recent posts

अध्याय-3 - मेरा अकेले छूट जाना - द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो -The Adventures of Robinson Crusoe - Daniel Defoe - डेनियल डिफो --- अंग्रेजी उपन्यास द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिंसन क्रूसो - डेनियल डिफो का संक्षिप्त हिंदी रूपांतरण ------ हिंदी रूपांतरण - अनीता गौड़ --- ऑल-टाइम ग्रेट क्लासिक्स द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो -- All-Time Great Classics : The Adventures of Robinson Crusoe --- English novel The Adventures of Robinson Crusoe - by Daniel Defoe --- Translator by Anita Gaur

 अध्याय-3 - मेरा अकेले छूट जाना  - द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो -The Adventures of Robinson Crusoe - Daniel Defoe - डेनियल डिफो  ---  अंग्रेजी उपन्यास द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिंसन क्रूसो - डेनियल डिफो का संक्षिप्त हिंदी रूपांतरण   ------  हिंदी रूपांतरण - अनीता गौड़  ---  ऑल-टाइम ग्रेट क्लासिक्स द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो  --  All-Time Great Classics : The Adventures of Robinson Crusoe  ---  English novel The Adventures of Robinson Crusoe - by Daniel Defoe  ---  Translator by Anita Gaur


अध्याय-3 - मेरा अकेले छूट जाना  -
द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो -The Adventures of Robinson Crusoe - Daniel Defoe - डेनियल डिफो

---

अंग्रेजी उपन्यास द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिंसन क्रूसो - डेनियल डिफो का संक्षिप्त हिंदी रूपांतरण

 ------

हिंदी रूपांतरण - अनीता गौड़

---

ऑल-टाइम ग्रेट क्लासिक्स द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो

--

All-Time Great Classics : The Adventures of Robinson Crusoe

---

English novel The Adventures of Robinson Crusoe - by Daniel Defoe

---

Translator by Anita Gaur

 

-----------

https://www.youtube.com/@shivavoicelibrary

------------------------------------------------

https://www.facebook.com/profile.php?id=61582814052126

------------------------------------------------

https://www.facebook.com/profile.php?id=61585805794623

------------------------------------------------

https://www.instagram.com/shivavoicelibrary/

------------------------------------------------

https://shivabooklibrary.blogspot.com/

-----------

अध्याय-3

---

मेरा अकेले छूट जाना

---

उन्होंने मुझसे पुर्तगाली, स्पेनिश और फ्रेंच में कुछ पूछना चाहा, लेकिन मैं उनकी कोई भी बात समझ नहीं पाया। आखिरकार बोर्ड पर मुझे एक स्कॉटिश नाविक ने बुलाया। मैंने उसकी बात का जवाब देते हुए उसे बताया कि मैं एक अंग्रेज हूं और सेले के हब्शियों की गुलामी से बचकर वहां से भाग निकला हूं। तब उन्होंने मुझे बेचारगी से देखा और मेरे पास पड़े सामान पर नजर डाली।

 

उस समय मैं इतना खुश हुआ कि उसका वर्णन नहीं कर सकता। मैं इस अनिश्चितता की स्थिति से खुद को उबरता हुआ महसूस कर रहा था। मैंने तुरंत उस जहाज के कप्तान से खुद को सुरक्षित अपने साथ लौटा कर ले चलने की गुहार लगाई और बदले में मैंने अपना सारा सामान उसे लेने के लिए कहा। उसने बड़ी सहृदयता के साथ मुझसे कहा कि तुम्हें कुछ भी देने की जरूरत नहीं है। तुम हमारे साथ चल सकते हो और जब तुम ब्राजील पहुंच जाओगे, तो सबकुछ अपने साथ रखना।

 

उसने अपनी उदारता दिखाते हुए अपने सहयोगियों को आदेश दिया कि कोई भी इनमें से किसी भी सामान को हाथ नहीं लगाएगा। इसके बाद उन्होंने मेरा सारा सामान सुरक्षित तौर पर अपनी निगरानी में रख लिया और मुझसे सही जगह पर वापस करने का वादा किया। मेरे पास उस समय तक तीनों कनस्तर भी मौजूद थे।

 

चूंकि मेरी नौका ठीक-ठाक स्थिति में थी, इसलिए उसने इसे मुझसे खरीदने का प्रस्ताव रखा। उसने कहा कि उसे इस जहाज पर रखने के लिए एक नौका की जरूरत है। उसने इस नौका की कीमत पूछी। मैंने कहा कि आपने मेरे प्रति इतनी उदारता दिखाई है कि मैं आपसे इस नौका की कीमत नहीं ले सकता। यह सुनकर वह खुश होते हुए बोला कि 'मैं ब्राजील पहुंचने पर अस्सी डॉलर अदा करूंगा। वहां पहुंचकर यदि कोई इसका अधिक मूल्य लगाएगा तो मैं वह भी दूंगा।' साथ ही उसने मुझसे मेरे साथ के लड़के जूरी के बदले भी साठ डॉलर देने का प्रस्ताव रखा, लेकिन मैं नहीं चाहता था कि उसके साथ मैं किसी तरह का अन्याय करूं। मैं उसे एक आजाद जिंदगी देना चाहता था। पूरी यात्रा के दौरान उसने मेरे प्रति आस्था जताई थी तथा मेरा विश्वास जीत लिया था।

 

लेकिन जब मैंने उसे इसका कारण बताया तो उसने कहा कि यदि वह ईसाई बन जाएगा तो अगले दस सालों में उसे मुक्ति मिल जाएगी। जूरी ने बताया कि उसकी इच्छा मेरे साथ रहने की है तो मैंने यह बात कप्तान को भी बता दी।

 

तकरीबन बाइस दिनों की समुद्री यात्रा के पश्चात हम ब्राजील की टोडोस लोस सेंटोस की खाड़ी या सेंट्स की खाड़ी पहुंच चुके थे। अब मैं यहां अपने जीवन में किसी भी तरह के हालात को झेलने के लिए तैयार था। मेरे साथ अब क्या होने वाला है, वह मुझे अब समझ में आ रहा था।

 

कप्तान ने मेरे साथ जितनी उदारता दिखाई, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उसने मुझे सुरक्षित रूप से यहां तक पहुंचाने की एवज में कुछ भी नहीं लिया और जहाज पर मौजूद मेरा सारा सामान सही हालत में मुझे लौटा दिया। मैं उन्हें अपना कुछ सामान बेचना चाह रहा था, जिसमें कुछ बोतलें, मेरी दो गन और मोमबत्ती बनाने में उपयोगी वैक्स शामिल थे, दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो मुझे सभी सामान के बदले दो सौ अस्सी डॉलर प्राप्त हुए। इस रकम को लेकर मैं ब्राजील के तट पर उतर गया।

 

मैं यहां ज्यादा समय तक नहीं रहना चाहता था, लेकिन उसने मेरी मुलाकात पास ही में बने एक मकान में रहने वाले खुद की तरह के ही एक ईमानदार आदमी से कराई। उसका नाम इंजेनियो था, उसका एक चीनी घर और नर्सरी का कारोबार था। मैं कुछ समय उसके साथ रहा और उसके पौधारोपण एवं चीनी बनाने के तरीकों से बेहद प्रभावित हुआ। मैंने देखा कि वह कैसे इस कारोबार से धनी हो गया है। मैंने सोचा कि मैं भी इस तरह से यहां एक धनी आदमी बन सकता हूं, लेकिन इसके लिए मुझे यहां रहने का लाइसेंस हासिल करना होगा। मैं उसकी तरह की एक नर्सरी चलाना चाहता था। मैंने लंदन में कमाए हुए अपने धन को हासिल करने का समाधान खोजना चाहा।

 

मैं अब सोच रहा था कि क्या मुझे यहां ठहर जाना चाहिए। मेरे पास रहने के लिए एक अच्छा घर था, जहां मेरे पिता मुझे एक खुशहाल जिंदगी देने का सपना देख रहे थे और रिटायर होने के बाद शांति से अपने दिन गुजारना चाहते थे।

 

चूंकि अब मैं अपने माता-पिता से काफी दूर आ गया था, इसलिए अब इन सब बातों का कोई मतलब नहीं रह गया था। मैं अब नर्सरी के कारोबार से बेशुमार दौलत कमाना चाह रहा था और ऐसी खुशहाल जिंदगी जीना चाह रहा था, ताकि अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए इस प्रकृति का पूरा आनंद ले सकूं।

 

ब्राजील में चार सालों के भीतर ही मैं वहां पूरी तरह से घुल-मिल गया। मेरा नर्सरी का कारोबार तरक्की करता रहा और इस दौरान मैंने न केवल वहां की भाषा सीख ली, बल्कि वहां के तमाम लोगों के बीच अपनी अच्छी-खासी जगह भी बना ली। फिर उनसे दोस्ती भी कर ली। इसमें उस बंदरगाह सेंट सल्वाडोर के कई व्यापारी भी थे। मैंने अपना अनुभव साझा करते हुए उन्हें बताया था कि मैं अपनी दो समुद्री यात्राओं के दौरान गिन्नियों के तट पर भी हो आया हूं। वहां खिलौने, चाकू, कैंची और कांच से बनी अनेक वस्तुओं समेत सोने के डस्ट, गिन्नियां, हाथी दांत आदि खरीदना भी सीखा है। वहां ब्राजील के लिए काम करने वाले नीग्रो भी बड़ी तादाद में हैं, जो खरीद-फरोख्त का धंधा करते हैं।

 

वे मेरी बातों को बड़े गौर से सुनते थे। खासकर नीग्रो खरीददारों से जुड़ी बातों में उनकी बहुत दिलचस्पी होती थी। उस समय यह व्यापार न केवल बहुत दूर प्रतीत होता था, जो वहां के एसिएंटो द्वारा किया जाता था, बल्कि इसके लिए स्पेन और पुर्तगाल के राजा से भी इसकी अनुमति लेनी होती थी। इस दरह से कुछ नीग्रो वहां ले जाए गए थे, जो बहुत ही मिलनसार स्वभाव के थे।

 

मेरी बातों से कुछ नर्सरी कारोबारी बहुत प्रभावित हुए। अगली सुबह इनमें से तीन लोग मुझसे मिलने आए। उन्होंने मुझसे गोपनीय रखते हुए एक बात बताई कि उनके दिमाग में एक युक्ति आई है कि एक जहाज लेकर गिन्नी चला जाए। वे सभी मेरी ही तरह नर्सरी का कारोबार करते थे। वहां जाकर वे नौकरी करना चाहते थे, ताकि ज्यादा धन अर्जित किया जा सके। चूंकि यह एक तरह का ऐसा व्यापार था, जिसे ढोया नहीं जा सकता। वे सार्वजनिक तौर पर इन सामग्रियों को हब्शियों को नहीं बेच सकते थे, इसलिए हब्शियों को निजी तौर पर वे अपने साथ ले जाना चाहते थे और उन्हें उनके मालिकों में बांटना चाहते थे।

 

वे एक बार समुद्री यात्रा पर जाना चाहते थे। गिन्नियों के तट की यात्रा की तैयारी के लिए मैंने जहाज में व्यापारिक सामग्रियों को रखने के लिए एक कार्गो बनाया। उन्होंने हब्शियों के साथ किए जाने वाले इस व्यापार में बिना किसी लागत के मुझे बराबर का साझीदार बनाने की पेशकश की।

 

यह एक अच्छा प्रस्ताव था, जिसे निश्चित रूप से स्वीकार किया जा सकता था। अब सवाल यह पैदा हुआ कि हम लोगों के यहां से जाने के बाद हमारी नर्सरियों की देखभाल कैसे होगी। चूंकि मैं इस नर्सरी के कारोबार का पुराना खिलाड़ी नहीं था, फिर भी पिछले तीन-चार सालों से तो मैं इसे चला ही रहा था, इस प्रकार कुछ ही सही, परंतु मेरे पास तीन से चार हजार पाउंड स्टर्लिंग जमा थे और उनमें धीरे-धीरे बढ़ोतरी भी हो रही थी।

 

मैंने उन लोगों से कहा कि मैं उनके साथ तभी चल सकता हूं, यदि मेरी अनुपस्थिति में मेरी नर्सरी की देखभाल करने का जिम्मा कोई उठाए। यदि मैं यहां वापस नहीं लौट सका तो वह बाद में मेरे दिशानिर्देशों के मुताबिक इसका संचालन कर सके। इसके लिए मैंने एक औपचारिक वसीयत भी तैयार की। इसमें मेरी मृत्यु की दशा में चीजों को निपटाए जाने के बारे में लिखा गया था। मैंने उसमें लिखा कि मेरी मृत्यु के बाद पूर्व में एक बार मेरी जिंदगी बचाने वाले जहाज के कप्तान को यह नर्सरी दे दी जाए। मेरी संपत्ति का निस्तारण करते समय उसका आधा हिस्सा उन्हें दिया जाए और बाकी को इंगलैंड भेज दिया जाए।

 

इधर हमारा जहाज बनकर तैयार हो गया। इस पर इसके मालिक, उसके लड़के और मेरे अलावा अन्य चौदह लोग सवार हुए। साथ ही, छह बंदूकें भी उस पर रखी गईं। हमने हब्शियों के साथ व्यापार की जरूरी वस्तुएं-जैसे कांच के टुकड़े, विचित्र प्रकार की सस्ती चीजें, छोटे और दिखने में सुंदर शीशे, चाकू, कैंची आदि अपने साथ जहाज पर रखीं। हम लोग उसी दिन सागर की यात्रा पर निकल पड़े। हम अपने तट से उत्तर की ओर बढ़ चुके थे। उत्तरी अक्षांश के तकरीबन 10 या 12 डिग्री पर जब हम अफ्रीकी तट की ओर बढ़े, तब तक तो हम अपने तट से बहुत दूर निकल चुके थे। उन दिनों को याद करते हुए अब भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

 

कुछ समय के बाद मौसम सुहावना हो गया था। हमारे तट की अपेक्षा यहां केवल गर्मी तपाने वाली थी। हम अब केप सेंट ऑगस्टीनो की ऊंचाई तक पहुंच चुके थे। हम समुद्र से इतनी दूर निकल गए थे कि अब दूर-दूर तक धरती नहीं दिखाई दे रही थी। अपना रास्ता नापते हुए हमारा जहाज फर्नांड डी नोरोन्हा द्वीप समूह के मार्ग से पूर्वोत्तर होते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था।

 

इस दौरान हम लोगों ने बारह दिनों तक यात्रा जारी रखी। अंत में हमने पाया कि हम 7 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर हैं। उस समय ऐसा भयानक तूफान टोरनेडो या हेरीकेन उठा, जो हमारी समझ से परे था। यह दक्षिण-पूर्व की ओर से उठा था और इतना भयानक था कि ऐसा लगा मानो अब कुछ नहीं बचने वाला है। अब हमें भाग्य ही बचा सकता था। तूफान के वेग को देखकर लोग भयभीत थे। पिछले इन बारह दिनों में कई बार छोटे-मोटे झटके आए, लेकिन यह तो अत्यंत विनाशकारी तूफान था।

 

इस हादसे में हम पूरी तरह से आंधी की चपेट में फंस चुके थे। इस दर्दनाक घटना में हमारा एक साथी मारा गया, जबकि एक आदमी और वह लड़का घायल हो गए। तकरीबन बारहवें दिन जाकर मौसम कुछ साफ हुआ और मालिक ने मौसम और हालात का जायजा लिया तो पता चला कि हम लोग 11 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर हैं, लेकिन यह जगह केप सेंट ऑगस्टिनो से 22 डिग्री पश्चिम की दूरी पर स्थित है। उसे लगा कि वह गिन्नियों के तट की ओर या फिर ब्राजील के उत्तरी हिस्से की ओर पहुंच रहा है, जो कि अमेजन नदी के बाद का इलाका है। इधर एक और नदी ओरोनोकू भी थी, जिसे आमतौर पर ग्रेट रिवर के नाम से जाना जाता है। उन्होंने मुझसे सलाह लेते हुए पूछा कि अब हमें क्या करना चाहिए। जहाज में कई जगह छेद हो चुके थे और कुछ हद तक अब यह क्षतिग्रस्त होने की कगार पर पहुंच चुका था, इसलिए वे सीधे ब्राजील के तट की ओर वापस होना चाह रहे थे।

 

मैं उनके इस फैसले के बिलकुल खिलाफ था। उनके साथ अमेरिका के समुद्री तटों का चार्ट देखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि कैरिबियाई द्वीप समूहों के घेरे में आबादी वाला कोई भी ऐसा इलाका नहीं है जहां हम ठहर सकें, इसलिए हमने बारबडोस में ही ठहरने का फैसला किया। तकरीबन 15 दिनों की लगातार समुद्री यात्रा के दौरान हम मेक्सिको की खाड़ी में भी नहीं रुके, जहां हम आसानी से जीवन यापन कर सकते थे। इधर दूसरी ओर के हालात कुछ इस तरह के थे कि हमारा जहाज तो क्षतिग्रस्त हो ही चुका था, हम भी भीतर से टूट चुके थे, इसलिए अफ्रीका के तट तक पहुंचना हमें मुमकिन नहीं लग रहा था।

 

तमाम परिस्थितियों को देखते हुए हमने अपना रास्ता बदला और अंग्रेज द्वीप समूह की ओर जाने के लिए पश्चिम से उत्तर-पश्चिम का रास्ता पकड़ा। मुझे उम्मीद थी कि वहां हमें कुछ राहत मिल सकती है। जब हम 12 डिग्री अक्षांश पर थे, तो उस समय एक दूसरा तूफान उठा, जो हमें पश्चिम की ओर तेजी से बहाए ले जा रहा था। सागर के थपेड़ों से दो-दो हाथ करते हुए किसी तरह हमारी जान तो बच गई, लेकिन अब हमें यह डर सता रहा था कि यहां जंगली मानव हमें मार न डालें। अपने वतन लौट पाना हमें मुमकिन नहीं लग रहा था। हम निराशा के इस भंवरजाल में फंसे ही थे कि इतने में हवा का तेज झोंका आया और सुबह-सुबह हमारा एक आदमी चिल्लाया, "जमीन!" और हम लोग तेजी से केबिन से बाहर यह जानने के लिए दौड़ पड़े कि आखिरकार हम दुनिया के किस हिस्से में पहुंच चुके हैं। इतने में ही जहाज बालू के ढेर से टकराया और कुछ ही पल में वह वहीं रुक गया। हमें लगा कि समुद्र ने किसी-न-किसी बहाने हमें खत्म करने की ठान ही ली है। हम तेजी से किसी सुरक्षित ठिकाने की खोज में थे।

 

किसी ऐसे आदमी को इस विषम परिस्थिति के बारे में बताना थोड़ा मुश्किल है, जो इस तरह के हालातों से कभी दो-चार नहीं हुआ हो। हमें कुछ नहीं पता था कि हम कहां आ गए हैं या फिर हम किस धरती पर पहुंचे हैं? क्या यह कोई द्वीप समूह है या फिर मुख्यभूमि ? यहां लोग रहते भी हैं या यह जगह निर्जन है?

 

हवा के तेज झोकों को देखकर एकबारगी यह उम्मीद खत्म हो गई कि अब हम बच भी पाएंगे या नहीं, लेकिन एकाएक एक प्रकार का चमत्कार ही हुआ जो तेज हवा शांत हो गई।

 

जब हवा कुछ शांत हुई तो जहाज बालू से टकराकर गिरने लगा था। हम इस खतरनाक हालात में पहुंच गए थे कि अब भी कुछ कर पाने में सक्षम नहीं हो रहे थे। अब हमारे लिए अपनी जान तक बचाना मुश्किल हो रहा था, लेकिन हमने हार नहीं मानी और जिंदगी की लड़ाई लड़ते रहे। यात्रा प्रारंभ करते समय हमने ऐसी परिस्थितियों से मुकाबला करने के लिए एक छोटी-सी नौका रखी थी, किंतु तूफान ने ऐसी तबाही मचाई कि सबकुछ क्षतिग्रस्त कर दिया और बचाव का वह माध्यम भी हमसे छीन लिया। हम स्वयं को बेहद असहाय-सा महसूस कर रहे थे। अब हमारी उम्मीदें खत्म होने लगी थीं। किसी भी क्षण हम पानी में डूब सकते थे। हमारे पास बोर्ड पर एक और नौका थी, लेकिन उसे सागर की लहरों पर कैसे उतारा जाए, यह समझ में नहीं आ रहा था। हालांकि अब इन सब बातों पर बहस करने का समय नहीं बचा था और हरेक मिनट हमारे लिए आफत के तौर पर बीत रहा था। किसी ने हमें बताया कि वह नौका भी उस तूफान में टूट चुकी थी।

 

इस निराशाजनक स्थिति में जहाज के मेट ने वहां मौजूद सभी लोगों की सहायता से नौका उतारी और सारे लोग उसमें सवार हो गए। हम ग्यारह लोगों ने इसे ईश्वर की नियति मानकर इस भयंकर सागर से बाहर निकलने में एक-दूसरे की मदद का वादा किया। हमें उम्मीद थी कि हम इस भयानक हालात से जल्द ही उभरकर किसी तट के पास अवश्यमेव पहुंच पाएंगे।

 

इतने में हमने स्पष्ट तौर पर देखा कि समुद्र की लहरें इतनी ऊंची हो गई हैं कि नौका को बचाना मुश्किल है और अब हमें डूबने से कोई नहीं बचा पाएगा। नाव को खेने के अलावा हम कुछ भी नहीं कर सकते थे। जैसे कोई आदमी अपनी मुक्ति के लिए पूरी ताकत लगाता है, उसी तरह से हम पतवार को तेजी से चलाते जा रहे थे, ताकि जल्द ही इस भयानक दौर से बाहर निकल सकें और किसी किनारे पर पहुंचने में कामयाबी हासिल हो, अन्यथा समुद्र हमारे टुकड़े-टुकड़े कर सकता है। हालांकि हमने पूरी तल्लीनता से खुद को ईश्वर के भरोसे छोड़ दिया था और तेज हवा हमें किनारे की ओर बहाए ले जा रही थी,

 

लेकिन जैसे-जैसे हम तट की ओर बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे अपने हाथों से अपने विनाश की इबारत गढ़ रहे थे। लेकिन इसके अलावा हमारे पास दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं था।

 

हमें नहीं मालूम कि जहां समुद्र तट मिलेगा वह कैसा होगा। चट्टान होगी या बालू, जमीन ढाल होगी या साफ होगी, इस बारे में हमें कुछ नहीं पता, बस इतनी उम्मीद थी कि कैसी भी हो, इस भयंकर समुद्र से बेहतर ही होगी। हमने सोचा कि यदि हम किसी खाड़ी या नदी के मुहाने पर पहुंचने में कामयाब हुए तो अपनी नाव छोड़कर ताजे पानी की तलाश में निकल पाएंगे। लेकिन वहां ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं दिया था। हमारी आशाएं उस समय धूमिल हो गईं, जब हमें नजदीक आने पर जमीन का किनारा तो दिखाई दिया, लेकिन वह इस समुद्र से भी भयानक था।

--

अब हम समुद्री किनारे से तकरीबन साढ़े तीन मील की दूरी पर थे। हम यह देखकर भयभीत हो गए कि पर्वत की ऊंचाई के समान गर्जना करती हुई एक लहर हमारी ओर आ रही है। एक शब्द में कहा जाए तो यह इतनी डरावनी थी कि इसने पूरी नौका को अपने थपेड़े में लेते हुए सबकुछ अस्त-व्यस्त कर दिया। न केवल नौका ने हमारा साथ छोड़ दिया, बल्कि हम एक-दूसरे से भी बिछड़ गए। उस आपदा ने हमें इतनी तेजी से अपने चपेट में लिया कि हमारे पास ईश्वर का ध्यान करने का समय भी नहीं मिला।

 

जब मैं पानी में पूरी तरह डूब गया था, उस समय मैंने कैसा महसूस किया, इसे मैं बता नहीं सकता, लेकिन चूंकि मुझे तैरना अच्छी तरह से आता था, इसलिए मैं लहरों से तब तक टकराता रहा, जब तक मैं समुद्र के किनारे तक नहीं पहुंच गया। हालांकि समुद्र का यह तट खतरनाक था। इसके किनारे पर कीचड़ वाली मिट्टी थी और यहां की बंजर धरती थी। यहां मुख्य भूमि में दूर-दूर तक ताजे पानी की संभावना कम ही दिखाई दे रही थी। इन सारी बातों को सोचते हुए मैं अपने पैरों पर खड़ा हुआ और दूसरी लहर के आने से पहले मैं वहां से आगे बढ़ जाना चाहता था। सागर में लहरों से दो-दो हाथ करते समय मैंने वहां अपनी सांस और तैरने की क्रिया पर काबू रखा, ताकि मैं किसी तरह सुरक्षित रूप से किनारे तक पहुंच सकूं। मुझे इस बात का यकीन था कि एक बार तट तक पहुंचने पर वहां से लहरें मुझे लौटा नहीं पाएंगी।

 

दोबारा जब लहर आई तो उसने मुझे अपने आगोश में लेते हुए बीस से तीस फीट की गहराई में धकेल दिया। मैंने महसूस किया कि किसी ईश्वरीय शक्ति ने मुझे इस गहराई से उबारते हुए चंद सेकंड के बाद पानी की सतह के ऊपर फेंक दिया। इससे मुझे सांस लेने में सहायता मिली और कुछ हद तक मैंने राहत महसूस की। अपने दोनों हाथ पानी से बाहर निकालते हुए मैंने तैरने का प्रयास किया, जिसमें मुझे कामयाबी मिली। जब मैंने दोबारा सांस ली, तब मेरी हिम्मत लौटी। कुछ ही प्रयास के बाद मैंने अपने पैरों को जमीन पर टिका पाया और कुछ देर रुककर आराम किया। अब चूंकि पानी मेरे से दूर जा चुका था, इसलिए मैं पूरी ताकत लगाते हुए वहां से जमीन की ओर भागा। लेकिन मुझे इस बार भी कामयाबी नहीं मिली, क्योंकि वहां का समुद्री तट बहुत ही उथला था और एक बार फिर लहरों ने मुझे उसी तरह से आगोश में लेते हुए पानी में डुबो दिया।

 

हालांकि इस बार लहर की ऊंचाई पहले की तरह नहीं थी, इसलिए मैं खुद को बचाने में आसानी से कामयाब रहा। इसके बाद भी कुछ लहरें आईं, लेकिन मेरा शरीर उनमें डूबने से बचा रहा। इस प्रकार मैं लहरों से दो-दो हाथ करते हुए मुख्यभूमि के करीब पहुंच गया। यहां लहरों की पहुंच से दूर, खतरों से बाहर निकलते हुए घास पर बैठकर मैंने बहुत राहत महसूस की।

 

जब मैंने दूर से नौका की ओर देखा तो लहरों के नजारों से मैं सहम गया और सोचने लगा, 'हे ईश्वर, यह कैसे संभव हो पाया कि मैं किनारे तक पहुंच सका?'

 

खुद को यह सांत्वना देने के बाद कि चलो किसी तरह बच तो गए-जान बची तो लाखों पाए, मैंने अपने आसपास की चीजों को देखा। हालांकि उस समय मेरे सारे कपड़े भीग चुके थे और उन्हें निकालकर दूसरा पहनने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं था। न तो मेरे पास कोई खाने की वस्तु थी और न ही पीने के लिए पानी। मुझे जोरों की भूख लगी थी।

 

आसपास के जंगलों में रहने वाले भयानक जानवरों का डर भी सता रहा था कि कहीं वे मुझे मार न डालें। मेरे पास उनसे लड़ने का कोई हथियार नहीं था और न ही छोटे जीवों को मारकर खाने के लिए ही कुछ साधन था। एकाएक मुझे खयाल आया कि मेरे पास एक छोटी डिब्बी होनी चाहिए जिसमें एक चाकू, एक तंबाकू पाइप और कुछ तंबाकू आदि होने चाहिए।

 

हालात पर गौर करने के बाद मैंने एक मोटे से पेड़ पर आश्रय लेने का मन बनाया। मैं उस पर रातभर बैठा रहा और सोचता रहा कि क्या

 

इसी तरह से मेरी मौत होनी चाहिए। मेरे जीने की संभावनाएं कम होती जा रही थीं। रातभर आराम करने के बाद मैं कुछ फर्लांग की दूरी तक पीने के लिए ताजे पानी की तलाश में गया। मेरी तलाश पूरी हुई और मैंने वहां पेट भर पानी पीया और तंबाकू को मुंह में भरकर भूख मिटाने की कोशिश की। दोबारा पेड़ के पास आकर अपने पास सुरक्षा के लिए एक डंडा लेकर मैं वहां सो गया। मैं काफी थका हुआ था, यह सोच रहा था कि मेरे साथ अब कुछ भी बीत सकता है। इतने में, न जाने कब, मुझे नींद ने अपनी आगोश में ले लिया।

 

-----------

और दोस्तो ये था आज का चैपटर -

और अब मिलते हैं अगले नए चैपटर के साथ, नई विडियों में,

आप हमेशा खुश रहें, आबाद रहें, स्वस्थ रहें, और आपका धन्यावाद, नमस्कार, जय हिन्द, जय भारत 

------

 

 

 

 

 

अध्याय-3 - मेरा अकेले छूट जाना - द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो -The Adventures of Robinson Crusoe - Daniel Defoe - डेनियल डिफो --- अंग्रेजी उपन्यास द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिंसन क्रूसो - डेनियल डिफो का संक्षिप्त हिंदी रूपांतरण ------ हिंदी रूपांतरण - अनीता गौड़ --- ऑल-टाइम ग्रेट क्लासिक्स द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो -- All-Time Great Classics : The Adventures of Robinson Crusoe --- English novel The Adventures of Robinson Crusoe - by Daniel Defoe --- Translator by Anita Gaur  अध्याय-3 - मेरा अकेले छूट जाना  - द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो -The Adventures of Robinson Crusoe - Daniel Defoe - डेनियल डिफो  ---  अंग्रेजी उपन्यास द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिंसन क्रूसो - डेनियल डिफो का संक्षिप्त हिंदी रूपांतरण   ------  हिंदी रूपांतरण - अनीता गौड़  ---  ऑल-टाइम ग्रेट क्लासिक्स द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो  --  All-Time Great Classics : The Adventures of Robinson Crusoe  ---  English novel The Adventures of Robinson Crusoe - by Daniel Defoe  ---  Translator by Anita Gaur Reviewed by Shiv Rana RCM on जुलाई 04, 2026 Rating: 5

कोई टिप्पणी नहीं:

Blogger द्वारा संचालित.