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अच्छा वक्ता बनने का आसान तरीक़ा- ऑडियो बुक अच्छा वक्ता बनने का आसान तरीक़ा- LOK VYAVHAR BOOK

 अच्छा वक्ता बनने का आसान तरीक़ा- ऑडियो बुक

अच्छा वक्ता बनने का आसान तरीक़ा- LOK VYAVHAR BOOK

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लोक व्यवहार, प्रभावशाली व्यक्तित्व की कला

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हैल्लो दोस्तो, नमस्कार, आदाव,

स्वागत है आपका मेरे चैनल शिवा वॉयस लाइब्रेरी में

आज आपको लोक व्यवहार पुस्तक के

नए  चैपटर   जिसका नाम है

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अच्छा वक्ता बनने का आसान तरीक़ा - की ऑडियो बुक

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के बारे में बताने जा रहे हैं

आईये शुरू करते हैं।

इस चैपटर की ऑडियो बुक    

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 अच्छा वक्ता बनने का आसान तरीक़ा

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कुछ समय पहले मैं एक ब्रिज पार्टी में गया। मैं ब्रिज नहीं खेलता कु और वहाँ पर मेरे ही जैसी एक और महिला थी जिसे ब्रिज इतना नहीं आता था। उसे यह जानकारी मिली कि लॉवेल थॉमस रेडियो की दुनिया में जाने से पहले मैं उनका मैनेजर था और मैं उनके सहयोगी के रूप में यूरोप घूम चुका हूँ। इसलिए उसने मुझसे कहा, "मिस्टर कारनेगी, मैं चाहती हूँ कि आप बताएँ आप कितनी बेहतरीन जगहों पर घूमे हैं और आपने यूरोप में कितने दर्शनीय स्थलों को देखा है।"

 

जब हम सोफ़े पर बैठे, तो उसने मुझे बताया कि वह और उसका पति अभी-अभी अफ्रीका की यात्रा से लौटे हैं। मैंने कहा, 'आफ्फ्रीका ! कितना मज़ेदार अनुभव रहा होगा। मैं हमेशा से अफ्रीका घूमना चाहता हूँ, परंतु चौबीस घंटे अल्जियर्स में रुकने के सिवाय मुझे अफ्रीका घूमने का मौक़ा ही नहीं मिला। मुझे बताएँ, क्या आपने सचमुच उस रोमांचक देश का भ्रमण किया है ? हाँ ? आप कितनी खुशकिस्मत हैं? मुझे आपसे सचमुच ईर्ष्या होती है। आप मुझे अष्ठीका के अपने अनुभव सुनाएँ।"

 

इसके बाद वह महिला पैंतालीस मिनट तक बोलती रही। उसने मुझसे एक बार भी यह नहीं पूछा कि मैं कहाँ-कहाँ गया था या मैंने स्या-क्या देखा था। वह मेरी यात्राओं के बारे में सुनना भी नहीं चाहती थी। वह तो सिर्फ एक दिलचस्प श्रोता की तलाश में थी. जे उसके अहं को संतुष्टि दे सके. और जिसे वह अपने किस्से सुना सके।

 

क्या उस महिला का व्यवहार असामान्य था ? नहीं। ज्यादातर लोग इसी तरह के होते हैं।

 

उदाहरण के तौर पर, न्यूयॉर्क के पुस्तकों के एक प्रकाशহ द्वारा दी गई डिनर पार्टी में मैं एक प्रसिद्ध बॉटनिस्ट से मिला। मेरे इसके पहले कभी किसी बॉटनिस्ट से बातें नहीं की थीं और मुझे उनकी बातें दिलचस्प लग रही थीं।

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जब वे मुझे पेड-पौधों की दुनिया की रोचक बातें बता रहे थे. तो मैं अपनी कर्सी के किनारे पर बैठा रहा और सुनता रहा (और उन्होंने मुझे घरेलू आलू के बारे में भी कां दिलचस्प बातें बताई। उन्होंने मुझे इनडोर गार्डन विकसित करने के नए-नए तरीके बताए। मैं मन लगाकर उनकी बात सुनता रहा। मेग खुद का भी एक छोटा सा बगीचा था और वह प्रसिद्ध बॉटनिर इतना भला था कि उसने मुझे यह भी बताया कि मैं किस तरा अपनी समस्याओं को सुलझा सकता हूँ।

 

जैसा मैंने कहा हम एक डिनर पार्टी में थे। वहाँ पर कोई एक दर्जन लोग होंगे, पर मैंने सामाजिकता के सभी नियमों को तोडते हुए, बाक़ी सबको नज़रअंदाज़ करते हुए सिर्फ़ उसी बॉटनिस्ट के घंटों बातें कीं।

 

आधी रात होने पर मैंने सबसे विदा ली और चल दिया। मेरे जाने के बाद वह बॉटनिस्ट मेज़बान के पास गया और उसने मेरो बहुत प्रशंसा की। मुझे "बहुत प्रेरक" व्यक्ति और "बहुत ही रोचक वक्ता" कहा गया।

 

बहुत ही रोचक वक्ता ? जबकि मैंने उसके सामने ज़्यादा बातें की ही नहीं थीं। मैं चाहता भी, तो भी बिना विषय को बदले ज्याय कुछ नहीं कह सकता था, क्योंकि बॉटनी के बारे में मुझे उतना ही मालूम है जितना कि पेंग्विन की एनोटॉमी के बारे में। परंतु मैंने एक काम किया था : मैंने उनकी बातों को मन लगाकर सुना था। मैंने मन लगाकर इसलिए सुना था क्योंकि मुझे उनकी बातें सचमुच दिलचस्प लग रही थीं। और उन्हें इस बात का एहसास हो गया। स्वाभाविक तौर पर इससे उन्हें खुशी हुई। इस तरह से किसी की बात सुनना किसी भी व्यक्ति की अप्रत्यक्ष रूप से सर्वोच्च प्रशंसा है। बैंक वुडफ़ोर्ड ने अपनी पुस्तक स्ट्रेन्जर्स इन लव में लिखा है, "बहुत कम इसान ऐसे होते हैं जो मन लगाकर सुनने की चापलुसी को पसंद नहीं करते।" में मन लगाकर सुनने से भी दो क़दम आगे निकल गया था, मैं तो उनकी दिल खोलकर तारीफ़ कर रहा था और मुक्त कठ से सराहना भी कर रहा था।

 

मैंने उन्हें बताया कि मुझे उनकी चर्चा में बहुत मज़ा आया और ज्ञान भी मिला- जो कि सच था। मैंने उन्हें बताया कि काश मेरे पास भी उन जैसा ज्ञान होता जो कि सच था। मैंने उन्हें बताया कि मैं उनके साथ खेतों में घूमना पसंद करूँगा और मैं ऐसा कर चुका हूँ। मैंने उन्हें बताया कि मैं उनसे दुबारा मिलूँगा- और मैं मिला भी।

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तो इस तरह से उन्होंने मुझे एक अच्छा वक्ता समझ लिया जबकि दरअसल मैं सिर्फ़ एक अच्छा श्रोता था जो उन्हें चर्चा करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था।

 

सफल बिज़नेस इंटरव्यू का रहस्य या भेद क्या है ? भूतपूर्व हार्वर्ड प्रेसिडेंट चार्ल्स डब्ल्यू. इलियट के अनुसार, "सफल बिज़नेस चर्चा के बारे में कोई रहस्य नहीं है... जो आपसे बात कर रहा है उस पर संपूर्ण ध्यान देना बहुत महत्वपूर्ण है। इससे बड़ी चापलूसी दूसरी नहीं होती।"

 

इलियट स्वयं सुनने की कला के बहुत बड़े विशेषज्ञ थे। अमेरिका के महान उपन्यासकार हेनरी जेम्स अपने संस्मरण में कहते हैं, "डॉक्टर इलियट का सुनना सिर्फ़ मौन नहीं था, बल्कि एक तरह की गतिविधि थी। सीधे तनकर बैठना, हाथों को इकट्ठे गोद में रखना, अपने अँगूठों को एक दूसरे पर लपेटने के सिवा उनके शरीर में कोई हरकत नहीं होती थी। वे सीधे वक्ता के सामने रहते थे और कानों के साथ-साथ आँखों से भी सुनते थे। वे अपने दिमाग से सुनते ये और आपके कहते समय यह सोचते थे कि आपको यह बात क्यों कहनी पड़ी... इंटरव्यू के अंत में जो व्यक्ति उनसे बात करता था उमे महसूस होता था कि सामने वाला उसकी पूरी बात समझ गया है।

 

बात सीधी सी है, नहीं क्या? आपको यह रहस्य जानने लिए हार्वर्ड में चार साल तक अध्ययन करने की आवश्यकता नहीं है। परंतु हम और आप ऐसे डिपार्टमेंट स्टोर मालिकों को जानते है जो महँगी दुकानें ख़रीदते हैं, किफ़ायत से अपना सामान खरीदते है अपनी खिडकियों को आकर्षक अंदाज़ में सजाते हैं, विज्ञापन में हजारों डॉलर खर्च करते हैं और फिर क्लर्कों को नौकरी पर रखते हैं- उन क्लकों को जो अच्छे श्रोता नहीं होने के कारण ग्राहकों को बात को बीच में ही काटते हैं, उनसे बहस करते हैं, उन्हें चिढ़ा देते हैं और कुल मिलाकर उन्हें स्टोर से भाग जाने पर एक तरह से मजबूर कर देते हैं।

 

शिकागो के एक डिपार्टमेंट स्टोर ने अपना एक ऐसा ग्राहक लगभग खो दिया था जो उस स्टोर से हर वर्ष कई हज़ार डॉलर का सामान खरीदती थी- सिर्फ़ इसलिए क्योंकि सेल्सगर्ल ग्राहक की बात सुनने के लिए तैयार ही नहीं थी। शिकागो में हमारे कोर्स में भाग लेने वाली मिसेज़ हेनेरिटा डगलस ने स्पेशल सेल से एक कोट खरीदा था। घर आने पर उन्होंने देखा कि उस कोट की लाइनिंग थोड़ी सी उधड़ी हुई है। वे अगले दिन स्टोर में गई। और उन्होंने सेल्सगर्ल से कोट बदलने का अनुरोध किया।

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सेल्सगर्ल ने उनकी शिकायत तक सुनने से इंकार कर दिया, "आपने इसे एक स्पेशल सेल में खरीदा है।" इसके बाद उसने दीवार पर लिखा हुआ वाक्य पढ़वा दिया, "इसे पढ़िए, इस पर क्या लिखा है बिका हुआ सामान वापस नहीं लिया जाता।" उसने कहा, "आपने इसे एक बार खरीद लिया है, अब आपको इसे रखना होगा चाहे यह जिस हाल में हो। अगर कोट की सिलाई उधड़ी हुई है तो यह आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप इसे ठीक करें।"

 

"परंतु यह तो पहले से ही ख़राब सामान था," मिसेज़ डगलस ने शिकायत की।

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उससे कोई फर्क नहीं पड़ता," क्लर्क ने उनकी बात काटते कहा, "आप फ़ालतू बहस न करें।"

 

मिसेज डगलस गुस्से से आगबबूला होकर जाने ही वाली थीं। मन ही मन दुबारा उस स्टोर में न आने का फैसला कर चुकी है। तभी वहाँ का डिपार्टमेंट मैनेजर आया जो स्थायी ग्राहक होने के कारण उन्हें वर्षों से जानता था। मिसेज डगलस ने उसे अपनी परी कहानी सुनाई।

 

मैनेजर ने ध्यान से पूरा किस्सा सुना, कोट की जाँच की और दिर कहा "स्पेशल सेल का सामान इसलिए वापस नहीं होता योंकि हम सीजन के आखिर में अपना सामान बेचकर खत्म करना साहते हैं। परंतु सामान वापस न होने का नियम दोषपूर्ण सामान पर सागू नहीं होता। हम निश्चित रूप से इसकी मरम्मत कर सकते हैं फिर से सिलाई करवा सकते हैं या अगर आप कहें तो हम आपका पैसा वापस कर सकते हैं।"

 

दोनों के व्यवहार में कितना फ़र्क़ था! अगर मैनेजर वहाँ न आया होता और उसने इस स्थायी ग्राहक से बातें न की होतीं तो उनके स्टोर से एक ग्राहक हमेशा के लिए चला गया होता।

 

सुनने की कला घर पर भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि बिज़नेस में। न्यूयॉर्क की मिली एस्पोसिटो ने यह आदत डाल ली कि जब भी उनके बच्चे उनसे कुछ कहना चाहते थे, वे ध्यान से उनकी बात सुनती थीं। एक दिन वे शाम को अपने पुत्र रॉबर्ट के साथ बैठी हुई थीं। रॉबर्ट के मस्तिष्क में घुमड़ रही बातों पर संक्षिप्त चर्चा के वाद रॉबर्ट ने कहा, "माँ, मैं जानता हूँ कि आप मुझसे बहुत प्यार करती हैं।"

 

मिसेज़ एस्पोसिटो को यह सुनकर अच्छा लगा और उन्होंने रुहा, "हाँ बेटा, मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ। पर तुम्हें यह किस बात से लगा ?"

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रॉबर्ट ने जवाब दिया, "मैं जानता हूँ कि आप मुझसे प्यार करती हैं क्योंकि आप मेरी हर बात बहुत ध्यान से सुनती हैं। जब भी में कुछ कहता है तो आप अपना सारा काम छोडकर मेरी बाते सुनने लगती हैं।"

बड़े से बड़ा आलोचक भी धैर्यवान, सहानुभूतिपूर्ण श्रोता के सामने नर्म पड़ जाएगा- एक ऐसा श्रोता जो उस समय चुप रहे जब क्रोधित आलोचक किंग कोबरा की तरह फन फैलाकर अपने शरीर टेलीफोन कंपनी ने कुछ साल पहले यह पता लगाया कि इसे एक से अपना जहर उगल रहा हो। उदाहरण के तौर पर न्यूयाक ऐसे कष्टकारी ग्राहक से निबटना है जो हमेशा ग्राहक सेवा प्रतिनिधियों को कोसता था। और उसने सच में बहुत भला-बुरा कहा। उसने बहुत चिल्लाचोट की। उसने फोन को इसकी जडों से उखाड़ने को धमकी दी। उसने कुछ बिलों का भुगतान करने से मना कर दिया क्योंकि उसकी नज़र में वे गलत थे। उसने अख़बारों को पत्र लिखे। उसने असंख्य जनहित याचिकाएँ दायर कीं और उसने टेलीफोन कंपनी के ख़िलाफ़ अदालत में कई मामले भी दायर किए।

 

आख़िरकार कंपनी के सबसे योग्य ट्रबलशूटर यानी संकटमोचक को इस गुस्सैल ग्राहक का इंटरव्यू लेने के लिए भेजा गया। इस ट्रवलशूटर ने ग्राहक की बात सुनी और भड़कने वाले ग्राहक को अपना गुस्सा निकालने दिया। टेलीफ़ोन प्रतिनिधि सुनता रहा। वह "हाँ, हाँ" कहता रहा और ग्राहक के नज़रिए से सहानुभूति प्रदर्शित करता रहा।

 

"ग्राहक अपनी भड़ास निकालता रहा और मैंने लगभग तीन घंटे तक उसकी बातें सुनीं," ट्रबलशूटर ने हमारी क्लास में अपना अनुभव सुनाया, "मैं उससे चार बार मिला और चौथी मीटिंग में पहले मैं उस संगठन का चार्टर मेंबर बन चुका था जिसे उसने शुरू किया था। उसने इसका नाम 'टेलीफ़ोन सब्सक्राइबर्स प्रोटेक्टिव एसोसिएशन' रखा था। मैं अब भी उस संगठन का सदस्य हूँ और जहाँ तक मुझे पता है मिस्टर के अलावा मैं ही दुनिया में उसका एकमात्र सदस्य हूँ।

"इन मीटिंगों में मैंने उसकी हर बात को मन लगाकर सुना

उसकी बातों को इस तरह पहले कभी नहीं सुना था और वह एक और उसकी कही बातों से हमदर्दी जताई। किसी टेलीफोन प्रतिनिधि ने तरह से मेरा दोस्त बन चुका था। जिस बारे में मैं उससे मिलने गया था उसका जिक्र मैंने पहली मीटिंग में नहीं किया, न ही दूसरी या तीसरी मीटिंग में।

 

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परंतु चौथी मीटिंग में मैंने मामले को पूरी तरह निबटा लिया. उसने अपने बिलों का पूरा भुगतान कर दिया और टेलीफोन कंपनी के साथ उसकी समस्याओं के इतिहास में पहली बार उसने अपनी सारी शिकायतें और केस वापस ले लिए।"

 

इसमें कोई संदेह नहीं कि मिस्टर ..... खुद को धर्मयोद्धा मानते हे जो क्रूर शोषण के विरुद्ध जनअधिकारों की रक्षा कर रहे थे। परंतु दरअसल वे महत्वपूर्ण अनुभव करना चाहते थे। उन्हें पहले महत्वपूर्ण होने का यह एहसास चिल्लाने और शिकायत करने से मिलता था। परंतु जैसे ही उन्हें कंपनी के प्रतिनिधि की तरफ़ से महत्व मिला, उनकी शिकायतें काफूर हो गईं।

 

वर्षों पहले, एक सुबह एक क्रुद्ध ग्राहक डेटमर वूलन कंपनी के संस्थापक जूलियन एफ़. डेटमर के ऑफ़िस में आ धमका (डेटमर वृलन कंपनी बाद में टेलरिंग व्यवसाय को सामान देने वाली विश्व की सबसे बड़ी डिस्ट्रिब्यूटर बनी)।

 

मिस्टर डेटमर ने मुझे बताया, "इस ग्राहक से हमें कुछ पैसे लेने थे। ग्राहक यह मानने को तैयार नहीं था, परंतु हम जानते थे कि हम सही थे। इसलिए हमारे क्रेडिट डिपार्टमेंट ने भुगतान करने के लिए उससे बार-बार अनुरोध किया। हमारे क्रेडिट डिपार्टमेंट की तरफ़ से बहुत से पत्र मिलने के बाद उसने अपना सूटकेस पैक किया और वह शिकागो आ पहुँचा। वह तेज़ी में मेरे ऑफ़िस में आया, सिर्फ़ यह बताने के लिए कि न तो वह बिल चुकाएगा, न ही भविष्य में डेटमर वूलन कंपनी से एक धेले का भी सामान ख़रीदेगा।

 

"मैंने उसकी बातें धैर्य से सुनीं। मेरा बहुत मन हो रहा था कि उसे टोक दूँ या उसकी बात काट दूँ, पर मैंने महसूस किया कि यह गलत नीति होगी। इसलिए मैंने उसके दिल का गुबार निकल जाने दिया। जब उसका गुस्सा ठंडा पड़ गया और वह सुनने की स्थिति के लिए और मुझे पूरी बात बताने के लिए धन्यवाद देता है। आपने में आ गया तो मैंने उससे शांति से कहा, "मैं आपको शिकागो आने की वजह से आपको तकलीफ हई है तो इससे और भी कई अच्छे मुझ पर एक बड़ा एहसान किया है। अगर हमारे क्रेडिट डिपार्टमेंट ग्राहकों को तकलीफ़ हो सकती है और यह हमारे बिजनेस के लिए अच्छा नहीं है। मेरा यकीन मानिए, आप इन बातों को बताने के लिए जितने उत्सुक हैं, उससे कहीं ज्यादा में इन्हें सुनने के लिए उत्सुक हूँ।'

 

"जब मैंने यह सब कहा, तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ। उसे यह सुनने की उम्मीद ही नहीं थी। मुझे लगा जैसे वह थोडा निराश भी हुआ। वह मुझे दो-चार बातें सुनाने के लिए शिकागो आया था. और मैं था कि उससे बहस करने के बजाय उसे धन्यवाद दे रहा था। मैंने उसे विश्वास दिलाया कि हम अपने बहीखाते से उसके उधार को काट देंगे और इसे भूल जाएँगे क्योंकि उसके पास तो देखने के लिए एक ही अकाउंट है, जबकि हमारे क्लर्कों को हज़ारों अकाउंट देखने पड़ते हैं। इसलिए उसके गलत होने की संभावना कम है, जबकि हमारे गलत होने की संभावना ज़्यादा है।

 

"मैंने उसे बताया कि मैं उसकी भावनाओं को समझ सकता हूँ। अगर मैं उसकी जगह होता तो मैंने भी यही किया होता। चूँकि अब उसकी इच्छा हमसे सामान ख़रीदने की नहीं थी, इसलिए मैंने उसे कई दूसरे अच्छे वूलन स्टोर्स के नाम सुझा दिए।

 

"पहले जब भी वह शिकागो आता था, तब हम आम तौर पर इकट्ठे लंच किया करते थे इसलिए मैंने उस दिन भी उसे लंच के लिए आमंत्रित किया। उसने अनमने ढंग से मेरे आग्रह को स्वीकार किया परंतु जब हम वापस ऑफ़िस लौटे तो उसने मुझे पहले से बड़ा ऑर्डर दिया। वह अच्छे मूड में घर लौटा क्योंकि वह अच्छाई का जवाब अच्छाई से देना चाहता था। घर लौटकर उसने अपने अकाउंट को ठीक से देखा और उसे एक ऐसा बिल मिल गया, जिसका भुगतान उसने नहीं किया था। उसने माफ़ी माँगते हुए चेक भिजवा दिया।

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बाद में जब उसके पर बेटा हुआ तो उसने अपने पुत्र का का नाम पर रखा और बाईस साल बाद अपनी मृत्यु तक कंपनी का मित्र और ग्राहक बना रहा।"

 

सालों पहले एक गरीब श्रच आप्रवासी बालक स्कूल के बाद अपने परिवार की भवन करने के लिए बेकरी शॉप की खिड़कियाँ धोया करता था। उसका परिवार इतना गरीब था कि इसके अलावा वह हर सड़क पर बाल्टी लेकर घूमता था ताकि कोयले की गाडियों से बदर में गिरे कोयले के टुकड़ों को बीन सके। इस बालक एडवर्ड बैंक को अपने जीवन में छह वर्ष का स्कूल जीवन ही नसीब हुआ, अंततः वह अमेरिकी पत्रकारिता के इतिहास में सर्वाधिक सफल मैकलीन संपादकों में से एक बन गया। ऐसा किस तरह हुआ। यह एक लंबी कहानी है, परंतु इसकी शुरुआत किस तरह हुई, यह संक्षेप में बताया जा सकता है। इस अध्याय में दिए गए सिद्धांतों का प्रयोग शके उन्हें पहला अवसर मिला।

 

उन्होंने तेरह वर्ष की उम्र में स्कूल छोड़ दिया था और वे वेस्टर्न दुनियन में ऑफ़िस बॉय बन गए, परंतु उन्होंने शिक्षा के विचार को एक पल के लिए भी अपनी नज़रों से ओझल नहीं होने दिया। इसके रुजाय, उन्होंने खुद को शिक्षित करना प्रारंभ किया। उन्होंने अपनी यात्राओं का खर्च बचाया और बिना लंच के लंबा समय गुज़ारा ताकि उनके पास अमेरिकी जीवनियों का एनसाइक्लोपीडिया ख़रीदने लायक़ पैसा बच जाए और इसके बाद उन्होंने एक आश्चर्यजनक काम किया जिसके बारे में पहले कभी नहीं सुना गया था। उन्होंने प्रसिद्ध लोगों की जीवनियाँ पढ़ीं और इन महान लोगों को पत्र लिखा कि वे अपने बचपन के बारे में बताएँ। बॉक एक अच्छे श्रोता थे। उन्होंने प्रसिद्ध लोगों से खुद के बारे में बताने का अनुरोध किया। उन्होंने जनरल जेम्स ए. गारफ़ील्ड को पत्र लिखा जो उस वक़्त प्रेसिडेंट पद के लिए अभियान चला रहे थे और पूछा कि क्या यह सच है कि दे कभी नहर पर टो बॉय थे। गारफील्ड ने इस पत्र का जवाब दिया। उसने जनरल ग्रान्ट से एक विशेष युद्ध के बारे में पूछा और ग्रान्ट ने उसके लिए नक्शा बनाया और इस चौदह वर्ष के बच्चे को डिनर के लिए बुलवाया और पूरी शाम उससे बातें कीं।

 

जल्दी ही वेस्टर्न युनियन का यह मैसेंजर बॉय देश के बहुत ओलिवर वेंडेल होम्स. लॉगफेलो. मिसेज अब्राहम लिंकन, लुइसा में प्रसिद्ध व्यक्तियों से पत्र व्यवहार कर रहा था: राल्फ़ वॉल्डो इमर्सन एल्कॉट, जनरल शेरमैन और जेफरसन डेविस । न सिर्फ वह इन प्रसिद्ध हस्तियों से पत्र व्यवहार करता था बल्कि छुटिटयाँ मिलने पर वह उनके घर भी जाता था और उसका अतिथि के रूप में हर जगह स्वागत होता था। इस अनुभव से उसमें वह आत्मविश्वास आ गया जो कि बहुमूल्य था। इन प्रसिद्ध व्यक्तियों ने उसमें वह दृष्टि और महत्वाकांक्षा भर दी जिससे उसके जीवन का नक्शा ही बदल गया। और यह सब, मैं इस बात को दोहराना चाहता है. सिर्फ इसलिए संभव हुआ क्योंकि उसने यहाँ दिए गए सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारा था।

 

आइजैक एफ़. मार्कोसन नामक पत्रकार ने सैकड़ों प्रसिद्ध हस्तियों के इंटरव्यू लिए हैं। उनका मानना है कि कई लोग इसलिए अच्छा प्रभाव नहीं छोड़ पाते क्योंकि वे ध्यान से सुनते ही नहीं हैं। "उनका पूरा ध्यान तो इस बात पर ही लगा रहता है कि वे क्या बोलने वाले हैं इसलिए वे अपने कान खुले नहीं रखते... अति महत्वपूर्ण लोगों ने मुझे यह बताया है कि उन्हें अच्छे वक्ताओं को तुलना में अच्छे श्रोता ज़्यादा पसंद आते हैं, परंतु सुनने की कला आज दूसरी किसी भी कला से ज़्यादा दुर्लभ है।"

 

और केवल महत्वपूर्ण लोग ही अच्छे श्रोताओं को पसंद नहीं करते, सामान्य लोग भी उन्हें पसंद करते हैं। रीडर्स डाइजेस्ट में एक बार छपा था, "कई लोगों को जब श्रोताओं की ज़रूरत होती है, तो वे डॉक्टर को बुला लेते हैं।"

 

गृहयुद्ध के कष्टकारी दिनों में लिंकन ने स्प्रिंगफ़ील्ड के अपने पुराने दोस्त को चिट्ठी लिखकर वॉशिंगटन बुलवाया। लिंकन ने उसे लिखा था कि वे कुछ समस्याओं पर उसके साथ विचार-विमर्श करना चाहते हैं। पुराना पड़ोसी व्हाइट हाउस आया और लिंकन घंटों तक उसके सामने दासों को मुक्त करने के कानून बनाने के परिणामों पर बोलते रहे। लिंकन ने सारे तर्कों को दोहराया कि दासप्रथा समाप्त करने के क्या फायदे होंगे और क्या नुकसान होंगे। लिंकन ने पत्र पढे लेख पढ़कर सुनाए। कुछ में लिंकन की आलोचना की गई थी कि वे अब तक दासों को मुक्त नहीं कर पाए हैं, कई में उनकी इस बात के लिए आलोचना की गई थी कि वे उन्हें मुक्त करना चाहते हैं। घंटों तक बोलने के बाद लिंकन ने अपने पुराने पड़ोसी से हाथ मिलाया, गुड नाइट कहा और बिना उसके विचार पूछे उसे इलिनॉय रवाना कर दिया। लिंकन ने समस्या के बारे में उस दोस्त के विचार पूछे ही नहीं। पूरे समय लिंकन ही बोलते रहे। ऐसा करने से उनके विचार स्पष्ट हुए और वे सही तरीके से सोच सके। "ऐसा लग रहा या कि इस चर्चा से उन्हें काफ़ी राहत मिली थी," पुराने दोस्त ने कहा। लिंकन को सलाह की ज़रूरत नहीं थी। उन्हें केवल एक अच्छे, सहानुभूतिपूर्ण श्रोता की जरूरत थी जिसके सामने वे अपने दिल का बोझ हल्का कर सकें। हम लोग भी जब मुश्किल में होते हैं, तो हमें भी इसी बात की ज़रूरत होती है। क्रुद्ध ग्राहक, असंतुष्ट कर्मचारी या आहत मित्र भी इतना ही तो चाहते हैं।

 

आधुनिक काल के सबसे महान श्रोताओं में सिगमंड फ्रॉयड का नाम भी है। एक व्यक्ति फ्रॉयड से मिला। उनके सुनने के तरीके के बारे में उसका कहना था, "इससे मुझ पर इतना गहरा असर हुआ कि मैं उन्हें कभी नहीं भूल पाऊँगा। उनमें ऐसे गुण हैं जो मैंने किसी दूसरे व्यक्ति में नहीं देखे। मैंने किसी और को सामने वाले व्यक्ति पर एकाग्रतापूर्वक इतना ध्यान देते नहीं देखा। इसमें 'आत्मा की गहराई को बेधती नज़र' जैसी कोई बात नहीं है। उनकी आँखें कोमल और दयालु हैं। उनकी आवाज़ धीमी और सहानुभूतिपूर्ण है। उनकी मुद्राएँ कम हैं। परंतु उन्होंने मेरी तरफ़ जितना ध्यान दिया, मेरी बातों की जितनी सराहना की, हालाँकि मैंने उसे ठीक ढंग से नहीं कहा या, वह सचमुच अद्भुत और असामान्य है। आपको अंदाज़ा ही नहीं हो सकता कि इस तरह सुने जाने का क्या अर्थ हो सकता है।"

 

अगर आप यह चाहते हों कि लोग आपको देखकर मुँह फेर लें. पीठ पीछे आपकी हँसी उड़ाएँ और आपसे नफ़रत करें, तो मैं आपको इसका अचूक फॉर्मूला बता सकता है आप ज्यादा देर तक किसी की बात न सुनें। अपने बारे में ही बोलते रहें। किसी दसो के बोलते समय यदि आपके मन में कोई विचार आए तो आप जरा भी इंतज़ार न करें और सामने वाले की बात बीच में ही काट दें। उसके अधुरे वाक्य के बीच से ही अपनी बात बोलना शुरू कर दें।

 

क्या आप इस तरह के लोगों को जानते हैं ? दुर्भाग्य से में ऐसे कई लोगों को जानता हूँ और आश्चर्य की बात यह है कि इनमें कई प्रसिद्ध लोग भी शामिल हैं।

 

यह अलग बात है कि इन लोगों को उबाऊ की श्रेणी में रखा जाता है, ऐसे उबाऊ लोग जो अपने अहंकार में चूर रहते हैं और खुद को ब्रह्मांड का केंद्र मानते हैं।

 

जो लोग सिर्फ अपने बारे में बात करते हैं, वे केवल खुद के बारे में ही सोचते हैं। और "जो लोग खुद के बारे में ही सोचते हैं" वे कोलंबिया युनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट डॉ. निकोलस मरे बटले के शब्दों में, "बुरी तरह अशिक्षित होते हैं। वे शिक्षित नहीं होते, चाहे वे कितने ही पढ़े-लिखे क्यों न हों।"

 

अगर आप एक अच्छे वक्ता बनना चाहते हैं, तो ध्यान से सुनने की आदत डाल लें। अच्छे श्रोता बनें। दिलचस्प बनने के लिए लोगों की बातों में दिलचस्पी लें। ऐसे सवाल पूछें जिनका जवाब देने में सामने वाले को मज़ा आए। उनके बारे में और उनकी उपलब्धियों के बारे में बात करने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें।

 

याद रखें कि लोगों को आपमें या आपकी समस्याओं में जितनी रुचि है उससे सौ गुना ज़्यादा रुचि उन्हें अपने आपमें या खुद की समस्याओं में है। चीन में अकाल से लाखों लोगों के मरने से ज़्यादा परवाह उन्हें अपनी दाढ़ के दर्द की है। अफ्रीका में चालीस भूकंपों से ज़्यादा दर्द उन्हें अपनी गर्दन के फोड़े से होता है। अगली बार चर्चा करते समय इस बात का ध्यान रखें।

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यह था इस चैप्टर का

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सिद्धांत 4

अच्छे श्रोता बनें, दूसरों को ख़ुद के बारे में बातें करने के लिए प्रोत्साहित करें।

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और दोस्तो ये था आज का चैपटर

और अब मिलते हैं अगले नए चैपटर के साथ, नई विडियों में,

धन्यावाद, नमस्कार, जै हिन्द

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