अध्याय-1 - मेरी पहली समुद्री यात्रा - द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो -The Adventures of Robinson Crusoe - Daniel Defoe - डेनियल डिफो --- अंग्रेजी उपन्यास द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिंसन क्रूसो - डेनियल डिफो का संक्षिप्त हिंदी रूपांतरण - हिंदी रूपांतरण - अनीता गौड़ --- ऑल-टाइम ग्रेट क्लासिक्स द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो -- All-Time Great Classics : The Adventures of Robinson Crusoe --- English novel The Adventures of Robinson Crusoe - by Daniel Defoe --- Translator by Anita Gaur
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अध्याय-1 - मेरी पहली समुद्री यात्रा - द एडवेंचर्स
ऑफ रॉबिनसन क्रूसो -The Adventures of Robinson Crusoe - Daniel Defoe - डेनियल डिफो
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अंग्रेजी उपन्यास द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिंसन क्रूसो - डेनियल
डिफो का संक्षिप्त हिंदी रूपांतरण - हिंदी
रूपांतरण - अनीता गौड़
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ऑल-टाइम ग्रेट क्लासिक्स द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो
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All-Time Great Classics : The Adventures of Robinson
Crusoe
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English novel The Adventures of Robinson Crusoe - by
Daniel Defoe
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Translator by Anita Gaur
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ऑल-टाइम ग्रेट क्लासिक्स
द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनसन क्रूसो
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अध्याय-1
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मेरी पहली समुद्री यात्रा
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सन् 1632 में, सिटी
ऑफ यॉर्क के एक संभ्रांत परिवार में, मेरा जन्म हुआ था। मेरे दो बड़े भाई थे। इनमें
से एक फ्लांडर्स में अंग्रेजी सेना की पैदल रेजिमेंट में लेफ्टीनेंट कर्नल थे और स्पेनियार्ड्स
के खिलाफ युद्ध के दौरान डनकिर्क में मारे गए थे। मेरे दूसरे भाई के बारे में मुझे
कोई खास जानकारी नहीं है। जहां तक मुझे याद है, मेरी मां और पिताजी को मेरे बारे में
भी, बाद में, कुछ पता नहीं चल पाया होगा।
एक दिन हयूल में जहां
मैं आमतौर पर रहता था, मेरा एक दोस्त अपने पिता से मिलने के लिए समुद्री जहाज से लंदन
जाने वाला था। मेरी समुद्री यात्रा की लालसा को जानते हुए, उसने मेरे सामने अपने साथ
चलने का प्रस्ताव रखा। मेरे पास किराए आदि के लिए पैसे नहीं थे, तो भी उसने बिना किसी
खर्च के इस यात्रा को कराने का मुझसे वादा किया। किसी अन्य युवा की तरह मैं भी इस साहसिक
यात्रा का अवसर नहीं छोड़ना चाह रहा था। इसलिए मैं शीघ्र ही इस लंबी यात्रा के लिए
तैयार हो गया। अभी यात्रा शुरू भी नहीं हुई थी कि एक अजीबोगरीब स्थिति सामने आ खड़ी
हुई।
जहाज अभी लंगर से बंधा
हुआ ही था कि तेज हवाएं चलने लगीं और समुद्र में ऊंची तरंगें उठने लगीं। सब बड़ा भयानक
था। चूंकि मैंने पहले कभी समुद्र को देखा नहीं था इसलिए मेरे दिमाग में हलचल पैदा होने
लगी, मेरा पूरा शरीर भय से कांप उठा और मैं बुरी तरह से डर गया।
देखते-ही-देखते सागर
में भयंकर आंधी आ गई। मेरे सामने एक ऐसा आतंक छाया हुआ था, जिससे सभी भयभीत थे। यहां
तक कि वो भी जो सागर में अकसर रहा करते हैं-वह उनके घर जैसा है।
जहाज आंधी ने उग्र रूप
धारण कर लिया था। मैं देख रहा था कि के कप्तान समेत तमाम कर्मचारी अपने कार्यों के
प्रति कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो गए थे और बाकी लोग ईश्वर की प्रार्थना कर रहे थे
कि वह उनके जहाज को बचा ले।
आधी रात को जब आंधी
खत्म हुई तो निराशा की स्थिति में कुछ लोग जहाज का जायजा लेने के लिए निकले और घबराए
हुए वापस आए। उन्होंने बताया कि जहाज में एक स्थान पर छेद हो गया है, जहां चार फीट
तक पानी भर गया है।
सभी को उस
पानी को निकालने के लिए बुलाया गया। इन हालात
को देखकर मैं डर गया। मुझे लगा कि मौत अब मेरे सामने खड़ी है और केबिन में अपने बिस्तर
के पास ही घबराकर गिर गया। हालांकि वहां मौजूद अन्य लोगों ने मुझसे कहा कि घबराने से
कुछ नहीं होगा, अभी हमारे पास बचने का मौका है। यदि हम लोग सारा पानी बाहर निकाल दें,
तो हम बच सकते हैं।
इसके बाद हम सभी उस
काम में पूरी तरह से जुट गए। लेकिन काफी कोशिशों के बाद भी पानी कम होने का नाम नहीं
ले रहा था। आंधी की वजह से जहाज समुद्र में रास्ता भटककर इतनी दूर तक आ गया था कि वहां
से दूर-दूर तक कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। हम समुद्री किनारे से इतनी दूर थे कि वहां
तक तैरकर पहुंच पाना किसी भी तरह से मुमकिन नहीं था।
तभी हमारे जहाज से कुछ
दूर एक छोटा जहाज दिखाई दिया, जिससे मदद मांगने के लिए कप्तान ने बंदूक से फायरिंग
की। वह नौका हमारी मदद के लिए नजदीक आई, लेकिन इस जहाज से उस नौका पर सवार होना काफी
मुश्किल लग रहा था। हालांकि उस नौका पर सवार लोग दयालु थे और हमें बचाने का अथक प्रयास
करते हुए हमें जोरों से आवाज लगा रहे थे। जहाज पर मौजूद यात्रियों ने इसका हल निकाला
और एक मोटी रस्सी को उस नौका पर फेंकते हुए दोनों छोरों को कसकर बांध दिया। काफी मेहनत
के बाद इस काम में हमें सफलता हासिल हुई और आखिरकार हम उस नौका तक पहुंचने में कामयाब
भी हो गए।
इस नौका में सवार होने
के बाद न तो उनके और न ही हमारे दिमाग में अपने गंतव्यों तक पहुंचने की बात आ रही थी।
दोनों ही तरफ के लोगों के बीच एक मौन सहमति इसी बात को लेकर थी कि जल्द ही किसी समुद्री
तट पर पहुंचा जाए। हमारे कप्तान ने उनसे वादा किया कि एक बार समुद्री तट आ जाने के
बाद, परिस्थितियों के अनुसार, हम पूरी मदद के लिए तैयार रहेंगे। इस प्रकार समुद्र में
तैरते हुए हमारी नौका विंटनटॉन नेस से दूर नॉर्थवार्ड की ओर किनारे पर जा पहुंची।
हम जब अपने
जहाज से बचकर निकले थे, उसके महज 15 मिनट
के बाद ही वह समुद्र में डूब गया था। तब मैंने पहली बार यह समझा कि समुद्र में तैरने
वाले जहाज के पानी में डूबने का क्या अर्थ होता है।
जब हमारी यह नौका समुद्री
किनारे के नजदीक पहुंच रही थी, ठीक उसी समय वहां जोरदार लहरें उठने लगीं। वहां समुद्र
किनारे काम करने वाले श्रमिकों और मल्लाहों ने हमारे हालात को भांप लिया और सभी लोग
हमारी मदद को आगे बढ़े। लेकिन तेज लहरों में उनकी गति इतनी धीमी थी कि वे कितने समय
में हमारे पास पहुंचेंगे, इसका अंदाजा हम नहीं लगा पा रहे थे। आंधी का स्पष्ट प्रभाव
यहां भी दिखाई दे रहा था। यहां का लाइट हाउस ध्वस्त हो चुका था। तेज तूफान ने समुद्री
किनारों को बुरी तरह से नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था।
किसी तरह हम लोग किनारे
पर पहुंचे और नौका से सुरक्षित बाहर उतरे। यहां से कुछ दूर चलते हुए हम लोग यारमाउथ
पहुंचे, जहां हमें ऐसा महसूस हुआ कि हम दुर्भाग्यशालियों को अच्छे लोगों का साथ मिल
गया और हम बच गए। हमारा हालचाल जानने के लिए शहर में मजिस्ट्रेट भी हमसे मिलने आए थे।
उन्होंने वहां अच्छे घरों में ठहराने का हमारा इंतजाम किया, साथ ही हमें पर्याप्त रकम
भी मुहैया कराई, ताकि हम अपनी इच्छा के अनुसार लंदन तक की यात्रा पूरी कर सकें या फिर
वापस ड्यूल लौट सकें।
अब मेरा दिमाग दुनिया
को समझने लगा था और वापस अपने घर ह्यूल जाने की बात को सोचकर खुश था। लेकिन मेरा दुर्भाग्य
मुझे कहीं और लेकर जाना चाह रहा था इसलिए वह मेरी इस सोच में आड़े आ रहा था।
मेरे दोस्त ने, जिसने
कई बार विपरीत परिस्थितियों में मेरी सहायता की थी, जो उस जहाज के मालिक का बेटा था,
मुझे अपने साथ चलने को राजी कर लिया। मैं उसकी सारी बातें सुनता रहा और उसकी 'हां'
में 'हां' मिलाता रहा, हालांकि उसके पिता ने मुझे अपनी यात्रा यहीं खत्म कर वापस घर
जाने के लिए कहा था। उन्होंने मुझसे कहा था, "नौजवान, तुमने अभी ज्यादा समुद्री
यात्राएं नहीं की हैं। समुद्र में आने वाले खतरों को तो तुम देख ही रहे हो। इसलिए मेरी
बात मानो और वापस अपने घर चले जाओ।"
और कुछ समय बाद मैं उनसे बिछुड़ गया, मैं उन लोगों को नहीं खोज पाया।
वे लोग किस रास्ते से कहां गए, मैं नहीं जान सका। जहां तक मुझे याद है, मेरी जेब में
उस समय कुछ ही पैसे थे। मैं सड़क मार्ग से लंदन के लिए विदा हो गया और वहां की सड़कों
पर मैंने बहुत संघर्ष किया। मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि मुझे घर लौट जाना चाहिए या
समुद्र की यात्रा पर जाना चाहिए।
लेकिन घर लौटने के बारे
में सोचते ही उसके बाद की स्थितियों को भांपकर मैं सहम जाता था। मुझे घर लौटने के नाम
से ही शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। मैं जानता था कि मेरे घर लौटने से किसी को खुशी नहीं
होती-मेरे माता-पिता समेत मेरे पड़ोसी भी मेरी हंसी उड़ाते।
मैं लंदन में, एक कंपनी
में काम करने लगा, जहां कुछ सहयोगी मेरे साथ काफी बुरा बर्ताव करते थे। वे दुष्ट प्रकृति
के थे और कई चीजों में मेरा हिस्सा हड़प जाते थे। उन्हीं दिनों एक बार मौका मिलते ही
मैं सोने की गिन्नियों का कारोबार करने वाले समुद्र के तट पर एक जहाज के मालिक के साथ
उस पर सवार हो गया और मुझे वहां कामयाबी भी मिली। मैं एक बार फिर से आगे की यात्रा
पर निकल पड़ा। मेरी बातचीत से वे बहुत प्रभावित हुए, वो मेरी बातों से सहमत भी थे।
मेरी पूरी बात को सुनने के बाद उन्होंने मुझसे कहा, 'तुममें दुनिया देखने का माद्दा
है और इसकी पूरी क्षमता भी है। यदि तुम चाहो तो मेरे साथ समुद्री यात्रा पर चल सकते
हो और उसके लिए तुम्हें कुछ भी खर्च नहीं करना होगा। इसके लिए मुझे उनका दोस्त बनना
होगा।' इस प्रकार की उत्साहपूर्ण बातें सुनने के बाद मैंने उनके साथ चलने की योजना
बनाई और वाकई में यह बहुत ही साहसिक कदम था।
मैंने इस मौके को हथियाते
हुए कप्तान के साथ दोस्ती गांठ ली। कप्तान एक ईमानदार और नेकदिल इंसान था। यात्रा के
दौरान आने वाली दिक्कतों से दो-दो हाथ करते हुए हम आगे बढ़ रहे थे, साथ ही इस मामले
में मेरी परिपक्वता भी बढ़ रही थी। कप्तान के निर्देशानुसार मैंने तकरीबन 40 पाउंड
के खिलौने और कुछ सस्ती चीजें खरीदकर अपने साथ रख लीं। ये 40 पाउंड मैं अपनी पहली साहसिक
यात्रा शुरू करते समय अपने साथ लेकर चला था, जिन्हें मैंने अपने रिश्तेदारों आदि से
इकट्ठा किया था।
जहां तक मैं
समझता हूं, केवल यही समुद्री यात्रा मेरे
जीवन में सफल कही जा सकती है। इस दौरान मैंने अपने कप्तान मित्र से एकता और ईमानदारी
का पाठ सीखा। उनसे मैंने गणित और नौकायन के नियमों का पर्याप्त ज्ञान हासिल किया। समुद्री
यात्रा के दौरान होने वाली तमाम गतिविधियों को मैंने बारीकी से देखा और उन्हें समझा।
एक नाविक को किन चीजों की जरूरत होती है, इन सारी बातों को भी मैंने जाना-समझा। सारांश
में कहा जाए तो इस यात्रा के दौरान मैंने नाविक के कार्यों और समुद्री व्यापार के तमाम
पहलुओं को समझा। घर से चलते वक्त मैं अपने साथ पांच पाउंड नौ औंस के मूल्य की सोने
की गिन्नियां लेकर चला था, जो लंदन पहुंचते-पहुंचते बढ़कर तकरीबन 300 पाउंड हो गई थीं।
इससे मेरी सोच में जो बदलाव आया था, उसे मैं आज महसूस कर रहा हूं।
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और दोस्तो ये था आज
का चैपटर -
और अब मिलते हैं अगले नए चैपटर के साथ, नई विडियों में,
आप हमेशा खुश रहें, आबाद रहें, स्वस्थ रहें,
और आपका धन्यावाद, नमस्कार, जय हिन्द, जय भारत
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Reviewed by Shiv Rana RCM
on
जुलाई 04, 2026
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