नेतृत्व का मानव विज्ञान - Secrets of Leadership - प्रदीप ठाकुर - की ऑडियो बुक- #Audio #Book- सीक्रेट्स ऑफ लीडरशिप ------- सीक्रेट्स ऑफ लीडरशिप - की ऑडियो बुक- Secrets of Leadership - #Audio #Book - Pardeep Thakur - ----- कैसे बनाएँ खुद को सफल नेतृत्वकर्ता - How to make yourself a successful leader - ------- By : प्रदीप ठाकुर - - Writer : Pardeep Thakur
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नेतृत्व का मानव विज्ञान
- Secrets of
Leadership - प्रदीप ठाकुर
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of Leadership - #Audio
#Book - Pardeep Thakur -
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कैसे बनाएँ खुद को सफल नेतृत्वकर्ता - How
to make yourself a successful leader -
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By : प्रदीप ठाकुर - - Writer : Pardeep Thakur
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नेतृत्व का मानव विज्ञान
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कार्य समूह (टीम) के
बिना नेतृत्वकर्ता का कोई अस्तित्व नहीं है। दोनों एक साथ मिलकर समूह के भीतर पारस्परिक
संबंध की रचना करते हैं। और समूह की सफलता इस बात निर्भर करती है कि दोनों - नेतृत्वकर्ता
व कार्य समूह-कैसे एक साथ मिलकर काम कर पाते हैं। लेकिन ऐसा तब हो पाता है, जब कार्य-स्थल
में नेतृत्वकर्ता व कार्यकर्ता के बीच का अस्वाभाविक असुरक्षा भाव खत्म हो जाता है
और स्वाभाविक 'मानवीय सुरक्षा-चक्र' (ह्यूमन सेफ्टी सर्किल) का निर्माण होता है। फिर,
कार्य समूह के सदस्य एक-दूसरे पर भरोसा करने लगते हैं। उनके बीच आपसी सहानुभूति बढ़ती
है। वे एक-दूसरे के लिए कुछ करने को तैयार हो जाते हैं और उनके लिए कोई भी लक्ष्य असंभव
नहीं रह पाता है। यही है नेतृत्व का मानव-विज्ञान (ह्यूमन साइंस)। और मानव विज्ञान
यानी मानवीय मूल्यों पर आधारित नेतृत्व करनेवालों को बहुत अच्छी तरह से पता होता है
कि स्वयं के ऊपर दूसरों की जरूरतों व हितों को स्थान देने की इच्छा ही नेतृत्व का सच्चा
मूल्य है। इसीलिए महान् नेतृत्वकर्ता नेतृत्व करने के अपने विशेषाधिकार के प्रति अत्यंत
संवेदनशील होते हैं। वे जानते हैं कि स्वयं के हितों के व्यय पर ही नेतृत्व का विशेषाधिकार
हासिल होता है।
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पारस्परिक सहानुभूति
का मूल्य
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हम आमतौर पर रेखीय पदानुक्रम
(लीनियर हाइआर्की) में ही काम करते हैं, इसीलिए हम स्वाभाविक रूप से यह चाहते हैं कि
हमारे ऊपर बैठा व्यक्ति हमारे काम को देखे। हम मान्यता व पुरस्कार के लिए अपना हाथ
ऊपर उठाते हैं। हममें से अधिकांश खुद को उतना ही आधिक सफल महसूस करते हैं, जितनी अधिक
मान्यता हमें अपनी कोशिशों के लिए अपने प्रभारियों को मिलती है। लेकिन इस तरह की प्रणाली
तभी तक काम कर पाती है, जब तक कि हमारे कार्यों की निगरानी करनेवाला व्यक्ति हमारे
संगठन में मौजूद रहता है और ऊपर से किसी प्रकार का दबाव महसूस नहीं करता। लेकिन यह
कोई मानक प्रणाली नहीं है और इसे हमेशा बनाए रखना भी संभव नहीं हो पाता है।
अब जरा सेना में काम
करनेवाले व्यक्तियों के बारे में सोचिए। क्या वे मान्यता व पुरस्कार के लिए काम करते
हैं ? जब वे अपनी जान जोखिम में डालते हैं तो क्या वे यह उम्मीद करते हैं कि ऊपर बैठा
अधिकारी उनके काम से खुश होकर उन्हें शाबासी देगा या पदोन्नत करेगा ? बिल्कुल नहीं।
सैनिकों की सफलता की इच्छा-शक्ति व संगठन के हितों को आगे बढ़ाने के लिए काम करने की
इच्छा सिर्फ इस बात से प्रेरित नहीं होती है कि उन्हें अपने अधिकारियों से मान्यता
मिलेगी। ये सब चीजें सेनाओं के त्याग एवं सेवा की कार्य-संस्कृति का अहम हिस्सा हैं,
जहाँ सुरक्षा संगठन के हर स्तर से प्रदान की जाती है।
आप सैनिकों से पूछकर
देखिए कि वह कौन सी चीज है, जो उन्हें खतरों से जूझने की हिम्मत प्रदान करती है? आप
हैरान होंगे कि उन्हें जान पर खेल जाने की हिम्मत या तो उनके कठोर प्रशिक्षण या उनकी
शिक्षा-दीक्षा या फिर उन्हें प्रदान की जानेवाली अत्याधुनिक हथियारों से ही मिलती है।
जी हाँ, सैनिकों के चाहे कितने ही साजो-सामान क्यों न हों, लेकिन उनके पास अपने काम
को करने की सबसे बड़ी पूँजी होती है सहानुभूति। आप सेना की वर्दीवाले किसी स्त्री या
पुरुष से पूछकर देख लीजिए कि वह अपने दूसरे साथियों को बचाने के लिए अपनी जान जोखिम
में डालने के लिए क्यों तत्पर रहते हैं, तो यही जवाब मिलेगा, "क्योंकि वे भी हमारे
लिए ऐसा ही करते हैं।"
तो क्या सैनिक आसमान
से टपकते हैं? क्या वे इसी काम के लिए पैदा हुए हैं ? हो सकता है कि कुछ लोग ऐसे भी
हों। लेकिन जहाँ भी हम काम करते हैं, वहाँ की कार्य स्थिति यदि सेनाओं जैसी हो तो हम
भी अपने साथियों के लिए मर मिटने को तैयार हो सकते हैं। जी हाँ, हममें से सभी सैनिक
साहस व त्याग का प्रदर्शन करने का सामर्थ्य व योग्यता रखते हैं। हो सकता है कि हमें
अपनी जान जोखिम में डालने या किसी और की जान बचाने के लिए न कहा गया हो, लेकिन फिर
भी हम खुशी-खुशी अपने यश को साझा करने और अपने साथ काम करनेवालों की मदद करने के लिए
तैयार हो जाएँगे। लेकिन, इसकी शर्त यह है कि जहाँ हम काम करते हैं, वहाँ ऐसा माहौल
है कि दूसरे भी हमारे लिए ऐसा करने को तत्पर हों ? जब ऐसी स्थिति होती है, जब उस तरह
के बंधन बनते हैं तो फिर सफलता व गुजर-बसर की वैसी मजबूत नींव स्थापित होती है, जो
बड़ी-से-बड़ी धनराशि, यश या पुरस्कार से नहीं खरीदी जा सकती। लेकिन यह सब उसी कार्य
समूह व कार्य-स्थल में संभव हो पाता है, जहाँ नेतृत्वकर्ता अपने कार्यदल के सभी साथियों
के कल्याण को सुनिश्चित करता है। जब नेतृत्वकर्ता अपने कार्य समूह के हितों की सुरक्षा
करता है तो बदले में सभी सदस्य भी एक-दूसरे की और संगठन की रक्षा एवं हितों को आगे
बढ़ाने के सबकुछ न्योछावर करने को तैयार रहते हैं।
जी हाँ, आपको सेनाओं
जैसी आपसी सहानुभूति वाली कार्य-संस्कृति हर उस संगठन में देखने को मिल जाएगी, जो सबसे
बड़ी सफलताएँ हासिल करते हैं, जो अपने प्रतिस्पर्धियों की युक्तियों व नवाचारों को
पटकनी देते हैं, जो संगठन के अंदर व बाहर दोनों से आदर प्राप्त करते हैं, जो कर्मचारियों
की उच्चतम निष्ठा एवं न्यूनतम छंटनी को बनाए रखते हैं और जो लगभग हर प्रकार की मुसीबतों
व चुनौतियों से मुकाबले की क्षमता रखते हैं। ऐसे सभी असाधारण संगठनों में हर स्तर के
नेतृत्वकर्ता अपने मातहत काम करनेवालों के हिंत्तों की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करते
हैं। इसीलिए उनके कार्य समूहों के हर सदस्य भी अपने साथियों व संगठन के हितों की सुरक्षा
के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए हमेशा तैयार खड़े रहते हैं। तो यह है आपसी सहानुभूति
का मूल्य और एक साथ काम करने का पहला रहस्य।
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याद रखें कि कर्मचारी
'मनुष्य' भी हैं
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तो क्या जिन कार्य-स्थलों
में आपसी सहानुभूति को महत्त्व नहीं दिया जाता है, वहाँ पर कर्मचारी काम नहीं करते
? बिल्कुल करते हैं। लेकिन, वहाँ पर लोग सिर्फ काम ही करते हैं। वे घड़ी की सुई देखकर
कार्य-स्थल पर पहुँचते हैं; घंटी बजने पर मशीन को चालू करते हैं; फिर जब लघु विश्राम
की घंटी बजती है तो अचानक मशीनें बंद हो जाती हैं और लगभग सभी कर्मी अपनी जगह छोड़
देते हैं; कुछ लोग शौचालय की तरफ भागते हैं तो कुछ चाय-कॉफी की दुकान की ओर और कुछ
बस, यूँ ही अपनी जगह पर बैठे-बैठे सुस्ताते हैं। फिर विश्राम समाप्ति की घंटी बजती
है तो सभी अपनी मशीनें चालू करते हैं और फिर से अपने काम पर जुट जाते हैं। फिर भोजनावकाश
की घंटी बजती है फिर काम शुरू होता है; फिर पहली पारी समाप्त होने की घंटी बजती है।
सभी कर्मी अपनी मशीनें बंद कर कार्य-स्थल से बाहर निकल जाते हैं। फिर दूसरी पारी शुरू
हो जाती है। यही तो होता है लगभग अधिकांश कार्य-स्थलों पर।
वर्ष 1969 में यही माहौल
था, जब रॉबर्ट एच 'बॉब' चैपमैन ने अपने पिता विलियम चैपमैन के अनुरोध पर विनिर्माण
संयंत्रों (मैन्युफैक्चरिंग प्लांट) की निर्माता बैरी-वेहमिलर कंपनीज (सेंट लुईस, मिसौरी,
अमेरिका) का कामकाज सँभाला था। इससे पहले बॉब लेखांकन प्रतिष्ठान प्राइस वाटरहाउस
(अब प्राइस वाटरहाउस कूपर्स, दुनिया की सबसे बड़ी चार लेखांकन कंपनियों में से एक)
में लेखापाल (अकाउंटेंट) की नौकरी कर रहा था। सन् 1975 में पिता की मृत्यु के बाद बॉब
चैपमैन ने मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सी.ई.ओ.) व सभापति (चेयरमैन) की जिम्मेदारी सँभाली
थी। उस वक्त तक बैरी-वेहमिलर मुख्य रूप से शराब संयंत्र का विनिर्माण कर रही थी और
उसका सालाना कारोबार 1.80 करोड़ डॉलर था। हालाँकि, उसके कामकाज सँभालने के एक महीने
बाद ही बैंक ने कंपनी के वित्त-पोषण से अपना हाथ खींच लिया था; लेकिन बॉब ने लागत कटौती
कर सन् 1976 में 2.20 करोड़ डॉलर का कारोबार किया था।
आखिर, बॉब चैपमैन ने
ऐसा कौन-सा जादू किया था कि वित्तीय संकटों के बावजूद बैरी-वेहमिलर के कारोबार में
40 लाख डॉलर का इजाफा हो गया था? जी हाँ, बॉब चैपमैन ने वह किया था, जिसे अधिकांश नेतृत्वकर्ता
अनसुना करते हैं। उसने अपने लोगों की बातें सुननी शुरू कर दी थीं और फिर बिना शोर मचाए
ऐसे छोटे-छोटे बदलाव शुरू किए थे, जिनसे कर्मियों के बीच आपसी सहानुभूति का माहौल बनने
लगा था। असल में, जब चैपमैन ने काम सँभाला था तो उसने सबसे पहले कंपनी में 27 वर्ष
पुराने वरिष्ठ कर्मचारी रॉन कैंपवेल से बातचीत का सिलसिला शुरू किया था, उसे अपने मन
की बात कहने का मौका दिया था। चूँकि चैपमैन के पिता ने कभी कैंपवेल की बातें सुनने
की जहमत नहीं उठाई थी, इसलिए कैंपवेल घबरा गया था-कहीं सी.एम.डी. को उसकी कोई बात बुरी
लग जाए तो ?
लेकिन, चैपमैन के आश्वस्त
करने के बाद कैंपवेल ने खुलकर अपनी बातें शुरू की थीं। उसने कहना शुरू किया था,
"ऐसा लगता है कि जब तुम मुझे नहीं देखते हो तो मुझ पर कुछ अधिक भरोसा करते हो,
बजाय तब के जब मैं बिल्कुल यहाँ होता हूँ।" असल में कैंपवेल अभी हाल में ही पोर्टो
रिको के एक ग्राहक के संयंत्र का मुआयना करने के बाद मुख्यालय में वापस लौटा था और
उसी के हवाले से यह बातें कह रहा था, "जब मैं बाहर ग्राहक की फैक्टरी में था,
यहाँ की तुलना में मुझे ज्यादा आजादी थी। जब से मैं फैक्टरी में दाखिल हुआ हूँ, ऐसा
लगता है मानो मेरी सारी आजादी फिसल गई। मुझे लगता है कि किसी ने मुझ पर अपना अँगूठा
रख दिया है। जब मैं अंदर आया था, तब मुझे समय-घड़ी में अपना पंच कार्ड घुसाना पड़ा
था; और फिर, जब मैं दोपहर के खाने के लिए गया, वापस आया था और जब मैंने अपना दिन पूरा
किया था, तब मुझे बाहर ऐसा नहीं करना पड़ता था।"
चैपमैन ने कभी ऐसी बातें
नहीं सुनी थीं, उसे ऐसा लग रहा था मानो सी.एम.डी. की कुरसी पर बैठकर भी वह अपने फैक्टरी
कर्मियों के बारे में कुछ नहीं जानता था। उसने कैंपवेल से अपने दिल की बातें कहने के
लिए प्रोत्साहित किया था। कैंपवेल ने आगे बोलना शुरू किया था, "मैं अभियंताओं,
लेखपालों व अन्य लोगों के साथ एक ही दरवाजे से अंदर आता हूँ। वे बाएँ दफ्तर की तरफ
मुड़ जाते हैं और मैं सीधे फैक्टरी में चला जाता हूँ, और हमारे साथ बिल्कुल अलग व्यवहार
किया जाता है। आप उन लोगों के फैसले पर भरोसा करते हैं कि सोडा या कॉफी लें या अल्पावकाश
लें; लेकिन हमें घंटी बजने तक इंतजार करने को मजबूर करते हैं।" चैपमैन चुपचाप
उसकी बातें सुनता रहा था; लेकिन वह अंदर-ही-अंदर परेशान हो गया था।
कैंपवेल ने चैपमैन को
बताया था कि संयंत्र के अन्य कर्मचारी भी उसके जैसा ही महसूस कर रहे थे। कैंपवेल ने
चैपमैन के सामने यह रहस्य खोला था कि एक ही फैक्टरी के भीतर दो अलग-अलग कंपनियाँ चल
रही थीं- एक संयंत्र के अंदर और दूसरा मुख्यालय दफ्तर में। चैपमैन को अब समझ में आया
था कि शीर्ष प्रबंधन चाहे जितनी भी कोशिशें करने का दावा करता रहा हो, कठोर सच्चाई
यह थी कि संयंत्र में मशीनों के सामने खड़े होकर काम करनेवाले कामगार यह नहीं महसूस
कर पा रहे कि कंपनी उन पर भी उतना ही भरोसा करती है, जितना कि दफ्तर में बैठनेवाले
कर्मचारियों पर। चैपमैन को जल्द ही पता चल गया था कि फैक्टरी के कामगार ऐसा क्यों महसूस
कर रहे थे। कैंपवेल ने चैपमैन के सामने चौंकानेवाला तथ्य पेश किया था कि दफ्तर में
बैठनेवाले कर्मचारी बिना किसी से पूछे कभी भी फोन कर अपने परिवार का हाल-चाल पूछ सकते
थे; जबकि इसी काम के लिए फैक्टरी के कामगारों को अनुमति लेने की जरूरत पड़ती थी।
कैंपवेल की बातें सुनने
के बाद चैपमैन ने कार्मिक विभाग के प्रमुख को बुलाया था और निर्देश दिया था कि समय-घड़ी
को तत्काल बंद किया जाए और विभिन्न अवकाशों के लिए घंटी बजाने की प्रथा को भी खत्म
कर दिया जाए। साथ ही, दफ्तर की अन्य सामान्य सुविधाओं के लिए भी कामगारों को अनुमति
से मुक्त कर दिया जाए। उसी समय चैपमैन ने मन-ही-मन फैसला कर लिया था कि अब के बाद कामगारों
से भेदभाव दरशानेवाला कोई नियम-कानून नहीं रहेगा और वह हर हाल में कामगारों का अटूट
विश्वास हासिल करके ही दम लेगा। ये बहुत ही क्रांतिकारी फैसले थे, लेकिन चैपमैन ने
इन्हें बहुत ही गुपचुप तरीके से लागू किया था। चैपमैन को पता था कि ज्यों ही कंपनी
में आपसी सहानुभूति पैदा करनेवाली कोशिशें शुरू होंगी, आपसी विश्वास नया मानक बन जाएगा।
चैपमैन ने यह सुनिश्चित
करने के लिए कि चाहे वे फैक्टरी के कामगार हों या फिर कार्यालय के कर्मचारी, सभी के
साथ मनुष्य जैसा एक समान व्यवहार किया जाए। कई अन्य जरूरी बदलाव भी किए थे, जैसे- हमेशा
से मशीनों के अतिरिक्त कल-पुरजों को तालाबंद जालीदार कमरों में रखा जाता। जब किसी कामगार
को पुरजों की जरूरत होती थी तो उन्हें जालीदार कमरों के बाहर पंक्ति में खड़ा होना
पड़ता था और अपनी बारी आने के बाद अंदर बैठे कर्मचारी के सामने अपनी माँग रखनी पड़ती
थी। कामगारों को उस जालीदार कमरे में जाने की अनुमति नहीं थी। कंपनी के प्रबंधन ने
यह व्यवस्था कल-पुरजों की चोरी को रोकने के लिए बनाई थी। इस व्यवस्था से भले ही चोरी
को रोकने की कोशिश की गई थी, लेकिन यह सख्त चेतावनी भी थी कि शीर्ष प्रबंधन कामगारों
पर भरोसा नहीं करता था। चैपमैन ने उन कमरों से ताला हटाने का और कामगारों को अपने आप
जरूरी कल-पुरजों लेने का आदेश जारी कर दिया था।
इतना ही नहीं, चैपमैन
ने फैक्टरी के भीतर स्थापित भुगतान-दूरभाषों (पे फोन) को बाहर कर दिए थे और कामगारों
के उपयोग के लिए कंपनी की तरफ से कई दूरभाष लगवा दिए थे। अब किसी कामगार को निजी बातचीत
के लिए न तो सिक्कों की जरूरत थी और न ही किसी से अनुमति लेने की। वे जब चाहें, किसी
से भी बातचीत कर सकते थे। अब मुख्यालय के कर्मचारियों और संयंत्र के कामगारों के भेद
को पूरी तरह खत्म कर दिया गया था। कंपनी में काम करनेवाला कोई भी व्यक्ति मुख्यालय
के किसी भी दरवाजे या संयंत्र के किसी भी हिस्से में अपनी मरजी से किसी भी समय आने-जाने
के लिए स्वतंत्र था। बिल्कुल कोई रोक-टोक नहीं; सभी कंपनी के थे और कंपनी उनकी थी।
शुरुआती हिचक के बाद जल्द ही यह एक सामान्य व्यवस्था बन गई थी। इस तरह, चैपमैन ने दिमाग
से काम करनेवाले और हाथ से काम करनेवाले के बीच हर प्रकार की भेदभावपूर्ण व्यवस्था
को खत्म कर दिया था। अब सभी मनुष्य थे, न कि कर्मचारी, अधिकारी या कामगार।
इसका नतीजा क्या निकला
था? बहुत ही कम समय में कंपनी एक परिवार की तरह बनने लगी थी। व्यवस्था में मामूली बदलावों
से कंपनी के भीतर का माहौल बदल गया था। लोग भी वही थे, स्थान भी वही था; लेकिन उनके
बीच के आपसी व्यवहार बदल गए थे। सभी खुद को कंपनी से जुड़ा हुआ महसूस करने लगे थे;
सभी को अपना महत्त्व नजर आने लगा था और सभी दूसरे को महत्त्व देने लगे थे। अब हर कोई
दूसरे का खयाल रखने लगा था, क्योंकि दूसरा भी उसका खयाल रख रहा था। आपसी सहानुभूति
के उस माहौल ने हर किसी को अपने काम में दिल व दिमाग दोनों झोंक देने के लिए मजबूर
कर दिया था। अब संगठन उनका व उनके साथियों का खयाल रख रहा था और वे अपने साथियों व
संगठन का खयाल करने लगे थे।
रोचक तथ्य यह है कि
इस दौरान पेट विभाग के एक कर्मचारी के ऊपर भारी मुसीबत आन पड़ी थी। उसकी पत्नी को मधुमेह
था और उसकी टाँग कटवाने की नौबत आ पड़ी थी। उसे अपनी पत्नी की सहायता के लिए छुट्टी
की जरूरत थी; लेकिन वह छुट्टी लेकर अपना वेतन कटवा सकने की स्थिति में भी नहीं था।
शीर्ष प्रबंधन को इस बात का पता तब चल सका था, जब उस विभाग के अन्य कर्मचारियों ने
अपनी बची छुट्टियाँ उक्त कामगार के खाते में स्थानांतरित करने का आवेदन किया था। इस
तरह, उस कर्मचारी को वेतन कटवाने की जरूरत नहीं पड़ी थी और वह अपनी पत्नी की सहायता
के लिए ज्यादा समय भी निकाल पाया था। हालाँकि, यह सब कंपनी के घोषित नियमों का सरासर
उल्लंघन था, फिर भी प्रशासनिक विभाग ने समय की जरूरत और कामगारों की सामूहिक भावना
का आदर करते हुए उसके लिए विशेष प्रावधान करने का फैसला किया था।
ध्यान देने की बात है
कि कामगारों ने सिर्फ अपने साथियों का ही खयाल नहीं रखा था, बल्कि वे अपनी मशीनों का
भी ज्यादा ध्यान रखने लगे थे। इस कारण मशीनों की टूट-फूट कम हो गई थी, उनकी मरम्मत
में कम कल-पुरजों की लागत होने लगी थी और काम रुकने का समय काफी कम हो गया था। कंपनी
को इसका यह लाभ मिला था कि संयत्र के रख-रखाव की लागत काफी कम हो गई थी और उत्पादन
भी बढ़ गया था। इतना ही नहीं, उत्पादों की गुणवत्ता में जादुई सुधार हुए थे; ग्राहक
सेवाएँ ज्यादा फुरतीली हो गई थीं और जब पहला साल बीता तो पता चला था कि कंपनी का सालाना
कारोबार पिछले साल के मुकाबले 40 लाख डॉलर ऊपर चला गया था। चैपमैन ने अतिरिक्त राजस्व
को नई प्रौद्योगिकियों में निवेश किया था और अगले चार वर्षों में कंपनी का सालाना कारोबार
2.20 करोड़ डॉलर (1976) से बढ़कर 7.10 करोड़ डॉलर (1980) के स्तर पर पहुँच गया था।
चौंकिए मत। अगले 35
वर्षों में बॉब चैपमैन ने दुनिया भर की कुल 70 कंपनियों का अधिग्रहण कर समूह के कारोबार
को 10 सहायक कंपनियों में पुनर्गठित किया था और वर्ष 2015 तक बैरी-वेहमिलर को 1.8 अरब
डॉलर का सालाना कारोबार करनेवाली विश्व व्यापी अभियांत्रिकी समूह में बदल दिया था।
चैपमैन ने इस क्रांतिकारी कारोबारी यात्रा के अनुभवों को अपनी पुस्तक 'एवरीबॉडी मैटर्स'
(अक्तूबर 2015) में दर्ज किया है।
बॉब चैपमैन का 'सच्चा
मानवीय नेतृत्व'
बॉब चैपमैन ने अपने
अद्भुत कारोबारी दर्शन को 'सच्चा मानवीय नेतृत्व' (टूली ह्यूमन लीडरशिप) नाम दिया है।
चैपमैन बेधड़क यह घोषणा करता है, "जब लोगों को संगठन के अंदर के खतरों से निपटना
पड़ता है, तब संगठन खुद भी बाहर से खतरों का सामना करने में कम सक्षम हो जाता है।"
तो सच्चा मानवीय नेतृत्व
क्या करता है? चैपमैन का यही कहना है कि सच्चा मानव नेतृत्व अपने संगठन की कार्य-संस्कृति
को तहस-नहस कर देने वाली आंतरिक प्रतिद्वंद्विता से सुरक्षित रखता है। जब एक संगठन
या कार्य समूह में हमें एक-दूसरे से सावधान रहना पड़े, अपनी रक्षा करनी पड़े तो हम
अपने समूह या संगठन के बारे में क्या कुछ पाएँगे? इसके उलट, यदि संगठन या समूह के अंदर
विश्वास एवं आपसी सहयोग की भावना को पनपने का मौका मिलता है तो हम एक-दूसरे को नजदीक
खींचने लगते हैं; हमारे बीच सच्ची सहानुभूति का माहौल कायम होता है, हम सभी अपने काम
में दिल व दिमाग दोनों झोंकने लगते हैं; उत्पादन बढ़ता है, सेवाएँ सुधरती हैं, कारोबार
बढ़ता है और हमारा संगठन पहले से ज्यादा मजबूत होकर सामने आता है।
चैपमैन सीधे तौर पर
यह तो नहीं कहता है कि सच्चे मानवीय नेतृत्व के अभाव में ही आजकल के अधिकांश कारोबारी
संगठन आंतरिक प्रतिद्वंद्विता की भयानक बीमारी के शिकार हैं, लेकिन उसका इशारा साफ
है। इस बात की बहुत अधिक आशंका है कि आप जिस कारोबारी संगठन के लिए काम कर रहे हों,
वह भी इसी संकट से जूझ रहा हो ? वैसे, किसी भी संगठन के नेतृत्व से बात कर देखिए, सभी
यही दावा करते हैं कि वे आदर्श मानव संसाधन प्रबंधन प्रणाली (ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट
सिस्टम) पर काम कर रहे हैं। तो फिर, अधिकांश कंपनियाँ अपने कर्मचारियों को साथ बनाए
रख पाने में क्यों विफल हो रही हैं ? 'कार्य संतुष्टि' (जॉब सैटिस्फेक्शन) के अभाव
में अधिकतर कर्मचारी मानसिक रोगों के शिकार क्यों बन रहे हैं? और भारी सार्वजनिक पूँजी
झोंकने के बावजूद बड़ी-बड़ी निगमित कंपनियों की अधिकांश परियोजनाएँ क्यों विफल हो रही
हैं। इन सभी सवालों का जवाब चैपमैन के कथन में मिलता है कि अधिकांश कंपनियाँ सच्चे
अर्थों में मानवीय नेतृत्व नहीं प्रदान कर पा रही हैं। क्या यही कारण नहीं है कि दुनिया
भर में एक तरफ करोड़ों कमानेवाले शीर्ष पेशेवर नेतृत्व की सूची लंबी होती जा रही है
तो दूसरी तरफ बेरोजगारों की संख्या भी बढ़ती जा रही है?
लेकिन, आपसी प्रतिद्वंद्विता
के इस भयानक दौर में भी बॉब चैपमैन जैसा व्यक्ति उभरकर सामने आता है; वह सच्चे मानवीय
नेतृत्व को अपने कारोबारी सपनों का आधार बनाने की हिम्मत जुटाता है और फिर अपनी आश्चर्यकारी
उपलब्धियों से दुनिया को चौंकाता है। तो चैपमैन को ऐसा कौन सा रहस्य पता चल गया था
कि उसने अपने भीतर सच्चे मानवीय नेतृत्व को उभरने का मौका दिया था ? जी हाँ, उसने मानव
शरीर-रचना विज्ञान (ह्यूमन एनाटोमी) के आधारभूत तत्त्वों की बारीकी को समझने की कोशिश
की थी। उसे पता चला था कि मानव शरीर के अंदर वैसी हर प्रकार की प्रणालियाँ मौजूद हैं,
जो इस प्रजाति को जीवित बने रहने व फूलने-फलने में मदद करती हैं।
यही कारण है कि हजारों
वर्ष पहले जब अन्य सभी आदिम प्रजातियाँ खत्म होती चली गई थीं, तब भी मानव प्रजाति न
केवल खुद को जिंदा रख पाने में सफल रही थी, बल्कि हर संकट के बाद पहले से ज्यादा मजबूत
बनकर उभरी थी। रोचक तथ्य यह भी है कि अन्य प्रजातियों की तुलना में मानव का अस्तित्व-काल
अपेक्षाकृत काफी कम रहा है, फिर वह सबसे ज्यादा सफल रही है और पृथ्वी ग्रह पर एकमात्र
अद्वितीय स्तनधारी प्राणी है। और, सच्चाई यह कि मानव प्रजाति इतना अधिक सफल रही है
कि उसका हर फैसला पृथ्वी ग्रह के अन्य सभी प्राणियों के जीवित रहने या फूलने-फलने की
क्षमता को प्रभावित करती है। इससे भी आगे बढ़कर, कुछ मानव समुदाय इतने शक्तिशाली हो
गए हैं कि अपनी ही प्रजाति के अन्य मानव समुदायों के अस्तित्व की क्षमता को प्रभवित
करने लगे हैं।
इस तरह, हम मानव प्रजाति
के अंदर की प्रणालियाँ हमें न केवल बाहरी खतरों से रक्षा करती हैं, बल्कि हम जिस भी
माहौल में रहते तथा कार्य करते हैं, उसमें हमारे सर्वोत्तम हितों के लिए जरूरी व्यवहार
को दोहराने के लिए उत्साहित करती हैं। इसीलिए जब हम खतरा महसूस करते हैं तो हमारी आंतरिक
प्रतिरक्षा प्रणाली तेज हो जाती है और हम सचेत व्यवहार करने लग जाते हैं। इसके उलट,
जब हम अपने लोगों या समुदायों या संगठनों में खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं, तो हमारी
आंतरिक प्रणाली स्वाभाविक आराम की स्थिति में आ जाती है और हम दूसरों पर विश्वास व
सहयोग करने के लिए ज्यादा खुल जाते हैं।
उच्च कार्य-प्रदर्शन
करनेवाले संगठनों, जहाँ पर काम पर आने के बाद लोग खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं,
का अध्ययन कुछ चौंकानेवाले तथ्य उजागर करते हैं। वहाँ की कार्य-संस्कृतियाँ बिल्कुल
उन्हीं भयानक परिस्थितियों का सादृश्य निर्माण करती हैं, जिनमें कार्य करने के लिए
आदिम मानव प्रजाति की रचना हुई थी। जी हाँ, मानव प्रजाति का उत्थान एवं विकास कभी भी
शांतिपूर्ण माहौल में नहीं हुआ है। मानव प्रजाति हमेशा से ही ऐसी शत्रुतापूर्ण व प्रतिस्पर्धी
दुनिया में काम करती आ रही है, जहाँ पर प्रत्येक समूह अनंत संसाधनों को हासिल करने
की कोशिशों में जुटा रहा है। तो, हमारे अंदर की जो प्रणालियाँ हमें उन भीषण परिस्थितियों
में एक प्रजाति के रूप में जीवित रहने और फलने-फूलने में मदद करती रही हैं, वही प्रणालियाँ
संगठनों को भी जीवत रहने, फूलने-फलने एवं महान् उपलब्धियाँ हासिल करने में मदद करती
हैं।
तो सामूहिक कार्य की
सफलता का रहस्य न तो तथाकथित आधुनिक प्रबंधन सिद्धांतों में छुपा हुआ है और न ही सपने
साकार करनेवाले कार्य समूहों में। यह बस, जीव विज्ञान (बायोलॉजी) व मानव विज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी)
का विषय है। यदि कुछ निश्चित शर्तें पूरी कर दी जाती हैं तो किसी संगठन के भीतर लोग
खुद दूसरों के बीच में सुरक्षित महसूस करने लगते हैं और फिर वे उन चीजों को हासिल के
लिए दूसरों के साथ मिलकर काम करने लग जाते हैं जो उन्होंने कभी अकेले हासिल नहीं की
होता हैं। नतीजा यह निकलता है कि वह संगठन तमाम प्रतिस्पर्धियों के बीच अपना झंडा बुलंद
करने लगता है।
यही कुछ तो बॉब चैपमैन
ने अपनी कंपनी बैरी-वेहमिलर में किया था। उसने अपनी फैक्टरी के कार्य-वातावरण में बदलाव
के लिए कोई भारी-भरकम योजना नहीं बनाई थी, बल्कि मामूली से बदलाव किए थे, जो जीव विज्ञान
की सामान्य शर्तों को पूरा करती थीं। उसके चलते कंपनी में जो नई कार्य-संस्कृति विकसित
हुई थी, वह कार्य समूहों को अपने सदस्यों के अंदर सर्वोत्तम बाहर निकालने में सक्षम
बनाती थी। तो चैपमैन या उनके जैसे अन्य लोग अपने कार्य समूहों या उनके अंदर के लोगों
को बदलने की कोशिश नहीं करते, बल्कि उन कार्य-परिस्थितियों में बदलाव कर देते हैं।
आखिर चैपमैन जैसे लोग वैसी कार्य-संस्कृतियाँ बनाने में क्यों सफल हो जाते हैं, जो
अपने लोगों को अपना सबकुछ दे देने को प्रेरित करती हैं? इसका सीधा जवाब इस तथ्य में
छुपा हुआ है कि हम वही करते हैं, जो हम करना चाहते हैं, मतलब, चैपमैन जैसे लोग अपने
कार्य स्थल से खुद भी प्यार करते हैं और अपने आसपास वैसा ही स्वाभाविक मानवीय वातावरण
निर्माण करते हैं, जिसमें खुद को भी आनंदित महसूस करते हैं।
अब सवाल यह उठता है
कि हम जो भी करते हैं, वह क्यों करते हैं ? अपनी शारीरिक संरचना पर ध्यान दीजिए तो
आपको आसानी से पता चल जाएगा कि हमारे अंदर सारी प्रणालियों का विकास हमें भोजन खोजने,
जीवित रखने और अपनी प्रजाति को उन्नत बनाने में मदद करने के लिए हुआ है। वैसे, जैसे
मानव सभ्यता विकसित होती गई है, वैसे-वैसे हमारी भोजन खोजने तथा खुद को सुरक्षित रखने
की व्यस्तताएँ कम होती चली गई हैं। अब हम कम-से-कम कंदराओं में रहनेवाले आदिम मानव
प्रजाति की तरह तो नहीं ही हैं। अब हमें शिकार करके भोजन इकट्ठा करने की जरूरत नहीं
पड़ती। अब हमें न तो खुद को जंगली जानवरों के भोजन बन जाने से और न ही दूसर
मानव समूहों से अपने
भोजन को सुरक्षित रखने की जरूरत पड़ती है। आधुनिक समाज में हमारी जरूरतें भी बदल गई
हैं और सफलता के पैमाने भी। अब पेशेवर जीवन की उन्नति, खुशी व संतुष्टि ढूँढ़ने की
कोशिशें ही हमारी सफलता की परिभाषा बन गई हैं। यदि हम अपने शरीर की आंतरिक कार्य-प्रणालियों
को गौर से देखें तो साफ पता चलता है कि वे आज भी हजारों साल पहले आदिम मानव की तरह
ही परिचालित हो रही हैं। हमारा आदिम मस्तिष्क अभी भी अपने आसपास की दुनिया को अपनी
भलाई या सुरक्षा-प्राप्ति के अवसरों के खतरे के संदर्भ में ही देखती है। यदि हम समझ
लेते हैं कि ये प्रणालियाँ किस प्रकार काम करती हैं तो हम अपने लक्ष्यों तक पहुँच सकने
के लिए खुद को बेहतर उपकरणों से लैस कर सकते हैं। साथ ही, हम जिन समूहों में काम करते
हैं, उन्हें भी सफल व उन्नतिशील बनाने के लिए ज्यादा सक्षम बना सकते हैं।
लेकिन आज की आधुनिक
दुनिया में भी, जब हमने मानव संसाधन विकास व प्रबंधन की तथाकथित उन्नत प्रणालियाँ विकसित
कर ली हैं, ऐसी कंपनियों व संगठनों की संख्या बहुत कम है, जो वास्तव में अपने कर्मचारियों
का विश्वास हासिल कर पाने में और उन्हें अपना सबकुछ देने के लिए सुरक्षित माहौल दे
पाने में सफल हो रही हैं। हकीकत यही है कि बहुसंख्यक कंपनियों व संगठनों की कार्य-संस्कृति
के मानदंड हमारी स्वाभाविक जीव-वैज्ञानिक झुकावों के खिलाफ काम करते हैं। यही कारण
है कि खुश, प्रेरित व परिपूर्ण महसूस करनेवाले कर्मचारियों को ढूँढ़ पाना बहुत ही मुश्किल
होता जा रहा है। पेशेवर सेवाएँ देने वाली बहुराष्ट्रीय प्रतिष्ठान डेलॉयट के कार्य-संतुष्टि
सर्वेक्षणों के मुताबिक दुनिया भर में 80 प्रतिशत से अधिक कर्मचारी अपनी नौकरियों से
असंतुष्ट हैं। अब जरा कल्पना कीजिए कि जब काम करनेवाले लोग अपने कार्यों से ही संतुष्ट
नहीं हैं तो वे कैसा कार्य-उत्पादन कर पा रहे होंगे और वे जिन कंपनियों व संगठनों में
नियुक्त हैं, उनका कारोबारी प्रदर्शन कैसा होता होगा ? फिर भी, हम कंपनियों की सफलताओं
को वर्षों या दशकों में नहीं, बल्कि तिमाही नतीजों से नापते हैं।
अब, सबसे बड़ा सवाल
यह है कि यदि हमारा कारोबारी माहौल लोगों की बजाय छोटी अवधि परिणामों व लाभ राशि पर
केंद्रित है तो हमारा विश्व समाज किस दिशा में आगे बढ़ रहा है? जब हमें कार्य-स्थलों
में खुशी व अपनापन ढूँढ़ने के लिए संघर्ष करना पड़ता है तो हम उस संघर्ष को भी अपने
घर के अंदर घसीट लाते हैं। तो क्या आधुनिक मानव समाज इसी विनाशकारी उपलब्धि के लिए
संघर्ष कर रहा है ? बिल्कुल नहीं। यह अपवाद नहीं, बल्कि नियम होना चाहिए कि अधिकतर
लोग जब काम पर से घर लौटें तो खुद को प्रेरित, सुरक्षित, परिपूर्ण व आभारी महसूस करें।
यह हमारा स्वाभाविक मानवाधिकार है और हम इसके हकदार हैं। यह कोई आधुनिक विलासिता नहीं
है, जो चंद भाग्यशाली लोगों को उपलब्ध हो। जी हाँ, बॉब चैपमैन जब 'सच्चा मानवीय नेतृत्व'
की बात करता है तो उसका मतलब यही है कि कर्मचारियों के साथ सचमुच में मानव जैसा व्यवहार
हो, ताकि वे अपने स्वाभाविक मानवाधिकार को हासिल कर सकें। चैपमैन ने अपने संगठन में
यही कुछ सुनिश्चित करने की कोशिश की है और ऐसी ही कोशिशें अन्य कंपनियों में की जाने
की भारी जरूरत है। और, यही सामूहिक कार्य-संस्कृति की सफलता का रहस्य भी है।
आखिर ऐसा क्या हुआ था,
जब बॉब चैपमैन को 'सच्चा मानवीय नेतृत्व' का बोध हुआ था? असल में, चैपमैन अपनी पत्नी
के साथ गिरजाघर में आयोजित एक विवाह समारोह को देख रहा था। दुलहन को अपनी तरफ बढ़ता
देख दूल्हा खड़ा हुआ था। उनमें एक-दूसरे के प्रति प्यार का एहसास साफ नजर आ रहा था।
वहाँ मौजूद सभी ने उनकी इस भावना को महसूस किया था। फिर, सदियों से चली आ रही परिपाटी
का पालन करते हुए पिता ने अपनी पुत्री का हाथ उसके भावी पति के हाथों में सौंप दिया
था। चैपमैन को पहली बार इस पुरानी परिपाटी के पीछे का तर्क समझ आया था। एक पिता, जो
अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए कुछ भी कर सकता था, वही अब रस्मी तौर पर अपनी जिम्मेदारी
किसी दूसरे के हाथों में सौंप रहा था। बेटी का हाथ सौंपने के बाद पिता वापस अपने आसन
पर आ बैठा था। अब उसके चेहरे पर अद्भुत संतोष व भरोसे का भाव प्रकट हो रहा था। ऐसे
लग रहा था, मानो वह अपनी वर्षों की जिम्मेदारी को बिल्कुल सही हाथों में सौंप आया था,
जो अब आगे उसी की तरह उसकी बेटी की सुरक्षा करता रहेगा। चैपमैन को समझ में आ गया था
कि यही बात हरेक कंपनी पर भी लागू होती है।
चैपमैन का मानना है
कि हरेक कर्मचारी किसी का पुत्र या किसी की पुत्री है। हरेक माता-पिता अपने बच्चे को
अच्छी जिंदगी, अच्छी शिक्षा तथा जिंदगी को खुशहाल बनानेवाले सारे हुनर सिखाने के लिए
काम करता है, ताकि वे ईश्वर से आशीर्वाद के रूप में मिली अपनी सभी प्रतिभाओं का उपयोग
कर पाने के काबिल बन सकें। उसके बाद जब वे माता-पिता अपने बच्चों के हाथ किसी कंपनी
के हाथों में सौंपते हैं तो उनकी उम्मीद यही होती है कि अब वह कंपनी भी उनकी ही तरह
उन बच्चों की देखभाल करेगी। चैपमैन ने कई अवसरों पर कंपनी के संचालक के नाते अपनी इस
महान् जिम्मेदारी को घोषित किया था कि "वे हम लोग यानी कंपनियाँ हैं, जो अब उन
अनमोल जिंदगियों के लिए जिम्मेदार हैं।
यही तो किसी भी समूह,
कंपनी या संगठन का नेतृत्वकर्ता होने का मतलब होता है। क्या ऐसी मजबूत धारणा के बिना
कोई नेतृत्वकर्ता अपने कार्य समूहों के सदस्यों से उनका सर्वोत्तम निकाल पाने की उम्मीद
कर सकता है? बिल्कुल नहीं। चैपमैन की धारणा भले ही समर्पित उपदेशकों जैसी लगती है,
लेकिन क्या कोई नेतृत्वकर्ता अपने साथियों के पिता होने की जिम्मेदारी से बच सकता है
? चैपमैन का स्पष्ट मत है कि नेतृत्वकर्ता अपने कर्मचारियों के लिए पिता की तरह ही
होता है और जब वह अपने कर्मचारियों को पिता जैसी सुरक्षा प्रदान कर पाने में सक्षम
होता है तो फिर कर्मचारी कंपनी को अपना नया घर समझने लगते हैं। जब कर्मचारियों को एहसास
होता है कि कंपनी हर सुख-दुःख में उसके साथ खड़ी है तो वे कंपनी को अपना परिवार और
अन्य कर्मचारियों को अपने सगे समझने लगते हैं। और, जब ऐसा होता है तो वे अपनी निष्ठा
को प्रकट करने लिए अपने परिवार की तरह कंपनी को भी अपनी पहचान बना लेते हैं। तब कंपनी
व कर्मचारी का भेद मिट जाता है और काम पारिवारिक जिम्मेदारी बन जाता है। और जब कर्मचारी
अपनी कंपनी से परिवार व अन्य कर्मचारियों से सगे की तरह प्रेम करने लगता है, तभी सही
मायने में कार्य स्थलों में सामूहिक कार्य-भावना का विकास होता है और कार्य समूह अपने
नेतृत्वकर्ता के सपने को पूरा कर पाता है।
आज के घोर पूँजीवादी
युग में चैपमैन की बातें आध्यात्मिक प्रवचन जैसी लग सकती हैं। लेकिन, बड़ी विडंबना
यही तो है कि असल में पूँजीवाद भी तभी बेहतर तरीके से काम कर पाता है, जब इसे मानव
शरीर विज्ञान के आधार पर लागू किया जाता है। मतलब, जो पूँजीवादी व्यवस्था मनुष्य को
अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर पाने का मौका देती है, वही ज्यादा कामयाब होती है। असल
में, पूँजीवाद ऐसी आर्थिक व राजनीतिक प्रणाली है, जिसमें किसी देश का व्यापार व उद्योग
सरकार की बजाय निजी मालिकों द्वारा लाभ के लिए नियंत्रित किया जाता है। हम इस परिभाषा
का सही अर्थ निकाल पाने में अकसर चूक कर जाते हैं। माना कि पूँजीवाद का उद्देश्य लाभ
कमाना है और वह भी निजी नियंत्रण में; लेकिन लाभ मिलेगा कैसे ? सीधा जवाब है कि जब
कम लागत में ज्यादा उत्पादन होगा। अब अगला सवाल यह है कि ऐसा कब संभव होगा? जब निजी
क्षेत्र अपने कर्मचारियों से ज्यादा उत्पादन ले पाएगा। और यह तब तक संभव नहीं हो पाएगा,
जब तक वह कर्मचारियों के साथ सही मायने में मानवीय व्यवहार करेगा।
लेकिन, विडंबना यही
है कि पूँजीवाद के लाभ सिद्धांतों पर चलने का दावा करनेवाली अधिकतर कंपनियाँ कर्मचारियों
एवं उनकी प्रतिभा को कच्चा माल से ज्यादा कुछ नहीं मानतीं। लेकिन उनके नेतृत्वकर्ता
इस सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पाते कि कर्मचारी मनुष्य भी हैं, सिर्फ कच्चा माल नहीं।
और, मनुष्य ऐसा कच्चा माल है, जो एक ही बार में इस्तेमाल नहीं होता, बल्कि उसे जितना
भरोसा व प्यार मिलता है, वह ज्यादा बेहतर कच्चा माल साबित होता है तथा कम लागत पर बेहतर
उत्पादन एवं बेहतर लाभ का कारण भी बन सकता है। आप किसी भी नवाचारी कंपनी का उदाहरण
ले सकते हैं। वे अपने मानव-संसाधन को ही सही मायने में सबसे बड़ी पूँजी समझते हैं और
उनकी देखभाल का सबसे अधिक ध्यान रखते हैं; क्योंकि वे मनुष्य की जादुई क्षमता को भी
समझते हैं और उसकी संवेदनशीलता को भी समझते हैं। वे 'मनुष्य' को नहीं, बल्कि उसकी
'कार्यक्षमता' को कच्चा माल समझते हैं, जो सुरक्षित माहौल में आश्चर्यजनक रूप से बढ़ती
है। जब कार्य-स्थल में मौजूद मनुष्य कर्मचारी खुद को सुरक्षित माहौल में पाता है तो
दिल व दिमाग दोनों झोंककर अपने कर्तव्य को पूरा करने की कोशिश करता है। वह जहाँ कहीं
भी खुद को कमजोर पाता है, वहाँ उसे अपना साथी हाथ बँटाने के लिए तत्पर मिलता है; फिर
वह अपनी चिंता भूलकर अपने कार्य समूह या संगठन या कंपनी के लक्ष्य को हासिल करने के
लिए अपनी जान भी जोखिम में डालने को तत्पर हो जाता है।
आपने प्राचीन यूनान
के दास कथाकार ईसप की दंतकथाएँ जरूर पढी होंगी। उनमें एक लोकप्रिय कथा यह भी है। एक
खेत में चार बैल चरा करते थे। वे इतने हहृष्ट-पुष्ट थे कि उन्हें देखकर एक शेर के मुँह
में पानी आ जाता था। वह शेर खेत के आसपास घात लगाकर बैठ गया था। लेकिन जब भी वह उन
बैलों पर आक्रमण करता तो वे एक सुरक्षा-चक्र बना लेते थे। उनकी पूँछें पीछे हो जाती
थीं और सींगें आगे तथा वे एक चक्र बनाकर घूमने लग जाते थे। ऐसे में शेर जिधर से भी
आक्रमण करने की कोशिश करता था, उसे किसी-न-किसी बैल के सींगों का ही सामना करना पड़ता
था। लेकिन कुछ समय बाद वे आपस में झगड़ने लगे थे और एक-दूसरे से अलग-थलग रहने लगे थे।
शेर तो घात लगाए बैठा ही था। उसने एक पर आक्रमण किया था; लेकिन इस बार उसे बचाने बाकी
तीनों बैल नहीं आए। वे खेत के अलग-अलग कोने में एक-दूसरे से बेपरवाह बैठे रहे थे। इस
तरह शेर को उन्हें भी बारी-बारी से शिकार बनाने का मौका मिल गया था।
इस दंतकथा का भावार्थ
यही है कि लोगों के एक समूह द्वारा उल्लेखनीय कार्य करने की क्षमता इस बात पर निर्भर
करती है कि वे एक कार्य समूह के रूप में किस प्रकार से एकजुट होते हैं। लेकिन एकजुटता
की यह भावना शून्य में नहीं पैदा होती है।
अपने आसपास की दुनिया
पर नजर घुमाकर देखिए, तत्काल पता चल जाएगा कि हम हमेशा खतरों से घिरे हुए हैं। हमारे
चारों तरफ ऐसी चीजों की भरमार है, जो हमारी जिंदगी को दयनीय बनाती हैं। लेकिन आपको
यह भी एहसास होगा कि वे चीजें व्यक्तिगत रूप से आपको ही अपना निशाना नहीं बना रही हैं;
वे तो सबके लिए बस वैसी ही हैं, जैसी कि उन्हें होना चाहिए। जरा ध्यान से देखिए, हमारे
आसपास किसी भी समय, कहीं से भी और कितनी भी संख्या में ऐसी शक्तियाँ बिना किसी प्रकार
के विवेक के हमारी सफलता में बाधा पहुँचाने के लिए-यहाँ तक कि हमें मारने के लिए भी
काम करती नजर आ जाएँगी। जब हजारों वर्ष पहले हम लोगों के पूर्वज कंदराओं में रहते थे,
तब बिल्कुल यही स्थितियाँ थीं। हमारे पूर्वजों को उन सभी प्रकार की चीजों से लगातार
धमकियाँ मिलती रहती थीं, जो पृथ्वी पर उनके अस्तित्व को समाप्त कर सकती थीं। वे चीजों
में जीवित रह पाने के संसाधनों के अभाव, जंगली आदमखोर जानवर या फिर भयानक मौसम भी शामिल
हो सकते थे। लेकिन, यह सबकुछ किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं था, तब बस जिंदगी ही वैसी
थी। और, यही सच है कि वैसी ही जिंदगी आज भी जारी है; और आगे भी ऐसे ही जारी रहेगी।
हमारे अस्तित्व के लिए खतरे निरंतर बने रहे थे, हैं और रहेंगे।
जहाँ तक आधुनिक युग,
कारोबार व संगठन की बात है, हमें खतरों से मुकाबला करना पड़ता है। उनमें वास्तविक खतरे
भी शामिल हैं और माने गए खतरे भी। शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं और वे किसी
कंपनी के कार्य-प्रदर्शन को प्रभावित कर सकते हैं। बाजार में कभी भी कोई नई प्रौद्योगिकी
आ सकती है, जो पुरानी प्रचलित प्रौद्योगिकी को पछाड़ सकती है या फिर समूचे कारोबारी
प्रारूप को ही रातोरात अप्रचलित कर सकती है। भले ही हमारे प्रतिस्पर्धी जान बूझकर हमारे
खिलाफ काम नहीं कर रहे हों। फिर भी उनका बेहतर कार्य-प्रदर्शन हमारे लिए नुकसानदेह
साबित हो सकता है। भले ही वे अपना ग्राहक आधार बढ़ाने की कोशिशें कर रहे हों, फिर भी
वे हमारे ग्राहक-आधार में ही सेंधमारी कर रहे होते हैं और भले ही वे अपनी लाभदायकता
को बढ़ाने में सफल हो रहे हों, फिर भी वे हमारे लिए घाटे की स्थिति को पैदा करने के
कारण बन रहे होते हैं। इतना ही काफी नहीं है, ग्राहकों की अपेक्षाओं को पूरा करने की
तात्कालिकता, उत्पादन व सेवा क्षमता का तनाव और अन्य बाहरी दबाव- सभी हमारे कारोबार
के खतरों में निरंतर अपना-अपना योगदान करते रहते हैं। ये सभी ताकतें प्रत्यक्ष या परोक्ष
रूप से हमारे कारोबार की वृद्धि व लाभदायकता में बाधा पहुँचाने के लिए निरंतर काम कर
रही होती हैं। लेकिन उन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता। वे कभी भी खत्म नहीं होने
वाली हैं; वे कभी भी बदलने वाली नहीं हैं। क्योंकि वे जैसी थीं, वैसी अभी भी हैं और
आगे भी वैसी ही बनी रहेंगी।
इन बाहरी ताकतों से
भी ज्यादा खरतनाक हैं आंतरिक ताकतें, जो हमारे संगठन के भीतर मौजूद रहती हैं और हम
पर निरंतर दबाव भी बनाए रखती हैं। रोचक तथ्य यह है कि बाहरी ताकतों के उलट आंतरिक ताकतें
परिवर्तनशील भी होती हैं और उन पर बाकायदा हमारा नियंत्रण भी होता है। कुछ खतरे वास्तविक
होते हैं और वे तात्कालिक रूप से प्रभाव डाल सकते हैं; जैसे कि खराब तिमाही या वार्षिक
प्रदर्शन के बाद होनेवाली छंटनी। इसी तरह, कई लोगों के सामने आजीविका छिन जाने का भी
खतरा पैदा हो सकता था, जब वे कुछ नया करने की कोशिश में कंपनी की पूँजी ही गँवा बैठते
हैं। कार्य-क्षेत्र में एक-दूसरे को पीछे धकेलकर आगे बढ़ने की प्रतिद्वंद्वितापूर्ण
राजनीति भी निरंतर खतरे का माहौल बनाए रखती है। इसके अलावा कार्य-स्थल पर धमकी, अपमान,
अलगाव, भावना-शून्यता, निरर्थकता व अस्वीकृति ऐसे दबाव हैं, जो कर्मचारियों की कार्य-क्षमता
को बुरी तरह प्रभावित करते हैं।
लेकिन ये सभी ऐसे खतरे
हैं, जिन्हें 'सच्चा मानवीय नेतृत्व' आसानी से नियंत्रित कर सकता है। ऐसा अपनी कंपनी
के अंदर ऐसी सुरक्षात्मक कार्य-संस्कृति विकसित करता है, जो कर्मचारियों को आपसी प्रतिद्वंद्विता
भुलाकर एक-दूसरे के साथ मिल-जुलकर रहने के लिए प्रेरित करता है और उनके बीच आपसी सहानुभूति
का माहौल बनता है। जब नेतृत्वकर्ता अपने कर्मचारियों के लिए कार्य-स्थल पर सुरक्षा-चक्र
का निर्माण करता है तो वे दिल व दिमाग का उपयोग अपनी कंपनी की सुरक्षा में कर पाते
हैं। याद रहे कि किसी कंपनी की ताकत व सहन-शक्ति उसके उत्पादों या सेवाओं से नहीं मिलती,
बल्कि उनके कर्मचारियों की एकजुटता से मिलती है। कार्य समूहों का हरेक सदस्य इस सुरक्षा-चक्र
को बरकरार रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और ऊपर बैठा नेतृत्वकर्ता यह सुनिश्चित
करता है कि वह ऐसा करे। तो सामूहिक कार्य का यही रहस्य है कि नेतृत्वकर्ता किस प्रकार
अपने लोगों के लिए सुरक्षा-चक्र निर्मित करता है और किस प्रकार हरेक को उसके भीतर रखता
है।
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और दोस्तो ये था आज
का चैपटर -
और अब मिलते हैं अगले नए चैपटर के साथ, नई विडियों में,
आप हमेशा खुश रहें, आबाद रहें, स्वस्थ रहें,
और आपका धन्यावाद, नमस्कार, जय हिन्द, जय भारत
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Reviewed by Shiv Rana RCM
on
जून 14, 2026
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