हुआ, तो उसे चोट तो लगी थी, लेकिन उसे यक़ीन था कि उसकी जान बच गई है, इसलिए वह भीड़ से चिल्लाकर बोला, "तुम लोगों ने देखा, रूस वाले कोई भी काम ठीक तरह से नहीं कर सकते। उन्हें तो रस्सी बनानी भी नहीं आती है!"

 

एक संदेशवाहक तत्काल यह ख़बर लेकर सम्राट के पास गया कि मृत्युदंड नहीं दिया जा सका। इस निराशाजनक ख़बर से चिंतित होने के बावजूद निकोलस प्रथम विद्रोही नेता रयेलेयेव के माफ़ी नामे पर हस्ताक्षर करने लगे। लेकिन तभी उन्होंने संदेशवाहक से पूछा, "क्या इस घटना के बाद रयेलेयेव ने कुछ कहा था?" संदेशवाहक ने जवाब दिया, "उसने कहा था कि रूस वालों को तो रस्सी बनानी भी नहीं आती है।"

 

सम्राट ने माफ़ीनामे को फाड़ते हुए कहा, "अगर ऐसी बात है, तो हम उसकी बात को गलत साबित करके दिखा देंगे।" अगले दिन रयेलेयेव को दोबारा फाँसी के फंदे पर लटकाया गया और इस बार रस्सी नहीं टूटी।

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यह सबक़ सीख लें: एक बार बाहर निकल जाने के बाद आप शब्दों को दोबारा नहीं लौटा सकते। उन्हें नियंत्रण में रखें। व्यंग्य के प्रति ख़ास तौर पर सावधान रहें : आपके व्यंग्य-बाणों से आपको क्षणिक संतुष्टि तो मिल सकती है, लेकिन बदले में आपको उनकी बहुत ज़्यादा क़ीमत चुकानी पड़ती है।

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तस्वीर : - डेल्फ़ी की भविष्यवाणी। जब आगंतुक डेल्फ़ी की भविष्यवाणी सुनने जाते थे, तो पुजारिन कुछ जटिल शब्द बोल देती थी, जो अर्थपूर्ण और महत्त्वपूर्ण लगते थे। भविष्यवाणी के शब्दों की अवज्ञा कोई नहीं करता था क्योंकि उनमें ज़िंदगी और मौत की शक्ति होती थी।

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विशेषज्ञ की राय अधीनस्थों के बोलने से पहले कभी अपने होंठ न हिलाएँ। मैं जितनी ज़्यादा देर तक चुप रहता हूँ, दूसरे उतनी ही जल्दी बोलने लगते हैं। जब वे बोलते हैं, तो मैं उनके शब्दों से उनके असली इरादे समझ सकता हूँ... अगर सम्राट रहस्यमय न हो, तो मंत्रियों की तो चाँदी ही हो जाएगी। (हान फेई त्सु, चीनी दार्शनिक, तीसरी सदी ईसा पूर्व)

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पटकथा लेखक माइकल आर्लेन 1944 में न्यूयॉर्क गए। उनके सितारे गर्दिश में चल रहे थे। अपना गम गलत करने के लिए उन्होंने मशहूर रेस्तराँ "21" में जाने का फैसला किया। वहाँ पर वे लॉबी में सैम गोल्डविन से टकरा गए, जिन्होंने उन्हें रेसहॉर्स ख़रीदने की अव्यावहारिक सलाह दी। बार के अंदर पहुँचने पर आर्लेन की मुलाक़ात लुइस बी. मेयर से हो गई, जो उनके पुराने परिचित थे। लुइस ने आर्लेन से पूछा कि भविष्य के लिए उनकी क्या योजना है। इस पर आर्लेन ने इस तरह से जवाब देना शुरू किया, "मैं अभी सैम गोल्डविन से बात कर रहा था..." मेयर ने बीच में बात काटते हुए कहा, "उसने तुम्हारे सामने कितने का प्रस्ताव रखा?" आर्लेन ने असली बात को छिपाते हुए कहा, "मुझे जमा नहीं।" मेयर ने पूछा, "तीस सप्ताह के लिए पंद्रह हज़ार का प्रस्ताव तो तुम्हें जम जाएगा ?" इस बार आर्लेन ने कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई और "हाँ" कह दिया। द लिटिल ब्राउन बुक ऑफ़ एनेक्डोट्स से, क्लिफ़टन फ़ैडिमैन,

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पूर्णिमा के दिन जब चाँद पूरी तरह चमकता है, तो ईस्टर्स पूरी तरह खुल जाते हैं। खुले हुए ईस्टर को देखकर केंकड़ा उसमें कोई कंकड़ या तिनका डाल देता है। चूँकि ईस्टर अब दोबारा बंद नहीं हो सकता, इसलिए यह केकड़े का आहार बन जाता है। उस आदमी की किस्मत भी ईस्टर की तरह ही होती है, जो अपना मुँह ज़रूरत से ज़्यादा खोलता है और श्रोता की दया पर ज़िंदा रहता है। -लियोनार्डो द विंशी, 1452-1519 -

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और दोस्तो ये था आज का चैपटर -

और अब मिलते हैं अगले नए चैपटर के साथ, नई विडियों में,

आप हमेशा खुश रहें, आबाद रहें, स्वस्थ रहें, और आपका धन्यावाद, नमस्कार, जय हिन्द, जय भारत 

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