अध्याय-2 - समुद्री डाकुओं द्वारा कब्जा- द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो -The Adventures of Robinson Crusoe - Daniel Defoe - डेनियल डिफो --- अंग्रेजी उपन्यास द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिंसन क्रूसो - डेनियल डिफो का संक्षिप्त हिंदी रूपांतरण - हिंदी रूपांतरण - अनीता गौड़ --- ऑल-टाइम ग्रेट क्लासिक्स द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो -- All-Time Great Classics : The Adventures of Robinson Crusoe --- English novel The Adventures of Robinson Crusoe - by Daniel Defoe --- Translator by Anita Gaur
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अंग्रेजी उपन्यास द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिंसन क्रूसो - डेनियल
डिफो का संक्षिप्त हिंदी रूपांतरण - हिंदी
रूपांतरण - अनीता गौड़
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ऑल-टाइम ग्रेट क्लासिक्स द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो
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All-Time Great Classics : The Adventures of Robinson
Crusoe
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English novel The Adventures of Robinson Crusoe - by
Daniel Defoe
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ऑल-टाइम ग्रेट क्लासिक्स - द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो
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अध्याय-2
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समुद्री डाकुओं द्वारा
कब्जा
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अब तक मैं सोने की गिन्नियों
के व्यापारी के रूप में स्थापित हो चुका था। लेकिन मेरे साथ एक दुर्भाग्यशाली घटना
यह हुई कि मेरे उस मित्र का यहां देहांत हो गया। मैंने फिर से समुद्री यात्रा पर जाने
की तैयारी पूरी कर ली। अपनी पिछली यात्रा से सबक लेते हुए इस बार मैं पूरी तैयारी के
साथ यात्रा पर निकला और जहाज पर नियंत्रण कायम रखने का भी मैंने पूरा बंदोबस्त किया।
परंतु इस बार की यात्रा मेरे लिए लाभकारी नहीं रही। इसमें मुझे 100 पाउंड का नुकसान
हुआ। इस प्रकार मेरे पास अब 200 पाउंड बचे हुए थे, जिससे मैं अपने दोस्त की विधवा की
मदद करना चाहता था। मेरे सिवाय उसका अब कोई भी मददगार नहीं था। इस तरह यह समुद्री यात्रा
मेरे लिए नुकसानदेह साबित हुई। पहले तो हमारा जहाज कैनरी द्वीप समूह की ओर भटक गया।
फिर इन द्वीप समूहों और अफ्रीकी किनारों के पास चला गया। और बाद में, इसी दौरान, तुर्की
के समुद्री लुटेरों ने हमारा पीछा करते हुए हमारा सारा माल लूट लिया।
वह पूरी तैयारी के साथ
हम पर आक्रमण करने आए थे। उनसे हमने खुद ही अपना बचाव किया। जब हम बोर्ड पर थे, उसी
दौरान 60 लुटेरे वहां डेक पर आए और तेजी से हम सबको घेर लिया। हमने अपने साधनों और
पूरी ताकत के साथ उनका मुकाबला किया और उनसे लोहा लेते हुए दो बार उन्हें डेक पर से
खदेड़ दिया। हालांकि, इस दर्दनाक हादसे में न केवल हमारा जहाज क्षतिग्रस्त हुआ, बल्कि
हमारे तीन लोग मारे गए तथा आठ घायल भी हो गए। बाकी बचे लोगों को बंदी बनाकर ले जाया
गया, जो उस समय मूर्स के कब्जे में था। यहां आकर मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था। यहां
किसी ने भी मुझे तंग नहीं किया और न ही कोई मुझे यहां के शासक के दरबार में ले गया,
जबकि मेरे साथ के अनेक लोगों को वहां ले जाया गया। कप्तान ने अपने व्यवसाय के योग्य
जानकर हमें अपना गुलाम बना लिया।
चूंकि मेरा
नया मालिक या संरक्षक मुझे अपने साथ अपने
घर लेकर गया था, इसलिए मुझे इस बात की उम्मीद बंध-सी गई थी कि अब जब कभी यह समुद्री
यात्रा पर जाएगा, तो मुझे जरूर अपने साथ लेकर जाएगा। मुझे विश्वास होने लगा था कि मेरा
भाग्य एक दिन जरूर मुझे स्पेन या पुर्तगाल पहुंचा देगा, इसलिए अब मुझे निश्चित हो जाना
चाहिए। लेकिन मेरी उम्मीदों को उस समय एक बड़ा झटका लगा, जब मुझे अकेला किनारे पर छोड़कर
मालिक यह आदेश देकर चला गया कि मैं उसके घर की देखरेख करने वाले गुलामों की निगरानी
करने के साथ ही उसके बगीचे की देखभाल भी करूं। और फिर जब वह यात्रा से लौटा तो उसने
मुझे जहाज के केबिन की देखरेख करने का भार दिया।
यहां मैं अपने बचाव
के सभी रास्तों की खोज करता रहा, परंतु मुझे अब इसकी संभावना कम होती दिखाई दे रही
थी। मैं किसी को जानता भी नहीं था कि उससे इन बातों को साझा करता। न तो कोई गुलाम,
न अंग्रेज, न आयरिश या न स्कॉटिश। तकरीबन दो सालों तक मैं इन सबसे जूझता रहा और इस
दौरान किसी भी तरह की प्रेरणा मुझे नहीं मिली।
इस तरह की विपरीत परिस्थितियों
में दो साल गुजारने के बाद हालात कुछ इस तरह के बने कि मैं स्वयं में सकारात्मक सोच
भरने लगा। स्वयं को मुक्ति के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार करने लगा। अपने जहाज
को पूरी तरह ठीक किए बिना ही मेरा मालिक, जैसा कि मैंने सुना था, धन पाने की लालसा
में सप्ताह में एक या दो बार मौसम ठीक रहने पर अकसर सड़क मार्ग से ही मछली पकड़ने के
लिए बाहर जाने लगा था। चूंकि वह अकसर मुझे अपने साथ ले जाता था और मैं मछली पकड़ने
में उसकी काफी मदद भी करता था, इसलिए वह कभी-कभी मुझे अपने एक संबंधी मुअर और एक अन्य
नौजवान मेरेस्को के साथ भेजता था। वे लोग उसकी पसंद के अनुसार मछली पकड़कर लाते थे।
एक दिन ऐसा
हुआ कि सभी लोग एक शांत-सी सुबह के घने कुहासे
में मछली पकड़ने के लिए निकले। किनारे से कुछ ही दूर जाने पर कुछ भी नहीं दिखाई दे
रहा था। हमें वहां कोई भी रास्ता नहीं सूझ रहा था। हम लोग समुद्र तट से महज डेढ़ मील
दूर थे, इसके बावजूद कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। हम लोग रात भर मेहनत करते रहे और
जब सुबह हुई तो देखा कि किनारे की ओर जाने की बजाय हम किनारे से 6 मील दूर निकल गए
हैं। उस समय तक हम बुरी तरह से थक चुके थे और खतरों से जूझते हुए दोबारा प्रयास में
लग गए। इधर हम सभी जोरों की भूख से बेहाल भी हो चुके थे।
लेकिन हमारे मालिक ने
सबको इस आपदा के लिए सतर्क किया हुआ था और भविष्य में इससे बचाव के लिए सबको सावधानी
बरतने का निर्देश भी दिया हुआ था। उसने हमें कहा था कि अपने साथ उसका अंग्रेजी जहाज
लेकर जाएं। साथ ही हमें सुझाव दिया था कि मछली पकड़ने के लिए कंपास और जरूरी सामानों
के बिना कभी भी समुद्र में नहीं जाना चाहिए। अतः उसने अपने जहाज के बढ़ई को आदेश दिया
कि लंबी नौका के बीच में एक छोटा-सा कमरा या केबिन बना दे, ताकि वहां एक-दो लोग अपने
घर की तरह आराम से काम कर सकें। वह बढ़ई भी एक अंग्रेज गुलाम था। उस केबिन में सभी
चीजें दुरुस्त कर दी गईं। उसमें एक-दो गुलामों को रखने का प्रबंध भी किया गया। साथ
ही एक खाने की टेबल और एक छोटा-सा लॉकर, जिसमें शराब की कुछ बोतलें, ब्रेड समेत चावल
और कॉफी स्टोर की गई, ताकि जरूरत के वक्त उनका उपयोग किया जा सके।
हम लोग नौका से मछली
मारने के लिए तेजी से निकल पड़े। चूंकि मछली पकड़ने में मैं उन सभी लोगों में सबसे
ज्यादा दक्ष था, इसलिए मुझे अपने साथ लिए बिना वे कभी भी इस काम के लिए नहीं जाते थे।
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ऐसा अकसर होता था कि
वे घूमने के इरादे से या फिर मछली पकड़ने के इरादे से बाहर निकलते तो दो या तीन हब्शियों
को जरूर साथ लेते। इसके बाद उन्हें बोर्ड पर भेजा जाता ताकि वे उसे पाउडर से पूरी तरह
से साफ रखें। उस जगह पर उन्होंने मछलियों को फंसाने और पकड़ने की कुछ युक्तियां लगा
रखी थीं।
मैं उनके
दिशा-निर्देशों के अनुसार सभी चीजों को दुरुस्त
कर, अगली सुबह नाव की साफ-सफाई करने के बाद उनके मेहमानों को सभी चीजें मुहैया कराने
का इंतजार कर रहा था। कुछ देर बाद मेरे मालिक बोर्ड पर अकेले आए और मुझसे कहा कि मेरे
दोस्त अपने कारोबार के सिलसिले में बाहर चले गए हैं। उन्होंने मुझे आदेश दिया कि सदा
की तरह एक आदमी और लड़के के साथ मैं नौका से मछलियों को पकड़ने के लिए जाऊं। उनके मित्र
खाना खाने के लिए उनके यहां आने वाले हैं और उनके आदेशों के मुताबिक कुछ मछलियां मुझे
लाकर उनके घरों तक पहुंचानी हैं। मैं इस सबकी तैयारी में जुट गया।
इस दौरान मुझे यह जानकर
खुशी हुई कि एक समय वह भी था, जब मैं एक छोटे से जहाज पर नियंत्रण नहीं रख पाता था।
मेरे मालिक चले गए और मैं खुद को तैयार करने में लग गया, मछलियों के कारोबार के लिए
नहीं, बल्कि समुद्री यात्रा के लिए। हालांकि मैं अब तक यह नहीं समझ पाया था कि मुझे
क्या करना चाहिए और कहां जाना चाहिए।
इस मामले में मैंने
पहली युक्ति यह लगाई कि बोर्ड पर ही अपने जीविकोपार्जन के लिए दूसरे तरीकों के बारे
में हब्शी से बातचीत की जाए। मैंने उससे कहा कि हमें अपने मालिक की आजीविका को नहीं
छीनना चाहिए। उसने अपनी सहमति जताते हुए कहा कि यह सही है। वह एक बड़ी टोकरी लेकर आया,
जिसमें बिस्कुट समेत खाने की कुछ अन्य सामग्रियां और ताजे पानी के तीन जार थे। इन सबको
हमने नाव पर रखा।
मुझे मालूम था कि मेरे
मालिक इन बोतलों को कहां रखते हैं। मैंने सभी चीजों को ठीक तरह से रखने के बाद किनारे
पर खड़े हब्शी को नौका में आने के लिए बुलाया और उसे अन्य जरूरी सामग्रियों को नौका
में रखने के लिए कहा।
इस तरह से जरूरत की
सभी चीजों को रखने के बाद हम लोग मछली पकड़ने के लिए समुद्र में निकल पड़े। उत्तर-पूर्व
से हवा चल रही थी, जो मेरी जरूरतों के विपरीत थी। यदि यह दक्षिण दिशा की ओर से चलती
तो हम निश्चित रूप से स्पेन के तट की ओर जाते और केडिज की खाड़ी पहुंच जाते। लेकिन
मैंने भी ठान लिया था कि चाहे जिस दिशा में हवा चले, मुझे उस दिशा में जाना है। मैंने
भयानक स्थानों पर पहुंचने और इस भूमि से आगे बढ़ने का इरादा पक्का कर लिया था।
जब मैंने
पीछे नजर डाली तो देखा कि मैं तीन मील दूर
निकल चुका हूं। तब मैं चाहता तो मछली का शिकार कर सकता था। जब मैंने उस लड़के को नाव
की पतवार थमाई तो मैं यह देखने के लिए बढ़ा कि वह हब्शी कहां है। मैंने कुछ ही क्षण
बाद उसे अपने पास पाया। वह बोर्ड पर इस प्रकार से लेटा हुआ था कि थोड़ी-सी भी असावधानी
होने पर वह समुद्र में गिर सकता था। वह तेजी से जागा और उसने मुझसे गुहार लगाई कि वह
दुनिया में कहीं भी मेरे साथ चलने को राजी है। नौका से बाहर भी वह तैर सकता था। मैं
केबिन के भीतर गया और पकड़ी हुई मछलियों को लाकर उसे खाने के लिए दिया। मैंने उसे आश्वासन
दिया कि मैं उसका कोई नुकसान नहीं करूंगा। यदि वह शांत रहा तो मैं उसे कुछ नहीं कहूंगा।
अतः वह वहां से तैरते हुए किनारे की ओर चला गया। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि वह आसानी
से किनारे तक पहुंच गया होगा, क्योंकि वह एक शानदार तैराक था।
जब वह चला गया तो मैं
उस लड़के की तरफ मुड़ा, जिसका नाम जूरी था। मैंने उससे पूछा, "यदि तुम मेरे विश्वासपात्र
बनोगे तो मैं तुम्हें महान आदमी बना दूंगा, लेकिन यदि तुम मेरे साथ धोखाधड़ी करोगे,
तो मैं तुम्हें समुद्र में फेंक दूंगा।"
वह लड़का मेरी ओर देखकर
मुस्कराया और बड़े ही निर्दोष भाव से बोला, "मुझे आप पर पूरा भरोसा है।"
उसने मेरा भरोसा कायम रखने की शपथ ली और हमेशा मेरा साथ निभाने का वादा किया। जैसे-जैसे
शाम का धुंधलका छाता जा रहा था, वैसे-वैसे हम लोग दक्षिण से पूरब की ओर बढ़ते जा रहे
थे। मुझे महसूस हो रहा था कि हम लोग अब काफी आगे निकल चुके हैं। यहां काफी ताजी हवा
चल रही थी तथा समुद्र पूरी तरह से शांत था। मुझे विश्वास हो रहा था कि हम लोग अगले
दिन दोपहर तीन बजे तक किसी तट के समीप पहुंच सकते हैं। अभी हम सेले से डेढ़ सौ मील
से कम की दूरी पर पहुंच चुके थे, जो मोरक्को साम्राज्य से थोड़ा पहले था।
तट के नजदीक
पहुंचकर मैंने वहां उतरने का साहस बटोरा और
एक छोटी-सी नदी के मुहाने के पास पहुंचा। मुझे नहीं पता था कि मैं कहां, किस देश में,
कितने अक्षांश या किस नदी के पास पहुंच चुका हूं। मुझे वहां दूर-दूर तक न तो कोई आदमी
दिखाई दे रहा था और न ही मुझे किसी की जरूरत थी। मैं यहां केवल शुद्ध पानी की खोज में
आया था। हम लोग इस खाड़ी में शाम के वक्त पहुंचे थे और अंधेरा होने से पहले इसका समाधान
कर कोई देश खोज लेना चाहते थे। लेकिन जैसे-जैसे अंधेरा गहराने लगा, वैसे-वैसे हमें
जानवरों के दहाड़ने, चिल्लाने और चिंघाड़ने की भयानक आवाजें सुनाई पड़ने लगीं। इन भयानक
आवाजों से भयभीत होकर बेचारा वह लड़का बुरी तरह से थरथर कांपने लगा और मुझसे किनारे
पर नहीं जाने की प्रार्थना करने लगा।
समुद्र में उठने वाली
लहरों के थमने के बाद हमें शुद्ध जल की खोज के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ा। उस खाड़ी
में वहीं पास में ही साफ पानी का एक अच्छा स्रोत हमें दिखाई पड़ा।
इस ठहराव के बाद हम
लगातार दस या बारह दिनों तक दक्षिण दिशा की ओर लगातार बढ़ते रहे। अब हमारे पास रखी
हुई सारी चीजें खत्म होने के कगार पर पहुंच गई थीं। हम अब जल्द ही समुद्र का किनारा
पाने को व्याकुल हो रहे थे, ताकि कहीं से शुद्ध पानी का इंतजाम किया जा सके। मुझे ऐसा
प्रतीत हो रहा था कि हम अब गाम्बिया या सेनेगल नदी की ओर जा रहे थे।
मुझे उम्मीद थी कि उस
जगह हमें कुछ यूरोपीय जहाज मिल सकते हैं। मैं अपनी इस विचारधारा पर दस दिनों तक कायम
रहा। जैसा कि मैंने कहा था, मुझे अब दूर से ही धरती दिखाई देने लगी थी, जहां कुछ आवास
भी थे। वहां हमने अपना लंगर डाला। वहां दो या तीन जगहों पर लोग हमारी ओर देख रहे थे।
वे लोग देखने में अश्वेत लग रहे थे। मैं एकाएक उन लोगों की तरफ मुड़ा और उनसे बात करने
के लिए तट पर आगे की ओर बढ़ा। लेकिन यहां जूरी ने एक बेहतर सलाहकार की भूमिका निभाते
हुए मुझसे कहा, "वहां जाने की कोई जरूरत नहीं है। आप वहां मत जाओ।" फिर भी
मैं उसकी बात को काटते हुए तट पर उनसे बात करने के लिए आगे की ओर बढ़ा तो मैंने देखा
कि वे लोग अच्छी नीयत से मेरी ओर बढ़े हुए आ रहे हैं।
मैंने देखा
कि उनमें से किसी के हाथ में कोई हथियार नहीं
था। केवल एक आदमी के पास एक हथियार था, जिसका नाम जूरी ने लांस बताया था और उसे वे
बहुत दूर से फेंक कर मारने में सक्षम थे। इसलिए मैंने उनसे कुछ दूरी बनाए रखी और इशारों
से ही उनसे बात करने की कोशिश की। वे खासतौर पर कुछ खाने के लिए इशारा कर रहे थे। वे
मुझसे वहां अपनी नाव रोककर कुछ भोजन करने को कह रहे थे और मेरे खाने के लिए वे कुछ
मांस के टुकड़े लेकर आए भी।
इसके बाद मैं वहां ठहर
गया। लेकिन उनमें से दो लोग बस्ती की ओर भागकर गए और तकरीबन आधे घंटे के बाद कुछ सूखे
मांस के टुकड़े और अनाज लेकर वहां आए। हालांकि मुझे यह नहीं पता कि उस अनाज की पैदावार
वहां होती थी या नहीं और वे लोग कौन थे, फिर भी हमने खाना खाया। यह सब क्यों हुआ था-यह
एक अलग विषय था। मैं वहां किसी तरह का पराक्रम नहीं दिखा रहा था, लेकिन वे लोग कुछ
हद तक भयभीत जरूर दिख रहे थे। उन लोगों ने हमसे दूरी बनाकर रखी थी और जब मैं किनारे
पर आ गया, तब भी उन लोगों ने मुझसे एक पर्याप्त दूरी ही कायम रखी।
तब मैंने उनसे इशारे
से कुछ पानी मुहैया कराने की मदद मांगी और अपना पानी का कनस्तर उन्हें उलटकर दिखाया
कि वह बिलकुल खाली है और मैं इसे भरना चाहता हूं। उन्होंने कुछ दोस्तों को वहां बुलाया।
इतने में दो महिलाएं तट की ओर आगे बढ़ीं। मैंने जूरी को तीनों खाली कनस्तर लेकर उसमें
पानी भरकर लाने के लिए तट पर भेजा।
अब तक मैंने वहां से
हासिल हुए सभी अनाज को सही तरीके से ठिकाने लगा दिया था। इन नीग्रो दोस्तों से हुई
एक अच्छी मुलाकात के बाद मैं बिना किसी समुद्री तट के पास फटके तकरीबन ग्यारह दिनों
तक लगातार समुद्र में तब तक रहा, जब तक मुझे धरती नहीं दिखाई दी। मैंने देखा कि इस
शांत से सागर में तकरीबन 12 से 15 मील की दूरी पर समुद्र का तट और उससे लगी धरती दिखाई
दे रही है।
मैंने वहां
तक पहुंचने का प्रयास तेज कर दिया। सागर तट
से तकरीबन छह मील की दूरी शेष रहने पर वहां तक पहुंचना और भी कठिन लग रहा था। वहां
दूर मैदानी जमीन दिखाई दे रही थी, जिससे मैंने यह अंदाजा लगाया कि हम किसी सही जगह
पर पहुंच गए हैं-वह जगह केप डी वर्ड द्वीप समूह था, हालांकि किनारा अभी मुझसे दूर था।
मैं अच्छी तरह नहीं कह सकता कि वहां तक पहुंचने के लिए बेहतर प्रयास क्या किया जाता,
क्योंकि ताजी हवाएं हमें वहां तक जल्द पहुंचने में मुश्किल पैदा कर रही थीं।
इस उहापोह की स्थिति
से मैं काफी बेचैन था। मैं केबिन में आकर बैठ गया। इधर जूरी ने पतवार थाम रखी थी। थोड़ी
ही देर बाद वह लड़का जोर से चिल्लाया, "मालिक, मालिक! सागर में एक जहाज दिखाई
दे रहा है!" और वह बेवकूफ लड़का डर से कांपने लगा। वह सोच रहा था कि वह जहाज निश्चित
रूप से हमारा पीछा कर रहा है। मैं केबिन से तेजी से बाहर निकला। मुझे जहाज पर दूर से
ही नाम लिखा हुआ दिखाई दिया। वह एक पुर्तगाली जहाज मालूम हो रहा था। मैं सोच रहा था
कि मुझे गिन्नियों के लिए नीग्रो तट तक जल्द ही पहुंचना चाहिए। इतने में मैंने अनुमान
लगाया कि वे लोग अब दूसरी दिशा की ओर जा रहे थे। सागर की ओर देखते हुए मैंने उनसे,
संभव होने पर, बातचीत करने का मन बनाया।
सागर की लहरों पर हमारी
नौका तैरते हुए आगे बढ़ रही थी। मुझे लगा कि हमें अब उनकी ओर नहीं बढ़ना चाहिए। वे
लोग इतनी दूर निकल चुके थे कि उन्हें सिगनल भी नहीं दिखाया जा सकता। धीरे-धीरे वह जहाज
नजदीक आता हुआ दिखा। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि वह जहाज भी अपना रास्ता भटक चुका था और
वह कोई यूरोपियन जहाज था। उन लोगों ने हमें अपने पास बुलाया, जिससे मेरा उत्साह कुछ
बढ़ा। समुद्री यात्रा के बहुत से टिप्स मैंने अपने मालिक से सीखे थे। उन्होंने सिखाया
था कि धुआं उठता देख सावधान हो जाना चाहिए और गन की आवाज पर ध्यान लगाना चाहिए। इस
सिगनल को देखकर कि वे सहृदयता से मेरी ओर बढ़ रहे थे और फिर मेरे नजदीक मेरी सहायता
के मकसद से आ पहुंचे।
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और दोस्तो ये था आज
का चैपटर -
और अब मिलते हैं अगले नए चैपटर के साथ, नई विडियों में,
आप हमेशा खुश रहें, आबाद रहें, स्वस्थ रहें,
और आपका धन्यावाद, नमस्कार, जय हिन्द, जय भारत
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Reviewed by Shiv Rana RCM
on
जुलाई 04, 2026
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