किस तरह लोगों को तत्काल आकर्षित करें - ऑडियो बुक किस तरह लोगों को तत्काल आकर्षित करें - Audio Book LOK VYAVHAR BOOK
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लोक व्यवहार, प्रभावशाली व्यक्तित्व की कला
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किस तरह लोगों को तत्काल आकर्षित करें - ऑडियो बुक
किस तरह लोगों को तत्काल आकर्षित करें - Audio Book
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हैल्लो दोस्तो, नमस्कार, आदाव,
स्वागत है आपका मेरे इस शिवा वॉयस लाइब्रेरी चैनल पर
आज आपको लोक व्यवहार पुस्तक के
नए चैपटर के साथ
जिसका नाम है
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किस तरह लोगों को तत्काल आकर्षित करें - ऑडियो बुक
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के बारे में बताने जा रहे हैं
आईये शुरू करते हैं।
इस चैपटर की ऑडियो बुक
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हैल्लो दोस्तो, नमस्कार, आदाव,
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आज आपको लोक व्यवहार पुस्तक के
नए चैपटर जिसका नाम है
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किस तरह लोगों को तत्काल आकर्षित करें
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मैं न्यूयॉर्क में थर्टी-थर्ड स्ट्रीट पर बने पोस्ट ऑफ़िस में रजिस्ट्री करवाने गया था और लाइन में लगा था। मुझे लगा कि क्लर्क लिफाफ़ों का वज़न लेते हुए, उन पर टिकट चिपकाते हुए, पैसे गिनते हुए और रसीद देते हुए बोर हो रहा था क्योंकि उसे यही काम हर रोज करना होता था। इसलिए मैंने खुद से कहा: कोशिश करूँगा कि यह क्लर्क मुझे पसंद करे। मेरी बातें उसे पसंद आएँ, इसलिए मुझे खुद के बारे में नहीं बल्कि उसके बारे में बातें करनी होंगी। अब मैंने खुद से पूछा, 'इस आदमी में ऐसा क्या है जिसकी में सच्ची तारीफ़ कर सकता हूँ?'" कई बार इस सवाल का जवाब देना काफ़ी कठिन होता है, ख़ासकर अजनबियों के साथ। परंतु इस मामले में जवाब बहुत ही आसान था। मैंने तत्काल कुछ ऐसा देख लिया जिसकी मैं दिल खोलकर तारीफ़ कर सकता था।
जब वह मेरे लिफ़ाफ़े को तौल रहा था, तो मैंने उत्साह भरे स्वर में कहा: "काश मेरे बाल भी आप जैसे होते!"
वह थोड़ा चौंका, और फिर उसके चेहरे पर चमक और मुस्कराहट आ गई। उसने विनम्रता से कहा, "अब तो ये उतने अच्छे नहीं रहे।" मैंने उससे कहा कि हालाँकि ये पहले जितने अच्छे नहीं रहे होंगे, पर अब भी ये बहुत आकर्षक हैं। यह सुनकर वह बेहद खुश हुआ। हम लोगों ने कुछ देर तक छुटपुट दिलचस्प चर्चा की और उसके आखिरी शब्द थे, "कई लोगों ने मेरे बालों की तारीफ की है।"
मैं शर्त लगाता है कि वह आदमी हवा में उड़ता हुआ लंच पर गया होगा और उसने रात को घर लौटकर अपनी पत्नी को यह बात बताई होगी। मैं शर्त लगाता हूँ कि उसने शीशे में खुद को देखा होगा और कहा होगा, "मेरे बाल कितने सुंदर हैं।"
मैंने एक बार लोगों को यह कहानी सुनाई और बाद में एक व्यक्ति ने मुझसे यह सवाल पूछा, "आप उससे क्या हासिल करने की कोशिश कर रहे थे ?"
मैं उससे क्या हासिल करने की कोशिश कर रहा था !!! मैं उससे क्या हासिल करने की कोशिश कर रहा था!!!
अगर हम इतने ज़्यादा स्वार्थी हो जाएँ कि हम सामने वाले बिना कुछ लिए उसे ज़रा सी खुशी या तारीफ़ भी न दे सकें तो हमारी आत्माएँ सड़े हुए सेब की तरह सिकुड़ चुकी हैं और हमें निश्चित रूप से असफल हो जाना चाहिए।
और हाँ, मैं उससे कुछ हासिल करना चाहता था। मैं उससे एक अमूल्य चीज़ हासिल करना चाहता था, और जो मैं चाहता था वह चीज़ मुझे मिल भी गई। मैं चाहता था कि मैं उसे खुश कर दूँ, कि मैं बिना कुछ मिलने की आशा के उसे कुछ दे सकूँ। यही वह भावना है जो घटना के बीत जाने के बाद भी हमारी यादों में लंबे समय तक बनी रहती है और मधुर स्वर में गुनगुनाती है।
मानव व्यवहार का एक बहुत महत्वपूर्ण नियम है। अगर हम उस नियम का पालन करेंगे तो हम कभी मुश्किल में नहीं फँसेंगे। वास्तव में अगर हम उस नियम पर चलेंगे तो हमारे पास अनगिनत दोस्त होंगे और हम हमेशा खुश रहेंगे। परंतु जिस पल हम उस नियम को तोड़ेंगे उसी पल से हम बहुत सारी मुश्किलों में फँस जाएँगे। यह नियम है : हमेशा दूसरे व्यक्ति को महत्वपूर्ण अनुभव कराएँ। जैसा हम पहले ही देख चुके हैं, जॉन डयूई ने कहा है कि महत्वपूर्ण बनने की इच्छा मानव स्वभाव की सबसे महत्वपूर्ण इच्छा होती है। विलियम जेम्स ने कहा है, "हर मनुष्य के दिल की गहराई में यह लालसा छुपी होती है कि उसे सराहा जाए।" जैसा में पहले ही बता चुका हूँ कि यही लालसा हमें जानवरों से अलग करती है। यही लालसा मानव सभ्यता के विकास का कारण है।
दार्शनिक सदियों से मानव संबंधों के नियमों पर चिंतन-मनन करते आ रहे हैं और इस चिंतन-मनन से केवल एक महत्वपूर्ण सूत्र विकसित हुआ है। यह सूत्र नया नहीं है। यह उतना ही पुराना है जितना कि इतिहास। झोरोआस्ट्र ने दो हज़ार पाँच सौ साल पहले अपने अनुयायियों को इसकी शिक्षा दी थी। कन्फ्यूशियस ने चीन में दो हज़ार चार सौ वर्ष पूर्व इसकी शिक्षा दी थी। ताओवाद के संस्थापक लाओ-त्से ने होन की घाटी में अपने शिष्यों को यह सूत्र सिखाया था। बुद्ध ने ईसा के पाँच सौ साल पहले पवित्र गंगा नदी के किनारे पर इसका पाठ पढ़ाया था। 1900 साल पहले हिंदू धार्मिक ग्रंथों ने इस सूत्र की व्याख्या की थी। ईसा मसीह ने इस नियम को एक विचार के रूप में संक्षेप में कहा था जो शायद दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण नियम है, "दूसरों के साथ वही व्यवहार करो, जैसा तुम चाहते हो कि वे तुम्हारे साथ करें।"
आप चाहते हैं कि आपसे मिलने-जुलने वाले लोग आपकी तारीफ़ करें। आप चाहते हैं कि आपकी प्रतिभा को पहचाना जाए। आप चाहते हैं कि आप अपनी छोटी सी दुनिया में महत्वपूर्ण बनें। आप सस्ती चापलूसी या झूठी तारीफ़ नहीं सुनना चाहते। परंतु आप सच्ची प्रशंसा अवश्य सुनना चाहते हैं। आप चाहते हैं कि आपके मित्र और सहयोगी, जैसा चार्ल्स श्वाब ने कहा है, आपकी दिल खोलकर तारीफ़ करें और मुक्त कंठ से सराहना करें। हम सभी यह चाहते हैं।
इसलिए हमें स्वर्णिम नियम का पालन करना चाहिए और दूसरों को वही देना चाहिए जो हम उनसे अपने लिए चाहते हैं।
कब ? कैसे ? कहाँ ? जवाब है हर समय, हर कहीं।
विस्कॉन्सिन के डेविड जी. स्मिथ ने हमारी क्लास में बताया कि जब उन्हें एक चैरिटी कंसर्ट के लिए रिफ्रेशर बूथ का चार्ज दिया गया तो किस तरह उन्होंने एक नाजुक परिस्थिति को सँभाला।
"संगीत समारोह जिस रात को होने वाला था उस रात को मैं पार्क में आया और मैंने देखा कि दो बुजुर्ग महिलाएँ बुरा सा मुँह बनाए रिफ्रेशर स्टैंड के पास खड़ी हैं। दोनों को ही यह ग़लतफ़हमी हो गई थी कि वही इस कार्यक्रम की इंचार्ज थीं। जब मैं वहाँ खड़ा विचार कर रहा था कि क्या किया जाए तो प्रायोजक समिति की एक सदस्य आई और उसने मुझे कैशबॉक्स दे दिया और प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए धन्यवाद दिया। उसने रोज़ और जेन का परिचय मेरे सहायकों के रूप में करवाया और रवाना हो गई।
"काफ़ी देर चुप्पी छाई रही। मुझे एहसास था कि कैश बॉक्स अब सत्ता का प्रतीक बन गया है, इसलिए मैंने उसे रोज़ को दे दिया और कहा कि शायद मैं पैसे का हिसाब-किताब ठीक से नहीं रख पाऊँगा और यदि वह यह ज़िम्मेदारी उठा ले तो मुझे अच्छा लगेगा। फिर मैंने जेन को सुझाव दिया कि वह दो किशोरों को, जिन्हें रिफ्रेशमेंट देने के लिए नियुक्त किया गया था, सोडा मशीन ठीक से चलाना सिखा दे। मैंने जेन से कहा कि वह प्रोजेक्ट के इस हिस्से की इंचार्ज रहेगी।
"पूरी शाम मज़ेदार रही। रोज़ खुशी-खुशी पैसे गिनती रही और जेन किशोरों को मार्गदर्शन देती रही और मैं संगीत समारोह का आनंद लेता रहा।"
प्रशंसा की इस फ़िलॉसफ़ी का प्रयोग करने के लिए आपको तब तक इंतज़ार नहीं करना चाहिए जब तक कि आप फ्रांस के राजदूत न हो जाएँ या किसी कमेटी के चेयरमैन न बन जाएँ। आप लगभग हर दिन इसका जादू की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं।
उदाहरण के लिए यदि वेटर आपके लिए आलू की जगह फ्रेंच बीन्स ले आए तो आप कहिए, "मुझे आपको परेशान करने में कष्ट हो रहा है, परंतु मुझे फ्रेंच बीन्स पसंद हैं।" शायद वह जवाब देगी "कोई परेशानी नहीं" और आलू बदलने में उसे खुशी होगी क्योंकि आपने उसके प्रति सम्मान दर्शाया है।
"मुझे आपको परेशान करने में कष्ट हो रहा है," "क्या आप कृपया यह करेंगे- ?" "क्या आप कृपया ?" "आपको कष्ट तो नहीं होगा?" "धन्यवाद" जैसे छोटे-छोटे वाक्य रोज़मर्रा के जीवन की खुरदुरी मशीन में तेल की तरह जाकर इसे एक बार फिर से चिकना वना देंगे। ज़ाहिर है इन छोटे-छोटे वाक्यों से यह भी पता चलता है कि आप कितने सुसंस्कृत हैं।
हम एक और उदाहरण लेते हैं। हॉल केन के उपन्यास बीसवीं सदी के शुरू में वहुत लोकप्रिय हुआ करते थे। उनकी पुस्तकें क्रिश्चियन, द डीम्स्टर, द मैंक्समैन इत्यादि बेस्टसेलर बन चुकी थीं। करोड़ों लोग उनके उपन्यास पढ़ा करते थे। वे एक लुहार के पुत्र थे। उन्हें ज़िंदगी में आठ साल तक ही पढ़ने का अवसर मिला, परंतु जब उनकी मृत्यु हुई तो वे अपने समय के सबसे अमीर साहित्यकार थे।
कहानी इस तरह है हॉल केन को सॉनेट और वैलेड प्रिय थे, इसलिए उन्होंने दान्ते गैब्रील रॉसैटी की सारी कविताएँ पढ़ी थीं। यही नहीं, उन्होंने रॉसैटी की साहित्यिक उपलब्धियों और योगदान पर एक प्रशंसात्मक लेख भी लिखा और रॉसैटी को इसकी एक प्रति भेजी। रॉसैटी उसे पढ़कर गद्गद हो गया। रॉसैटी ने खुद से यह कहा होगा, "जो नौजवान मेरी प्रतिभा को समझ सकता है, वह निश्चित रूप से खुद भी प्रतिभावान होगा।" इसके बाद रॉसैटी ने इस लुहार के बेटे को लंदन बुलवाकर अपना सेक्रेटरी बना लिया। इस घटना ने हॉल केन के जीवन को बदलकर रख दिया क्योंकि इसी वजह से वह अपने युग के महान साहित्यकारों से मिल पाया। उनकी सलाह से लाभ लेकर और उनके प्रोत्साहन से प्रेरित होकर उसने अपने करियर को इस तरह शुरू किया कि उसने अपना नाम आसमान पर लिखवा लिया।
ऑइल ऑफ़ मैन पर उसका घर ग्रीबा कैसल दुनिया भर के सैलानियों के लिए मक्का बन गया और उसने विरासत में करोडों डॉलर की जायदाद छोड़ी। और कौन जाने, अगर उसने एक प्रसिद्ध व्यक्त्ति की प्रशंसा में वह लेख न लिखा होता, तो शायद वह गरीबी में ही जिया और ग़रीबी में ही मरा होता।
यही सच्ची, दिल से निकलने वाली प्रशंसा की प्रबल शक्ति है। रॉसैटी खुद को महत्वपूर्ण समझता था। इसमें कोई अजीब बात नहीं है। हम सभी खुद को महत्वपूर्ण, बहुत महत्वपूर्ण समझते हैं।
कई लोगों की ज़िंदगी शायद बदल जाए अगर कोई उन्हें यह अनुभव करा दे कि वे महत्वपूर्ण हैं। रोनाल्ड जे. रॉलैन्ड कैलिफ़ोर्निया में हमारे कोर्स के शिक्षक थे और वे कला के शिक्षक भी थे। उन्होंने क्रिस नाम के विद्यार्थी के बारे में हमें बताया :
क्रिस बहुत शांत और शर्मीला बच्चा था जिसमें आत्मविश्वास कम था और वह उस तरह का विद्यार्थी था जिस पर लोग उतना ध्यान नहीं देते थे जितना कि दिया जाना चाहिए। मैं एक एडवांस्ड क्लास भी पढ़ाता हूँ जिसमें पढ़ना गौरव की बात समझी जाती है और यह माना जाता है कि उसमें पहुँचने वाले विद्यार्थी में कोई विशेष प्रतिभा होती है।
बुधवार को क्रिस अपनी डेस्क पर मेहनत से काम में जुटा हुआ था। मुझे सचमुच महसूस हुआ कि उसके भीतर गहराई में कोई छुपी हुई आग धधक रही है। मैंने क्रिस से पूछा कि क्या वह एडवांस्ड क्लास में जाना चाहेगा। क्रिस का चेहरा देखने लायक़ था! मैं उसके चेहरे के भावों का बयान नहीं कर सकता। चौदह साल का वह संकोची लड़का अपने आँसुओं को रोकने की कोशिश कर रहा था।
"कौन ? मैं, मिस्टर रॉलैन्ड ? क्या मैं इतना अच्छा हूँ?" "हाँ, जिम, तुम यक़ीनन इतने अच्छे हो।"
मुझे बात को वहीं पर रोकना पड़ा क्योंकि मेरी आँखों में भी आँसू आ रहे थे। जब क्रिस उस दिन क्लास से बाहर निकला तो वह अपने आपको दो इंच लंबा महसूस कर रहा था। उसने अपनी नीली चमकदार आँखों से मेरी तरफ़ देखते हुए जोशीली आवाज़ में कहा, "धन्यवाद, मिस्टर रॉलैन्ड।"
क्रिस ने मुझे वह सबक़ सिखाया जिसे मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा- महत्वपूर्ण अनुभव करने की हमारी प्रबल आकांक्षा। मैंने तय किया कि मैं इस नियम को हमेशा याद रखूँगा और मैंने एक पोस्टर बना लिया, "आप महत्वपूर्ण हैं।" यह पोस्टर क्लासरूम के सामने सबकी आँखों के सामने टँगा रहता है और हर विद्यार्थी को यह एहसास दिलाता है कि वह महत्वपूर्ण है।
बिना लागलपेट के सच बात यह है कि आपसे मिलने वाले ज़्यादातर लोग अपने आपको आपसे किसी न किसी मामले में सुपीरियर समझते हैं। उनका दिल जीतने का अचूक तरीक़ा किसी कुशल तरीके से उन्हें यह जता देना है कि आपको उनके महत्व का रहसास है और आप इसे सचमुच स्वीकार करते हैं।
इमर्सन की बात याद रखें "हर व्यक्ति मुझसे किसी न किसी शत में बेहतर होता है। मैं उसकी वह बात सीख लेता हूँ।"
और इस मामले का दुखद पहलू यह है कि अक्सर ऐसे लोग जिनके पास खुद को सुपीरियर समझने का कोई कारण नहीं होता वे अपने ईगो को संतुष्ट करने के लिए अहंकार और बहस का सहारा लेते हैं जो सचमुच दिल दुखाने वाली बात है। जैसा शेक्सपियर ने कहा है : "मनुष्य, घमंडी मनुष्य! ज़रा सी सत्ता की पोषाक पहनते ही... ईश्वर की आँखों के सामने ऐसे-ऐसे करतब दिखाता है जिन्हें देखकर देवदूत आँसू बहाने लगते हैं।"
मैं अब आपको यह बताने जा रहा हूँ कि मेरे कोर्स के विद्यार्थियों ने किस तरह से इन सिद्धांतों को अपने जीवन में सफलतापूर्वक उतारा। हम कनैक्टिकट के एक वकील का उदाहरण लेते हैं जो अपने रिश्तेदारों की वजह से अपना नाम गोपनीय रखना चाहता है।
कोर्स में भाग लेने के कुछ ही दिनों के बाद मिस्टर आर. अपनी पत्नी के साथ लाँग आइलैंड पर अपनी पत्नी के रिश्तेदारों से मिलने गए। पत्नी ने उसे अपनी बुढी चाची से बातें करने के लिए बिठा दिया और खुद अपने कुछ युवा रिश्तेदारों से मिलने चली गई। चूँकि मिस्टर आर. को हमारी क्लास में एक भाषण देना था जिसमें उन्हें प्रशंसा के सिद्धांतों पर अमल और उनके परिणामों के बारे में बताना था, इसलिए उन्होंने उस वृद्ध महिला की प्रशंसा करने का निर्णय लिया। उन्होंने घर में चारों तरफ़ देखा कि वे किस चीज़ की सच्ची तारीफ़ कर सकते हैं।
"यह घर 1890 में बना है। है ना?" उन्होंने पूछा। "हाँ," महिला ने जवाब दिया, "यह घर उसी साल बना था।" "यह मुझे उस घर की याद दिलाता है जहाँ मैं पैदा हुआ था।" उन्होंने कहा, "यह बहुत सुंदर है। इसे दिल से बनाया गया है। इसमें बहुत जगह है। आजकल ऐसे घर बनते कहाँ हैं?"
वृद्ध महिला ने कहा, "बिलकुल ठीक कहा। आजकल लोगों को सुंदर घर की क़द्र ही कहाँ है? वे तो बस एक छोटा सा अपार्टमेंट चाहते हैं और फिर वे अपनी कारों में बैठकर इतराते फिरते हैं।
"यह हमारे सपनों का घर था।" उसने काँपती हुई आवाज़ में कहा। "हमने इसे प्रेम से बनाया था। मेरे पति और मैंने इसका बरसों तक सपना देखा था। हमने इसे बनवाने में किसी आर्किटेक्ट की मदद नहीं ली। हम लोगों ने खुद ही इसका नक्शा बनाया था।"
फिर उस महिला ने मिस्टर आर. को पूरा घर दिखाया। मिस्टर आर. ने उन खूबसूरत चीज़ों की दिल खोलकर तारीफ़ की, जिन्हें वह महिला अपनी यात्राओं में ख़रीदकर लाई थी और जिन्हें सँजोने में उसने जीवन बिता दिया था- मखमली शाल, पुराना अँग्रेज़ी टी-सेट, सिल्क के पर्दे जो कभी फ्रांस के महल की शोभा बढ़ाते थे।
घर दिखाने के बाद वृद्ध महिला मिस्टर आर. को अपने गैरेज में ले गई। वहाँ कवर से ढँकी हुई एक नई चमचमाती पैकार्ड कार खड़ी हुई थी।
"मेरे पति ने अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले ही यह कार घरीदी थी।" महिला ने आहिस्ता से कहा। "उनकी मौत के बाद मैं इसमें कभी नहीं बैठी। तुम अच्छी चीज़ों की क़द्र करते हो, और इसलिए मैं तुम्हें यह कार तोहफे में देना चाहती हूँ।"
"अरे, आंटी," मिस्टर आर. ने कहा, "आप यह क्या कह रही है? आपने तो मुझे अभिभूत कर दिया। मैं आपकी उदारता की प्रशंसा करता हूँ, परंतु में इसे कैसे ले सकता हूँ। मैं तो आपका निकट संबंधी भी नहीं हूँ। मेरे पास एक नई कार है और फिर आपके कई रिश्तेदार इस पैकार्ड के मालिक बनना चाहते होंगे।"
"रिश्तेदार," महिला ने कहा। "हाँ, मेरे रिश्तेदार तो मेरे मरने का रास्ता देख रहे हैं ताकि वे मेरी कार पर क़ब्ज़ा कर सकें। परंतु यह कार उन्हें नहीं मिलने वाली।"
"अगर यह कार आप उन्हें नहीं देना चाहतीं, तो फिर आप इसे बड़ी आसानी से किसी सेकंडहैंड डीलर को बेच सकती हैं।" उन्होंने सुझाव दिया।
"बेच दूँ?" महिला चीख़ी। "क्या तुम्हें लगता है कि मैं इस कार को बेचूँगी ? क्या तुम्हें लगता है कि मैं कभी यह सहन कर पाऊँगी कि अजनबी लोग इस कार में घूमें, उस कार में जिसे मेरे पति मेरे लिए ख़रीदकर लाए थे। मैं इसे बेचने की बात तो सपने में भी नहीं सोच सकती। मैं यह कार तुम्हें दे रही हूँ। तुम सुंदर चीज़ों की क़द्र करते हो।"
उसने बहुत प्रयास किया कि वह कार के तोहफ़े को अस्वीकार कर दे, परंतु महिला का दिल दुखाए बिना ऐसा करना संभव नहीं था।
वह वृद्ध महिला अपने बड़े, पुराने महल में अपनी मखमली शालों और फ्रांसीसी एन्टीक्स और अपनी यादों के साथ रह रही थी और थोड़े से आदर, थोड़ी सी प्रशंसा के लिए तरस रही थी। वह भी कभी युवा और सुंदर थी। उसने भी कभी प्रेम से अपने सपनों का घर बनवाया था और इसे सजाने के लिए पूरे यूरोप से दुर्लभ चीजें इकट्ठी की थीं।
अब वह बुढ़ापे में अकेले दिन गुज़ार रही थी और वह प्रेम चाहती थी, सच्ची सराहना चाहती थी और उसे यह कहीं नहीं मिले। और जब यह उसे मिले, तो उसे लगा कि रेगिस्तान में झरना मिल गया है। अपनी कृतज्ञता दिखाने के लिए उसे अपनी पसंदीदा पैकार्ड कार को तोहफे में देने से कम कोई बात पर्याप्त ही नहीं लगी।
अब हम एक और उदाहरण लेते हैं। डोनाल्ड एम. मैक्मैहन न्यूयॉर्क में राई में लैंडस्केप आर्किटेक्ट कंपनी ल्युइस एंड वैलेंटाइन का सुपरिंटेंडेंट था। उसने हमें यह घटना सुनाई :
""हाऊ टु विन फ्रेंड्स एंड इन्फ्लुएंस पीपुल' कोर्स में भाग लेने के बाद एक दिन मैं एक प्रसिद्ध जज की जायदाद को लैंडस्केप कर रहा था। जज ने बाहर आकर मुझे निर्देश दिए कि वे कहाँ पौधे लगाना चाहते हैं।
"मैंने कहा, 'आपकी हॉबी बहुत अच्छी है। मैं काफ़ी देर से सोच रहा था कि आपने कितने सुंदर कुत्ते पाल रखे हैं। मुझे लगता है कि आप मैडीसन स्क्वेयर गार्डन के शो में हर साल बहुत सारे ब्लू रिबन जीतते होंगे।'
"इस थोड़ी सी प्रशंसा का प्रभाव बहुत आश्चर्यजनक था।
""हाँ,' जज ने जवाब दिया, 'मुझे अपने कुत्तों के साथ बहुत आनंद आता है। क्या आप मेरा डॉगहाउस देखना पसंद करेंगे ?'
"जज ने मुझे एक घंटे तक कुत्ते और उनके द्वारा जीते गए इनाम दिखाए। इसके बाद उन्होंने उनकी वंशावली का बखान किया और मुझे समझाया कि किस तरह उनके शुद्ध जातीय रक्त की वजह से ही वे इतने सुंदर और बुद्धिमान हो पाए हैं।
"आख़िरकार मेरी तरफ़ मुड़ते हुए उन्होंने मुझसे पूछा, 'क्या आपके यहाँ कोई छोटा बच्चा है ?'
"मैंने कहा, 'हाँ, मेरे एक बेटा है।'
""क्या वह कुत्ते के पिल्ले से खेलना पसंद करेगा ?' जज ने पूछा।
""हाँ, वह तो खुशी से पागल हो जाएगा।' मैंने जवाब दिया।
""ठीक है, तो फिर मैं उसे एक पिल्ला तोहफे के रूप में भिजवा देता हूँ।' जज ने घोषणा की।
"इसके बाद उन्होंने मुझे यह बताना शुरू किया कि पिल्ले को कैसे खिलाया जाता है। फिर वे रुके। 'अगर मैं आपको मुँहज़बानी बताऊँगा तो आप भूल जाएँगे। बेहतर होगा कि मैं इसे लिख दूँ।' जज घर के अंदर गए, और वहाँ पिल्ले की वंशावली और खानपान की आदतें टाइप कीं। उन्होंने सैकड़ों डॉलर का बहुमूल्य पिल्ला और अपना सवा घंटे का क़ीमती समय मुझे इसलिए दिया क्योंकि मैंने उनकी हॉबी और उनकी उपलब्धियों की सच्ची तारीफ़ की थी।"
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कोडक फ्रेम जॉर्ज ईस्टमैन ने ट्रांसपेरेंट फ़िल्म का आविष्कार किया जिसकी वजह से मोशन पिक्चर्स बनना संभव हुआ। उनके पास एक अरब डॉलर की संपत्ति थी और वे दुनिया के सबसे सफल बिज़नेसमैनों में से एक थे। परंतु अपनी इन सारी अद्भुत उपलब्धियों के बावजूद वे भी प्रशंसा के उतने ही भूखे थे जितने कि आप और मैं।
एक उदाहरण लें: ईस्टमैन रॉशेस्टर में स्कूल ऑफ़ म्यूज़िक और किलबोर्न हॉल बनाने जा रहे थे। ईस्टमैन की इन इमारतों में थिएटर चेयर्स लगनी थीं इसलिए सुपीरियर सीटिंग कंपनी के प्रेसिडेंट अपनी कंपनी के लिए उनसे कुर्सियों का ऑर्डर लेना चाहते थे। मिस्टर एडमसन ने आर्किटेक्ट को फ़ोन करके रोशेस्टर में मिस्टर ईस्टमैन से मुलाक़ात का समय ले लिया।
जब एडमसन उनके ऑफ़िस पहुँचे, तो आर्किटेक्ट ने कहा, 'मैं जानता हूँ कि आप यह ऑर्डर हासिल करना चाहते हैं। परंतु मैं आपको यह भी बताना चाहता हूँ कि अगर आपने जॉर्ज ईस्टमैन का पाँच मिनट से अधिक समय लिया, तो आप अपने मक़सद में कामयाब नहीं हो पाएँगे। वे बहुत अनुशासनप्रिय व्यक्ति हैं। वे बेहद व्यस्त हैं। इसलिए जल्दी से अपनी बात कहो और वापस आ जाओ।'
एडमसन यही सब करने के लिए पूरी तरह तैयार थे। कमरे में दाखिल होने के बाद एडमसन ने देखा कि मिष्टा ईस्टमैन अपनी डेस्क पर रखे काग़ज़ों के गट्ठे पर झुके हुए थे। थोक देर बाद मिस्टर ईस्टमैन ने अपना सिर उठाया, चश्मा उतारा और मिस्टर एडमसन तथा आर्किटेक्ट की तरफ़ बढ़कर कहा, "गुह मॉर्निंग, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ?"
आर्किटेक्ट ने उनका परिचय कराया और फिर मिस्टा एडमसन ने कहा, "जब मैं बाहर आपका इंतज़ार कर रहा था, मिस्टर ईस्टमैन, तो मैं मन ही मन आपके ऑफ़िस की तारीफ़ कर रहा था। ऐसे ऑफ़िस में काम करने का किसका दिल नहीं करेगा? मैं इंटीरियर बिज़नेस में हूँ और मैंने अपने जीवन में इससे सुंदर ऑफ़िस नहीं देखा।"
जॉर्ज ईस्टमैन ने जवाब दिया "आपने मुझे वह बात याद दिला दी जिसे मैं लगभग भूल चुका था। यह ऑफ़िस सुंदर है, है ना ? जब मैंने इसे बनवाया था, तो शुरू में मुझे इसमें काम करने में बहुत आनंद आता था। परंतु अब मेरे दिमाग में दूसरी बहुत सी बातें रहती हैं और कई बार तो मैं हफ्तों तक अपने कमरे को ही ठीक से नहीं देख पाता।"
एडमसन ने उठकर अपने हाथ से एक पैनल को छुआ। "याह इंग्लिश ओक है, है ना? यह इटेलियन ओक से ज़रा हटकर है।"
"हाँ," ईस्टमैन ने जवाब दिया। "यह इम्पोर्टेड इंग्लिश ओक है। इसे मेरे दोस्त ने ख़ास तौर पर पसंद करके चुना था और मेरा दोस्त लकड़ी का विशेषज्ञ है।"
फिर ईस्टमैन ने उसे पूरा कमरा दिखाया, उसके आकार पर टिप्पणी की, उसके रंग, और वे सारी चीजें जिनकी उन्होंने योजना बनाई थी और जिनके अनुसार यह कमरा तैयार हुआ था।
कमरे में घूमते समय और लकड़ी के काम की सराहना करते हुए वे लोग एक खिड़की के सामने रुक गए और जॉर्ज ईस्टमैन ने अपने विनम्र अंदाज में उन संस्थाओं की ओर संकेत किया जिनके द्वारा वे मानवता की सेवा करने का प्रयास कर रहे थे यूनिवर्सिटी ऑफ रोशेस्टर, जनरल हॉस्पिटल, होम्योपैथिक हॉस्पिटल, फ्रेंडली होम, चिल्ड्रंस हॉस्पिटल इत्यादि। एडमसन ने दौलत का आदर्शवादी उपयोग करने के लिए उनकी तारीफ़ की कि वे अपनी संपत्ति का प्रयोग मानवता के दुख-दर्द कम करने के लिए कर रहे हैं। फिर जॉर्ज ईस्टमैन ने काँच का एक केस खोला और उसमें से अपना पहला कैमरा निकालकर एडमसन को दिखाया एक आविष्कार, जिसे उन्होंने एक अँग्रेज़ से ख़रीदा था।
एडमसन ने ईस्टमैन से विस्तार से पूछा कि बिज़नेस में इतनी अपार सफलता हासिल करने से पहले उन्हें शुरुआत में किस तरह के संघर्षों से गुज़रना पड़ा। मिस्टर ईस्टमैन ने बचपन की अपनी ग़रीबी के बारे में बताया कि किस तरह उनकी विधवा माँ बोर्डिंग हाउस चलाती थीं, जबकि वे एक बीमा ऑफ़िस में क्लर्क का काम करते थे। गरीबी का राक्षस उन्हें दिन-रात डराता रहता था और इसी वजह से उन्होंने यह संकल्प किया कि वे इतना अधिक धन कमाएँगे कि उनकी माँ को काम करने की ज़रूरत न रहे। मिस्टर एडमसन सवाल पूछते रहे और मन लगाकर पूरी बात सुनते रहे। फिर मिस्टर ईस्टमैन ने बताया कि किस तरह वे ड्राई फ़ोटोग्राफ़िक प्लेट्स के साथ प्रयोग किया करते थे। किस तरह वे पूरे दिन ऑफ़िस में काम करके रात को प्रयोगशाला में काम करते थे। झपकी लेने का समय भी वे प्रयोग के दौरान ही निकालते थे, जबकि केमिकल्स अपना काम करते रहते थे। कभी-कभी तो लगातार बहत्तर घंटे तक वे अपने कपड़े भी नहीं बदलते थे और वे उन्हीं कपड़ों में सोते भी थे, और काम भी करते थे।
जेम्स एडमसन को ईस्टमैन के ऑफ़िस में घुसने से पहले यह चेतावनी दी गई थी कि मुलाक़ात पाँच मिनट से अधिक नहीं चलनी चाहिए परंतु दो घंटे गुज़रने के बाद भी उनकी बातें ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थीं।
अंत में. जॉर्ज ईस्टमैन ने एडमसन से कहा, "पिछली बार मैं जापान से कुछ कुर्सियाँ लेकर आया था, और उन्हें अपने पोर्च में रख दिया था। परंतु सूर्य की गरमी के कारण उनका पेंट उखड़ गया।
इसलिए मैं कछ दिन पहले बाज़ार जाकर पेंट लाया और मैंने अपने हाथों से उन कुर्सियों को पेंट किया है। क्या आप देखना चाहेंगे कि मैंने कैसा पेंट किया है? अच्छा, तो आइए, मेरे साथ लंच पर घर चलिए और मैं आपको वे कुर्सियाँ दिखाता हूँ।"
लंच के बाद मिस्टर ईस्टमैन ने एडमसन को वे कुर्सियाँ दिखाई जिन्हें वे जापान से ख़रीद कर लाए थे। उनकी क़ीमत कुछ डॉलर से अधिक नहीं थी, परंतु जॉर्ज ईस्टमैन को, जो अब एक अरबपति था. इस बात पर गर्व था कि इन कुर्सियों को उसने खुद पेंट किया था।
जिन कुर्सियों का ऑर्डर लेने के लिए एडमसन गया था, वह ऑर्डर १०,००० डॉलर का था। आपको क्या लगता है, ऑर्डर किसे मिला होगा- जेम्स एडमसन को या उसके किसी प्रतिद्वंद्वी को ?
इस घटना के बाद जॉर्ज ईस्टमैन और जेम्स एडमसन पक्के दोस्त बन गए और उनकी दोस्ती मिस्टर ईस्टमैन की मृत्यु तक चलती रही।
फ्रांस के एक रेस्तराँ मालिक क्लॉड मॉरिस ने इस सिद्धांत का प्रयोग करते हुए अपनी एक महत्वपूर्ण कर्मचारी को नौकरी न छोड़ने के लिए राज़ी कर लिया। यह महिला उसके यहाँ पाँच साल से नौकरी कर रही थी और वह मॉरिस तथा उसके इक्कीस लोगों के स्टाफ़ के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी थी। जब इस महिला ने अपना इस्तीफ़ा रजिस्टर्ड पोस्ट से भिजवाया तो मॉरिस को धक्का लगा।
"मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, और उससे भी बढ़कर मैं निराश हुआ क्योंकि मुझे लगता था कि मैं उसके साथ पूरी तरह न्याय कर रहा हूँ और उसकी आवश्यकताओं को पूरा कर रहा हूँ। चूँकि वह कर्मचारी के साथ-साथ दोस्त भी थी, इसलिए हो सकता है कि मैं उससे अन्य कर्मचारियों की तुलना में कुछ ज़्यादा ही अपेक्षाएँ करने लगा था और इसलिए उस पर मानसिक दबाव बढ़ गया हो।
"बिना पूरी बात को समझे मैं उसका इस्तीफ़ा मंजूर नहीं कर सकता था। मैंने उसे अकेले में बुलाकर उससे कहा, 'पॉलेट, तुम्हें यह समझ लेना चाहिए कि मैं तुम्हारा इस्तीफ़ा मंजूर नहीं कर सकता। तुम मेरे और इस कंपनी के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो। इस रेस्तराँ की सफलता के लिए तुम भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो, जितना कि मैं हूँ।'
मैंने इस वाक्य को पूरे स्टाफ़ के सामने कहा और फिर मैं उसे अपने घर ले गया और वहाँ पर अपने परिवार के सामने भी उससे यही कहा।
"पॉलेट ने अपना इस्तीफ़ा वापस ले लिया और आज मैं उस पर पहले से अधिक विश्वास कर सकता हूँ। मैं बार-बार उसके कांम की सराहना करता हूँ और उसे यह बताता रहता हूँ कि वह मेरे और रेस्तराँ के लिए कितनी महत्वपूर्ण है।"
ब्रिटिश साम्राज्य पर शासन करने वाले सबसे बुद्धिमान व्यक्तियों में से एक डिज़राइली ने कहा था, "लोगों से उनके बारे में बात कीजिए और वे घंटों तक आपकी बातें सुनते रहेंगे।"
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यह था इस चैप्टर का
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सिद्धांत 6
सामने वाले व्यक्ति को महत्वपूर्ण अनुभव कराएँ और पूरी ईमानदारी से कराएँ।
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और दोस्तो ये था आज का चैपटर
और अब मिलते हैं अगले नए चैपटर के साथ, नई विडियों में,
धन्यावाद, नमस्कार, जय हिन्द, जय भारत
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Reviewed by Shiv Rana RCM
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दिसंबर 25, 2025
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